Kalvachi-Pretni Rahashy - 40 books and stories free download online pdf in Hindi

कलवाची--प्रेतनी रहस्य - भाग(४०)

कालवाची के अश्रु कौत्रेय से देखे ना गए ,कुछ भी हो ,वो ही तो एकमात्र मित्र है उसकी इस संसार में,कालवाची को उसने बारह वर्षों के कड़े परिश्रम एवं प्रतीक्षा के पश्चात पुनः पाया था इसलिए उससे उसका दुख देखा ना गया और वो उससे बोला....
"चिन्ता मत करो कालवाची!, अब चाहे जो भी परिणाम हो किन्तु आज मैं उन सभी को हम दोनों की सच्चाई बताकर रहूँगा,मैं भी झूठा अभिनय करते करते उकता गया हूँ और मैं भी अब अपने इस दोहरे चरित्र से मुक्ति चाहता हूँ"
"तुम सच कह रहे हो कौत्रेय!तुम ऐसा करोगें", कालवाची ने कौत्रेय से पूछा...
"हाँ!सच!चलो अभी मेरे साथ मैं उन सबसे सब सच सच कह दूँगा",कौत्रेय बोला...
"हाँ!चलो कौत्रेय!अब मुझसे भी ये भेद छुपाया नहीं जाता",कालवाची बोली...
और दोनों उन सभी के समीप पहुँचें,भैरवी ने कर्बला को देखा तो भयभीत सी हो गई,भैरवी को चिन्तामग्न देखकर कर्बला बनी कालवाची बोली....
"भयभीत मत हो भैरवी! तुम जिस बात से चिन्तित थी,मैं उसी बात का निवारण करने आई हूँ"
"हाँ! हम दोनों आप सभी से कुछ कहना चाहते हैं",कौत्रेय बोला....
"हाँ! बोलो कुबेर कि क्या कहना चाहते हो"?,अचलराज बोला...
"सर्वप्रथम कि मैं कुबेर नहीं कौत्रेय हूँ",कौत्रेय बोला...
"ये नाम तो कुछ कुछ सुना सुना सा लगता है",व्योमकेश जी बोलें.....
और कौत्रेय अब अपने पुराने रूप में आ चुका था,जो रूप उसने कभी वैतालिक राज्य में धर रखा था,उसे कालवाची ने पुनः वही रूप दे दिया था और वो स्वयं भी कालिन्दी वाले रूप में आई जिससे व्योमकेश जी ने उन दोनों को पहचानते हुए कहा....
"कालवाची! तुम अभी तक जीवित हो और कौत्रेय तुम भी ठीक हो ,कहाँ थे तुम दोनों अभी तक"?
"क्या कहा आपने काकाश्री? ये ही कालवाची है",भैरवी बोली...
"तो इसका तात्पर्य है कि तुम दोनों इतने दिनों से हम सभी के संग अपना रूप बदल कर रह रहे थे",व्योमकेश जी बोलें...
"हाँ! सेनापति व्योमकेश जी मुझे क्षमा करें"कालवाची बोली...
"किन्तु मुझे तुम ये बताओ कि तुम्हें उस विशालवृक्ष के तने से मुक्त किसने किया"?,व्योमकेश जी ने पूछा...
"जी! कौत्रेय ने निरन्तर बारह वर्षों तक कड़ा परिश्रम करके मुझे मुक्त किया",कालवाची बोली....
"कौत्रेय ने तुम्हें मुक्त किया ये तो अत्यधिक आश्चर्य वाली बात है,ये मेरे लिए अविश्वसनीय है क्योंकि कालवाची को उस तने में स्थापित करने में हमने बाबा कालभुजंग की सहायता ली थी,जो कि एक अत्यधिक कठिन कार्य था",व्योमकेश जी बोलें....
तभी भैरवी बोली...
"तो तुम कालवाची हो इसलिए उस रात्रि तुम पिशाचिनी बनकर अपना भोजन ग्रहण करने गई थी,मैनें सब देखा था,किन्तु अभी कुछ देर पहले तो तुम मुझे चेतावनी देकर गई थी कि यदि मैनें अचलराज से कुछ कहा तो तुम उसके प्राण हर लोगी"
"सखी!मुझे क्षमा कर दो,बहुत बड़ी भूल हो गई मुझसे,मेरे मन में कपट समा गया था",कालवाची बोली...
"क्या कह रही हो तुम कालवाची "?,भैरवी ने पूछा....
तब कालवाची बोली...
"मैं तुम्हें सब कुछ विस्तार से बताती हूँ"
और इसके पश्चात कालवाची ने सभी के समक्ष सबकुछ सच सच कह दिया कि उसने क्या क्या किया था, किन्तु आज उसका हृदय परिवर्तन हो गया है और वो इस प्रेतनी शरीर से मुक्त होकर साधारण युवती का जीवन जीना चाहती है, तभी अचलराज बोला...
"हम तुम दोनों पर कैसें विश्वास करें कि तुम दोनों हमारे साथ पुनः छल नहीं करोगे",
" ये तो तुम पर निर्भर करता है कि तुम हमें क्षमा करोगें या नहीं करोगे",कालवाची बोली...
