कशिश - 19 in Hindi Love Stories by Seema Saxena books and stories Free | कशिश - 19

कशिश - 19

कशिश

सीमा असीम

(19)

थोड़ी ही देर में बेटर एक ट्रे में फुल प्लेट दाल फ्राई, गोभी की सब्जी का बड़ा डोंगा, दो पैक्ड दही, बड़ी प्लेट सलाद और चार रूमाली रोटियों जो कपड़े के नैपकिन में लपेट कर डलिया में रखी हुई थी !

उसने पहले टेबल पर रखे हुए सामान को समेटा फिर बड़े करीने से खाने का सारा सामान टेबल पर सजा दिया !

एक स्टूल पर पानी का जग और गिलास रख कर वो कमरे से चला गया !

ओहह माइ गॉड !! इतना सारा खाना कौन खाएगा ? पारुल के मुंह से अनायास निकल पड़ा !

जितना खाना है खा लेंगे ! राघव उसके इस एक्सप्रेशन पर मुस्कराते हुए बोला !

पारुल भी अपनी कही हुई बात पर थोड़ा शरमा गयी !

राघव ने एक प्लेट उठाई और उसमे थोड़ी सब्जी व सलाद रखा एक रोटी निकाली और खाना शुरू कर दिया !

अरे आपने दाल नहीं ली ?

ले लूँगा भाई ! आप अपनी प्लेट तो लगाओ !

पारुल का मन कर रहा था कि वो राघव की प्लेट में खाना खा ले, लेकिन शायद उसे अच्छा न लगे, ऐसे सोचते हुए बड़े बेमन से उसने अपनी प्लेट लगा ली !

खाना बहुत टेस्टी है पारुल ! लो एक गस्सा खा कर तो देखो ! राघव ने रोटी को सब्जी में लगाकर पारुल को देते हुए कहा !

वो खुश हो गयी क्योंकि यही तो वो चाहती थी ! उसने गस्सा खा लिया !

वाह बहुत टेस्टी है ! ओके अब मैं आपको दाल से खिलाती हूँ !

रोटी को तोड़कर एक टुकड़ा दाल में भिगोया और उसने स्वयं अपने हाथों से उस गस्से को राघव के मुंह में खिला दिया ! थोड़ी देर तक यही सिलसिला चलता रहा !

न जाने कहाँ से उन दोनों के बीच इतना प्यार उमड़ा आ रहा था ! मन खुशी से प्रफुल्लित हो रहा था !

रुक जाये यह वक्त यही पर ! सब कुछ थम जाये, ठिठक जाये ! यह लम्हे कभी न गुजरे लेकिन कभी सोचने से कहाँ कुछ होता है क्योंकि होता वही है जो होना होता है और वक्त तो कभी किसी के लिए नहीं रुकता फिर उनके लिए कैसे रुकता, निकल गया और गुजर गया वो लम्हा !

बार बार आए यह दिन, यह लम्हे ! पारुल ने मन में सोचा !

राघव ने बस थोड़ा सा ही खाना खाया ! पारुल ने तो उससे भी कम खाया ! सारा ख़ाना बच गया ! राघव ने फोन करके खाना ले जाने को कहा और खुद एक सिगरेट सुलगा ली !

दो चार काश लेने के बाद ऐश ट्रे में सिगरेट को मसल कर बुझाया और फोन निकाल कर नं मिलाने लगा !

उधर से किसी की आवाज आते ही वे फोन को कान से लगाए बाहर बालकनी में चले गए ! पारुल भी साथ मे बाहर जाना चाहती थी लेकिन वे शायद कोई जरूरी बात कर रहे हो और उसके सामने करने में शायद वे असहज हो ! यह सोचकर उसने टीवी ऑन कर लिया और बेड पर लेट कर देखने लगी !

थोड़ी देर यूं ही लेटे लेटे टीवी देखती रही फिर उसका मन नहीं माना और वो कमरे से बाहर आ गयी ! आसपास राघव कहीं नजर ही नहीं आ रहे थे ! कहाँ चले गए ? शायद अपने कमरे में चले गए होंगे ! राघव के दूर जाने के अहसास मात्र से ही मन में अजीब सी बेचैनी और घबराहट का अनुभव सा हुआ !

उसने अपने मन को समझाते हुए कहा अरे कोई दूर तो नहीं गए हैं यही इसी होटल के दूसरे कमरे में ही तो हैं जब चाहें वो उनको फोन करके बुला सकती है ! फोन का नंबर तो है न उसके पास और फिर रूम का फोन भी तो है !

