O Bedardya - 2 in Hindi Love Stories by Saroj Verma books and stories PDF | ओ...बेदर्दया--भाग(२)

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ओ...बेदर्दया--भाग(२)

शास्त्री जी जैसे ही सौरीगृह में पहुँचें तो उन्हें देखकर शैलजा खुशी से रो पड़ी और उनसे बोली...
"लीजिए!आपका लाल आपका इन्तजार कर रहा था"
शास्त्री जी ने शैलजा से कुछ नहीं कहा,बस एक उत्साह भरी दृष्टि उस पर डाली और वें नवजात शिशु के पास चारपाई के नीचें बैठ गए और लालटेन की मद्धम रौशनी में उन्होंने कपड़े में लिपटे हुए शिशु को निहारा और हौले से उसके माथे को चूमा फिर शैलजा से बोलें....
"मैं बाहर जा रहा हूँ, इतनी खुशी मुझसे बरदाश्त ना होगी"
और ये कहते कहते उनकी आँखें भर आईं,जाते जाते शैलजा से कहते गए कि दाईअम्मा से कहो कि नन्हे को काला टीका लगा दे,कहीं मेरी नजर ना लग जाए उसे.....
उनकी इस प्रतिक्रिया पर शैलजा कूछ ना बोली,क्योंकि उसका और शास्त्री जी का अन्तर्मन ही जानता था कि आज उन्हें जो खुशी मिली है वो उन दोनों के लिए अनमोल थी, इतने देवी-देवता पूजने के बाद और ना जाने कहाँ कहाँ मत्था टेकने के बाद आज उन दोनों को ये खुशी नसीब हुई थी,दाईअम्मा ने शिशु की नजर उतारकर उसे काला टीका लगाया,उसकी बलाइया ली फिर अपना नेग लेकर अपने घर चली गई, सुबह सुबह शास्त्री जी एक नौकरानी ढूढ़ लाए जो चौबीसों घण्टे जच्चा और बच्चा की खिदतम में लगी रहे और एक नौकरानी उन्होंने घर के लिए लगा ली,जो घर का काम सम्भाल ले,
छठें दिन शिशु की छठी पूजी गई,आस पास पड़ोस के लोंग खुशी खुशी शास्त्री जी की खुशी में शामिल होने आएं,घर में कढ़ी-पकौड़ी,चने की दाल,दही बड़े और ना जाने कौन कौन से पकवान पकाए गए, कुल देवी को भोग लगाया गया,पड़ोस ही उनका परिवार बन गया था,क्योंकि शास्त्री जी के परिवार के नाम पर एक चचेरा भाई था जो कि किसी के खून के जुर्म में जेल में बंद था,शैलजा के घर पर भी उसके बूढ़े बाप के सिवाय कोई और ना था,पन्द्रह दिन बाद शैलजा सौरीगृह से बाहर निकल आई तो शास्त्री जी ने बच्चे के नामकरण की सोची और गाँव वालों को भोज कराने का भी सोचा,फिर क्या था इस कार्य में देर ना करते हुए शास्त्री जी ने जाने माने ज्योतिषि जी को बच्चे के नामकरण के लिए बाहर गाँव से बुलवाया,साथ में नौटंकी का कार्यक्रम भी रखवाया ,जिसमें नाचने के लिए सिताराबाई आई,भोज में तरह तरह के व्यंजन बनवाएं जिन्हें खाकर गाँव वालों की तबियत खुश हो गई और लोगों की तबियत खुश होने में जो कसर रह गई थी वो कसर सिताराबाई के नाच ने पूरी कर दी,अब आई बच्चे के नामकरण की बारी, उस समय शास्त्री जी मेहमानों का स्वागत करने में लगे थे,गाँव की एक दो बुजुर्ग महिलाएँ ही ज्योतिषी जी के पास बैठीं थीं,फिर ज्योतिषी जी ने माता को शिशु के साथ बुलवाया,शैलजा शिशु के साथ बाहर आई तो ज्योतिषी जी बच्चे को देखकर बोले...
"बहुरानी!बच्चा भाग्य का बड़ा ही तेज है, मनचाही चींज हासिल करके ही माना करेगा,बहुत तरक्की करेगा ,लेकिन .....
"लेकिन क्या ज्योतिषी जी"?,शैलजा ने पूछा...
"पिता की इज्जत पर कलंक लगाएगा,ऐसा वो जानबूझकर नहीं करेगा ,उससे ये भूलवश होगा,बालक की पिता के साथ ज्यादा नहीं बनेगी,बच्चा हमेशा पिता के विरुद्ध रहेगा",ज्योतिषी जी ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा....
"ये क्या कह दिया आपने ज्योतिषी जी?",शैलजा बोली....
"हाँ!बहुरानी!मुझसे झूठ नहीं बोला जाता,जो मुझे लगा तो मैनें आपको बता दिया",ज्योतिषी जी बोले...
तब शैलजा बोली...
"ये तो अच्छा है कि बच्चे के पिता यहाँ मौजूद नहीं हैं,नहीं तो ना जाने उनके दिल पर क्या बीतती?"
तब उन बुजुर्ग महिलाओं में से एक ने शैलजा से कहा....
