Mrityu Murti - 7 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | मृत्यु मूर्ति - 7

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मृत्यु मूर्ति - 7

बाथरूम से लौटकर बिस्तर पर लेटते ही नींद नहीं आई। इधर-उधर करके ही कुछ समय बीत गया। कमरे के अंदर की ठंडी और कौवे की आवाज को मैं अपने मन से निकाल ही नहीं पा रहा था। एक हल्का घुटन आंखों को बंद होने नहीं दे रहा था। बिस्तर पर कुछ देर इधर-उधर करने के बाद अचानक से ऐसा लगा कि इस कमरे में मेरे अलावा भी दूसरा कोई उपस्थित है। उसके सांस की आवाज और पैरों की आवाज नहीं सुनाई दे रहा लेकिन यहां कोई तो है। 6th सेंस द्वारा उसे अच्छी तरह अनुभव किया जा सकता है। मैं एक तरफ आँख बंद करके लेटा हुआ हूं। मुझे ऐसा लगा कि मेरे ठीक पीछे कोई आकर खड़ा है और वह मुझे ही देख रहा है और शायद बहुत धीरे - धीरे हंस भी रहा है। आंख बंद करके भी मानो मैं उसके हर एक क्रिया को देख रहा हूं। धीरे-धीरे मैंने अपने आँख को खोला। मैं कमरे को पूरी तरह अंधेरा करके नहीं सोता इसीलिए कम वाट का एक लाइट जल रहा है लेकिन उसका रंग हरा तो नहीं है फिर पूरा कमरा क्यों इस हल्के हरे रंग की रोशनी से भरा हुआ है? और ठीक उसके बाद ही जो मैंने स्पष्ट देखा वह है मेरे ठीक सामने ही दीवार पर एक परछाई हिल डोल रहा था। वह परछाई इस हल्के हरे रंग में धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा था। हाथ - पैर हिलाकर वह विकृत रूप से मुद्रा रहा था और उसका सिर शरीर की तुलना में बहुत बड़ा था। नहीं गलत, एक नहीं उसके जगह तीन सिर है इसलिए इतना बड़ा दिखाई दे रहा है। अकेले कमरे में लेटकर वैसी विकृत व डरावनी परछाई देख शरीर में जो अनुभूति होता है वह समझाया नहीं जा सकता। डर से आँख बंद कर लिया, सीने से दिल धक - धक कर मानो अभी बाहर आ जायेगा। मुझे तुरंत ही याद आया कि इस प्रकार का कुछ वस्तु मैंने देखा है लेकिन उस वक्त डर व आतंक से याद नहीं कर पाया । 6th सेंस फिर सचेत हुआ। कमरे के अंदर हल्का एक चलने की आवाज , वह आवाज धीरे-धीरे कमरे से बाहर की ओर खत्म होता जा रहा है। मैं कुछ देर आँख बंद कर उसी तरह लेटा रहा फिर धीरे से अपने आंख को खोला लेकिन अब कमरे में कोई हरा रोशनी नहीं है। दीवार पर दिख रही वह विकृत परछाई भी अब गायब है। मैंने क्या देखा? फिर से हलूसनेशन लेकिन क्या हलूसनेशन क्या इतना स्पष्ट होता है?
दिमाग़ की ऐसी अवस्था होने पर भी ना जाने क्यों तुरंत ही मुझे नींद आने लगा? नींद आने के ठीक पहले ही मुझे सुनाई दिया कि नीचे के कमरे से रॉकेट के भौकने की आवाज़ आ रहा है। रात को कभी कभी चूहा या कुछ देखने पर रॉकेट ऐसा करता है। धीरे - धीरे मैं नींद में खो गया।
सुबह बहुत ही बुरी तरह नींद खुला। नीचे से माँ के चिल्लाने की आवाज़ सुन मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा।

" बेटा जल्दी से नीचे आ। "

