कशिश - 23 in Hindi Love Stories by Seema Saxena books and stories Free | कशिश - 23

कशिश - 23

कशिश

सीमा असीम

(23)

पारुल जरा वो पानी की बोतल तो उठा कर दे देना ! राघव ने उस मौन को तोड़ा !

जी ! वो बस इतना ही कह पाई थी !

उसने उठकर साइड टेबल में रखी हुई पानी की बोतल और गिलास उसे पकड़ा दिया !

अरे भाई सिर्फ बोतल ही मांगी थी न ! वे चिड़चिड़े स्वर में बोले !

ओह ! पारुल ने उनके हाथ से गिलास लिया और मेज पर रख दिया !

ये राघव भी न वैसे बड़ा लाड़ दिखाते हैं लेकिन जरा सी गलत बात पर ऐसे बोलते हैं जो अच्छा नहीं लगता ! खैर यह तो इनकी आदत है और हर इंसान की अपनी एक आदत होती है और वो अपनी आदत से मजबूर होता है !

राघव को शायद इस बात का अहसास हो गया था कि उसे अच्छा नहीं लगा है इसीलिए बड़े प्यार और अपनेपन से बोले, यार ज़रा नीबू की चाय बनाकर पिला दे ! शायद कुछ वीकनेस कम लगे ! एक प्यार भरी नजर उस पर डाली और वो चाय बनाने के लिए उठ गयी ! चाय का मतलब सिर्फ चाय एक बिस्कुट भी नही ! पारुल ने खुद को ही समझते हुए कहा !

राघव मुस्कुराये ! उसने भी अपनी मुस्कान राघव की तरफ फेंकी ! मानों दो मूस्कान एक होकर मुस्कुराना चाहती हो ! अब कमरे में तेज सफ़ेद रंग की दूधिया रोशनी बिखरी हुई थी ! राघव ने कमरे की सभी लाइट्स ऑन कर दी थी !

उसे लेमन टी बहुत पसंद है अतः अपने लिए भी एक कप चाय बना ली ! और दोनो कप उठा कर मेज पर रख दिये ! राघव ने पिस्ते का डिब्बा उठाकर उसे देते हुए कहा, लो पारुल तुम यह पिस्ता खाओ ! तुम्हें बहुत ठंड लग रही होगी न !

हाँ ठंड तो लग रही है पर प्रेम की अगन जो मन में जल रही है उससे ठंड का एहसास ही नहीं हो रहा है ! वो मुस्कुराई तो राघव भी मुस्कुरा दिये और मुस्कुराते हुए दो सुर्ख होंठ आपस में मिलना चाहते थे, बतियाना चाहते थे !

सुनो राघव जरा चाय पीकर तो बताओ, कैसी बनी है ?

अच्छी ! वे बिना पिये ही बोले !

अरे ऐसे कैसे ?

ऐसे इसलिए क्योंकि इसमें तुमने अपना प्यार भी तो मिलाया है न, बनाते हुए और फिर जिसमें प्यार मिल जाये, उसमे किसी और स्वाद का फर्क ही महसूस नहीं होता !

सही कहा राघव ने प्रेम के स्वाद के आगे सभी स्वाद बेकार !

आई लव यू राघव !

कुछ कहा तुमने ?

नहीं नहीं कुछ भी तो नहीं ! क़हते हुए वो ज़ोर से हंसी !

राघव सिर्फ मुस्कुरा के रह गए ! दिल के अरमान अचानक से मचल पड़े ! एक कसक सी, एक हुक सी उठी मन में ! एक हो जाने की, एक दूसरे में समा जाने की ! न चाहते हुए भी वो उठी और राघव के पास जाकर बैठ गयी शायद वो अपने प्रिय को गले से लगाने को उतावली सी हो उठी थी !

आई लव यू राघव ! मन ही मन बुदबुदाई ! बाहर से कोई आहट सी सुन, राघव में खोया हुआ उसका मन एकदम से चौक गया वो उठी और फिर से उस कुर्सी पर ही जाकर बैठ गयी ! राघव मैं जानती हूँ तुम्हारे भीतर भी यही सब चलता रहता है पर तुम ऊपर से इतना नॉर्मल कैसे रह लेते हो ? कैसे इतना सब्र कर लेते हो ? कैसे अकेले कमरे में मेरे होते हुए तुम अपने मन को संभाले रखते हो ?

