Ant - 10 in Hindi Moral Stories by निशा शर्मा books and stories PDF | अंत... एक नई शुरुआत - 10

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अंत... एक नई शुरुआत - 10

इन सबके बीच मैं निर्मोही उस नन्ही सी जान को तो भूल ही गई और जब ख्याल आया तब उसकी हालत देखकर मैं बुरी तरह से काँप उठी।उसका बदन बुखार के कारण एकदम आग की तरह तप रहा था और वो बिल्कुल गुमसुम सा लेटा हुआ था,न बोलता था और न ही आँखें ही खोलता था।मैनें आननफानन में उसे गोद में उठाया और उसे लेकर दौड़ती हुई सीधे अस्पताल पहुँच गई जहाँ रात का समय होने के कारण डॉक्टर की उपलब्धता के नाम पर मुझे बस इमरजेंसी-स्टाफ ही मिला और तभी पूजा का फोन बज उठा जो कि एयरपोर्ट पहुँचकर मुझे कॉल कर रही थी।फिर जब आलोक को बच्चे की हालत के बारे में पता चला तो उसनें तुरंत अपने एक कॉलीग-डॉक्टर जो कि एक बच्चों का डॉक्टर था,को कॉल कर दिया।इत्तेफ़ाक़ से ये डॉक्टर मतलब कि डॉक्टर बनर्जी,इसी अस्पताल से जुड़े हुए होने के कारण कुछ ही देर में यहाँ पहुंच गए और फिर बच्चे का इलाज शुरू हुआ।

मैं आज तक इतना कभी भी नहीं घबरायी थी जितना कि आज!न जाने ये ममता मुझमें पहले से थी या आज ऊषा देवी की उस घटिया हरकत को देखने के बाद इस बच्चे का सुरक्षा-कवच बनने को जागी थी,मुझे सचमुच नहीं पता।कुछ ही देर में डॉक्टर बनर्जी ने मुझे बताया कि बच्चे की हालत बहुत नाज़ुक है,उसे बच्चों के आईसीयू में रखा गया था और वो अगले अड़तालीस घंटों तक कुछ भी नहीं कह सकते।उनके इस बयान के बाद तो मेरे हाथपांव बिल्कुल ही ठंडे पड़ गए।मैं बस अपनी हथेलियों से अपने आँसुओं को छुपाती हुई उसी अस्पताल के बाहर बने हुए मंदिर में जाकर बैठ गई।इसके बाद वो दो दिन मेरे लिए कैसे पहाड़ से गुज़रे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती।इस बीच पूजा ने स्मिता मैम को कॉल करके सबकुछ बता दिया था और अब वो मेरे साथ थीं।उन्होंने मेरे स्कूल में छुट्टी के लिए इनफॉर्म भी कर दिया था।वो बार-बार मुझे कुछ खाने या पीने के लिए कहती रहीं मगर मैंने उन दो दिनों में न तो कुछ खाया और न ही पिया!मैंने ईश्वर से बस इतना ही कहा कि मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई कि मैंने इस अबोध बालक को इस कठोरता के साथ ठुकराया और अब हे भगवान,आप मेरे कुकर्म की सजा इस तरह से मुझे न दें कम से कम उस बच्चे को तो ऐसा कष्ट न दें,प्रभु और मैं अब तब तक अन्न या जल ग्रहण नहीं करूँगी जब तक कि इस नन्ही सी जान को आप उसकी हंसती-खेलती ज़िंदगी लौटा नहीं देते!!

मेरी इन बीते हुए दो दिनों की प्रार्थना का फल अब उस मुस्कुराते हुए बच्चे के रूप में मेरी गोदी में खेल रहा था।हालाँकि वो बहुत कमज़ोर हो चुका था मगर डॉक्टर ने कहा कि अब वो खतरे से बाहर है।अगले तीन दिन और हम अस्पताल मे ही रहे जिसके बाद कई हिदायतों और दवाइयों के साथ उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

इस बार बच्चे का गृह-प्रवेश मैंने उस तरह से किया जिस तरह से कि समीर के बच्चे का गृह-प्रवेश होना चाहिए था।मैंने घर के अंदर जाकर सबसे पहले उसे अपने घर के मंदिर के दर्शन करवाये और वहीं ईश्वर के सामने ही मैंने उसका नामकरण भी किया।मैंने बच्चे का समीर से 'स' और नीलोफ़र से 'न' लेकर सनी रखा।इन सबके बीच मुझे ऊषा देवी के विरोध का कई बार सामना करना पड़ा मगर इसमें भी हर बार की तरह ही समीर के सच्चे प्यार की शक्ति ही मेरा सहारा बनी जो कि समीर ने पता नहीं कि कभी मुझसे किया भी था या नहीं मगर मैंने सिर्फ उसे ही हमेशा अपने सच्चे दिल से चाहा था।

मैं अब सनी को अपने साथ ही अपने स्कूल लेकर जाती थी।मैंने उसके लिए स्कूल की टाइमिंग के लिए एक केयर-टेकर भी रख ली थी और मेरी प्रिंसिपल ने मुझे इसके लिए अनुमति भी दे दी थी।समय अपनी ही रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था।सनी अब मेरे लिए जीने की वजह सा बनता जा रहा था।मेरे दिन की शुरुआत से लेकर मेरी रात्रि के समापन तक मेरा सबकुछ सनी के इर्दगिर्द ही घूमता रहता था।वो अब अपने घुटनों के बल चलने लगा था तो कभी सहारे से खड़े होने की कोशिश भी करता था।धीरे-धीरे सनी नें मेरे दिल में कुछ ऐसी जगह बना ली कि मैं भूलने सी लगी कि इसकी माँ नीलोफ़र है न कि मैं!!आज सनी ने पहली बार मुझे माँ बोला और उसके द्वारा बोले गये इस पहले शब्द ने मुझे सचमुच में माँ बना दिया।

क्रमशः...

💐निशा शर्मा💐