O Bedardya - 6 books and stories free download online pdf in Hindi

ओ..बेदर्दया--भाग(६)

और अभ्युदय ने शास्त्री जी की बात नहीं मानी और उसने काँलेज में बी.ए. में एडमिशन ले लिया और इस बात का फायदा लल्लन ने उठाया और वो एक दिन अभ्युदय को विधायक जी के पास ले गया,विधायक जी ने देखा कि नया लड़का है तो उन्होंने सोचा क्यों ना इसे काँलेज के चुनाव में उम्मीदवार बनाकर पेश किया जाए,अगर जीत गया तो फिर काँलेज में भी हमारा जलवा हो जाएगा और यही सब सोचकर उन्होंने अपनी बात अभ्युदय के सामने रखी लेकिन अभ्युदय इस बात के लिए तैयार ना हुआ,
लेकिन लल्लन ने विधायक जी को आश्वासन दिया कि वो अभ्युदय को काँलेज के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए मना लेगा और फिर लल्लन ने अभ्युदय को काफी समझाया और उससे ये कहा....
"बेटा!अभ्युदय!क्या तुम जिन्दगी भर अपने पिता की तरह रहना चाहते हो,तुम नहीं चाहते कि हर जगह तुम्हारी धाक हो,शहर में में तुम्हारी तूती बोले,तुम्हारे एक इशारे पर बड़े से बड़ा काम यूँ चुटकियों में हो जाए,तुम अगर छात्र संघ के नेता बन गए ना तो फिर तुम्हारी चाँदी ही चाँदी हो जाएगी"
"लेकिन चाचाजी!ये सब बाबूजी को पसंद नहीं आएगा,वें वैसे भी मुझसे आजकल खफा-खफा से रहते हैं और यदि मैं चुनाव में खड़ा हो गया तो वें सदैव के लिए मुझसे मुँह मोड़ लेगें",अभ्युदय बोला...
तब लल्लन बोला...
"लेकिन बेटा!जरा सोचो तो सत्ता बहुत बड़ी चीज होती है,अगर तुम चुनाव जीत गए तो तुम जो चाहो वो कर सकते हो,किसी किसी को ही ईश्वर ऐसा मौका देता है और तुम उसे ठुकरा रहे हो,याद रखना जिन्दगी में ऐसे मौके कभी कभी ही आते हैं"
"आपकी बात तो ठीक है चाचाजी!लेकिन बाबू जी इसके लिए नहीं मानेगें",अभ्युदय बोला...
"अरे!ज्यादा से ज्यादा दो चार दिन तुमसे नाराज रहेगें,लेकिन इसके बाद जब तुम्हें लोग नेता जी...नेता जी.. कहकर पुकारेगें ना तो वें अपना सारा गुस्सा भूल जाऐगें",लल्लन बोला....
"लेकिन मेरा मन नहीं मानता,मैं डाक्टरी ना पढ़कर बाबूजी का पहले ही इतना दिल दुखा चुका हूँ,इसलिए अब मैं उनका और दिल नहीं दुखा सकता",अभ्युदय बोला...
"पागलों जैसी बातें मत करो बेटा!थोड़ा सोच समझ कर ही फैसला लेना,कोई जल्दबाजी थोड़े ही है,कुछ दिन ठण्डे दिमाग से सोच लो फिर विधायक जी को जवाब देना",लल्लन बोला...
"आप कहते हैं तो कुछ दिन और सोचकर देखता हूँ अगर मन नहीं माना तो मैं चुनाव में खड़ा नहीं हूँगा",अभ्युदय बोला...
"हाँ!बेटा!ऐसी कोई जल्दबाजी थोड़े ही ,इत्मीनान से सोच लो"लल्लन बोला....
और फिर उस दिन के बाद अभ्युदय ने लल्लन से बिल्कुल ही मिलना जुलना छोड़ दिया,उसे काँलेज का नेता बनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी,वो छात्र संघ का नेता बनकर अपने पिता का और दिल नहीं दुखाना चाहता था,तभी शास्त्री जी के स्कूल में एक घटना घटी,प्रिन्सिपल साहब ने सभी मास्टरों की तनख्वाह शास्त्री जी से सुरक्षित रखने की कही ,तो उन्होंने उसे प्रिन्सिपल के आँफिस की अलमारी में सुरक्षित रखकर ताला लगा दिया और ये बात वहाँ के चपरासी को पता चल गई तो उसने अलमारी की नकली चाबी बनवाकर सारे रूपए अलमारी से उड़ा लिए,अब बेचारे शास्त्री जी पर चोरी का इल्जाम लग गया ,क्योंकि ये बात प्रिन्सिपल और शास्त्री जी के बीच की बात थी,ये बात उन दोनों के अलावा और किसी को पता नहीं थी,अब शास्त्री जी बुरे फँसे, क्योंकि उनके ऊपर चोरी का झूठा इल्जाम लग गया था और प्रिन्सिपल ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी कि चोरी शास्त्री जी ने ही की है, तो पुलिस की जीप शास्त्री जी के दरवाजे पर आई और उन्हें चोरी के इल्जाम में पुलिस थाने उठाकर ले गई,शास्त्री जी के लिए ये बात डूब मरने वाली थी,उन्हें इस बात से बहुत शर्मिन्दगी उठानी पड़ी,खबर सुनकर अभ्युदय दौड़ा दौड़ा पुलिस थाने पहुँचा और सारी बात सुनकर उसे केवल विधायक जी ही याद आएं,इसलिए वो उनके पास पहुँचा और उनसे बोला....
