वो लडक़ी - कैद

वो लड़की "उस रात" मेरी जिंदगी में एक रहस्य का  "पर्दा" लेकर आई... फिर "बेपर्दा" कर गई "ख़ौफ़ का राज" । वो मुझे ले गई "आत्मालोक" में जहां "पर्दाफ़ाश" हुआ एक ऐसी "घिन्न" का जहां से "वापसी" तब तक सम्भव नहीं थी जब तक "सोमू" अपना "बदला" लेकर गुनाहगारों को  "सज़ा "न दिला दे...पर शायद सज़ा मुझे मिलने जा रही थी , एक "कैद" के रूप में.... अब आगे।


                      अध्याय 12 - कैद         

                                    
हवेली की पिछली दीवार पर लगे पर्दों और उनके पीछे छिपी काली दीवारों के दरवाजों को मैं अच्छी तरह से पहचानता था इस दृश्य को देखकर मन ही मन मैंने भगवान को धन्यवाद दिया कि उन्होंने मुझे सही जगह पर पहुंचाया है।
अब मैं उन दरवाजों से अच्छी तरह से परिचित था। इसलिए बायीं ओर से तीसरे पर्दे के अंदर चला गया। जो दिखने में एक काली दीवार थी पर उस के आर पार कोई भी जा सकता था। मैं अंदर जाकर उस तरफ बढ़ने लगा जिस तरफ पिछली बार मुझे सोमू मिली थी , पर अचानक पायल  के खनकने की आवाज़ आई और सामने से भागती हुई एक राजपूती वेशभूषा वाली लड़की आई जो "बचाओ-बचाओ" चिल्ला रही थी मुझे महंत जी की बात याद आ गई और मैं तुरंत उसकी राह में खड़ा हो गया। "रुको...! आगे मत जाओ "  यह कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। बदहवास सी मुझसे हाथ छुड़ाते हुए बोली "छोड़िए मुझे...! साहेब पर शैतान चढ़ गया है .... वह मुझे मार डालेंगे ...जाने दीजिए मुझे।"
   मैं:-        "मेरे होते हुए आप का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता" यह कहते हुए मैं उन्हें कमरे की तरफ ले कर गया।
      वो;-     "आप हमें इधर क्यों लेकर आए हैं??"
         मैं:-  "आपको कुछ बताना है"
     वो:-      "वह सब बाद में बताना पहले हमें यहां से निकलना है।" थोड़ी बेचैनी ओर डर से कांपती हुई वह बोली।
       मैं:-    "क्या आपको नहीं लगता कि यह रोज का ही काम है ......हर रोज आप यूं ही भागती हो,  हर रोज आपके साहेब आपकी जान लेने के लिए आपके पीछे भागते हैं..." आप थोड़ा सा सोच कर क्यों नहीं देखती ....क्या ऐसा सच में पहली बार हो रहा है या बार-बार होता आ रहा है..?"
