Ek Yogi ki Aatmkatha - 23 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 23



{ विश्वविद्यालय से उपाधि की प्राप्ति }

“तुम दर्शनशास्त्र के अध्ययन कार्य की उपेक्षा कर रहे हो। इसमें सन्देह नहीं कि तुम परीक्षा में पास होने के लिये परिश्रमविहीन 'अंतः प्रेरणा' पर निर्भर कर रहे हो। परन्तु यदि तुम एक विद्यार्थी की तरह मेहनत से पढ़ाई नहीं करोगे, तो मैं तुम्हें इस परीक्षा में पास नहीं होने दूँगा।”

श्रीरामपुर कॉलेज के प्रोफेसर डी. सी. घोषाल मुझसे सख्ती के साथ बोल रहे थे। यदि मैं उनकी लिखित फाइनल क्लास रूम टेस्ट में पास नहीं होता, तो मैं विश्वविद्यालय की परीक्षा में बैठने के लिये अयोग्य ठहराया जाता। ये नियम कोलकाता विश्वविद्यालय के बनाये हैं और श्रीरामपुर कॉलेज उसकी एक सम्बद्ध शाखा है। भारतीय विश्वविद्यालयों में बी. ए. की परीक्षा में एक विषय में भी अनुत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थी को अगले वर्ष फिर से सब विषयों की परीक्षा देनी पड़ती है।

श्रीरामपुर कॉलेज के मेरे प्राध्यापक साधारणतया मेरे साथ अच्छा ही बर्ताव करते थे, यद्यपि उसमें कुछ विनोद की झलक अवश्य होती थी। “मुकुन्द धर्म में कुछ ज्यादा ही बह गया है।” इस प्रकार मेरा आकलन कर वे मुझे कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने की मुसीबत से कुशलतापूर्वक बचाते थे; उन्हें पूर्ण विश्वास था कि फाइनल लिखित टेस्ट मुझे बी.ए. परीक्षार्थियों की सूचि से हटाने का काम कर देगी। मेरे सहपाठियों का मेरे बारे में मत उनके द्वारा मुझे दिये गये नाम से ही स्पष्ट था “पागल संन्यासी।”

प्रोफेसर घोषाल की मुझे दर्शनशास्त्र में अनुत्तीर्ण करने की धमकी को विफल करने के लिये मैंने भी चालाकी की। जब फाइनल टेस्ट के परिणाम घोषित किये ही जाने वाले थे, तभी मैंने एक सहपाठी को अपने साथ प्रोफेसर के कक्ष में चलने के लिये कहा।

“मेरे साथ चलो; मुझे एक साक्षी चाहिये, " मैंने अपने सहपाठी से कहा। “यदि प्रोफेसर को अपनी चालाकी से मात देने में मैं सफल नहीं हुआ, तो मुझे बड़ी निराशा होगी।”

जब मैंने पूछा कि मेरी उत्तर-पत्रिका पर उन्होंने कितने अंक दिये हैं, तो प्रोफेसर घोषाल ने नकारार्थी सिर हिलाया।

“जो लोग पास हुए हैं, उनमें तुम नहीं हो,” उन्होंने विजयी मुद्रा के साथ कहा। उन्होंने अपनी मेज पर पड़े उत्तर-पत्रिकाओं के गठ्ठे में देखना शुरू किया। “इसमें तुम्हारी उत्तर पत्रिका ही नहीं है; परीक्षा में न बैठने के कारण तुम वैसे ही अनुत्तीर्ण हो गये हो।”

मैं हँसा। “सर, मैं परीक्षा में बैठा था। क्या इस गठ्ठे को मैं देख सकता हूँ?”

