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अनुभव अपने-अपने

विवाह के चार माह पश्चात अनिका दौज पर मायके आई थी।छोटी बुआ यामिनी को देखकर अनिका खुशी से बुआ के गले से लिपट गई।छोटी बुआ से उसकी हमेशा से खूब पटरी खाती थी, बुआ कम मित्रता का रिश्ता अधिक था उनके मध्य।उसी शहर में फूफाजी का बिजनेस था।मायके की सबसे छोटी बेटी यामिनी ससुराल में पाँच बड़ी नन्दों एवं एक छोटी नन्द के मध्य भरे-पूरे परिवार की बहू थीं।बड़ी बुआ कामिनी भी आई हुईं थीं, वे मां के साथ किचन में उनकी मदद कराते हुए गप्पें मार रही थीं।अनिका की आवाज सुनकर माँ तथा बड़ी बुआ ने भी बाहर आकर उसे गले से लगा लिया।पगफेरे पर केवल कुछ घण्टे के लिए आ सकी थी अनिका,इसलिए इसबार 10-15 दिन रहने की इजाज़त पिताजी से कहलाकर ले लिया था, हालांकि पति अपनी नवब्याहता को इतने दिन स्वयं से दूर रहने की बात पर नानुकुर कर रहे थे।

सब अनिका के ही आने की प्रतीक्षा कर रहे थे, टीका करने के पश्चात सबने एक साथ खाना खाया।ततपश्चात भाई,पापा आराम करने चले गए और चारों महिलाएं बातों में बैठ गईं, सभी अनिका के ससुराल के समाचार जानने को उत्सुक थे,अनिका के पास भी बताने को बातों का भंडार था,नई जगह के तमाम नए रिश्ते,खट्टी-मीठी घटनाएं…..,अब इतनी बातें दो-चार घण्टों में तो समाप्त होने से रही।दोनों बुआ 1-2 दिन से अधिक रुक नहीं पाती थीं क्योंकि बड़े फूफाजी को बुआ का मायके जाना पसंद नहीं था और छोटी बुआ के लोकल में होने के कारण एक दिन बाद फूफाजी ही चले आते थे, फिर तो आवभगत में सारा समय निकल जाता था, इसलिए बुआ झुंझलाकर वापस चली जाती थीं लेकिन इस बार दोनों बुआएँ अनिका के आग्रह पर एक सप्ताह रुकने के लिए आईं थीं।

दूसरे दिन से सभी मिल-जुलकर काम निबटाने के बाद आराम से बातों में बैठ जाते।बातों -बातों ने अनिका ने प्रसन्नता से कहा कि ससुराल में बिल्कुल मायके जैसा ही माहौल है।

सुनकर धीर-गम्भीर कामिनी बुआ ने कहा,"भगवान करें,हमेशा ऐसा ही बना रहे।"फिर वे अपनी जिंदगी की किताब के अनुभवों के कुछ पन्नों की बातों को बताने लगीं।विवाहोपरांत गृह प्रवेश में सासुमां ने कहा था कि कामिनी बेटा, देवर-नन्द को अपने भाई-बहन सा स्नेह एवं सम्मान दोगी तो बदले में तुम्हें भी वैसा ही मिलेगा।विवाह के एक माह पश्चात ही होली का त्यौहार था,ससुराल में पहले त्यौहार को लेकर वे बेहद उत्साहित थीं, उन्हें रंगों का बेहद शौक था।उस समय हर अवसर पर यथा होली,दिवाली,नववर्ष, जन्मदिन इत्यादि पर ग्रीटिंग कार्ड भेजने का चलन था।मायके से आई ग्रीटिंग कार्ड में रँग का एक छोटा सा पाउच था,रात के खाने से निबटने के पश्चात उन्होंने एक छोटी सी कटोरी में एक चुटकी रँग घोला औऱ छोटी नन्द को जरा सा शगुन के तौर पर लगाना चाहा, छीना- झपटी में रँग जमीन पर बिखर गया, नन्द को जरा सा लगाकर नीचे अपने बेडरूम में सोने चली गईं।रात में ही नन्द ने फर्श का रँग छुड़ाया औऱ खुद भी नहाया।दूसरे दिन जब वे ऊपर आईं तो सास ने सख्त शब्दों में हिदायत दी कि इस घर में तुम्हारे मायके का हिसाब नहीं चलेगा,यहाँ की बहू हो,बहू के तरीके से रहो।उसके बाद उन्होंने कभी भी रंगों को हाथ नहीं लगाया।होली वाले दिन देवर-नन्द ने खूब रँग लगाया,उन्होंने बस अबीर से शगुन कर दिया।तेरे फूफाजी सब समझ रहे थे, एकांत मिलने पर कहा भी कि मुझे तो रँग लगा दो,लेकिन मैंने सिर्फ गुलाल ही लगाया।

जब अंशु हुआ था तो यामिनी को सहारे के लिए बुला लिया था।एक माह के पश्चात किसी बात पर सासुमां ने कहा कि तुम यह मत सोचना कि अपने देवर से यामिनी की शादी करा दोगी।मैंने अपने क्रोध को नियंत्रित कर बस इतना ही कहा कि यामिनी को न तो इतना छोटा कस्बा पसंद है न मेरा देवर।इसीलिए इसके बाद मैंने कभी भी यामिनी को अपनी ससुराल में नहीं बुलाया।

