Kartvya - 12 in Hindi Moral Stories by Asha Saraswat books and stories PDF | कर्तव्य - 12

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कर्तव्य - 12

कर्तव्य (12)

उदास बैठे भैया बहुत ही गहरी सोच में डूब गये ,उनके सामने पुराने दिन चलचित्र की तरह घूमने लगे ।अम्मा की बहुत याद आ रही थी । अम्मा उनके लिए रात को ही पराँठे बना कर रख दिया करतीं, उन्हें बड़े प्यार से जगाती। अपूर्व भैया पिछली बातें सोचने लगे ।

जब मैं सुबह सो कर उठता,फिर दैनिक क्रिया से निवृत्त होता तो मुझे सुबह सवेरे ही भूख लग जाती , मैं मॉं से कहता “मुझे भूख लगी है तो वह जल्द ही रात के रखे हुए बासी पराठे दही के साथ दे देतीं । किसी दिन यदि दही नहीं होता तो देशी घी और नमक लगाकर दे देती। मैं खाने के बाद ही अपने बाक़ी सब काम किया करता।

मॉं घर की सफ़ाई और दैनिक दिनचर्या के कामकाज कर भोजन बनातीं तभी घर के बाक़ी सदस्य खाना खाया करते,फिर मैं भी सबके साथ खाने का आनंद लेता। मुझे मॉं सुबह ही खिला दिया करतीं । एक दिन मॉं को ज़रूरी काम से बाहर जाना था , तो मेरे लिए पराँठे बना कर ही वहॉं गई । मॉं मुझे बहुत प्यार करतीं,मुझे मॉं की बहुत याद आती हैं

एक बार गोवर्धन की परिक्रमा लगाने मॉं पिताजी , पूरा परिवार परिक्रमा के लिए गये । सभी ने परिक्रमा पूरी करने के बाद ही भोजन किया लेकिन मुझे पहले ही बांधकर जो पूरियाँ ले गईं , उनमें से कुछ अम्मा ने मुझे खाने के लिए दे दी । साथ में पड़ोसन चाचीजी भी गई,उन्होंने मना किया तो अम्मा ने कहा मेरा अपूर्व भूख का कच्चा है ।

आज मुझे बिस्तर में लेटे हुए बहुत देर हो गई, पिताजी किसी काम से चले गये हैं । किसी ने भी मुझे जगाया नहीं न ही कोई मेरी खुशामद कर रहा , पेट में भूख लगी है कोई नहीं जो मेरे पास आकर मुझसे बात करके पूछे कि मैं क्यों उदास हूँ ।

स्वयं उठा तो देखा सब खाना खा चुके हैं और मंझले भैया ने दुकान खोल ली है । मुझे देख कर बोले “उठ गये लाडसाहब” व्यंग्य में मेरी तरफ़ देख ने लगे । मैंने कहा “भैया आप उठ जाइए,मैं दुकान पर बैठ जाऊँगा ।” मैं बैठ गया और पूरे दिन के बाद रात को ही खाना मिला।

आये दिन ऐसा होता रहता किसी को कोई चिंता नहीं सब अपने आप में ही मस्त रहते । मुझे मनाने वाले सिर्फ़ पिताजी ही थे,कभी-कभी उदास देख कर पैसे दे दिया करते मैं बाहर जाकर कचौड़ी,जलेबी खा आता। पिताजी ने मुझे प्यार से समझाया कि छोटे बच्चों का घर है खाना बनने में देर सवेर यदि हो जाये तो तुम नाश्ता बाहर कर लिया करो। अब मैं बहुत शांत हो गया समझ आ गया कि किसी से कुछ कहना बेकार है । मेरे शांत व्यवहार से सब मुझे बाबा कहकर पुकारने लगे । मोहल्ले के बच्चे बाबा कहते,धीरे-धीरे बड़े लोग जो दुकान पर सामान लेने आते वह भी अप्पू बाबा कहने लगे ।

सब अपनी अपनी गृहस्थी में मस्त हो गये और मैं समय से दुकान खोलने जाता और समय से बंद कर दिया करता । मंझले भैया आज़ादी से बहुत दिनों तक अपने परिवार की ज़िम्मेदारी देकर मनमाने दिनों में आते अब पिताजी भी कहते-कहते थक गए,कुछ न कहते शांत ही रहते ।

