कशिश - 13 in Hindi Love Stories by Seema Saxena books and stories Free | कशिश - 13

कशिश - 13

कशिश

सीमा असीम

(13)

लगता है कि अभी हमारा समान आया नहीं है ! राघव ने कहा !

सामान नहीं आया मतलब ?

मतलब ? लगेज वाला जहाज अभी नहीं पहुंचा है !

क्या लगेज के लिए दूसरा जहाज ? उसे कुछ समझ नहीं आता बुद्धू कहीं की उसने स्वय को झिड़का !

और फिर जब कहीं बाहर नहीं जाना आना हो तो ऐसी बुद्धि होना स्वाभाविक है !

देखो जैसे मालगाड़ी होती है न ठीक वैसे ही जहाज होता हैं ! जो हमारा समान लेकर उड़ता है ! राघव ने उसे समझाते हुए कहा !

यह मेरे मन की बात कैसे समझ गए और समझने के साथ ही उसका समाधान भी कर दिया ! पारुल ने मन में सोचा !

हे भगवान, पारुल मैं तो मज़ाक कर रहा था ऐसा नहीं होता है ! एक ही जहाज में आ जाता है जिसमें हम सफर करते हैं न, उसी में !

बना लीजिये मज़ाक, मुझे पता ही नहीं था ! वो बड़ी मासूमियत से बोली !

तब तक राघव सामान वाली ट्रॉली पर जाकर बैठ गए ! शायद वे थक गए थे ! क्या हुआ राघव ? उसने उनके पास जाकर पूछा !

कुछ भी तो नहीं बस पैरों में दर्द हो रहा था !

ओहह !

ओहह क्या ? अभी ठीक हो जाएगा !

ठीक है जी !

पारुल को लगा कि वो कितने प्यार से पूछ रही थी और वे एकदम से रुडली बोल दिये ! शायद इनकी इस तरह से ही बोलने की आदत होगी ! उसने मन को समझाया !

बेल्ट चल पडी थी और लगेज आने शुरू हो गए थे ! ले पारुल आ गये अपने बैग्स !

बैग उठाकर ट्रॉली में रख लिए और वे खुद ही उसे चलाते हुए ले जाने लगे ! पहले पारुल ने सोचा कि वो ले ले ट्रॉली फिर कहीं राघव कुछ न कह दे यह सोचकर वो चुप ही रही !अभी यहाँ से करीब पाँच घंटे की दूरी और तय करनी थी इस समय दो बज रहे थे मतलब रात हो जाएगी ! लांच का समय हो रहा था तो राघव बोले पहले खाना खा लेते हैं फिर टेकसी बुक कर लेंगे !

जी ठीक है ! पारुल ने संछिप्त सा उत्तर दिया !

चारो तरफ खूब हरियाली, एकदम से खुला खुला माहौल ! यहाँ तो कहीं भी कोई रेस्टोरेन्ट दिखाई नहीं पड रहा है कहाँ पर खाना खाएँगे ? वो सोच रही थी ! वैसे बहुत ही सुंदर और हरीयाली से हरी भरी जगह थी ! इतना बड शहर और iतनी शांति कोई शोर शराबा नहीं !

पारुल पहले टेकसी बुक करनी पडेगी बरना यह समान कहाँ लेकर घूमेंगे !

हाँ सही है !

तब तक कई टेकसी वाले आ चुके थे ! कहाँ जाना है भाई ?

राघव ने जगह समझा कर पैसे तय किए और सामान उसमे रख कर खाना खाने के लिए एक कैनटीन कैंटीन की तरफ चल दिये ! बहुत ही छोटी सी कैंटीन थी दो तीन सीटें पडी थी जिनमे लोग बैठे हुए थे !

खड़े होकर खाना पड़ेगा ?

कोई बात नहीं, खा लेंगे !

राघव ने खाने का ऑर्डर किया !

दो थाली ले आओ !

क्या हम एक थाली में ही नहीं खा सकते ! वहाँ पर लोगों को खाते देखकर पारुल ने कहा ! उन लोगों की थाली में दाल चावल अचार और प्याज व मिर्च ! उसे पीटीए था कि वो अकेले इतना खाना नहीं खा पाएगी !

ठीक है एक ही ले आओ !

खाने की थाली आ गयी थी ! मोटा चावल और पतली पानी वाली दाल !

यहाँ के लोग ऐसा खाना खाते हैं ? पारुल ने मन में सोचा !

यहाँ पर यही मिलेगा ! थोड़ा बहुत खा लो ! राघव ने उसके मन की बात को समझते हुए कहा !

पारुल मुस्कराई ! हाँ, कोई बात नहीं !

खाने की थाली सामने रखकर और दो गिलास व एक जग रखा हम लोग याचक जैसे उस लड़के की तरफ देखने लगे कि भाई चम्मच दे दो ! लेकिन वो हमे इस तरह देखने लगा मानों कह रहा हो कि हम लोग कोई अजूबा हैं !

राघव ने उससे फिर कहा सुन भाई ज़रा जल्दी से दो चम्मच ले आओ !

वो लड़का दो छोटे छोटे चम्मच रख कर चला गया ! हम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कराये !

चल भाई खा ले जो भी है !

हाँ जी ठीक है !

अलग प्रदेश की अलग खुशबू ! बहुत खूबसूरत हरियाली ताजी हवा और प्रेम से ओत प्रेत दोनों ! राघव यह मिर्ची खाओ न !

नहीं मैं मिर्ची नहीं खाता !

क्यों खा कर देखो दाल चावल के साथ बहुत अच्छी लगेगी ! पारुल ने मिर्ची उसके हाथ में पकड़ते हुए कहा !

मिर्च को अपने हाथ में लेते हुए राघव ने प्यार ने उसे देखा ! जैसे कोई अपने को पूरी तरह समर्पित कर देता है उसका कोई अस्तित्व ही नहीं बचता जो भी बस सामने वाला ही है ! वो जैसा कहता जाएगा वैसा ही करता जाएगा, किसी के सम्मोहन में बंधा हुआ ! प्रेम एक सम्मोहन ही तो है जिसमे इंसान बध जाए तो उसमे से निकालना बहुत मुश्किल होता है ! कोई जादू सा तारी हो जाता है और फिर जादूगर के इशारों पर नाचने लगता है !

राघव ने चम्मच से दाल चावल खाये फिर थोड़ी सी आलू की सब्जी और दांत से कट से जरा सी हरी मिर्च खा ली !

सी सी करते हुए राघव ने मिर्च प्लेट में रखी और गिलास में पानी लौट कर पिया फिर भी मिर्च लगना कम नहीं हुई !

यह कैसा मेरा प्रेमी है जो मेरे लिए एक हरी मिर्च तक नहीं खा सका !

क्या हुआ राघव ? बहुत ज्यादा मिर्च लग रही है ? पारुल ने थोड़ा चिंतित होते हुए पूछा !

***