प्रोफेसर ने असंमजस में पड़कर अनुमति दे दी। मैंने शीघ्र ही अपनी उत्तर-पत्रिका ढूँढ निकाली, जिस पर मैंने अपने रोल नम्बर के अतिरिक्त पहचान का कोई चिह्न नहीं छोड़ा था। मेरे नाम की “लाल झंडी” न दिखने के कारण पाठ्यपुस्तकों के उद्धरणों से अलंकृत न होने पर भी प्रोफेसर ने मेरे उत्तरों को अच्छे अंक दिये थे। ¹

मेरी चालाकी ध्यान में आते ही वे गरज उठे: “केवल तुम्हारी किस्मत बलवान है!” फिर उन्होंने आशा के साथ कहा: “तुम बी.ए. की परीक्षा में अवश्य फेल हो जाओगे।”

मेरे अन्य विषयों की टेस्ट परीक्षाओं के लिये मैंने कुछ मार्गदर्शन प्राप्त कर लिया था, विशेष कर मेरे प्रिय मित्र एवं चचेरे भाई प्रभास चन्द्र प्रोफेसर घोष से, जो मेरे शारदा चाचा के बेटे हैं। सभी विषयों की अपनी टेस्ट-परीक्षा से मैं कष्टप्रद रूप से परन्तु सफलतापूर्वक निकल गया – सभी विषयों में मुझे न्यूनतम उत्तीर्णांक जितने ही अंक मिले।

कॉलेज की चार वर्षों की पढ़ाई के बाद अब मैं बी.ए. की परीक्षा में बैठने के योग्य हो गया था। परन्तु इस अवसर से कोई लाभ उठा पाने की आशा नहीं के बराबर थी। कोलकाता विश्वविद्यालय की कड़ी बी.ए. की डिग्री परीक्षा की तुलना में श्रीरामपुर कॉलेज की टेस्ट परीक्षा तो बच्चों का खेल मात्र थी। लगभग प्रतिदिन श्रीयुक्तेश्वरजी के पास जाने के कारण कॉलेज जाने का मुझे समय ही नहीं मिलता था। अनुपस्थिति की अपेक्षा कक्षा में मेरी उपस्थिति ही छात्रों के विस्मय का कारण बनती।

लगभग प्रतिदिन मैं जिस दिनचर्या का अवलम्बन करता, उसकी शुरूआत सुबह साढ़े नौ बजे मेरे साइकिल पर निकल पड़ने से होती। एक हाथ में गुरुदेव को अर्पित करने के लिये पंथी छात्रावास के बगीचे से चुने हुए फूल रहते। प्रेम से मुझसे मिलते हुए गुरुदेव दोपहर का खाना वहीं खाने के लिये मुझसे कहते। मैं बिना किसी अपवाद के नित्य ही अत्यंत सत्वरता के साथ उनकी बात मान लेता ताकि दिनभर के लिये कॉलेज के विचार से मुक्ति मिल जाये। घंटों श्रीयुक्तेश्वरजी के सान्निध्य में रहकर उनका अपूर्व ज्ञानोपदेश सुनने या आश्रम के कार्यों में सहायता करने के बाद मैं करीब आधी रात के समय अनिच्छापूर्वक ही पंथी छात्रावास के लिये प्रस्थान करता। कभी-कभी तो रातभर मैं अपने गुरु के साथ ही रहता, उनकी बातों में इतना मग्न होता कि कब रात का अन्धकार भोर के उजाले में बदल गया पता ही नहीं चलता।

एक रात लगभग ग्यारह बजे जब मैं छात्रावास में वापसी की अपनी साइकिल सवारी के लिये जूते पहनकर तैयार हो रहा था, तो गुरुदेव ने गम्भीर मुद्रा के साथ पूछाः

“तुम्हारी बी. ए. की परीक्षा कब शुरू होती है ?”

'आजसे पाँच दिन बाद, गुरुदेव !”

“तुम ने तैयारी तो कर ली है न ?”

मैं भय से काठ हो गया; हाथ का जूता हाथ में ही धरा रह गया। "गुरुदेव!" मैंने कहा, “आप जानते हैं कि मेरा सारा समय तो प्रोफेसरों के बजाय आप ही के सान्निध्य में बीता है। अतः उस कठिन परीक्षा में बैठने का ढोंग रचने से क्या लाभ ?”