लेकिन यह बुद्धू मन कहाँ समझता है ! खैर, वो वापस मुड़ी और अपने कमरे में जाने लगी ! उसे हल्का सा अहसास हुआ कि शायद ये राघव खड़े हैं ! उसने पलट कर देखा ! अरे यह तो यही पर खड़े हैं और वो खामखा इतना परेशान हो गयी ! वापस कमरे में जाने के बजाय वो राघव के पास आकर खड़ी हो गयी !

अरे पारुल तुम सोई नहीं अभी ?

नहीं, अभी नहीं !

क्यों नींद नहीं आ रही ?

हाँ ऐसा ही समझिए !

राघव मुस्कुरा दिये !

क्या हुआ आप हँस रहे हैं ?

क्या हँसना मना है ?

अरे नहीं नहीं ! बल्कि आप हँसिये क्योंकि आप हँसते हुए ही अच्छे लगते हैं !

अच्छा जी ! तो क्या बेमतलब भी हँसता रहूँ ?

जैसा आपका मन करे, कहकर उसने बात खत्म की !

चलो अब सो जाओ, सुबह जल्दी से निकलना है !

ओके !

पारुल अपने कमरे में आ तो गयी पर आँखों में नींद का कोई नामोनिशान तक नहीं !

उसका दिल चाह रहा था कि राघव आ जाए और पूरी रात यूं ही बातों में ही गुजर जाये !

सच में प्रेम कभी कभी कितना कमजोर बना देता है ! उसे ही देखते रहने का मन, उससे ही बात करने का मन ! क्या राघव भी यही सब सोच रहे होंगे या अपने कमरे में जाकर सो गए होंगे !

उसे बिलकुल भी चैन नहीं पड़ा और वो फिर से बाहर निकल आई ! देखा राघव अभी भी वहीं पर खड़े हैं ! उनके हाथ मे सुलगती हुई सिगरेट है ! ऊपर आसमान में न जाने क्या देख रहे हैं !

पारुल चुपके से जाकर उनके पास खड़ी हो गयी ! इतने करीब कि उनकी खुशबू को अपनी खुशबू में मिला लेना चाहती थी ! ये कैसी उल्झन होती है दो प्रेमियों के बीच में कि चाहकर भी एक दूसरे को गले नहीं लगा सकते ! झिझक आड़े आ जाती है भले ही वे उस आग में जलते रहें लेकिन कह नहीं सकते, अपने प्यार को जी नहीं सकते ! दुनियाँ का यही दस्तूर है !

जियो मत, भले ही मर जाओ !

लेकिन वो तो जीना चाहती है ! उसे जीना है अभी ज़िंदा रहना है ! दुनिया को देखना समझना है !

आई लव यू राघव !!

तुमने कुछ कहा पारुल ? राघव ने पलट कर उससे पूछा !

हाँ ! कहा है उसने जो सच है वही कहा है ! मैं तुम्हें प्यार करती हूँ !

सुनो पारुल कुछ बोलो न ?

क्या बोले वो ?

उसे कुछ समझ नहीं आया और उसने आगे बढ़कर राघव के गले मे बाहें डाल के उसके दायें गाल को जल्दी से चूम लिया ! राघव ने उसकी प्रेम भरी आँखों को पढ़ते हुए अपने तपते हुए होंठ उसके सुलग रहे होठों पर रख दिये ! मानों उन्हें किसी की फिक्र या परवाह ही नहीं कि कोई देख लेगा ! वे उन्मुक्त प्रेमी की तरह एक दूसरे की बाहों में कैद थे कि पारुल को कुछ ख्याल आया उसने खुद को राघव की बाँहों से अलग करते हुए कहा, अरे राघव ये हम क्या कर रहे हैं कोई हमें देखेगा तो क्या सोचेगा ! मैं जा रही हूँ ! वो राघव की बाहों से निकल कर सीधे अपने कमरे में आ गयी !

उसने शीशे में खुद को निहारा, चेहरे पर अलग तरह का निखार था गालों की सुर्खी थोड़ी बढ़ी हुई थी ! ओहह वो कितनी पागल है राघव उसके बारे में न जाने क्या सोच रहा होगा ? लेकिन वो तो राघव से प्रेम करती है और अगर उसने प्रेम का इजहार कर दिया तो इसमें बुराई भी क्या है ! उसने बाहर झांक कर देखा राघव अभी भी बाहर खड़े थे ! उफ़्फ़ इनका खामोश प्रेम, कितनी आग लगा रहा है, सच में वो सुलग कर मर जाएगी ! उसने गेट बंद किया और बेड पर लेट गयी, आँखों में नींद का नामों निशान नहीं था ! पूरी रात ऐसे ही करवटें बदलते हुए गुजर गयी, न जाने कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला ! सुबह हल्की खटपट की आवाज से अचानक आँख खुली देखा राघव उसके कमरे में कुछ कर रहे हैं ! वो हड्बड़ा कर उठ के बेड पर ही बैठ गयी ! अरे राघव आप ?