राघव मैं ज़ोर ज़ोर से चीख चीख कार कहना चाहती हूँ कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुम सिर्फ मेरे हो ! वो यह सब सोच ही रही थी कि कमरे में मेनका मेम का प्रवेश हुआ ! अपने नाम के अनुरूप खूबसूरत और सुदर शख्शियत की मालकिन मेनका मेम बस बदन से बहुत भारी थी !

अरे आइये आइये मैडम जी ! राघव ने बेड से उठते हुए उनको सम्मान देते हुए कहा !

हाँ हाँ ! आप बैठिए ! कमरे में सिर्फ एक ही कुर्सी थी और उस पर पारुल बैठी थी ! वो झट से उठी और जगह देते हुई बोली आइये न मैडम आप यहाँ बैठिए !

अरे बैठी रहो बेटा, मैं उधर बेड पर बैठ जाऊँगी ! वे बोली

नहीं नहीं, आप यहाँ बैठिए मैं उधर बैठ जाती हूँ ! उसके होते हुए कोई राघव की छाया को भी छु ले वो कैसे बर्दाश्त कर पाएगी ! राघव तो उसका है न सिर्फ उसका ही !

वो राघव के पास जाकर बैठ गयी ! राघव अपने पैर कंबल में लपेटे हुए टेक लगाकर अधलेटे से थे ! वो उनके पैरों की तरफ बैठी थी और उनके पाँव हल्के से उसे टच भी कर रहे थे ! वो टच मामूली सा नहीं था बल्कि उसके पूरे बदन का झनझना जाना था और मन में किसी कोलाहल का उतर आना था !

क्या हुआ आपको ? कमरे में फैली खामोशी को तोड़ते हुए वे बोली !

अरे कुछ खास नहीं हुआ है, बस बदलते मौसम और पानी का असर है ! राघव मुस्कुरा कर बोले !

कितने प्यारे लगते हैं यह राघव यूं मुसकुराते हुए !

अच्छा पर यह पारुल तो आपके लिए अकेले दवाई लेने गयी थी !

अरे यह तो पागल है बिना बताए ही चली गयी ! कहीं इधर उधर हो जाती तो मैं इसके घर वालों को क्या जवाब देता ! पर मैं इसे कैसे समझाऊँ ? राघव उसकी तरफ बड़े प्रेम से निहारते हुए बोले ! कितना अपनापन छलक रहा था उनकी बातों से !

भाई सहब जी यह इसका पागलपन नहीं है बल्कि इसे आपकी परवाह है, फिक्र है ! वे कहते हुए अजीब मुंह बनाकर मुस्कुराई !

उसे समझ नहीं आया उनका बात करने का यह ढंग ! लेकिन जाने दो उसे क्या !

चलो अब ले आई है तो देख लेना अपनी जरूरत के हिसाब से ! जैसे वे राघव को समझा रही थी !

हाँ जी यह दोनों दवाइयाँ जरूरत के हिसाब से लायी है ! राघव ने उसकी बात रखते हुए कहा !

वे हौले से मुस्कुराई ! एक गहरी मुस्कान ! उनकी मुस्कान को देखकर मन में ख्याल आया कि ना जाने क्या सोच रही हैं !

भाई पारुल मेनका जी को भी जरा लेमन टी बनाकर पिलाओ !

जी ! उसे यह मेङ्का जी न जाने कैसी लगती हैं कोई रहस्य मयी मयावी औरत की तरह से !

पारुल को इस एलेक्ट्रोनिक केटली में चाय बनानी नहीं आती थी राघव ने ही सिखाया अब तो बस हर बार उसे ही बनानी पड़ती है बिलकुल घर जैसा माहौल बना रखा है जब भी कोई उनके पास बैठने को आए चाय तो पिलाई ही जाएगी और बनाएगा कौन ? एक ही नाम पारुल !

उसने केटली में पानी डाल कर स्विच ऑन कर दिया ! मेनका जी राघव से बात कर रही थी दोनों एक ही फील्ड के थे सो वे अपनी बातों में मशगूल थे ! पारुल को सबके साथ बैठ कर भी अकेलापन लगा !