अनिका की तरफ देखते हुए बड़ी बुआ ने कहना जारी रखा। तेरे पिताजी के विवाह से साल भर पहले ही यामिनी का विवाह हुआ था।बड़े फूफाजी को घर का सदस्य समझकर थोड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जबकि छोटे फूफा पर नए दामाद के कारण थोड़ा अधिक ध्यान दिया जा रहा था।बड़े फूफाजी इस बात से नाराज हो गए कि मुझे सम्मान नहीं दिया जा रहा है छोटे के आगे।बढ़ी मुश्किल से विवाह में सम्मिलित हुए थे, दूसरे दिन ही चले गए थे।इसीलिए मैंने यामिनी को भी सलाह दिया था कि ससुराल एवं मायके के रिश्तों में थोड़ी सम्मानजनक दूरी अवश्य बनाकर रखनी चाहिए।

यामिनी बुआ ने भी उनकी बात का अनुमोदन करते हुए अपने अनुभव बताना शुरू किया।हनीमून से लौटते हुए छोटी नन्द के लिए मैं सूट लेकर आई थी,लेकिन उन्होंने मेरी भावनाओं की बेकद्री करते हुए वापस कर दिया कि यह रँग मुझे पसंद नहीं।देवर एवं इनके लिए एक जैसा सूट का कपड़ा शादी में गया था, जिसे देवर ने कभी नहीं बनवाया।दीदी के सलाह के अनुसार मैं प्रारंभ से ही सचेत थी,वैसे भी शुरुआत में ही सास ने समझा दिया था बहू के कर्तव्यों एवं संस्कारों के बारे में।एक बार की घटना है, छोटी नन्द ने कहा,"भाभी,आज तबियत सही न होने के कारण भूख नहीं है, मेरे लिए रोटी मत बनाना,मैंने नहीं बनाया,बाद में बतंगड़ बना कि मैं देवर-नन्द के लिए रोटी नहीं बनाना चाहती।अक्सर रोटियां बचती थीं तो सबसे बाद में खाने के कारण मुझे निबटानी पड़ती थीं, कभी तो एकाध छिपाकर बंदरों को डाल देती थी।एक दिन मैंने कहा कि अगर पहले ही बता दें कि किसे कितनी खानी है तो उपयुक्त रहेगा, इसपर सास ने खूब खरी-खोटी सुनाई।

छोटी नन्द खूब मजाक कर लेती थीं, उनकी एक घनिष्ठ सखी अक्सर मिलने आती, चाय-नाश्ता देने के बाद मैं थोड़ी देर साथ बैठ जाती।एक दिन शाम के समय वह आई हुई थी, मैंने उठते हुए कहा कि पतिदेव आ गए हैं, उन्हें चाय देकर आती हूँ।बाद में सास ने कहा कि तुम्हें बात करने की तमीज भी नहीं है, तुम्हें कहना चाहिए कि आपके भाई साहब आएं हैं।एक बार जाड़ों में धूप में सास चारपाई पर बैठी हुई थीं,मैं भी काम निबटाकर कुर्सी पर वहीं बैठ गई, सास ने तुरंत टोका कि तुम्हें मुझसे नीचे बैठना चाहिए, मैं उसके पश्चात चुपचाप चटाई बिछाकर बैठने लगी।

जब अनिका हुई थी तो मैं देखने आ रही थी तो सास भी साथ आईं।मां खूब नाराज हुईं सास को लाने के लिए कि अभी तो विशु के होने पर तेरी सास की ढेरों मांग को पूर्ण करने में कितना खर्च हुआ है, अब फिर विदाई देनी पड़ेगी, तुम्हें तो पता होना चाहिये कि तुम्हारे भाई की आय इफ़रात नहीं है।भाभी ने अपने लिए उनके मायके से आई हुई साड़ी मेरी सास को दिया,फिर भी सास ने घर आते ही वह साड़ी यह कहते हुए मुझे दे दी कि तेरे मायके वालों से एक ढंग की साड़ी भी नहीं देते बनी।खैर, तमाम बातें हैं, कहाँ तक बताएं, कुल मिलाकर सार यह है कि मायके एवं ससुराल के रिश्तों में थोड़ी दूरी,थोड़ी गोपनीयता अवश्य बनाकर रखनी चाहिए,इससे सम्बंध अच्छे बने रहते हैं।कई बार कहने का तात्पर्य कुछ होता है और मतलब कुछ और निकाला जाता है।कभी कोई घटना दूरगामी दुष्परिणामदायक होती है, इसलिए सोच-समझकर बातें कहनी चाहिए।

माँ खामोशी से सब सुन रही थीं, ऐसा नहीं था कि उनके पास अनुभवों की कमी थी,हम सभी जानते थे कि दादी बेहद तेज-तर्रार थीं,दादाजी औऱ पिताजी की भी हिम्मत नहीं थी उनके समक्ष कुछ कहने की, लेकिन बुआओं के सामने उन्हें व्यक्त करना उन्हें उचित नहीं प्रतीत हो रहा था, आखिरकार मेरी दादी उनकी माँ थीं।

सबकी बातें सुनकर अनिका मन ही मन सोच रही थी कि मैंने तो अभी गृहस्थी की शुरुआत की है, मेरी जिंदगी की डायरी में भी ढेरों अनुभवों के पन्ने जुड़ते चले जाएंगे।

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Rama Sharma Manavi