O Bedardya - 14 books and stories free download online pdf in Hindi

ओ..बेदर्दया--भाग(१४)

शक्ति और दुर्गा दोनों का आपस में बहुत प्रेम था और उनका प्रेम देखकर शैलजा को बहुत अच्छा लगता था,बस कभी कभी वो ये सोचा करती थी कि काश अभ्युदय भी ब्याह कर ले और वो भी अपनी पत्नी के संग ऐसे ही खुशी खुशी जिन्दगी बिताएं,लेकिन शैलजा के लाख कहने पर भी अभ्युदय ब्याह के लिए राजी ना होता और शैलजा को ये बात कहने पर हमेशा निराश होना पड़ता....
ऐसे ही दिन बीत रहे थे और पता चला कि दुर्गा उम्मीद से है,ये खुशखबरी पाकर पूरा परिवार खुशी से उछल पड़ा और फिर कुछ महीने बाद दुर्गा ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया और उसका नाम सबने सौरभ रखा जिसका अर्थ होता है सुगन्धित,क्योंकि बच्चे के आने से उनका घर महक उठा था इसलिए उन सबको सौरभ नाम ही उचित लगा,अब सौरभ धीरे धीरे बड़ा होने लगा था और तीन साल का होने पर अभ्युदय ने उसका दाखिला एक कान्वेन्ट स्कूल में करवा दिया,सौरभ और अभ्युदय के बीच बहुत प्यार था,अभ्युदय जब भी घर पर होता तो अपना पूरा समय सौरभ के साथ ही बीतता था और इधर शक्ति अपने बेटे को जरा भी वक्त नहीं देता था,जब भी वो दुलार से पापा...पापा..करके शक्ति के करीब जाने की कोशिश करता तो वो उसे झिड़क देता इसलिए सौरभ शक्ति से कभी हिल-मिल ही नहीं पाया और अभी भी शक्ति कोई काम नहीं करता था,अभ्युदय ने दो बार कोशिश भी की थी कि शक्ति कोई काम करने लगे इसलिए उसने एक बार उसे कपड़े की दुकान खुलवाकर दी लेकिन शक्ति का वहाँ मन ना लगा और दुकान घाटे की स्थिति में आते आते बंद करनी पड़ी और दूसरी बार अभ्युदय ने उसे अनाज के व्यापार में लगवाया तो वो भी शक्ति से सम्भाला ना गया,फिर तीसरी बार अभ्युदय ने शक्ति के लिए कुछ नहीं किया....
शक्ति अभ्युदय को देखकर ईर्ष्या करता था,वो शक्ति की तरह सत्ताधारी बनना चाहता था,लेकिन ऐसे गुण ही नहीं थे उसके पास जो वो अभ्युदय की तरह कामयाब हो पाता,हमेशा ठेके पर बैठकर ताश खेलना और दारू पीना ही शक्ति को भाता था,एक बार तो उसने दुर्गा के सोने के कंगन भी गिरवी रख दिए थे,इस बात से दुर्गा बहुत नाराज हुई और उसने अभ्युदय को बता दिया और ये सुनकर अभ्युदय ने अपना आपा खो कर शक्ति को पीट दिया,फिर उन लोगों को भी पीटा जिसके पास शक्ति दुर्गा के कंगन गिरवी रखकर आया था,फिर उन सभी का पैसा चुकाकर वो दुर्गा के कंगन वापस ले आया और शक्ति को हिदायत दी कि आज के बाद दोबारा ऐसा हुआ तो तुम्हें घर से निकाल दूँगा,सौरभ को ऐसे बाप की जरूरत नहीं है,कैसे बाप हो तुम और उसे तुम कैसी परवरिश दे रहे हो?,शक्ति तो वैसे भी अभ्युदय से नफरत करता था और उस दिन के बाद वो उससे और भी नफरत करने लगा और जब शक्ति कोई काम ना ढूढ़ पाया तो फिर थक हारकर अभ्युदय ने उसे अपने साथ ही लगा लिया उसने सोचा कि मेरी निगरानी में रहेगा तो कम से कम ठेके पर बैठकर ताश तो नहीं खेलेगा,दिनभर दारू तो नहीं पिएगा....