श्रीयुक्तेश्वरजी ने अन्तर्भेदी दृष्टि से मेरी आँखों में देखा। “तुम्हें परीक्षा देनी ही होगी।” उन्होंने ठंडे निर्णायक स्वर में कहा। “हमें तुम्हारे पिताजी को या अन्य रिश्तेदारों को ऐसा कोई अवसर नहीं देना चाहिये, जिससे वे आश्रम-जीवन के प्रति तुम्हारी अभिरुचि की आलोचना कर सकें। मुझे केवल इतना वचन दो कि तुम परीक्षा में बैठोगे। तुमसे जैसे बनेंगे, वैसे उत्तर लिख देना।”

आँसू बेकाबू होकर मेरे गालों पर बह रहे थे। मुझे लगा कि गुरुजी की आज्ञा अनुचित थी और इस ओर ध्यान देने में और कुछ नहीं तो विलम्ब उन्होंने अवश्य कर दिया था।

मैंने सिसकते हुए कहाः “यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो परीक्षा में तो मैं बैठ जाऊँगा, परन्तु अभी उचित तैयारी करने का समय नहीं रहा है।” फिर अपने आपसे ही मैंने बुदबुदाते हुए कहा: “प्रश्नों के उत्तर में मैं आपके ही उपदेशों से उत्तर-पत्रिकाएँ भर दूंगा!”

दूसरे दिन जब मैं सदा की भाँति अपने नियत समय पर आश्रम पहुँचा, तो मैंने विषण्ण मन से अपने फूल श्रीयुक्तेश्वरजी को अर्पित किये। मेरे खिन्न चेहरे को देखकर वे हँसने लगे।

“मुकुन्द! क्या भगवान परीक्षा में या अन्य कहीं तुम्हारी मदद करने में कभी चूके हैं?”

“नहीं, गुरुदेव!” मैंने उत्साहित होकर उत्तर दिया। और साथ ही कृतज्ञतापूर्ण स्मृतियों से मुझमें नवशक्ति का संचार हो गया।

“कॉलेज में गौरव प्राप्त करने के प्रयास से तुम्हें तुम्हारे आलस्य ने नहीं, बल्कि ईश्वर प्राप्ति के ज्वलंत उत्साह ने रोका है,” मेरे गुरु ने प्रेम से कहा। थोड़ी देर मौन रहने के बाद उन्होंने बाइबिल के एक वचन को उद्धृत किया: ‘पहले ईश्वर के साम्राज्य को और उसकी नीतिपरायणता को प्राप्त करने का प्रयास करो; तब अन्य सारी चीजें तुम्हें अपने आप मिल जायेंगी।’ ”²

अन्य हज़ारों अवसरों की तरह इस बार भी गुरुदेव के सान्निध्य में मेरे मन से बोझ आज फिर हट गया। मध्याह्न भोजन रोज़ की अपेक्षा पहले खत्म करने के बाद उन्होंने मुझे पंथी लौट जाने की सलाह दी।

“तुम्हारा मित्र रमेशचन्द्र दत्त क्या अब भी तुम्हारे छात्रावास में रहता है?”

“जी, गुरुदेव!”

“उससे मिलो; प्रभु उसे तुम्हारी परीक्षा की तैयारी में सहायता करने की प्रेरणा देंगे।”

“ठीक है, गुरुदेव! परन्तु रमेश इस समय अत्यन्त व्यस्त है। उसने ऑनर्स ले रखा है और अन्य छात्रों की अपेक्षा उसका पाठ्यक्रम अधिक है।”

गुरुदेव ने मेरे आक्षेपों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। “तुम्हारे लिये रमेश समय निकाल लेगा। अब तुम जाओ।”

मैं साइकिल से पंथी वापस लौटा। छात्रावास के अहाते में पहुँचते ही सर्वप्रथम किसी से मेरी भेंट हुई, तो वह थी विद्याभ्यासी रमेश से। झिझकते हुए किये गये मेरे अनुरोध को उसने ऐसी तत्परता के साथ स्वीकार किया जैसे उसके पास समय ही समय हो।

“अवश्य! मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ।” उस दिन और उसके बाद के प्रत्येक दिन उसने मुझे मेरे विभिन्न विषयों की परीक्षा के लिये तैयार करने में कई घंटे व्यतीत किये।