बात के बीच में स्त्री स्वतन्त्रता की बात चल पड़ी !

सुनिए मैडम क्या आप स्वतंत्र है ? क्या आप अपना जिस्म किसी को दे सकती है ?

राघव ने उनसे पूछा ! पारुल को राघव का यह सवाल बड़ा अनुचित लगा ! कोई पुरुष किसी महिला से ऐसा सवाल कैसे कर सकता है जबकि वो पहली बार आपस में मिले हो ! लेकिन वे न हिचकिचाई, न शरमाई ! बल्कि एकदम से बोली, हाँ बिलकुल ! अगर कोई इस लायक हो !

शायद राघव को उनसे इस तरह से बिंदास जवाब की उम्मीद नहीं थी !

मतलब आप पूरी स्वतंत्र हैं !

जी हाँ, मन से !

पारुल को उनका जवाब बहुत अच्छा लगा !

केटली का पानी खौल चुका था ! पारुल ने उनसे पुछे बिना ही एक चम्मच चीनी और आधा आधा नीबू निचोड़ कर लेमन टी तैयार कर दी ! ट्रे तो वहा पर थी नहीं अतः हाथ से उठाकर मेज पर रख दी !

चलो पहले चाय पी लो ! बात का रुख मोड़ते हुए राघव बोले !

चाय पीने के बाद वे बोली, चलिये यहाँ के लोकल मार्केट में घूम कर आते है कुछ स्थानीय समान अच्छा मिल जाये तो खरीद लाएँगे !

आप जाओ या इसे पारुल को अपने साथ ले जाओ अभी मेरा मन नहीं है !

अरे मन नहीं है तो क्या हुआ संग में चलिये आपका मन भी सही हो जायेगा !

राघव का मन नहीं था फिर भी वे बड़े बेमन से उनके साथ चल दिये ! हालांकि पारुल को मेनका जी की कोई भी बात अच्छी नहीं लग रही थी ! उनका राघव से इतना घनिष्ठ होकर बात करना और अपना अधिकार जताना !

पारुल भी साथ हो ली ! उसने सोचा अगर यहाँ अकेले बैठी रही तो न जाने क्या क्या सोचती रहेगी और रोती रहेगी !

उसे शायद सोचने की बीमारी लग गयी है सोचना, सोचना और सिर्फ सोचना ! ये प्रेम क्या हमे सोचने में तब्दील का देता है !

हाँ सिर्फ सोचने मे ही और सिर्फ अपने प्रिय को सोचने में !

वो बहुत ज्यादा पाजेसिव बना देता है उसके लिए जिसे वो प्रेम करता है ! वो नहीं चाहती कि राघव किसी से भी बात करे या किसी के साथ बैठे या फिर किसी के साथ कहीं आए जाये !

जब वो मेरा है तो सिर्फ मेरा है जैसे मैं हूँ उसकी सिर्फ उसकी ! लेकिन राघव को यह बात कौन समझाये ? कौन बताए ?

क्या उन्हें खुद ही समझ नहीं आता ? प्यार में डूबे दो दिल एक हो जाते है ! एक दूसरे में खो जाते हैं लेकिन राघव उसे यह अहसास तो नहीं देते !

होटल से बाहर निकलते ही ठंडक और ज्यादा लगने लगी थी ! उसका मन किया कि वो वापस चली जाये लेकिन राघव के साथ रहने का लोभ संवरण नहीं कर पायी और फिर वे उस मेनका मैडम के साथ अकेले घूमेंगे, यह बात भी तो उसे अखरती रहती ! प्रेम हमें इंसिक्योर करता है या फिर प्रेम में हमारा आत्मविश्वास खो जाता है जबकि होना तो यह चाहिए कि प्रेम हमें आजादी देता है हमें सुरक्षा देता है हमें खुशी देता है लेकिन हम इस सच को स्वीकार नहीं कर पाते हैं ! अगर हम प्रेम करते हैं तो वो भी प्रेम करेगा ही ! हम किसी को जो देंगे, हमारे पास वही वापस लौट कर आएगा ! उसने अपने दिमाग को झटकते हुए सोचा कि वो भी कितनी बड़ी पागल है हर वक्त सोचना और कुछ भी नहीं ! अपने दिमाग को सोचने से हटा कर बाजार की तरफ लगा लिया था !

