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अपना आकाश - 6 - 'चाहिए' और 'है' में अंतर है

अनुच्छेद-६
'चाहिए' और 'है' में अंतर है

तन्नी ओर तरन्ती दोनों का प्रवेश बी.एस-सी. प्रथम वर्ष में नहीं हो पाया। दोनों के परिवार दुखी हुए। तरन्ती की शादी की चर्चा जोर पकड़ रही थी। उसके माता-पिता शादी को अधिक ज़रूरी समझ, उसी को तय करने के लिए दौड़ने लगे। पढ़ाई छूट रही थी पर शादी हो जाने की उम्मीद बँध रही थी। तरन्ती भी भोजन बनाने में माँ की सहायता करती। उसे एक कुशल गृहिणी के गुर सिखाए जा रहे थे। वह भी अब एक गृहिणी बनने के सपने में डूबने लगी। सपनों का राजकुमार उसके मन मस्तिष्क में छाने लगा। तन्नी ने अभी अपना साहस नहीं छोड़ा। मंगल भी सोचते कि उसे कहीं प्रवेश दिला दिया जाए। उन्होंने खेती के लिए बैंक से बीस हजार रुपया निकाला। उसमे से तीन हजार रुपया तन्नी के हाथ में रखते हुए कहा-बेटी दूसरे ( स्ववित्त पोषित) महाविद्यालय में ही प्रवेश ले लो ।
'बापू, वहाँ पढ़ाई नहीं होती। प्रयोगशाला भी नहीं है।' 'पर रास्ता क्या है बेटी ?” तन्नी चुप हो गई। सचमुच उसके लिए विकल्प कम हैं। कुछ विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा लेकर प्रवेश देते है पर उसकी तैयारी भी यहाँ गाँव में बैठकर कैसे हो सकती है? घर से बाहर रहकर तैयारी करना उसके परिवार के बूते में अभी तो नहीं है।
'वत्सला बहिन जी से सलाह ले लो। वे ठीक राय देंगी।' मंगल ने बेटी से कहा । तन्नी भी उनसे मिलकर विचार विमर्श करना चाहती थी।
रविवार को तन्नी ने तरन्ती को भी साथ लिया। बहिन वत्सलाधर के दरवाजे की घंटी बजाई। वे घर पर थीं। झाँककर तन्नी और तरन्ती को देखा। दोनों ने प्रणाम किया। दरवाजा खोला। दोनों कमरे में आकर बैठ गईं। बहिन जी के यहाँ आज महरिन नहीं आई थी। कोई सूचना भी नहीं थी। जूठे बर्तन रखे थे। तन्नी उठी और बर्तन साफ करने लगी। वत्सलाधर अन्दर इनके लिए कुछ खाने का सामान ढूँढने लगीं। बेसन के चार लडडू तश्तरी में रखकर वे निकलीं । तन्नी को बर्तन साफ करते देख बोल पड़ीं, 'क्यों तन्नी, बर्तन साफ करने क्यों जुट गई?” 'बहिन जी थोड़े से बर्तन हैं । इन्हें साफ करने में कितने मिनट लगते हैं?'
सचमुच तन्नी ने चटपट बर्तन को साफ कर रख दिया। फर्श को धुला । हाथ धोया और कमरे में आकर बैठ गई । तरन्ती सोचती ही रह गई कि वह कौन सा काम करे। संकोच से गड़ सी गई।
वत्सलाधर ने लड्डू जैसे छोटी मेज पर रखा, तरन्ती उठी और तीन गिलास पानी ले आई। 'लड्डू लो' कहते हुए वत्सलाधर ने एक लड्डू स्वयं उठाया । तन्नी और तरन्ती ने भी एक एक लड्डू लेकर खाया ।
'आज कैसे तुम लोग?' वत्सलाधर ने पूछा ।
'बहिन जी हम लोगों का प्रवेश कालेज में हो नहीं पाया। दूसरे ( स्ववित्त पोषित) में हो जायेगा। आप ही से सलाह लेने आए हैं कि हम लोग क्या करें? 'यह तो अन्दाज़ था कि यहाँ तुम लोगों का प्रवेश मुश्किल है। दूसरे महाविद्यालय तीस किलोमीटर दूर हैं। वहाँ जा पाओगे?"
'साइकिल से इतनी दूर जाना कैसे हो पाएगा?' 'यही तो मैं भी सोचती हूँ। वहाँ अच्छे अध्यापक और लैब का भी अभाव है। कक्षाएँ चलती हैं। पर कम ही । ऐसी स्थिति में प्रवेश लेकर भी बहुत कुछ हासिल नहीं होगा।'
'प्रवेश होगा और परीक्षा देने का अवसर मिल जाएगा।' 'हाँ इतना तो हो ही जाएगा।' 'लेकिन बहिन जी हम लोग पढ़ कैसे पाएँगे?"