“मुझे लगता है कि अंग्रेजी साहित्य में अनेक प्रश्न चाईल्ड हैरोल्ड ने अपनी यात्रा के लिये जो रास्ता अपनाया था, उससे संबंधित होंगे। हमें तुरन्त एक एटलस लानी चाहिये,” उसने मुझे बताया।


मैं जल्दी-जल्दी शारदा चाचा के घर गया और एक एटलस माँग लाया। रमेश ने यूरोप के नक्शे में उन सभी स्थानों पर चिह्न लगा दिये, जहाँ बायरन का वह रोमांचक यात्री गया था।

रमेश जब मुझे बता रहा था, तब कुछ सहपाठी उसके मार्गदर्शन को सुनने के लिये हमारे इर्दगिर्द जमा हो गये थे। एक बैठक के अंत में उनमें से एक ने मुझसे कहा: “रमेश तुम्हें गलत सलाह दे रहा है। साधारणतया केवल पचास प्रतिशत प्रश्न ही पुस्तकों के बारे में होते हैं; अन्य आधे प्रश्न लेखकों की जीवनी से संबंधित होते हैं।”

जब परीक्षा भवन में अंग्रेजी साहित्य की प्रश्न पत्रिका मेरे हाथ में आयी, तो उस पर प्रथम दृष्टि पड़ते ही मेरी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बहकर मेरी पत्रिका को भिगोने लगे। उस कमरे के परीक्षा पर्यवेक्षक मेरे पास आकर सहानुभूतिपूर्वक पूछताछ करने लगे।

मैंने उन्हें बतायाः “मेरे महान् गुरु ने पहले ही मुझे बता दिया था कि रमेश मेरी सहायता करेगा और देखिये, रमेश ने मुझे जिन-जिन प्रश्नों के आने की सम्भावना बतायी थी, वही सब प्रश्न इस प्रश्न पत्रिका में आये हैं!” फिर मैंने आगे कहा: “मेरी खुशकिस्मती से इस साल बहुत कम प्रश्न अंग्रेज़ लेखकों के बारे में हैं, जिनका जीवन मेरे लिये तो गहरे रहस्य में ही लिपटा हुआ है।”

जब मैं परीक्षा देकर छात्रावास लौटा, तो छात्रों ने मुझे देखकर ज़ोर से हर्षध्वनि की। जो लड़के रमेश के मार्गदर्शन में विश्वास करने के कारण मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे, वही ज़ोर-ज़ोर से मेरा अभिनन्दन करके मेरे कानों के पर्दे फाड़ रहे थे। परीक्षा के पूरे सप्ताह में मैं यथासम्भव अधिक से अधिक समय रमेश के साथ ही बिताता रहा, जो मुझे प्रोफेसरों द्वारा प्रश्न-पत्रिका में डाले जा सकने वाले संभाव्य प्रश्न बताता रहा। दिन-प्रतिदिन प्रत्येक प्रश्नपत्रिका में रमेश के बताये हुए प्रश्न लगभग उसी के शब्दों में आते रहे।

कॉलेज में बिजली की तरह यह बात फैल गयी कि चमत्कार जैसा कुछ घटित हो रहा है और हमेशा अनमने से रहने वाले “पागल संन्यासी” का परीक्षा में उत्तीर्ण होना संभव लग रहा है। मैंने कुछ भी छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया। विश्वविद्यालय के द्वारा बनायी गयी प्रश्न पत्रिकाओं में कोई फेर-बदल करना स्थानीय प्रोफेसरों के हाथ में नहीं था।

एक दिन सुबह अंग्रेजी साहित्य की परीक्षा के विषय में सोचते हुए अचानक मेरे ध्यान में आया कि मैंने एक बड़ी भारी भूल कर दी थी। कुछ प्रश्न दो भागों में विभाजित किये गये थेः 'क' या 'ख', तथा 'ग' या 'घ' । प्रत्येक विभाग के एक प्रश्न का उत्तर लिखने के बजाय मैंने प्रथम विभाग के दोनों प्रश्नों के उत्तर लिख दिये थे और दूसरे विभाग को लापरवाही से पूर्णतः अनदेखा कर दिया था। उस परीक्षा में मुझे अधिक से अधिक ३३ अंक मिल सकते थे न्यूनतम उत्तीर्णांक ३६ से तीन अंक कम।