सीढ़ी से नीचे उतरते वक्त ही मैंने दृश्य को देख लिया था और वह दृश्य देख बाकी बची सीढ़ी उतर नहीं सका। मैं वहीं बैठ गया था। सीढ़ी के नीचे वाले कमरे के सामने ही मेरा रॉकेट चार हाथ - पैर फैलाकर पड़ा हुआ है। उसके शरीर में उस वक्त जान नहीं है। दोनों आँख बाहर की ओर निकला, मुँह खुला तथा जीभ बाहर निकल गया है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि उसका शरीर सूख गया था। किसी ने मानो उसके अंदर से खून व मांस को चूसकर केवल चमड़ा और हड्डी का शरीर फेंक दिया है। सुबह नींद से उठते ही वह भयंकर दृश्य मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने तुरंत ही उल्टी कर दिया। उसके बाद फिर मुझे कुछ याद नहीं। मैं शोक में खो गया बाकी सुबह कैसे बीता यह भी याद नहीं।
दोपहर को घर के सामने ही रॉकेट को कब्र दिया गया। दुःख व आतंक से मैं किसी पत्थर की तरह हो गया। रात की घटना मुझे स्पष्ट रूप से याद है। और आज सुबह उठकर यह दृश्य , मैं समझ गया कि घर के अंदर किसी कारणवश कुछ तो परिवर्तन हो रहा है। कुछ गड़बड़ है जो मुझे पता नहीं चल रहा। इन सभी घटनाओं का एक लिंक है लेकिन किसके साथ यही मुझे समझ नहीं आ रहा।
दोपहर में लेट कर कल से हो रही सभी घटनाओं को एक-एक कर मिलाने की कोशिश किया। ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि कल रात की घटना और रॉकेट की मृत्यु सब कुछ में एक लिंक है? दीवार के एक तरह सोचते हुए देख रहा था। वहां पर एक जगह मेरे द्वारा लाए गए मूर्ति पर नजर पड़ते ही मैं चौंक गया तथा से पूरा शरीर ठंडा हो गया। यही! हाँ इसी प्रकार की परछाई को मैंने कल रात देखा था। 3 सिर वाला वह परछाई और यह भी याद आया कि नींद आने से पहले मैंने रॉकेट के भौकने की आवाज सुना था। उस वक्त समझ नहीं पाया था कि क्या देखकर वह भौंक रहा है? मेरे दिमाग़ में कई बातें दौड़ने लगी। तो क्या इन सभी घटनाओं के पीछे इस मूर्ति का संबंध है?
इसके अलावा मेरे मन में यह बात भी घूम रहा था कि इस मूर्ति को घर में लाने के एक दिन के अंदर ही कई सारी हैरान कर देने वाली घटना घट गई। क्या यह मूर्ति अभिशापित है?
याद आया कि घर लौटने से पहले मैक्लोडगंज के मार्केट में उस आदमी ने कैसा अद्भुत आचरण किया था। मूर्ति को मेरे हाथ में देते ही ही वह भाग क्यों गया था? मनुष्य ऐसा तभी करता है जब वह किसी खराब चीज को किसी दूसरे पर थोप कर उससे छुटकारा पाना चाहता हो। एक पंचधातु की इतनी महंगी मूर्ति कोई फ्री में क्यों देगा? सोचने से बहुत सारी बातें सामने आती है। बहुत सारे प्रश्न मन में हैं जिसके बारे में मुझे नहीं पता।
कल रात को मुझे बहुत ही तेज ठंड लग रहा था। याद आया कि घर लौटते वक्त ट्रेन में भी बैग के अंदर इसी तरह का ठंड मैंने अनुभव किया था। मेरे बैग के अंदर उस वक्त भी यह मूर्ति थी। मेरे कमरे के अंदर भी अब वही मूर्ति है। तो क्या मेरा अंदाजा सही है? मूर्ति के साथ ही इन सभी घटनाओं का संबंध है लेकिन क्यों?
पंचधातु की एक सरल सुंदर मूर्ति के अंदर आखिर ऐसा क्या है? कुछ देर बाद ही मेरे मन ने मुझे समझाया कि ऐसा हो भी सकता है। सब कुछ मेरे अच्छे के लिए हो ऐसा नहीं हो सकता। शायद इस मूर्ति के अंदर कोई अभिशाप हो सकता है। मैं ही पागल था कि इस मूर्ति को उस आदमी से ले लिया। यह सब कुछ मुझे उस वक्त सोचना चाहिए था। उस वक्त एक बार के लिए भी मैंने इन सब बातों को नहीं सोचा। अब मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं किसी दूसरे के हाथ में यह मूर्ति दे दूं ठीक वैसे ही जैसे मैक्लोडगंज में उस आदमी ने मेरे हाथ में यह मूर्ति दे दिया था। लेकिन किस शत्रु को मैं यह मूर्ति दूं। उसके जीवन में भी यह अभिशाप उतर सकता है। मेरी धारणा अगर सही हुई तो यह एक बहुत ही अभिशापित वस्तु है। जिसके पास यह मूर्ति रहेगा उसके साथ भी मेरी तरह घटनाएं होंगी तथा घर में एक या एक से अधिक मृत्यु होगी। नहीं जानबूझकर मैं यह पाप नहीं कर सकता लेकिन अगर यह वस्तु मेरे घर में रही तो मुझे झेलना होगा। शायद रात होते ही वह फिर जाग जाएगी और फिर रॉकेट की तरह किसी और को भी! मैंने ही इसे लाया है और मैं ही इसकी कुछ व्यवस्था करूंगा। बहुत सोचकर ठीक किया कि इस मूर्ति को कहीं फेंक दूंगा। आसपास कहीं फेंका नहीं जा सकता। इसे सीधा गोमती में विसर्जन करके आऊंगा। लेकिन क्या इससे पूर्ण समाधान हो जाएगा देखते हैं? एक बार कोशिश कर ही सकता हूं।

क्रमशः....