"पुत्र!इन दोनों की आँखें कह रही हैं कि ये दोनों अपने किए पर लज्जित हैं,यही मेरा अनुभव भी कहता है",व्योमकेश जी बोले...
"जब पिताश्री ने तुम दोनों को क्षमा कर दिया तो मुझे भी ना तो तुम दोनों से कोई बैर है और ना ही कोई आपत्ति",अचलराज बोला...
तब कालवाची बोली...
" मैं सबसे बड़ी दोषी तो भैरवी की हूँ,जो मैनें उसकी माँ से भी छुपाया कि मैं कालवाची हूँ और उससे भी छुपाया कि मैं कौन हूँ, पता नहीं भैरवी मुझे कभी क्षमा भी कर पाएगी या नहीं",
"मैं क्षमा करने वाली कौन होती हूँ कालवाची! जब कोई अपने किए पर पश्चाताप करने लगे तो स्वयं उसे ईश्वर भी क्षमा कर देते हैं तो मैं तुम्हें क्यों क्षमा नहीं कर सकती,मैं ने भी तुम्हें क्षमा किया",भैरवी बोली....
"धन्यवाद सखी! तो अब गले नहीं मिलोगी",कालवाची बोली...
"नहीं! कल रात्रि जो मैने तुम्हारा बीभत्स रूप देखा तब से मेरे मन के भीतर भय समा गया है,मैं तुमसे गले नहीं मिल सकती",भैरवी बोली...
और भैरवी की इस बात पर सभी हँसने लगे,तब कालवाची बोली...
"सखी!अब ऐसा कदापि नहीं होगा,तुम मेरा बीभत्स रूप अब कभी नहीं देख पाओगी"
"तो अब ये समस्या तो सुलझ गई,अब हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है,किन्तु अब आगें की योजना क्या होगी"?अचलराज ने पूछा...
"आगे योजना यही होगी कि अब हम सब वैतालिक राज्य पहुँचकर भैरवी के राज्य को उसे दिलवा दें और उस राजा से महाराज कुशाग्रसेन ,उनके पिता प्रकाशसेन तथा उनकी माता मृगमालती की हत्याओं का प्रतिशोध लें,उस दुष्ट राजा ने तो महाराज कुशाग्रसेन के वृद्ध माता पिता को भी नहीं छोड़ा ,उन्होंने तो उनकी भी हत्या कर दी ,",कालवाची बोली....
"ये सब तुम्हें कैसें ज्ञात हुआ कालवाची"?,सेनापति व्योमकेश ने पूछा...
"ये है ना कौत्रेय! इसने वैतालिक राज्य के नगरवासियों के मुँख से सुना था और जब मैं उस उस विशाल तने से मुक्त हुई तो इसने मुझे बताया",कालवाची बोली....
"ओह...तो ये बात है",सेनापति व्योमकेश बोले...
"जी! सेनापति! यही बात है",कालवाची बोली...
सबकी बात सुनकर तब अचलराज बोला...
"इसके लिए तो कोई ना कोई रणनीति बनानी होगी हम सभी को, तभी सफलता मिलेगी,",
"इस कार्य में तो सेनापति व्योमकेश निपुण है वही एक अच्छी रणनीति बना सकते हैं",कौत्रेय बोला....
"तो पहले हम सभी वैतालिक राज्य तो पहुँच जाएं वहाँ का वातावरण देखें एवं वहाँ के नगरवासियों से पूछे कि राजा का प्रजा के संग व्यवहार कैसा है तभी एक अच्छी रणनीति बन सकती है", सेनापति व्योमकेश बोले...
"नहीं!पहले ये कार्य नहीं करना चाहिए हमें ",कालवाची बोली...
"तो पहले कौन सा कार्य करना है हमें",भैरवी ने पूछा...
"पहले हम सभी रानी कुमुदिनी के पास जाऐगें,उन्हें ये शुभ समाचार देगें कि सेनापति व्योमकेश और अचलराज मिल गए हैं एवं मैं उनसे क्षमा माँगकर कहूँगीं कि मैं ही कालवाची हूँ,मैनें आपसे ये सच्चाई छुपाई है कि मैं ही कालवाची हूँ",कालवाची बोली...
"हाँ! यही ठीक रहेगा,हमें कालवाची के सुझाव पर विचार करना चाहिए",अचलराज बोला...
"इसमें विचार क्या करना,तो चलो सभी अपने अपने अश्वों को उस नगर की ओर मोड़ो जहाँ रानी कुमुदिनी रहतीं हैं",कौत्रेय बोला...
"अभी! इसी समय,अब तो सायंकाल होने वाली है",भैरवी बोली...
"तो क्या हुआ?,प्रारम्भ अभी इसी समय से करते हैं",कौत्रेय बोला...
"हाँ!कदाचित!तुम ठीक कह रहे हो",अचलराज बोला....
अन्ततः सभी चल पड़े उस नगर की ओर जहाँ रानी कुमुदिनी रह रही थी...

क्रमशः...
सरोज वर्मा...