मैं सीधा गुरुदेव के पास पहुँच गया और उन्हें अपनी भूल बता दी। मैंने कहा: “गुरुदेव! मैंने अक्षम्य भूल कर दी है। मैं रमेश के माध्यम से मिली ईश्वरीय कृपा के योग्य नहीं हूँ मैं बिलकुल अपात्र हूँ।”

“मुस्कराओ, मुकुन्द !” श्रीयुक्तेश्वरजी के स्वर में चिन्ता का लवलेश नहीं था। उन्होंने नीले आकाश की ओर उँगली दिखाते हुए कहा: “सूर्यचन्द्र आकाश में अपने स्थानों की अदला-बदली कर सकते हैं, परन्तु तुम्हें विश्वविद्यालय की उपाधि मिलना नहीं रुक सकता!”

हिसाब करने से तो पास होना असम्भव लग रहा था, तथापि मैं जब आश्रम से बाहर निकला तो मेरा मन काफी शान्त हो गया था। एक-दो बार मैंने सशंक मन से आकाश की ओर देखा; सूर्य अपनी प्रचलित कक्षा में ही सुस्थित लग रहे थे।

जब मैं पंथी पहुँचा, तो एक सहपाठी का स्वर मेरे कानों में पड़ाः

“मैंने अभी-अभी सुना है कि इस वर्ष पहली बार अंग्रेजी साहित्य में उत्तीर्ण होने के लिये आवश्यक न्यूनतम उत्तीर्णांक को घटा दिया गया है।”

मैं इतनी तेज़ी से उस लड़के के कमरे में घुसा कि उसने घबराकर ऊपर देखा। मैंने अत्यंत उत्सुकता के साथ उससे पूछा।

उसने हँसते हुए कहाः “जटाधारी साधु महाराज! पढ़ाई-लिखाई में अचानक इतनी उत्सुकता क्यों ? अन्तिम क्षण में रोने-धोने से क्या लाभ ? परन्तु यह सच है कि उत्तीर्णांक को घटा कर ३३ कर दिया गया है।

खुशी के मारे उछलता-कूदता मैं अपने कमरे में पहुँचा और ज़मीन पर घुटने टेककर अचूक गणितीय हिसाब के लिये अपने परमपिता की स्तुति करने लगा।

प्रतिदिन रमेश के माध्यम से मेरा मार्गदर्शन करती एक आध्यात्मिक शक्ति की उपस्थिति के बोध से मैं रोमांचित हो उठता। बंगाली भाषा की परीक्षा के सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय घटना हुई। एक दिन प्रातः जब मैं छात्रावास से निकल कर परीक्षा के लिये कॉलेज की ओर जाने लगा, तो रमेश ने मुझे पुकारा। उसने मुझे बंगाली भाषा के विषय में कोई मार्गदर्शन नहीं दिया था।

“वहाँ रमेश तुम्हारे लिये चिल्ला रहा है, एक सहपाठी छात्र ने अधीर होकर कहा। “अब वापस मत जाओ, वरना हम लोगों को परीक्षा के लिये देर हो जायेगी।”

उसकी बातों की ओर कोई ध्यान न देकर मैं छात्रावास भवन की ओर दौड़ पड़ा।

रमेश ने कहाः “हमारे बंगाली लड़के साधारणतया बंगाली भाषा में आसानी से पास हो जाते हैं, परन्तु मेरे मन अभी-अभी ऐसी शंका उठी है कि इस वर्ष अपेक्षित पठन की पुस्तकों से प्रश्न पूछकर प्राध्यापकों ने विद्यार्थियों की बलि चढ़ाने की योजना बनायी है।” उसने फिर १९वीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध बंगाली समाजसेवक विद्यासागर के जीवन की दो कहानियाँ संक्षेप में बतायी।