दिन ऐसे ही गुजरने लगे सौरभ अब छः साल का हो चुका था लेकिन अभी तक अभ्युदय का ब्याह ना हुआ था और अब तो शैलजा और शास्त्री जी ने इस बात को कहना भी छोड़ दिया था,उन्हें पता था कि अभ्युदय उनकी बात मानने वाला तो है नहीं ,इसी बीच अभ्युदय की पार्टी में एक और सदस्य शामिल हुआ,वो दिल्ली से पढ़कर आया था लेकिन रहने वाला उसी शहर का था,वो उन सभी सदस्यों से बिलकुल अलग था जो कि अभ्युदय की पार्टी में उस समय शामिल थे,अभ्युदय की पार्टी के सभी सदस्य गुटखा खाते थे,गमछा डालते थे और धोती कुरता पहनते थे ,ठेठ हिन्दी में बात करते थे लेकिन वो ऐसा नहीं था,वो जींस पहनता था और चश्मा लगाता था ऊपर से अंग्रेजी में बात करता था,वो दिल्ली से लौटा था इसलिए बहुत सलीकेदार था,वो अभ्युदय की पार्टी में रहकर नेतागीरी सीखना चाहता ,वो ना दारू पीता था और ना गुटखा खाता था,बस उसके अंदर केवल एक ही ऐब था कि वो लड़कियों पर लट्टू रहता था,वो जल्द ही अभ्युदय का भरोसेमंद बन गया क्योंकि उसके अन्दर सभी गुण मौजूद थे जो अभ्युदय शक्ति में देखना चाहता था,लेकिन शक्ति उस काबिल नहीं था, उस लड़के का नाम बृजनाथ पटेल था....
अभ्युदय अभी भी छात्रसंघ का नेता था,क्योंकि वो छात्रसंघ का नेता बने रहने के चक्कर में किसी ना किसी विषय से ए.म. में एडमिशन ले लेता था,वो नेता होने के नाते बहुत से छात्रों की समस्याओं का समाधान भी करता था,इसलिए अपने काँलेज में वो छात्रों के बीच काफी प्रसिद्ध था और उसकी प्रसिद्धि के मद्देनजर विधायक जी भी उस पर मेहरबान रहते थे क्योंकि उसके कारण ही विधायक जी भी चुनाव जीत पाते थे,इस बार भी चुनाव नजदीक थे और विधायक जी ने अपने चुनाव प्रचार के लिए अभ्युदय की टोली को अपने पास रख लिया और अभ्युदय शहर के आँफिस का कार्यभार बृजनाथ पटेल उर्फ बिरजू को सौंपकर शक्ति के साथ विधायक जी के साथ आ गया,इस बार विधायक जी कुछ दिनों के लिए अपने गाँव जाकर अपने चुनाव के प्रचार को बढ़ाना चाहते थे इसलिए वो अपने गाँव आ गए,शिवराज चौहान जो कि अभ्युदय के विपक्षी पार्टी के छात्रसंघ का नेता था उसका गाँव भी वही था जो विधायक जी का गाँव था, शिवराज के पिता विधायक जी के बचपन के मित्र थे और दोनों का घर भी अगल बगल था,पहले तो शिवराज ही विधायक जी के लिए काम करता था ,शिवराज के पिता गम्भीर चौहान के कहने पर विधायक जी ने उसे अपने साथ रख लिया था,लेकिन शिवराज ने जब कई बार विधायक जी से ऐठकर और बतमीजी से बात की तो फिर विधायक जी ने शिवराज से दूरियाँ बना लीं,लेकिन गम्भीर चौहान ने इस बात का बुरा नहीं माना और विधायक जी के प्रति पहले जैसा ही स्नेह भाव रखा क्योंकि वें जानते थे कि उनका बेटा नालायक है....
चूँकि विधायक जी का पूरा परिवार तो शहर में ही था इसलिए उनका और उनके साथ के सभी लोगों के खाने पीने की व्यवस्था का कार्यभार गम्भीर चौहान ने अपने ऊपर ले लिया वें विधायक जी से बोलें....
"विधायक जी!आप यहाँ किसी चींज की चिन्ता ना करें,घर धन-धान्य से भरा हुआ है,आपके और आपके साथ के सभी जनो के तीन वक्त के भोजन की व्यवस्था मेरे ऊपर है,भला बचपन की मित्रता किस दिन काम आएगी"
तब विधायक जी बोलें...
