Ant - 8 in Hindi Moral Stories by निशा शर्मा books and stories PDF | अंत... एक नई शुरुआत - 8

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अंत... एक नई शुरुआत - 8

ज़िंदगी प्यार का गीत है,
इसे हर दिल को गाना पड़ेगा!
ज़िंदगी गम का सागर भी है,
हंस के उस पार जाना पड़ेगा!!

मेरी माँ हमेशा यह गीत गुनगुनाया करती थीं।ये मूवी उन्होंने तब देखी थी जब मैं उनके पेट में थी और वो हमेशा मुझे यही कहा करती थीं कि मैं बिल्कुल इस मूवी की नायिका 'पद्मिनी कोल्हापुरी' की तरह ही लगती हूँ।बस मेरा रंग कुछ गहरा हो गया जो कि धीरे-धीरे हल्का पड़ जायेगा मगर वो हल्का नहीं पड़ा,माँ ...माँमममाआआआआआ.....तुम कहाँ हो माँ????मुझे अपनी माँ की जब भी बहुत ज्यादा याद आती है तब अनायास ही ये ही गीत अपने-आप ही मेरे होठों पर उतर आता है!

आज समीर की बरसी है।न जाने क्यों आज मुझे समीर के साथ माँ भी बहुत ज्यादा याद आ रही है।यूं तो कहने को कई आये हैं आज यहाँ मेरे गम में शामिल होने के लिए मगर जो सचमुच मेरे गम में शामिल हैं वो है मेरी सहेली पूजा और मेरी मैम स्मिता!

पंडित जी आ चुके हैं और पूजा बस शुरू होने ही वाली है।मैं सबके सामने बैठी तो हुई हूँ मगर मैं यहाँ नहीं हूँ।मेरा मन,मेरी आत्मा,मेरी सोच,सबकुछ सिर्फ और सिर्फ समीर के साथ है।उनकी यादों,उनकी बातों और उनके साथ बिताए हुए लम्हों के साथ!

पंडित जी द्वारा करवाई जा रही विधियों के बीच में ही मेरा फोन कई बार बजा था।वैसे तो मेरे पास फोन कम ही आते हैं और फिर जिन लोगों के दो-चार फोन आते भी हैं,वो सब तो इस वक्त मेरे सामने ही हैं तो फिर ये कौन है जो मुझे लगातार फोन किये जा रहा है।कुछ पल को ये ख्याल आया और मैं बस देखने ही जा रही थी कि किसका फोन है पर तभी ऊषा देवी की आवाज और उस आवाज से लिपटे हुए कई आदेश और हिदायतें मेरे पास आ गए जिनके चलते मैं चाहकर भी अपना फोन नहीं देख पायी।

धीरे-धीरे लोग अपने जुड़े हुए हाथों के साथ मेरी आँखों से ओझल होने लगे।स्मिता मैम भी जा चुकी थीं बची थी तो बस पूजा और वो भी बस निकलने के लिए मुझसे कह ही रही थी कि तभी मेरे फोन की घंटी ने एक बार फिर से मुझे अपनी ओर खींचा और इस बार मैं उसे उठाने में कामयाब भी हो गई।

मैंने जब फोन को अपने कान से लगाकर हैलो बोला तब दूसरी तरफ़ से किसी औरत की आवाज सुनाई पड़ी।मैं बस आवाज को पहचानने की कोशिश ही कर रही थी कि तभी उसनें कहा कि मैं उसे नहीं जानती मगर वो मुझे बहुत अच्छी तरह से जानती है और वो मुझसे अभी तुरंत मिलना चाहती है।उसकी इस बात को या कह लूं कि फिल्मी सी बात को मैं आजकल दिल्ली जैसे बड़े शहर के गोरखधंधे मानकर उसका फोन काटने ही वाली थी कि तभी उसनें मुझसे कुछ ऐसा कह दिया कि मैं उसका फोन अपने कान से लगाये हुए ही तेज कदमों के साथ अपने घर से बाहर निकल गई।मुझे इस तरह से तेजी में बाहर जाते हुए देखकर किसी अंदेशे से भरकर पूजा भी मुझे पुकारती हुई मेरे पीछे हो ली।कुछ ही देर में पूजा और मैं एक ऑटोरिक्शा में बैठकर फोर्टिस अस्पताल की ओर जा रहे थे।पूजा मुझसे पूरे रास्ते तरह-तरह के सवाल-जवाब करती रही और मैं हाँ-हम्म के अलावा उससे और कुछ भी न कह सकी।मेरे कान से लगा हुआ फोन अब मेरे हाथ में था और मेरे दिमाग में था बस...फोर्टिस अस्पताल,वॉर्ड नम्बर-तीन और फर्स्ट-फ्लोर!!

अब हम दोनों उस औरत के कहेनुसार उस अस्पताल के उसी वॉर्ड के अंदर खड़े थे कि तभी मेरी नज़र तीन नम्बर बेड पर लेटी हुई एक औरत पर गई जो कि उम्र में मुझसे कुछ साल छोटी ही रही होगी।मैं उधर से नज़र हटाकर कहीं और देख पाती कि तभी उस औरत नें मुझे अपने हाथ के इशारे से अपनी ओर बुलाया।मैं अब समझ चुकी थी कि मुझे फोन करने वाली यही औरत है।मैंने जब उसे नज़दीक जाकर देखा तो मैं उसे बस देखती ही रह गई।वो बेहद खूबसूरत थी।रंगत इतनी सफ़ेद कि छू लो तो मैली हो जाये,आँखें हलके नीले रंग की,होंठ तो सचमुच गुलाब की पंखुड़ियों जैसे ही थे और लम्बे रेशमी बाल जो उसके तकिए पर बिखरे हुए थे।उसे देखकर मुझे पहली बार जीवन में शायरों की गज़लों पर विश्वास हुआ कि हाँ सचमुच खूबसूरती होती है,होंठ सचमुच गुलाब की पंखुड़ियों के मानिंद होते हैं।मैं तो बस उसे देखती ही जा रही थी कि तभी पूजा नें मुझे झकझोर कर पूछा....सुमन कौन है,ये?मैं उसकी बात का जवाब दे पाती उससे पहले ही उस बेड पर लेटी हुई खूबसूरत औरत नें मुझे उसके नज़दीक बैठने का इशारा किया और मैं चुपचाप उसके करीब बैठ गई।

"मेरा नाम नीलोफ़र है और मेरे पास अब वक्त बहुत कम बचा है,डॉक्टरों की हर मुमकिन कोशिश भी अब नाकाम हो चुकी है।ये मेरी साँसें मैंने सिर्फ़ आपके आने के इंतज़ार मे ही रोककर रखी हुई थीं।",वो औरत बहुत ही धीमी आवाज़ में और लड़खड़ाती जुबान से धीरे-धीरे ये सब बोलती जा रही थी।ऐसा लग रहा था कि मानो उसे बोलने में भी बहुत तकलीफ़ हो रही हो!!

वो इतनी खूबसूरत थी मगर उसके नज़दीक बैठने पर मुझे ये एहसास हुआ कि शरीर से वो इस वक्त बिल्कुल ही जर्जर हो चुकी थी और उसके चेहरे का नूर भी खत्म सा हो रहा था।मगर सफ़ेद पड़ते हुए उस खूबसूरत से चेहरे पर मेरी मौजूदगी से आयी हुई एक चैन और सुकूनभरी मुस्कान को मैं बहुत अच्छे से महसूस कर पा रही थी।

क्रमशः...

लेखिका...
💐निशा शर्मा💐