रमेश का धन्यवाद कर मैं तुरन्त साइकिल से कॉलेज पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि बंगाली की प्रश्न पत्रिका में दो विभाग थे। पहले विभाग में लिखा था: “विद्यासागर के समाजकार्य की दो घटनाओं का वर्णन करो।”³ जब मैं अभी-अभी ज्ञात हुई कहानियों को उत्तर पत्रिका पर उतार रहा था, तो मन ही मन धन्यवाद करने लगा कि अन्तिम क्षण में भी मैंने रमेश की पुकार का मान रखा था। विद्यासागर के कल्याण कार्यों (जिनमें अब एक मेरे प्रति भी हो गया था) से यदि मैं अनभिज्ञ रहता, तो बंगाली भाषा में मैं पास नहीं हो पाता।

प्रश्न पत्रिका के दूसरे विभाग में लिखा था: “बंगाली में उस व्यक्ति के जीवन पर निबंध लिखो जिससे तुम्हें सर्वाधिक प्रेरणा मिली हो।” भद्र पाठक, निबंध के लिये मैंने किसे चुना, इसके बारे में आपको बताने की कोई आवश्यकता नहीं। जब मैं पृष्ठ पर पृष्ठ अपने गुरु की प्रशंसा से भरता जा रहा था, तो अपने आप से बुदबुदाकर की हुई उस भविष्यवाणी को सच होते देख मेरे होठों पर मुस्कान आ गयी: “प्रश्नों के उत्तर में मैं आपके ही उपदेशों से उत्तर-पत्रिकाएँ भर दूंगा!”

दर्शनशास्त्र के मेरे पाठ्यक्रम के विषय में रमेश से कुछ पूछने की इच्छा मेरे मन में नहीं आई थी । श्रीयुक्तेश्वरजी के मार्गदर्शन में मिले दीर्घ प्रशिक्षण पर मुझे इतना भरोसा था कि पाठ्यपुस्तकों के विवरणों को मैंने कोई महत्त्व नहीं दिया। सब विषयों में मुझे सबसे अधिक अंक दर्शनशास्त्र में ही मिले। अन्य विषयों में मुझे केवल पास होने के लिये आवश्यक अंक ही मिले।

यहाँ बताते हुए मुझे अत्यंत हर्ष होता है कि मेरे निःस्वार्थी मित्र रमेश को उसकी अपनी ऑनर्स की डिग्री उच्च अंकों के साथ मिली।

मेरे स्नातक होने पर पिताजी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने स्वीकार कियाः “मुकुन्द ! तुम अपने गुरु के साथ इतना अधिक समय व्यतीत करते थे कि मुझे तुम्हारे उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं थी।” गुरुदेव ने मेरे पिताजी की अव्यक्त आलोचना को ठीक ही ताड़ लिया था।

वर्षों से मेरे मन में सन्देह बना हुआ था कि मैं अपने नाम के बाद बी.ए. के अक्षर जुड़े कभी देख भी पाऊँगा। इस उपाधि का उल्लेख करते समय हमेशा ही मेरे मन में यह विचार आये बिना नहीं रहता कि मुझे यह ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिली है, जिसके पीछे कोई गूढ़ कारण है। कभी-कभी मैं कॉलेज में पढ़े लोगों को ऐसा कहते सुनता हूँ कि उन्हें अपने रट रट कर प्राप्त किये ज्ञान का बहुत अल्प अंश ही उपाधि मिलने के बाद याद रह पाता है। उनकी इस स्वीकारोक्ति से मुझे अपनी निस्सन्दिग्ध शैक्षणिक अपूर्णता के विषय में थोड़ी-सी सान्त्वना मिल जाती है।

जून 1915 के जिस दिन मुझे कोलकाता विश्वविद्यालय की उपाधि मिली, उस दिन अपने गुरु के चरणों में सिर नवाकर मैंने उनके जीवन⁴ से अपने जीवन में प्रवाहित होने वाली सभी कृपाओं के लिये उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

“उठो, मुकुन्द !” उन्होंने अत्यंत प्रेम के साथ कहा। “बात केवल इतनी है कि प्रभु को सूर्य चंद्र के स्थानों की अदला-बदली करने के बजाय तुम्हें स्नातक बना देना ज़्यादा आसान लगा!”