       वो:-    "छोड़िए आप मुझे .....मुझे यहां से निकलना है" यह कहते हुए वह हाथ छुड़ाकर कमरे से बाहर निकलने ही वाली थी तो मैंने कहा :- "अगर आपको सामने की तरफ एक अंग्रेज पुलिस अफसर दिखाई दे ....और फिर आपको अपना अंजाम थोड़ा भी याद आ जाए ....तो आप मुड़ कर वापस आ जाना। "मेरी बात को सुनकर वह अपनी जगह पर ठिठक सी गई .....जैसे उसे बहुत कुछ याद आया हो। फिर वह जूतों की खटखट की आवाज सुनकर वापस दौड़ पड़ी । कुछ ही पल में वह फिर से कमरे में थी और रो रही थी।
       वो:-    "...मैं मर चुकी हूं??" उसने रोते हुए मुझसे पूछा तो मैंने कहा "हां ....अभी नहीं ,,आज से लगभग 200 साल पहले!!! अपनी मौत को न स्वीकारने के कारण आप पिछले 200 सालों से हर रोज मर रही हो। रोजाना आपको मौत का दर्द झेलना पड़ता है।"
           मेरी बात सुनकर उन्हें लगभग सब कुछ समझ आ गया। वह फूट फूट कर रोने लगी और उन्होंने पूछा :-"क्या मेरी रिहाई भी हो सकती है यहां से,,,,"
       मैं:-    "अगर ऊपर वाले ने चाहा,, तो जरूर होगी। मेरी छोटी बहन को जालिम ने यहां पर छुपा रखा है ...क्या आपने उसे देखा है .."मैंने उनसे सवाल किया तो उन्होंने कहा ,"मैंने तो पिछले 200 सालों से कुछ नहीं देखा है .."  और यह कहते हुए रो पड़ी। जब मैं उनको छोड़कर बाहर जाने लगा तो उन्होंने मुझसे पूछा ,"क्या वह भी यहां पर है,,"
     मैं:-     " कौन ..!!हरिया..???"   मैंने याददाश्त पर जोर डालते हुए पूछा तो उन्होंने गर्दन हिला कर हां कही।
       मैं:-    "हरिया बड़ी किस्मत वाला था.... उसकी किस्मत में केवल एक बार ही मरना लिखा था " यह सुनकर वह और भी जोर से रो पड़ी और मैं कमरे से बाहर चला गया क्योंकि मुझे सोमू को खोजना था।
           मैं उनसे और भी बात करना चाहता था उनका गम बांटना चाहता था पर क्या करूं मुझे सोमू को ढूंढना था । यह जितनी जल्दी हो जाए उतना ही ठीक है। हवेली में अंधेरा पसरा था कमरे से बाहर निकलकर जैसे ही मैं उस कमरे की तरफ निकलने को ही था तो वही बच्ची (जालिम की लड़की) चिल्लाते हुए भागती हुई दिखाई दी उसे देखकर मैं खुद को रोक नहीं पाया.... मैं उसे इस समय चक्र से मुक्त करना चाहता था। मैं उसे बताना चाहता था कि वह यह स्वीकार ले कि अब वह मर चुकी है जिससे वह हर रोज अपनी मौत को बार-बार न जिए।
           मैं उसके पीछे पीछे दौड़ता चला गया वह कमरे में जाकर बिस्तर के नीचे छिप गई। मैं भी उसके पीछे बिस्तर के नीचे गया ,, लेकिन जालिम ने पूरी हवेली को शैतानी भूलभुलैया बना रखा था । इस बार मेरे पास हवन कुंड की अग्नि (दिया)  भी नहीं थी।
मुझे बिस्तर के नीचे एक चमकती हुई सी तारे जैसी आकृति दिखाई दी यह आकृति किसी शैतानी दरवाजे का प्रतीक होती है।  इसे मैं अब अच्छे से समझता हूं ।मैंने इसके पार जाने की कोशिश की तो किसी ऐसी गली में पहुंच गया जहां दोनों तरफ जलती हुई मशालें दीवार पर टांगी गई थी। मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे वैसे मुझसे पीछे वाली मशाले बुझती जा रही थी । हर मशाल के बुझने पर बेहद ही दर्दनाक सी चीज गली में गूंज उठी थी। दिल दहला देने वाली चीखोंं के बीच में मैं आगे बढ़ता जा रहा था। लगभग 20 कदम चलने के बाद एक मशाल बुझी और आवाज आई "भैया" यह यह सोमू की आवाज ही थी।