'हाँ, यह समस्या तो बनी ही रहेगी। सुना है उसके प्रबन्धक कुछ रुपये लेकर नकल करने की सुविधा देते हैं। पर इससे तो हम लोगों का कॅरियर चौपट ही हो जाएगा।' 'ठीक सोचती हो तुम। एक बार अंक कुछ कम आ जाएँ तो विज्ञान के दरवाजे बन्द ही हो जाते हैं।' वत्सलाधर कुछ सोचने लगीं। 'तुम लोगों की राह कठिन है। इधर कुआँ, उधर खाई वाली स्थिति है ।' 'इसीलिए हम लोग कुछ सोच नहीं पा रहे हैं बहिन जी।' तन्नी ने कहा। तरन्ती चुप बैठी रही लोगों की बातें सुनती हुई। उसके माता-पिता का शादी करने का निर्णय ठीक ही है। जब प्रवेश ही नहीं मिलना है तो शादी कर घर बसा लेना ही ठीक। बेकार माथापच्ची करने से क्या फायदा? वह मन ही मन गद्गद् होती रही।
'यदि स्ववित्त पोषित में प्रवेश लेना है तो किसी कोचिंग में पढ़ाई करनी होगी।' वत्सलाधर ने कुछ संकेत दिया।
'कोचिंग में कितना देना पड़ेगा?' तन्नी की चिन्ता बढ़ी ।
'हजार बारह सौ तो देना ही पड़ेगा।'
'हर महीने?
"हाँ, हर महीने। सभी पढ़ा भी नहीं सकते। कुछ लड़के मिलकर इण्टर के साथ बी. एस. सी. की कोचिंग भी चलाते हैं। उनसे ही पढ़ना होगा।' अन्दर बहिन जी का मोबाइल बज उठा। वे उठकर बात करने लगीं। आठ महीने भी कोचिंग चली तो लगभग दस हजार......कालेज में प्रवेशादि में तीन हजार। परीक्षा काल में हजार दो-हजार का और व्यय । किताब कापी में भी दो-चार हजार। जोड़ते हुए तन्नी चिन्तित हो उठी। तरन्ती चिन्तामुक्त गद्गद् । अब उसे पढ़ाई छोड़ना ही है फिर क्यों सिर खपाया जाए। तन्नी का साथ देने के लिए चली आई है वह । बात करने के बाद वत्सलाधर पुनः आकर बैठीं तो तन्नी ने पूछ लिया, 'बहिन जी अब हम क्या करें?"
"अगर कोचिंग में पढ़ सको तभी स्ववित्त पोषित में प्रवेश लो। अपनी स्थिति सोच समझकर कदम उठाओ।'
'ठीक है बहिन जी।' प्रणाम करते हुए दोनों उठीं और नीचे आ गईं। बहिन जी ने दरवाजा बंद कर दिया। लौटते हुए तन्नी ने तरन्ती से पूछा, 'तू बिल्कुल चुप रही।'
'क्या करूँ? जानती हूँ मेरे लिए विज्ञान का रास्ता बन्द हो गया। बेकार मन की उड़ान भरने से क्या फायदा?"
"यह कहो शादी में मन रमा है।' कहकर तन्नी हँस पड़ी।
'मैं ऐसा सपना नहीं देखती जिसमें गिरकर चूर चूर हो जाऊँ। प्रवेश नहीं हुआ। अब नहीं पढूँगी । ज़िन्दगी में और भी काम हैं।'
'हाँ, चूल्हा चौका तो है ही ।'
'तू क्या चूल्हे चौके से बाहर है?"
"मैं तो अब भी सोचती हूँ हिम्मत न हारिए बिसारिये न राम ।'
'सोचो भाई, कौन मना करता है? पर हमारी सीमाएं हैं। हम फड़फड़ाकर अपने को घायल कर लेंगे। मिलेगा कुछ नहीं ।'
तन्नी ने सुना, पैडिल पर कसकर दबाव डाला। साइकिल सरसराती हुई खाली सड़क पर आगे बढ़ गई।
'तन्नी क्या सचमुच फड़फड़ाकर घायल ही कर लेगी?' तन्नी बुदबुदा उठी। 'नहीं, ऐसा नहीं होगा। उसे भी उच्च शिक्षा में कदम रखने का हक है।'
“क्या तू सचमूच पढ़ाई छोड़ देगी तरन्ती?' 'हाँ मैंने सोच लिया है।' तरन्ती बोल पड़ी। 'मैंने सोचा था...तेरा साथ रहेगा तो.....?' 'सोचा तो मैंने भी था। पर केवल सोचने से कहीं काम होता है?' तरन्ती ने उत्तर दिया। ‘हूँ।' तन्नी का सोचना बंद नहीं हुआ । 'परिस्थितियाँ हमारे विपरीत हैं।' तरन्ती जोड़ती गई । 'कठिन स्थितियों का सामना हमें साहस के साथ करना चाहिए।' 'चाहिए और है में काफी अन्तर होता है तन्नी । हर सपना पूरा कहाँ होता है?"
' पर हमें प्रयास तो करना चाहिए।"
‘अवश्य मैं कहाँ कहती हूँ कि नहीं करना चाहिए। पर कुछ ऐसे अवरोध आ जाते हैं, जिन्हें हटा पाना हमारे बस में नहीं होता।' 'हूँ।' तन्नी के मुख से फिर निकला, 'तो अकेले ही आगे का रास्ता तय करना होगा ।' तन्नी ने लम्बी साँस ली। पैडिल पर जोर पड़ा, साइकिल बढ़ चली।
"मैं चाहती थी तेरा साथ देना पर लगता नहीं कि सार्थक परिणाम निकलेगा । इसीलिए मन कहता है कि....।' 'चटपट शादी के खूँटे से......।' 'तू शादी पर ही हर बात ले आती है। मैं कहती हूँ तू भी शादी करेगी न? साल दो साल बाद करेगी।' 'कह नहीं सकती तरन्ती ।'
"क्या तू शादी ही नहीं करेगी?"
"कहा नहीं, कह नहीं सकती।'
'हाय राम, मैं किस लड़की से बात कर रही हूँ?"
'तन्नी से!' कहकर तन्नी खिलखिला पड़ी।
दोनों की साइकिलों का पहिया घूमता रहा।
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