Mrityu Murti - 9 books and stories free download online pdf in Hindi

मृत्यु मूर्ति - 9

अगले दिन 4 बजे बस स्टैंड पर अवधूत से मिला। वह सही सलामत है यह देखकर मेरे मन को शांति प्राप्त हुई। मूर्ति उसे हैंडोवर करके मैं बहुत ही चिंता में था। वहाँ से बाराबंकी के लिए बस पकड़ा। बस से बाराबंकी जाते हुए मैंने अवधूत से पूछा,
" कल रात तुमने भी कुछ देखा? "
अवधूत ने बोलना शुरू किया,
" हां , मैंने सोचा था कि तुम्हें बताऊंगा।
तुमने जो कुछ भी देखा था वह सब एकदम सही है। उस मूर्ति को जानबूझकर ही मैंने अपने कमरे में रखा था। कल रात को बहुत ही ठंड लगने के कारण मेरा भी नींद खुल गया था। नींद से जागने के बाद मैंने देखा कि कमरे के अंदर हल्के हरे रंग की रोशनी चारों तरफ बिखरा हुआ है। मैं बिस्तर पर नहीं सोता नीचे फर्श पर चटाई बिछा कर सोता हूं। नींद से जागते ही पीछे घूम कर जो दृश्य मैंने देखा उसे कोई आम आदमी देख ले तो वह वहीं डर से बेहोश हो जाता। कमरे के दीवार पर छिपकली की तरह ही दस - बारह साल की एक लड़की इधर-उधर चल रही थी। कोई मनुष्य उस तरह दीवार पर चल फिर नहीं सकता। उस लड़की की हाथ पैर कुछ ज्यादा ही बड़े थे तथा अपने बड़े - बड़े नाखूनों से दीवार को पकड़ रखा था। सबसे अचंभित कर देने वाली बात यह है कि उसके तीन बड़े-बड़े सिर थे। मैंने जैसे ही उसकी ओर देखा उसने भी मुझे देखा। उसके तीन जोड़े भयानक आंखों की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी तथा एक भयानक हंसी की आवाज पूरे कमरे में गूंजने लगा। उस आवाज़ को सुन डर से मानो पूरा शरीर कांप जाए। रात को नींद से जागने के बाद 3 सिर वाली लड़की को ऐसे दीवार पर चलते फिरते हुए देख क्या हाल होगा यह तुम समझ ही सकते हो? फिर वह लड़की दीवार से नीचे उतरी और दोनों घुटनों से लगभग रेंगते हुए मेरी तरफ बढ़ने लगी। उस वक्त ठंडी की वजह से मेरा शरीर कांप रहा था। मेरे तकिए के पास ही महाकाल यज्ञ के भस्म का थैला रखा हुआ था , अक्सर उसे सिर के पास ही रखकर सोता हूं। किसी तरह उस थैले में हाथ घुसा कर एक मुट्ठी भस्म निकाल तथा एक प्रयोग रक्षा मंत्र मन में ही बोलकर भस्म उस लड़की पर फेंक दिया। तुरंत ही कार्य हुआ , कमरे के अंदर से वह हल्का हरा रोशनी खत्म होकर कुछ सेकंड के लिए एक लाल रोशनी दिखाई दिया और लाल रोशनी खत्म होते ही सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो गया। पूरे कमरे में कहीं भी कोई नहीं था। इसके बाद पूरी रात कोई ऐसी घटना नहीं हुई लेकिन हां ऊपर के कमरे में रात भर किसी के धीरे - धीरे कराहने व इधर - उधर चलने की आवाज सुनाई देता रहा। जो भी हो आज ऐसा लग रहा है कि इस समस्या का समाधान हो जाएगा। "

मैं बस की खिड़की से बाहर उदास मन से देखता रहा। यह सब गलती मेरी ही है। इस समस्या को मैं ही उठा कर लाया था। अनजाने व्यक्ति द्वारा कोई चीज ऐसे ही नहीं लिया जाता यह बात मैं आज तक नहीं समझ पाया। मां ठीक ही कहती है कि मैं उम्र में बड़ा हो गया हूं लेकिन मन से अभी भी मैच्योर नहीं हूं। मेरे कारण ही इतने सारे लोग इस वक्त खतरे में हैं। जान से भी प्यारे रॉकेट को खोया। अपने ऊपर मुझे इस वक्त एक गुस्सा मिश्रित नफ़रत हो रहा था।