मेरे पीछे की तरफ अंधेरा हो चुका था और वह मशाल बुझ चुकी थी जिससे आवाज आई थी। मैं आगे की तरफ गया जहां नई मशाल जल रही थी। वहां  थोड़ा उछला और उछलकर एक नई जलती हुई मशाल को अपने हाथ में ले लिया । अब उसे लेकर वापस पीछे की तरफ आया और उस पहले वाली मशाल को उतारा जिससे सोमू की आवाज आई थी । फिर मैंने अपने हाथ वाली मशाल से सोमू की आवाज वाली मशाल को जला दिया। मुझे मालूम था यहीं कहीं कोई संकेत छुपा है जिसके माध्यम से मैं सोमू तक पहुंच सकूं , क्योंकि अब तक मैं भी तिलिस्म और शैतानीजम के बारे में काफी कुछ पढ़ चुका था। दोनो मशाल की रोशनी में एक कपड़े का टुकड़ा दीवार पे चिपका दिखाई दिया। मुझे लगा इस पर शायद  कुछ लिखा होगा,,,, जैसे ही मशाल को उसकी तरफ किया तो वो कपड़ा जल उठा ओर देखते ही देखते पूरी दीवार पर आग की लपटे छा गई।
मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आ रहा था,,, शायद कोई राज़ लिखा था जो मेरी असावधानी से जल गया।
थोड़ी ही देर में आग की लपटें शांत हो गई अब दीवार पर बना हुआ कोई गुप्त दरवाजा दिख रहा था जैसे पहले भी दरवाजे मैं देख चुका था।
लेकिन यह क्या मैं दरवाजे के आर पार नहीं निकल पा रहा था । गुस्से में आकर मैंने एक मशाल को जोर से दरवाजे पर मारा जिससे वह वही टूट गई पर दरवाजा खुल गया था। शायद यह उसे खोलने का एक तरीका था। वह दरवाजा किसी सूने घर में खुला।
उस घर से बाहर निकलने पर मुझे पता चला कि यह घर अकेला नहीं है ,,, एक पूरा  गांव बसा हुआ है और पूरा गांव ही सूना है।  गांव के सारे मकान एक जैसे बनाए हुए हैं।
मैं उस गांव की गलियों में सोमू सोमू चिल्लाता हुआ घूमने लगा। 
गांव के मकान पुरानी हवेली के जैसे थे,,, पर शायद ताज़ा बनाएं गए थे। मशाल की रोशनी में ताज़ा पुती सफेदी ओर भित्ति चित्र साफ नज़र आ रहे थे। मैं हर घर को खटखटाकर अंदर झांक कर सोमू सोमू चिल्ला रहा था।
तभी एक बार फिर से आवाज गूंजी "भैया,,,,"
ये सोमू की ही आवाज थी। मैं सामने वाले घर की तरफ दौड़ा। घर पर दरवाजे की जगह पर्दे लगाए हुए थे ओर उनको हटाता हुआ मैं सीधा अंदर पहुंचा। 
घर के बायीं तरफ के कमरे में  जाने पर मेरा कलेजा मानो फटने को आ गया जब मैंने सोमू को इस हालत में देखा। जैसे उन दरिंदो ने हज़ारो जन्मों बदला लिया हो। मैं बर्दास्त नहीं कर पाया। मैंने पूरी ताकत से मशाल महिपाल के सिर पर मारी। वो बेहद जोर से चिल्लाया ओर कोने में जा गिरा।  विनीत जैसे ही पीछे घूम कर महिपा... बोलने ही वाला था की जलती मशाल मैंने उसके मुंह में  घुसा दी। वो भी जमीन पर हाथ पांव मारकर तड़पने लगा।
मैं:-    "सोमू ,,, बेटा उठो,,, चलो यहां से,,, देखो मैं आ गया तुम्हे ले जाने,,,"
उसे ऐसे देख अपने आंसू रोक न पाया।
बड़ी मुश्किल से आंख खोलने की कोशिश करते हुए वो बोली "भ,,भैया आप इतनी देर से क्यों आये "