पूरा बाजार सजा हुआ था ! वहाँ के लोकल सामानों से भरा हुआ ! अभी थोड़ा धुंधलका सा हो गया था तो लोग अपना समान समेटने लगे थे ! पहाड़ी इलाकों में दिन भी जल्दी निकलता है और रात भी जल्दी होती है और रात इतनी प्यारी कि आसमान में चमकते तारे इतने करीब लगते हैं मानों इन्हें अपना हाथ बढ़ाकर छु लेंगे !

बाजार में वहाँ की दालें, सब्जियाँ, फल आदि थे ! सब्जियाँ अधिकतर वहाँ की ही थी लेकिन फल मैदानी इलाके वाले भी थे और डालें भी ! मेङ्का मैडम ने वहाँ उपजाए जाने वाली दालें और फल के रेट पुछे, सूखे मेवे के भी ! तभी एक लड़की करीब 17, 18 बरस की राघव के पास आई और बोली, अंकल आप कल आ जाइए हम आपको यहाँ से ले जाने वाले फल, दालें और मेवा अच्छी तरह से पैक करवा कर दे देंगे !

सब लोग उसे ध्यान से देखने लगे !

अरे आप लोग परेशान मत होइए हम आपको मुनासिब कीमत पर दे देंगे बल्कि अंकल जी के लिए कन्शेश्न भी करेंगे !

ठीक है बेटा जी हम कल सुबह आते हैं ! राघव मुस्कुराए !

हाँ ठीक ! फिर वो लड़की भी मुस्कुरा दी !

किस समय तक आ जाये ? राघव ने उससे बात को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से कहा ! शायद वे भी उसके साथ बात करके अच्छा महसूस कर रहे थे, तभी वे उस लोभ को संवरण नहीं कर पाये !

सुबह किसी भी समय आ जाइए हमारी दुकान तो बहुत ही जल्दी खुल जाती है !

ठीक मैं सुबह आठ बजे तक आ जाता हुआ क्योंकि फिर हमें आगे घूमने के लिए निकलना है ! पारुल सोचने लगी कि हर लड़की इनकी तरफ खींची चली आती है इसमें इनका कोई दोष ही नहीं है इनके बात करने का ढंग और चेहरे पर मुस्कान बस यह दो चीजें ही काफी हैं इनको किसी भी लड़की को आकृष्ट करने के लिए !

आसमान में चमकते हुए सितारे अपने पूरे शवाब पर थे आज चाँद ने छुट्टी कर ली थी क्योंकि अभी अंधियारा पाख चल रहा था ! मेनका जी और राघव आराम से बात करते हुए चले आ रहे थे और वो शांत मन से सिर्फ तारों और आसमान को देख रही थी ! वापस होटल में आकार वो मेनका जी के साथ उनके कमरे में चली गयी और राघव अपने कमरे में ! उसने मेनका जी के साथ रुम शेयर किया था ! हालांकि राघव अपने कमरे में चले गए थे लेकिन वो खुद को उसके पास ही छोड़ गए थे ! कमरे में आकर भी यही अहसास हो रहा था कि वे उसके साथ ही है उसे पल भर भी उसके बिना अच्छा कहाँ लगता है उसे एक पल की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती ! उसका जी चाहा कि वो दौड़ के राघव के कमरे में चली जाये लेकिन मेनका जी क्या सोचेंगी ? उफ़्फ़ यह कैसी अडचन है कि लोगों के सोचने के चक्कर में अपना कीमती समय यूं ही गवां देते हैं ! उसने घड़ी में समय देखा ! 7;30 हो रहा था अभी खाना खाने जाने के लिए पूरा एक घंटा था ! क्या करूँ ? यह समय कैसे बिताऊँ ? उसे मेनका जी से बात करने में कोई इन्टरेस्ट नहीं उनकी दुनियांदारी की बातें जो उसे नापसंद हैं ! वे अपना कोई कागजी काम लेकर बैठ गयी थी ! आँखों पर चश्मा लगाकर बेहद सुंदर नजर आ रही थी !

पारुल ने भी पर्स में से डायरी और पेन निकाल कर लिखना शुरू कर दिया क्योंकि यह लेखन ही उसे इस तकलीफ से मुक्ति दिला सकता है !

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