"बहुरानी!ये बात हमारे और तुम्हारे बीच ही रहनी चाहिए, बच्चे के पिता को इन सब बातों की भनक भी ना लगे,नहीं तो पिता और पुत्र के बीच अभी से दरार ना आ जाए"
"मैं तो ना कहूँगी उनसे कुछ भी लेकिन अगर ज्योतिषी जी ने कह दिया तो",शैलजा बोली...
"बहुरानी!अगर आप चाहतीं हैं तो मैं भी शास्त्री जी से कुछ ना कहूँगा",ज्योतिषी जी बोले....
"जी!बहुत बहुत कृपा आपकी ",शैलजा बोली...
"बच्चे का नामकरण करना है तो बच्चे को पिता को बुलवा लीजिए",ज्योतिषी जी बोले...
"जी!मैं उन्हें अभी बुलवाए लेती हूँ लेकिन कृपा करके आपने जो अभी कुछ देर पहले बच्चे के बारें में जो कुछ कहा है तो उनसे मत कहिएगा,नहीं तो वें बेवजह ही परेशान हो उठेगें",शैलजा बोली...
"आप फिक्र ना करें बहुरानी! मैं उनसे कुछ ना कहूँगा",ज्योतिषी जी बोलें....
फिर शैलजा ने किसी नौकर द्वारा शास्त्री जी को वहाँ बुलवाया और ज्योतिषी ने बच्चे का नाम अभ्युदय शास्त्री रखा,नाम बहुत ही सुन्दर था इसलिए सभी को बहुत पसंद आया,रतिशंकर शास्त्री जी ने अभ्युदय को गोद में उठाया और भीतर कोठरी में ले गए फिर अपने माता पिता की तस्वीरों के आगें उसका माथा टेकवाते हुए बोले....
"माँ-बाबा !देखो आपका पोता अभ्युदय, इसे आशीर्वाद देकर इसके मंगल भविष्य की कामना कीजिए"
नामकरण सामारोह समाप्त हुआ और सभी मेहमान अपने अपने घर चले गए, उस रात बहुत दिनों के बाद शैलजा और रतिशंकर जी को एकान्त में बात करने को मिला था,रतिशंकर जी शैलजा से बोले....
" और अभ्युदय की अम्मा कैसा लग रहा है अपने बबुआ को देखकर?"
पहले तो शैलजा शरमाई फिर बोली...
"आप भी कैसीं बातें करते हैं?कैसा लगेगा भला?अच्छा ही लगेगा ना,वर्षों की आस जो पूरी हो गई है, भगवान ने हमारी झोली खुशियों से भर दी और का चाहिए भला?"
"सही कहती हो शास्त्रिन! हम तो आस ही छोड़ चुके,तरसते थे कि ना जाने कब सन्तान का मुँह देखने को मिलेगा",शास्त्री जी दुखी होकर बोले...
"तो अब काहे दुखी होते हो,अब तो सारे जहान की खुशियाँ मिल गईं हैं आपको,तो अब काहे ऐसी सूरत बनाते हो"शैलजा बोली...
"हाँ!शास्त्रिन!अब तुम भी लोगों के ब्याह-मुण्डन में सिर उठा के जा पाओगी",शास्त्री जी बोले...
"सच!मैं तो तरस गई थी इस दिन को देखने के लिए,ईश्वर नजर ना लगाए,हमारी खुशियों को",शैलजा बोली...
"अब सब ठीक ही होगा,ईश्वर ने बहुत परीक्षा ले ली हम दोनों की,वें अब और परीक्षा ना लेगे हमारी",शास्त्री जी बोले....
"सच!आज मैं बहुत खुश हूँ,अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए,सब मिल गया मुझे " शैलजा बोली....
"हाँ!बस!अभ्युदय को पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाऐगें,बस इतना चाहता हूँ कि वो मेरी तरह मेहनतकश और ईमानदार हो,ताकि लोंग उसकी सच्चाई और ईमानदारी देखकर ये कहें कि जैसा बाप था वैसा ही बेटा निकला",शास्त्री जी बोले....
शास्त्री जी के मुँह से अभ्युदय के लिए ऐसे शब्द सुनकर शैलजा कुछ परेशान सी हो उठी क्योंकि उसे ज्योतिषी जी की कही बात याद आ गई, उसने मन में सोचा शास्त्री जी को कभी मालूम नहीं होना चाहिए कि अभ्युदय उनके कलंक का कारण बनेगा,शैलजा को परेशान देखकर शास्त्री जी ने पूछा....
"क्या बात है शास्त्रिन !तुम एकाएक इतनी परेशान क्यों हो उठी?"
"कुछ नहीं ऐसे ही,जरा थक गई हूँ",शैलजा बोली...
"ठीक है तो तुम आराम करो"जब बबुआ जाग जाए और रोने लगे तो मुझे जगा लेना,मैं उसे सम्भाल लूँगा,तुम भी तो थक जाती हो उसे सम्भालते सम्भालते",शास्त्री जी बोले...
"जी!ठीक है" और इतना कहकर शैलजा करवट बदलकर लेट गई और उसकी आँखों से दो बूँद आँसू भी टपक गए....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....