हाँ ! अभी अभी आया हूँ ! मेरे कमरे में लगा साकेट काम नहीं कर रहा था ! पारुल ने देखा वे इलेक्ट्रिक केटल लगाए खड़े थे ! आँखों मे अभी नींद भरी थी लेकिन उठने का समय हो गया था !

पारुल के दिल में प्यार उमड़ रहा था वो राघव को डाले लगाने को बेताव हो उठी लेकिन राघव की बेरुखी उसे परेशान कर रही ! क्यों चुप हो गए हैं राघव उनकी चुप रहने की आदत तो बिलकुल भी नहीं है ! कुछ बाते बिन कहे भी कह दी जाती हैं शायद तभी उसके मन ने उनकी हर अनकही बात को सुन और समझ लिया था किन्तु उसका दिल इस बात के लिए तैयार नहीं था !

राघव चाय के दो कप लेकर आए और उन्हें टेबल पर रख दिया ! बिना कुछ बोले और कहे एक नजर उसकी तरफ देखा और कप उठाकर चाय पीने लगे ! कितनी लाल हो रही हैं इनकी आँखें देखकर लगता है रात भर सोये नहीं हैं, वो भी तो कहाँ सो पायी थी !

पारुल का बिस्तर से उतरने का मन न होते हुए भी वो उतरी थी और सोफ़े पर आकर बैठ गयी, न जाने वो कौन सी चुम्बकीय शक्ति थी जो उसे उनकी तरफ खींचती लिए चली जा रही थी !

पारुल राघव को देखते हुए हल्के से मुस्कराई !!

न जाने कहाँ से पारुल के मन में राघव के लिए इतना प्यार उमड़ पड़ा ! उसका जी चाहा अपना सब कुछ निसार कर दे, बना ले अपना उसे सदा सदा के लिए ! भुला के दुनिया के सारे कायदे कानून ! जब हमारा प्यार सच्चा है तो दुनिया के कैसे बंधन और प्रकृति तो हमारे साथ है ही न ! वैसे भी जब आग और फूस एक जगह हो तो उन्हें जलने से कोई कैसे रोक पायेगा आखिर कब तक अपने मन को समझाया जा सकता है ! मन हार गया था और जीत प्यार की हो गयी थी ! वो उठी और राघव के गले में गलबहियाँ डाल कर उसकी नजरों मे अपनी नजर डाल दी उस वक्त सारी शर्मोहया न जाने कहाँ चली ज्ञी थी !

पारुल यह क्या कर रही हो ?

वो चुप ही रही उसने अपनी पलकें नीचे कर ली मानों स्वीकृति दे रही हो और उन शब्दों में खो गयी जो राघव उसके लिए बोल रहे थे ! रात से एकदम मौन धारण किए हुए राघव स्वय ही बोलने लगे थे !

पारुल, पारुल आई लव यू ! तुम मेरी हो, सिर्फ मेरी ! मैं तुम्हें अपनी जान से ज्यादा चाहता हूँ तुम्हारे लिए मेरी जान हाजिर है, हर समय, किसी भी वक्त !

पारुल तो कुछ सुनकर भी सुन नहीं पा रही थी ! वो तो उस अहसास में खोई थी जो वो राघव के आर्लिंगन में महसूस कर रही थी कितनी गर्माहट थी कितना अपनापन, कितनी खुशी जैसे वे इस धरती के नहीं है बल्कि जन्नत से उतर कर आए हैं और ईश्वर उनके ऊपर फूलों की वर्षा कर रहे हैं !

उनके प्रेम को तो ईश्वर ने भी स्वीकृति दे दी है फिर अब जमाने की कैसी परवाह वे सदा एक हैं और रहेंगे लेकिन उनको यह नहीं पता था कि इस नश्वर दुनियाँ में कुछ भी शाश्वत नहीं है ! हाँ प्रेम तो शाश्वत है पर उसे निभाने के लिए दो सच्चे दिल चाहिए ! सच कभी पीछे नहीं रहता देर से ही सही वो हमेशा जीत जाता है क्योंकि जीत सच की ही होती है !

कुछ न कहो बस अल्पना बनाओ और फिर सच अटल हो जाएगा कल्पना खत्म हो जाएगी !

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