"विधायक जी!मेरे पिता निर्दोष हैं ,उन पर झूठा इल्जाम लगाया गया,वें ऐसा काम कभी नहीं कर सकते,उन्होंने सारी उम्र केवल ईमानदारी से काम किया है,चोरी का इल्जाम उन पर बदनुमा दाग हैं,यदि उन पर चोरी का इल्जाम सच हो गया तो वें जीते जी मर जाऐगें,कृपया उन्हें बचा लीजिए,अब सबकुछ आप पर है,आप ही उन्हें बचा सकते हैं"
"हाँ...हाँ....हम शास्त्री जी को जेल से छुड़ाने की पूरी कोशिश करेगें और ये भी कोशिश करेगें कि उन पर लगा इल्जाम भी झूठा साबित हो जाएं लेकिन तुम्हें भी हमारी बात माननी पड़ेगी",विधायक जी बोले....
"मैं आपकी हर बात मानने को तैयार हूँ,बस आप मेरे बाबूजी को जेल से छूड़वा लीजिए",अभ्युदय बोला....
और फिर विधायक जी की सिफारिश पर शास्त्री जी को जेल से जमानत पर रिहा करा लिया गया और पुलिस ने जब केस की जाँच पड़ताल की तो पता चला कि स्कूल का चपरासी ही चोर है,शास्त्री जी पर लगा इल्जाम तो दूर हो गया लेकिन मजबूरी में विधायक जी के कहने पर अभ्युदय को छात्रसंघ के चुनाव में उम्मीदवार बनना पड़ा,इस बात से शास्त्री जी गुस्सा तो हुए लेकिन अभ्युदय ने उनसे कहा कि.....
"बाबूजी!मुझे विधायक जी की बात माननी पड़ेगी ,क्योंकि इसी शर्त पर वें आपको जेल से छुड़ाने के लिए तैयार हुए थे,मैनें उनसे वादा किया था कि जैसा वें कहेगें,वैसा मुझे मानना पड़ेगा"
अभ्युदय की बात सुनकर अब शास्त्री जी के पास कहने सुनने को कुछ नहीं रह गया था,इसलिए उन्होंने चुप रहने में ही सबकी भलाई समझी,इधर अभ्युदय छात्रसंघ के चुनाव में खड़ा हुआ और भारी मतों से विजयी भी हुआ क्योंकि उसे जिताने के लिए विधायक जी ने अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था,अभ्युदय के चुनाव जीतने पर सब खुश हुए लेकिन शास्त्री जी को इस बात की कोई खुशी नहीं हुई,वें कभी भी अभ्युदय को इस राह पर चलता हुआ नहीं देखना चाहते थे,क्योंकि वें अच्छी तरह से समझते थे कि अब अभ्युदय की गिनती शरीफ़ लोगों में नहीं होगी,एक ही संतान वो भी ऐसी राह पर ,ये शास्त्री जी को कभी गवारा ना था,दिन गुजरने लगे अब अभ्युदय पढ़ाई में ना ध्यान देकर नेतागीरी में ध्यान दे रहा था,वो देर रात घर लौटता और अब तो कभी कभी वो पीकर घर लौटने लगा था,लेकिन ये बात केवल शैलजा तक सीमित थी,उसने अभी शास्त्री जी से ये बात नहीं बताई थी,लेकिन ये बात ज्यादा दिनों तक छुप ना सकी,एक रात जब अभ्युदय पीकर जीप में कुछ लोगों के साथ घर लौटा तो तब शास्त्री जी जाग रहे थे और उस रात उन्होंने ही घर का दरवाजा खोला,दरवाजा खोलते ही अभ्युदय लड़खड़ाते हुए घर में घुसा तो शास्त्री का मन शराब की बू से भर गया तो उन्होंने अभ्युदय से पूछा.....
"तुम क्या शराब पीकर आए हो?
"बाबू जी!वो दोस्तों ने पिला दी,तो मैं क्या करता"?,अभ्युदय बोला....
"तुम कुछ ना करो,बस ऐसे ही शराब पीकर खानदान का नाम बदनाम करते रहे",शास्त्री जी बोलें...
बाप बेटे के बीच ज्यादा बहस ना हो जाए यही सोचकर शैलजा बीच में आकर शास्त्री जी से बोली....
"सुनिए ना!सारा मोहल्ला सो रहा है,जो बात करनी है सुबह कीजिएगा,वैसे भी वो अभी होश में नहीं है"
फिर शास्त्री जी ने शैलजा की बात मानकर अभ्युदय को जाने दिया.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा.....