सोमू के आंसू पोछ उसे उठाते हुए कहा "माफ कर दे बेटा,,, मैं तुझे समय रहते नहीं ढूंढ पाया।"
एक तरफ महिपाल ओर विनीत जमीन पर तड़पते हुए शोर मच रहे थे तो दूसरी तरफ मुझे ये समझ नही आ रहा था अब सोमू को कहाँ ले जाऊं क्योंकि अब तो मैं भी मर चुका था।मैंने जैसे तैसे सोमू को यहां से बाहर निकालना ठीक समझा।
मैं सोमू को थामे हुए धीरे धीरे उस घर से बाहर निकला,, निकलते ही सामने मुझे जालिम खड़ा दिखाई दिया। वह ताली बजाकर जोर जोर से ख़ौफ़नाक ढंग से हंसने लगा,,,
"बामण ...बामण.. बामण....तू नही सुधरेगा अहहहह मरने के बाद भी फिर से मरने को आ गया,,,, बामणो ने डर कर गांव के गांव खाली कर दिए ओर एक तू है जो बार बार मेरे पास मरणे आ जाता है,,,,घणा चाव है तन मेरा,,,भुगतेगा,,, बहुत भुगतेगा अहहहहहहहह।"

शायद पढ़ी हुई सारी फिलोसोफी मेरे अंदर जाग गई थी,,, मैं गरज के बोला ,"गलत,,,, गलत आदमी से उलझा है तू,,, मैंने कभी जीते जी हार नहीं मानी,,, तुझे क्या लगता है ,,, मैं मर के हार जाऊंगा,,, भुगतेगा तू,,,अब तो तू मुझे मार भी नहीं सकता क्योंकि मौत को गले लगाकर तेरा गला काटने आया हूँ,,,अब तो तू चाहकर भी मेरा कुछ नही बिगाड़ सकता," नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥"
अब मैं आत्मा हूँ,,, अब तू मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकता" सोमू को दीवार के सहारे खड़ा कर मैं पास ही के घर पे टँगी मशाल लेकर ज़ालिम की तरफ लपका।ओर वो मुझे देखकर तालियां बजा बजा कर हंस रहा था।,"किसने बताया तुम्हें यह सब ... तुझे  जिसने भी बताया होगा..
... उसने तुमसे बहुत बड़ा झूठ बोला है
.. तुझे सच जानना चाहिए ...आज मैं बताता हूं ,, जैसे ही मैं मशाल लेकर उसकी तरफ लपका उसने मेरे हाथ को कस के पकड़ा जिससे मशाल हाथ से छूट कर नीचे गिर गई और फिर उसने अपनी कमर पे बंधा एक खंजर निकाल कर  मेरे कंधे से कोहनी तक को  चीर दिया। मेरे हाथ की हड्डी मांस के हटने से साफ नजर आ रही थी। वह हंसते हुए बोला :-"देख शस्त्र आत्मा को काट सकते हैं " अब उसी मशाल को मेरे गले पर लगा कर जलाने लगा और कहा "देख इसे आग जलाती भी है " मैं दर्द के मारे जोर जोर से चीख रहा था इतना दर्द मैंने सोचा भी नहीं था कि कभी किसी को हो भी सकता है। इसके बाद उसने मुझे जोर से लात मारी मैं एक घर की दीवार को तोड़ता हुआ उसके अंदर चला गया । मुझ में उठने की हिम्मत नहीं थी मेरे हाथ पर बहुत बड़ा घाव था और मेरे गले पर जलन के कारण से बेहद दर्द हो रहा था। फिर वह उस घर में एक पानी के बर्तन को लेकर आया जिस में उबलता हुआ पानी भरा हुआ था मुझ पर डालकर वह बोला "पानी भी आत्मा को गला सकता है "मेरे पूरे शरीर पर फफोले से बन चुके थे मैं चिल्ला रहा था और वह जोर जोर से हंस रहा था उसके बाद वह मुझे पांव से घसीटकर उस टूटे घर से बाहर निकाल कर लाया। झूठ कहा गया था तुझसे ...."