"मित्र!ये तो आपका बड़प्पन है नहीं तो आजकल कौन किसके लिए क्या करता है?"
और फिर उस दिन विधायक जी के साथ अभ्युदय भी चुनाव का प्रचार करने उनके साथ गया और शाम को जब सब वापस लौटे तो गम्भीर सिंह हाजिर थे अपने नौकरों के साथ सभी का भोजन लेकर के,सभी अपने हाथ मुँह धोकर एक एक करके बिछौनों पर बैठ गए और नौकरों ने सभी को खाना परोसना शुरू किया और तभी विधायक जी के घर के द्वार पर पायलों की छन छन सुनाई पड़ी सभी ने देखा कि एक बीस-बाईस साल की लड़की पीले-सलवार कमीज में दुपट्टा डाले हाथ में एक बटलोई लेकर चली आ रही थी,गम्भीर चौहान ने उसे देखा तो पूछा...
"पारूल बेटी!तुम और यहाँ"
"जी!बाबू जी!मजबूरी में आना पड़ा हमें,नौकर ये मूँग के हलुए की बटलोई रसोई में ही भूल आए थे,सारे नौकर तो यहाँ मौजूद हैं तो माँ ने कहा कि तुम ही दे आओ,इसलिए हम मजबूरी में ये हलुए की बटलोई देने यहाँ चले आए"
"ठीक है बेटी" और इतना कहकर गम्भीर चौहान ने बटलोई ले ली और पारुल फिर से अपना दुपट्टा लहराते और पायल छनकाते हुए वापस चली गई...
और पारूल की पायलों की छम छम ने अभ्युदय के दिल की धड़कनों को बढ़ा दिया था,वो उसे बस जाते हुए देखता रहा,ये सब शक्ति भी देख रहा था और उसने अभ्युदय से कहा....
"भइया!खाना बहुत ही अच्छा है ना!"
अभ्युदय शक्ति का इशारा समझकर मुस्कुराया लेकिन बोला कुछ नहीं....
फिर क्या था अब जब देखो तब अभ्युदय की नजरें पारूल को तलाश करने लगी,लेकिन वो बहुत ही कम घर से बाहर निकलती थी,बस कभी कभी छत पर कपड़े सुखाने जाती और सूखे कपड़े उठाने जाती और इसी बीच अभ्युदय पारूल को देख लेता फिर पारुल भी अभ्युदय को देखकर मुस्कुरा देती,दोनों का ये सिलसिला यूँ ही चल रहा था,खाना लेकर गम्भीर चौहान ही अपने नौकरों के साथ आते थे,पारूल कभी नहीं आती थीं,पारूल को सख्त हिदायतें थी कि वो घर से बाहर ना निकलें,हमने तुम्हें दिल्ली से ग्रेजुएशन करने की अनुमति दे दी वही काफी है,अब घर पर बैठकर घर के काम काज सीखो,पारूल ने दिल्ली से ग्रेजुएशन किया था लेकिन उसके बाद उसे पोस्टग्रेजुएशन की इजाजत नहीं मिली थी,इसलिए वो अब घर पर ही रहती थी और अब उसकी शादी के लिए मुनासिब लड़का खोजा जा रहा था...
ऐसे ही विधायक जी की के चुनाव प्रचार को एक महीना बीत गया और सबके शहर जाने का वक्त हो गया,लेकिन अभ्युदय का मन नहीं था वहाँ से वापस जाने का लेकिन फिर भी उसे जाना तो था ही ,वें सभी दरवाजे से बाहर निकले और छत पर पारूल खड़ी थी मायूस सा चेहरा लेकर,तभी एक नौकरानी अभ्युदय के पास आई और चुपके से कागज का एक टुकड़ा उसके हाथ में थमाते हुए चली गई,उस समय वहाँ पर केवल अभ्युदय और शक्ति ही थे सब आगें जा चुके थे और अभ्युदय हवेली के किवाड़ो पर ताला लगा रहा था,गम्भीर चौहान भी विधायक जी के साथ आगें ही थे....
अभ्युदय ने एक नजर पारूल की ओर देखा और वहाँ से आगें बढ़ गया फिर जब अपनी अपनी कार में सब बैठ गए तो अभ्युदय ने उस कागज के टुकड़े को खोलकर पढ़ा,जिसमें लिखा था....