¹ यदि मैं यह स्पष्ट न करूँ कि प्रोफेसर घोषाल के साथ मेरी जो खींचातानी चल रही थी उसमें उनका कोई दोष नहीं था, तो यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। उसका कारण केवल कक्षा में मेरी अनुपस्थिति था।
घोषाल दर्शनशास्त्र के पंडित और अत्यंत कुशल वक्ता हैं। बाद के वर्षों में हम दोनों के बीच मधुर सम्बन्ध बन गया।

²मत्ती ६:३३ (बाइबिल)।

³ प्रश्न-पत्रिका के निश्चित शब्द मैं भूल गया हूँ, परन्तु मुझे इतना याद है कि उस प्रश्न का संबंध विद्यासागर की उन कहानियों से ही था जो रमेश ने मुझे बतायी थीं।
प्रकांड विद्वत्ता के कारण पंडित ईश्वरचन्द्र बंगाल में विद्यासागर के नाम से प्रख्यात हुए थे।

⁴ पतंजलि के योगसूत्र (विभूतिपाद के 24वें सूत्र) में दूसरों के मन और घटनाओं की गति को प्रभावित करने की शक्ति या विभूति का उल्लेख है। उसमें इसे विश्वमैत्री के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली शक्ति बताया गया है ('मैत्र्यादिषु च बलानि' योगसूत्र 3-24 और 'बलेषु हस्तिबलादीनि –योगसूत्र 3-25 )।

सभी शास्त्र यह घोषणा करते हैं कि ईश्वर ने अपने सर्वशक्तिमान प्रतिमूर्तिस्वरूप में मनुष्य की सृष्टि की है। ब्रह्माण्ड पर नियंत्रण होना अतिप्राकृतिक या अलौकिक शक्ति का प्रमाण लगता है, परन्तु वस्तुतः ऐसी शक्ति हर उस मनुष्य में अंतर्निहित और स्वाभाविक होती है, जिसने अपने ईश्वरीय मूल की स्मृति को जगा लिया हो। श्रीयुक्तेश्वरजी जैसे ईश्वर साक्षात्कारी पुरुष अहंकार ततव में और उससे उत्पन्न होने वाली व्यक्तिगत इच्छा-आकांक्षाओं से मुक्त रहते हैं ऐसे सिद्धां के कर्म 'ऋत' या ब्रह्माण्ड की स्वाभाविक नीतिपरायणता के अनुरूप अनायास ही होते हैं। इमर्सन के शब्दों में “सभी महान् पुरुष पुण्यवान नहीं, बल्कि पुण्यरूप बन जाते हैं; तभी सृष्टि का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है और ईश्वर प्रसन्न होते हैं।”

कोई भी आत्मसाक्षात्कारी पुरुष चमत्कार कर सकता है, क्योंकि ईसामसीह की तरह ही वह भी सृष्टि के सूक्ष्म नियमों से पूर्ण परिचित होता है परन्तु सभी सिद्धजन चमत्कारी शक्तियों का प्रयोग नहीं करना चाहते। (प्रकरण २४ दृष्टव्य)। प्रत्येक संत अपने विशिष्ट ढंग से ईश्वर की महिमा का प्रकाश करते हैं। इस जगत् में, जहाँ रेत के दो कण भी एक समान नहीं हैं, व्यक्तिगत वैशिष्ट्य की अभिव्यक्ति एक मूलभूत तथ्य है।

ईश्वर प्राप्त संतों पर कोई निश्चित नियम लागू नहीं किये जा सकतेः कुछ संत चमत्कार करते हैं, तो कुछ संत नहीं करते: कुछ संत निष्क्रिय रहते हैं, तो कुछ संत (जैसे प्राचीन भारत के राजा जनक और एविला की सेंट टेरेसा) विशाल कार्यों से संबद्ध रहते हैं; कुछ संत उपदेश देते हैं, भ्रमण करते हैं और शिष्य स्वीकार करते हैं, तो कुछ संत अपने जीवन को छाया की तरह चुपचाप, लोक समाज से अनजान रहकर ही व्यतीत कर देते हैं। प्रत्येक संत के लिये भिन्नभिन्न लिपियों में उत्कीर्ण कर्मलेख में क्या लिखा है, इसे इस संसार का कोई समालोचक नहीं पढ़ सकता।