यह देख आत्मा को हवा सुखा भी सकती है " उसने यह कहते हुए मुझे जोर से चौराहे में फेंक दिया । फिर वहां पर आंधी चलने से धूल का एक बवंडर बनने लगा । मैं दर्द से चिल्ला रहा था और जालिम जोर-जोर से हंसे जा रहा था और कह रहा था "सब झूठ है .....सब झूठ है... सच आज तेरे सामने है।देख इस कुलधरा में तेरी आवाज अब गूंज रही है .....यह समय के आयामों को चीरती हुई जाएगी... सबको सुनाई देगी ....सुना तुमने ......सबको सुनाई देगी.... यकीन हो जाएगा लोगों को कि आत्माएं तड़पती भी है ...आत्माएं रोती भी है ..आत्माएं चिल्लाती भी है...पर अफसोस वे मरती नहीं है..उनकी किस्मत में मैं कभी खत्म न होने वाला दर्द लिख देता हूँ।"
वह बवंडर और भी घनघोर होता गया और इतना कि मैं उसके साथ साथ उड़ने लगा । वह मुझे उड़ा कर किसी अनजान जगह पर ले गया ।जो मैंने पहले भी देखी थी ..हां.. यह वही जगह थी , जहां पर जालिम की कैद में मैंने सोमू को पहली बार देखा था। उस बवंडर ने मुझे एक पर्दे के पीछे ला पटका। 2 अजीब सी रस्सियां मेरे हाथों पर जकड़ गई और मैं हवा में लटक गया। पर्दों की इस घिनौनी दुनिया में आज मैं भी कैद हो चुका था।
चारों तरफ से दर्द में कहराने की आवाजें आ रही थी। मैं खुद दर्द में बुरी तरह से तड़प रहा था समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं ..??बस सिवाय इंतजार के अब मेरे वश में कुछ नहीं था।
कुछ घण्टो  के बाद उस अंधेरी दुनिया में उजाले की हल्की सी झलक मिली जैसे बरसों बाद सूरज उगा हो। मेरे मुंह से बस यही निकला "हेल्प.... कोई मदद करो .... बचाओ .... मुझे उसे बचाना है ....मुझे उसको खत्म करना है ...कोई मुझे बचाओ,,,,"
परदे को हटाकर कोई सामने आया । जो भी था वह  चमक रहा था । अंधेरे में रहने वाली मेरी आंखें उसे देखकर चूंधिया गई थी।
"अंकित तुम यहां कैसे आए.... मतलब तुम भी मर गए!!"

क्रमशः

प्रिय पाठकों ???

                  ? कौन था ये जो मेरे अंधेरे में उजालों को भरने आया था?? जानने के लिए पढ़े वो लड़की उपन्यास का अगला अध्याय "रिहाई" जो जल्द आपके लिए उपलब्ध होगा। 
ओर हाँ थोड़ी सी शिकायत भी है आप पाठकों से ,, जब हम लेखक लोग इतना लिख रहे हैं ताकि आपके मन को सुकून मिले तो समीक्षा में चंद शब्द आप भी लिख दिया कीजिये कि कहानी कैसी चल रही है।
             कहानी पढ़ने के बाद रेटिंग ओर समीक्षा जरूर दें ओर पसन्द आने पर इस सीरीज को दोस्तों में शेयर करें। इस कहानी को निर्मित करने के लिए विभिन्न प्रकार के भारतीय ओर पाश्चात्य दर्शन के साथ साथ आधुनिक पेरानॉर्मल विज्ञान का भी समावेश किया गया है। हालांकि तन्त्र विज्ञान से इसे दूर रखा है।
                   तन्त्र विज्ञान आधारित मेरी एक अन्य कहानी "मेरा हिस्सा" है जो शायद आपको जरूर पसन्द आएगी। इसी प्रकार भूतों के साथ साथ भगवान में भी मेरी आस्था है तो आस्था उम्मीद ओर सकारत्मकता से भरपूर मेरी एक अन्य कहानी "मन्ज़िल प्यार की" भी जरूर पढ़े जो मातृभारती पर उपलब्ध है।
                   जल्द ही अगले भाग के साथ मिलता हूँ ,तब तक पढ़ते रहे मातृभारती।

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