Hanuman Prasad Poddar ji - 28 books and stories free download online pdf in Hindi

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 28

स्वामीजी श्रीचक्रधरजी महाराज (श्रीराधाबाबा)

गीतावाटिका गोरखपुरमें जिस समय एक वर्ष का अखण्ड-संकीर्तन चल रहा था, उसी समय स्वामीजी चक्रधर जी महाराज गीतावाटिका पधारे। कालान्तरमें इनका भाईजी के साथ अत्यन्त प्रगाढ़ सम्बन्ध हो गया। इनका परिचय संक्षेपमें नीचे दिया जा रहा है --

बिहार प्रदेश के गया जिलेमें फखरपुर एक छोटा-सा ग्राम है। इसी ग्राममें परम्परागत वैदुष्य सम्पन्न 'मिश्र' उपाधिधारी ब्राह्मण कुलमें बाबा का जन्म पौष शु० 6 वि०सं० 1969 (16 जनवरी सन् 1913) को हुआ था। बाबा के पिता का नाम श्रीमहीपाल जी एवं माताका नाम श्रीमती अधिकारिणी देवी था। श्रीमहीपाल जी बहुत ही ईमानदार, सच्चरित्र थे एवं पूजा-पाठमें समय बिताते थे। माता भी अत्यन्त सरल हृदय एवं भक्ति भावापन्न थी। इन सभी का असर बाबा पर जन्मसे ही पड़ा।

सन् 1927 से 1931 तक बाबाका जीवन राजनैतिक कार्यों में व्यतीत हुआ। 1928 में बाबा गया नगर के जिला स्कूल की नवीं कक्षा में पढ़ते थे और उनकी आयु केवल पन्द्रह वर्ष की थी। राजनैतिक और क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लेने के कारण बाबा को दो बार जेल जाना पड़ा और प्रत्येक बार छः मास का कारावास-दण्ड मिला। जेल के भीतर उन्हें भीषण दारुण यन्त्रणा भोगनी पड़ी। उन अतिक्रूर और कष्टपूर्ण परिस्थितियों में बाबा को पद-पदपर सच्ची प्रार्थना एवं भगवत्कृपा के अनेक अद्भुत दिव्यानुभव हुए। इन चिरस्मरणीय अनुभवों ने बाबा के जीवन की धारा को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ दिया। बाबा जब जेल के भीतर थे, तभी इस प्रकारके विचार उनके मनमें आने लगे कि बाहर जाने के बाद अध्यात्मपूर्ण जीवन व्यतीत करना है।

सन् 1931 में जब दूसरी बार जेल से बाहर आये तो उनके बड़े भाई लोग उन्हें कलकत्ते ले गये और वहाँ उनका नाम सोहरावर्दी बेगम मेमोरियल स्कूल की नवीं कक्षामें लिखा दिया। सन् 1934 में बाबा ने मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणीमें उतीर्ण की। इसके बाद घरवालों ने उनका नाम रिपन कालेज (अब सुरेन्द्रनाथ कॉलेज) के इण्टरमीडियेट कक्षामें लिखवा दिया। सन् 1935 में बावाने प्रथम वर्षकी कक्षा उतीर्ण कर ली। प्रथम वर्ष उतीर्ण कर लेनेके बाद बाबा के जीवन-प्रवाहमें ऐसा आमूल परिवर्तन आया कि भविष्य का रूप ही बदल गया।

बाबाने सं० 1992 वि० की आश्विन मासवाली शारदीय रासपूर्णिमा ( शनिवार, 12 अक्टूबर 1935) के दिन सन्यास लिया था। तब बाबा कलकत्तेमें इंटरमीडियेट के द्वितीय वर्ष में पढ़ते थे। काषाय वस्त्र धारण करने के उपरान्त बाबाने अपने बड़े भाइयोंसे कहा था – इंटरमीडियेट की शिक्षामें डेढ़ वर्ष तक आपने मुझपर बहुत व्यय किया है। इस व्यय को निरर्थक करना उचित नहीं लगता, अतः मैं इंटरमीडियेट की पढ़ाई को पूरा करके परीक्षा दूँगा, जिससे आप लोगों के मनकी सन्तुष्टि हो सके। इस छः सात मासकी पढ़ाई के बाद जागतिक विषयों से सम्बन्धित मेरा अध्ययन समाप्त हो जायेगा।