शाम का समय था मैं दुकान पर बैठा था,पिताजी मेरे पास ही बैठे थे। पिताजी के मित्र उनके पास बैठें बातें कर रहे थे और मैं अपने काम में लगा हुआ था ।दूसरी दुकान ख़ाली थी,उसके बारे में उन्होंने पिताजी को सलाह दी कि यदि तुम अपूर्व को दूसरे काम में नहीं लगा रहे हो तो इस दुकान को किराये पर दे दो । किराएदार आपको पगड़ी की रक़म भी देगा उसे तुम अपूर्व के नाम बैंक में जमा कर देना । उनकी सलाह पिताजी को अच्छी लगी, लेकिन उन्हें वह अपने घर की हर बात बताना नहीं चाहते थे ।
उनके जाने के बाद पिताजी चिंतित लगे क्योंकि जो कुछ पैसा था वह सब ज़िम्मेदारी उठाने में खर्च हो गया और किसी बेटे का पैसे का कोई सहारा न होने की वजह से कुछ क़र्ज़ा भी हो गया था ।

पिताजी ने सोचा क्यों न मैं यह दुकान किराए पर दे दूँ
जिससे जो बाज़ार का क़र्ज़ है कुछ चुक जायेगा । किराए दार आने लगे,एक जान पहचान का व्यक्ति दुकान लेने का इच्छुक हुआ । पिताजी को वह पहले से जानता था इसलिए बड़ा मीठा बोल रहा था । पिताजी को उसने मीठी-मीठी बातों में उलझा कर बड़े ही सस्ते किराए पर दुकान का मामला तय कर पगड़ी भी दे दी । जो पैसे आये पिताजी ने कुछ क़र्ज़ा चुका दिया ।

हर महीने किराया आता रहा और घर में ही खर्च हो जाता । अब मंझले भैया मनमानी करते जब मन होता दुकान पर बैठते या कभी बीस दिन,महीने भर बाहर चले जाते । कोई कुछ कहता तो लड़ाई करके कहते मेरी पूरी दुकान ठप कर दी,कोई आमदनी ही नहीं होती हैं ।

परिस्थितियों से लड़ते पिताजी बहुत उदास रहने लगे।
अपूर्व को भी आदत पड़ गई,उन्हीं परिस्थितियों में अपने आप को ढाल लिया । कभी-कभी बहुत रोना आता तो अकेले में जाकर रो लेता। किसी को पता नहीं लगता और सुबह होने पर उठकर अपने काम करने लगता ।

त्यौहार पर मैं और मेरी बहिनों का आना-जाना होता रहता परंतु कभी भी अपूर्व भैया और पिताजी ने कुछ भी नहीं बताया ।जब हम अपने परिवार की कोई परेशानी उन्हें बताते तो पिताजी का एक ही वाक्य हमारे लिए होता “बेटा वह तुम्हारा घर है,तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हारे अपने है उन्हीं के साथ तुम्हें अच्छी तरह रहना चाहिए ।प्यार से सभी को अपना बनाने का प्रयास करो वही सब लोग तुम्हारे अपने है।”

उनकी यह बातें सुनकर मुझे बहुत ग़ुस्सा आता कि पिता जी हमारी कोई बात सुने बिना ही हमें ही समझा देते हैं । कभी-कभी लगता कि यहॉं तो कोई हमारी बात सुनता ही नहीं,हमारे घर में अब हमारा कोई हक़ नहीं कोई हमारी परेशानी सुनने को तैयार ही नहीं तो अब हम कुछ नहीं बतायेंगे । अपनी बहुत सारी बातें करना चाहते मन हल्का करने जाते लेकिन कोई सुनने वाला ही नहीं ।समस्याओं का बोझ लेकर वापस आ जाते । फिर सोचा अपनी समस्याओं का हल स्वयं ही निकालेंगे और अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ने का प्रण करके मैं वहाँ से चली आती ।

क्रमशः ✍️

आशा सारस्वत