बस से जब बाराबंकी उतरा तो 5 बजकर कुछ मिनट हो रहे थे। वहाँ से ई - रिक्शे में कृष्ण प्रसाद भट्टराई के घर पहुंचने में साढ़े पांच बज गए। घर के अंदर एक काम करने वाले आदमी ने दरवाजा खोल कर हमसे जानना चाहा कि हम किससे मिलना चाहते हैं। अवधूत ने कहा कि वह कृष्ण प्रसाद जी को जाकर बोले कि अवधूत उनसे मिलने आया है।
वह नौकर अंदर चला गया और लगभग 2 मिनट बाद आकर फिर दरवाजा खोल हमें अंदर ले गया। हॉल नुमा सुंदर बड़ा घर शायद किसी हिन्दू परिवार से खरीदा था। सीढ़ी से ऊपर जाकर एक कमरे में नौकर ने हमें बैठने को कहा और बता कर गया कि कुछ देर प्रतीक्षा करो कृष्ण प्रसाद जी कुछ देर में ही आएंगे। उस कमरे में चारों तरफ कई सारे अद्भुत प्रकार की वस्तुएं रखी हुई थी तथा साथ ही एक सुंदर महक से पूरा कमरा सुगंधित था। अवधूत से पूछने पर उसने बताया कि या कस्तूरी की महक है। पूरे कमरे में कई जगह दीवार पर शेल्फ बना हुआ हैं। एक जगह मार्बल डस्ट का एक सुंदर बुद्ध मूर्ति रखा हुआ है और उसके नीचे भी कई प्रकार के देव - देवियों की मूर्ति रखा हुआ है। हमारे देश के सिक्किम व नेपाल , भूटान वाले मंदिर व मार्केट में ऐसे भयानक दर्शन वालों कई मूर्तियों को मैंने देखा है। इसके अलावा भी कई सारे पुराने किताब वहाँ रखे थे। रोल किया हुआ स्क्रिप्चर , क्रिस्टल की जपमाला, कई प्रकार का घंटा , सुंदर पीतल की कटोरी इसके अलावा और भी कई प्रकार की अद्भुत सामान वहां इधर - उधर रखा हुआ था।
अवधूत ने एक कटोरी के जैसा वस्तु दिखाकर पूछा ,
" वो क्या है जानते हो? "
" नहीं! "
" खोपड़ी के ऊपर का भाग , उससे पेय पीने का कार्य करते हैं।

दरवाजे के पास पैरों की आवाज सुनकर हम उठ खड़े हुए। एक बड़े से शरीर वाले अद्भुत कपड़ा पहने एक आदमी आकर खड़े हुए। अवधूत ने आगे बढ़कर उनको प्रणाम किया। इसका मतलब यही कृष्ण प्रसाद भट्टराई जी हैं।
हमें बैठने को बोलकर खुद सामने रखे हुए भालू के चमड़े के आसन से बने कुर्सी पर आकर बैठे।

" कैसे हो अवधूत? "

एकदम शुद्ध अवधी भाषा में प्रश्न पूछा। उनका चेहरा नेपाली की तरह है परंतु बहुत ही स्पष्ट अवधी भाषा बोलते हैं। शायद बहुत सालों से यहां रहने के कारण ऐसा है। उम्र यही लगभग साठ के आसपास होगा लेकिन देखकर ऐसा नहीं लगता। नेपाली लोगों के जैसा चेहरा गोल नहीं बल्कि उससे अगल लम्बा चेहरा है, दोनों आँख छोटे लेकिन बहुत ही उज्वल, शरीर हेल्दी , सिर पर लम्बे काले - सफेद बाल पोनीटेल करके बांधा हुआ।

" तो आज मेरे पास कैसे? "
अवधूत बोला,
" आपके पास एक समस्या के कारण आया हूं। इस बारे में आप ही हमारी सहायता कर सकते हैं। असल में मेरे इस दोस्त ने एक अनजाने व्यक्ति से एक मूर्ति पाया है। वह कोई बौद्ध देवी का है। उस मूर्ति को घर लाने के बाद से ही कई सारी अद्भुत घटनाएं हो रही है। इसी मूर्ति के कारण कल इसका प्यारा कुत्ता भी मारा गया। इस वक्त मूर्ति मेरे पास है देखिए क्या इसे पहचान सकते हैं? "

कहते हुए अवधूत ने बैग़ से लाल कपड़े में मुड़ा हुआ मूर्ति को निकाल कृष्ण प्रसाद जी को दिया। अब तक शांत चुपचाप बैठे हुए भट्टराई जी मूर्ति को ठीक से एक झलक देखने के बाद आश्चर्य में पड़ गए। उनके चेहरे के हाव - भाव को देखकर समझ आ गया कि उन्होंने इस मूर्ति को पहचान लिया है।
कृष्ण प्रसाद जी उत्तेजित होकर बोले,
" मुझे सब कुछ बताओ, कुछ भी मत छुपाना। "

हम दोनों ने कृष्ण प्रसाद जी को सब कुछ बताया। हम यह भी ध्यान दे रहे थे कि घटना को सुनते हुए उनके आंख बार-बार चौड़े हो जाते। सब कुछ बताने के बाद अवधूत ने उनके तरफ देखकर बोला,
" इसका इतिहास जानना बहुत ही जरूरी है। यह किस देवी की मूर्ति है , किस उद्देश्य से इसे जगाया गया व अबतक यह कहाँ थी?"

कृष्ण प्रसाद जी ने उस मूर्ति को दाहिने हाथ से ऊपर उठाकर बोले ,
" मुझे थोड़ा वक्त दो , इस बीच कोई भी आवाज मत करना। "

यही बोलकर उन्होंने एक लम्बा सांस लिया और अपने आँख को बंद किया।.....

क्रमशः....