"नेताजी! हम आपको चाहने लगें हैं,अगर आप हमें ना मिले तो कसम खाकर कहते हैं कि हम मर जाऐगें"
वो वाक्य पढ़कर अभ्युदय के दिल के तार झनझना उठे और वो कराह उठा क्योंकि वो भी पारूल को पहले ही दिन से चाहने लगा था,उसने इसलिए कुछ नहीं कहा क्योंकि पारूल उससे उम्र में काफी छोटी थी,वो कोमल हृदय और अभ्युदय कठोर पत्थर से हृदय वाला था,उन दोनों का कोई मेल नहीं था,यही सब सोचकर अभ्युदय अभी तक कुछ नहीं बोला था,लेकिन अब इस प्रेम में प्रेमिका की सहमति मिल जाने पर अभ्युदय का हौसला बढ़ गया था,शक्ति ने उससे पूछा तो अभ्युदय ने उसे सब सच सच बता दिया,तब शक्ति बोला...
"भइया!ऐसे हाथ पर हाथ धरे रहने से काम ना चलने वाला,अगर आप पारूल से प्रेम करते हैं तो इसे निभाना भी पड़ेगा"
"लेकिन भाई मेरे वो शिवराज की बहन है और शिवराज मेरा जानीदुश्मन है,ऊपर से पारूल मुझसे उम्र में बहुत छोटी है और हमारी जाति-बिरादरी भी तो अलग है",अभ्युदय बोला....
"वो लड़की होकर इतनी हिम्मत कर सकती है तो भइया आपको भी तो कुछ करना चाहिए,इतने सालों बाद तो आपको कोई लड़की पसंद आई है,तो भगवान के लिए उसे मेरी भाभी बना दो",शक्ति बोला...
"लेकिन माँ बाबू जी मानेगें भला गैर बिरादरी में मेरा ब्याह करने के लिए और वें मान भी गए तो क्या शिवराज और उसके पिता गम्भीर चौहान मानेगें इस ब्याह के लिए?"अभ्युदय बोला...
" सब ना माने तो ना माने,हम दोनों भाभी को उनके घर से भगाकर ले आऐगें",शक्ति बोला...
"इससे तो दोनों घरों की बहुत बदनामी हो जाएगी",अभ्युदय बोला...
"आप ये सब मत सोचिए बस एक बार भाभी को ये पता चल जाए कि आप भी उन्हें चाहते हैं तो फिर बात आगें बढ़ाते हैं,जब सिर ओखली में दे ही दिया है तो फिर मूसलों से क्या डरना",शक्ति बोला....
फिर क्या था शक्ति के कहने पर अभ्युदय चुपके से फिर उस गाँव गया और एक खत में अपने मन की बात पारूल को लिखकर दे आया,खत पढ़कर पारूल खुशी के मारे रो पड़ी और दूसरे ही दिन वो अपने घर से भागकर शहर पहुँची और वहाँ से अभ्युदय के कार्यालय पहुँचकर उससे बोली...
"हम घर से भागकर आ गए हैं और अब हम वहाँ वापस नहीं जाऐगें,हम ने घर पर चिट्ठी भी छोड़ दी है और उसमें ये लिख दिया है कि हम आपसे प्यार करते हैं और आपसे ही शादी करेगें"
पारूल की इस हरकत से अभ्युदय बोला....
"पारूल!ये क्या किया तुमने? कुछ तो सोचा होता"
"हमें अब और कुछ नहीं सोचना,अगर आपने आसरा ना दिया तो हम किसी कुएंँ, नदी,तालाब में कूदकर अपनी जान देगें"
पारूल की बात अभी पूरी भी ना हो पाई थी कि शिवराज अपने दोस्तों के साथ वहाँ आ पहुँचा और पारूल का हाथ पकड़ते हुए बोला...
"पारूल तू यहाँ इसके साथ क्या कर रही है ,चुपचाप घर लौट चल"
"अब हम वापस घर नहीं जाऐगें",पारूल बोली...
और फिर पारूल के ऐसा कहने पर अभ्युदय ने पारूल का हाथ पकड़ लिया और शिवराज से बोला...
"अब ये वापस तेरे साथ नहीं जाएगी,ये विधायक जी के घर जाएगी और वें जो भी फैसला करेगें वही माना जाएगा"
"तू कौन होता है मेरी बहन की जिन्दगी का फैसला करने वाला",शिवराज दहाड़ा...
"फैसला तो तेरी बहन कर चुकी है,बेहतरी इसी में है कि ये मामला विधायक जी के घर पर ही निपटाया जाए",अभ्युदय बोला..
फिर क्या था सब विधायक जी के घर पहुँचे,विधायक जी ने सबकी बातें ध्यान से सुनी,उन्होंने पारूल से भी उसकी मर्जी पूछी तो पारूल ने सब सच सच कह दिया,पारूल की बात सुनने के बाद विधायक जी ने पारूल के पक्ष में ही फैसला दिया,जिससे शिवराज और उसके पिता आगबबूला हो उठे और वहाँ से जाने लगे तो शिवराज अभ्युदय से बोला...
"बहनोई बनने वाले हो तो एक बार गले नहीं मिलोगे"
तब अभ्युदय को मजबूरी में शिवराज के गले लगना पड़ा तो शिवराज ने अभ्युदय से दबे स्वर में कहा....
"जो लड़की अपने परिवार को धोखा दे सकती है वो तेरी सगी क्या होगी,ईश्वर करें तेरा जीवन उजड़ जाए तू और वो कभी खुश ना रहें"
शिवराज के ये बोल अभ्युदय को कानों में तीर की तरह चुभे,लेकिन सबके सामने वो कुछ नहीं बोला....
अब समस्या ये थी कि पारुल कहाँ रहेगी तो विधायक जी बोलें....
"जब तक अभ्युदय का ब्याह पारूल के संग नहीं हो जाता तो वो हमारे यहाँ रहेगी"
इस समस्या का समाधान तो हो गया था लेकिन अब अभ्युदय के लिए समस्या ये थी कि माँ और बाबूजी कैसे मानेगें इस ब्याह के लिए तो अब इसके निवारण के लिए फिर से विधायक जी ही आगें आए और वें बोलें...
"कल ही शास्त्री जी और बहनजी को ये बुलवा लो,वें एक बार पारूल से मिल ले फिर आगें बात बढ़ाई जाएं"
अब जब ये बात शास्त्री जी और शैलजा को पता चला चली तो शास्त्री जी गुस्से से भड़क कर बोलें....
"शास्त्रिन!बस यही दिन देखना बाकी रह गया था,अब लोगों की बेटियाँ भी भगाई जाने लगीं हैं,इस लड़के ने तो मुझे कहीं का नहीं रखा,पूरे समाज में नाक कटवाकर रख दी,सारा शहर मुझ पर थू..थू...कर रहा है,हम दोनों इतने सालों से चिल्ला रहे हैं कि बेटा शादी कर लो....शादी कर लो,लेकिन नहीं साहबजादे के मंजूबे तो कुछ और ही थे,इन्हें तो लड़की भगाकर शादी करनी थी,अब इसकी करतूत पर मैं कहाँ कहाँ मुँह छुपाता फिरूँ"
"लेकिन ताऊजी!लड़की को भइया ने नहीं भगाया है,वो तो खुद ही अपने घर से भागकर आई हैं",दुर्गा बोली....
"तू इसकी तरफदारी ज्यादा मत कर",शैलजा बोली...
"पहले तो खुद ही चिल्ला रहीं थीं कि शादी कर ले....शादी कर ले और जब भइया शादी करना चाहते हैं तो सब उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं"दुर्गा बोली...
"शादी करने का शौक था तो स्वयंवर रचा लेता,लड़की भगाने की क्या जरूरत थी",शास्त्री जी बोलें...
"ताऊ जी!स्वयंवर लड़कियों का होता है लड़को का नहीं",दुर्गा बोली...
और फिर दुर्गा की बात पर शास्त्री जी हँस पड़े,शास्त्री जी हँसे तो फिर शैलजा भी हँसी और फिर दोनों के हँसते ही सब हँस पड़े और फिर दोनों पारूल से मिलने के लिए राजी भी हो गए...
अब दूसरे दिन शास्त्री जी और शैलजा विधायक जी के घर आएं,वें पारूल से मिले और उससे मिलते ही उसका व्यवहार, उसकी सुन्दरता और सौम्यता ने दोनों का मन मोह लिया और फिर वें पारूल को अपनी बहू बनाने को राजी हो गए....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....