कुछ समय कलकत्तामें रहने के पश्चात् वे पूज्य श्रीजयदयाल जी गोयन्दका के साथ कुछ वर्ष बाँकुड़ामें रहे। पू० श्रीसेठजी ने इन्हें बड़े स्नेह से अपने पास रखा। उन दिनोंमें ये निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्मके उपासक थे। श्रीसेठ जी तत्त्व के ज्ञाता होते हुए भी सगुण साकार रूप का विवेचन भी किया करते थे। इन्हें वह रुचिकर नहीं लगता था, अतः उनसे ये विचार विनिमय करने लग जाते। श्रीसेठजीने इन्हें शास्त्र समझाया, पर ये उनके तर्को को स्वीकार नहीं कर पाये। तब श्रीसेठजी ने इन्हें एक बार भाईजी से मिलनेके लिये कहा पर इन्होंने रुचि नहीं दिखायी। परन्तु जगन्नियन्ता का विधान और ही था। श्रीसेठ जी गोरखपुर आने वाले थे सो इन्हें भी निर्धारित तिथि तक गोरखपुर पहुँचने के लिये कहा। ये गोरखपुर आ गये पर कारण विशेष से श्रीसेठ जी नहीं पहुँच पाये। आश्विन शुक्ल एकादशी सं० 1993 (26 अक्टूबर, 1936) को गीताप्रेस जाने पर इन्हें पता चला कि श्रीसेठ जी आये नहीं हैं। इन्होंने भाईजी का निवास स्थान पूछा और गीतावाटिका चले आये।

सूचना मिलनेपर भाईजी आये और स्वामीजी के चरण-नखों का स्पर्श करके प्रणाम किया। भाईजी के चरण स्पर्श करते ही स्वामीजी को ऐसी विलक्षण अनुभूति हुई, जैसे विश्व का सम्पूर्ण व्रज-रस उनके मानसमें उडेल दिया हो ?” अपने पूर्व जीवनमें कट्टर वेदान्ती होते हुए भी स्वामीजी इन परिवर्तनों को रोक नहीं पाये। इसके बाद स्वामीजी ने वाटिकामें ही पीछे की ओर इमली के पेड़के नीचे कुछ दिनोंतक वास किया। संकीर्तन-यज्ञ की भीड़ से साधनामें बाधा होते देखकर ये वहाँ से हटकर नगर के दूसरे छोरपर हनुमान गढ़ीके पास जाकर रहने लगे। वहाँ चार-पाँच महीने रहे।

स्वामीजी संस्कृत, बंगला तथा अंग्रेजी के प्रकाण्ड पण्डित थे एवं उनका शास्त्र ज्ञान अगाध था। संगीत शास्त्र का भी उनको अच्छा अभ्यास था। उनकी वाणीमें अद्भुत प्रवाह एवं आकर्षण था।

श्रीसेठजी के अनुरोधपर श्रीमद्भगवद्-गीता की टीका लिखवाने के लिये उनके साथ चुरू ( राजस्थान) गये और फिर उनके सान्निध्यमें कुछ बाँकुड़ामें रहकर टीका लिखवाने का कार्य अप्रैल 1939 में पूर्ण किया।

टीका लेखन का कार्य पूर्ण होने के बाद बाबा ने वृन्दावन जाने का निर्णय लिया एवं भाईजी से मिलकर उन्हें अपने निर्णय की जानकारी दी। भाईजीने कहा– हम जाने देंगे तभी तो आप जायेंगे। बाबा उस समय समझे नहीं कि भाईजी का क्या भाव है ? उन्होंने उत्तर दिया–आप टिकट ही तो नहीं कटायेंगे। मैं रेल लाइन के सहारे चलता-चलता पैदल जाऊँगा। यह बात कलकत्तेमें हुई। भाईजी मुस्कुरा दिये। बाबा अपने कक्षमें चले गये। जैसे ही वे ध्यानस्थ हुए उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण का स्पष्ट निर्देश मिला कि मेरे लिये ही तो वृन्दावन जाना चाहते हो, मैं तो हनुमानप्रसादके
पाँच भौतिक ढाँचे के अन्दर लीलायमान हूँ। फिर तुम मेरे लिये क्यों इसे छोड़कर जा रहे हो। बाबा के समझमें आ गया कि पोद्दार महाराजका शरीर साक्षात् वृन्दावन स्वरूप है एवं इनके नित्य साथ रहने का अर्थ है वृन्दावन क्षेत्रमें नित्य निवास करना । उसी दिन ज्येष्ठ कृ० 7 सं० 1996 (11 मई 1939) को उन्होंने भाईजी के नित्य संग रहने का 'क्षेत्र–सन्यास' व्रत लेकर भाईजी को बता दिया। इसके पश्चात् बाबा एक दिनके लिये भी अलग नहीं हुए।

लगभग 1941 में एक दिन बाबा प्रवचन देने जाने लगे तो भाईजी ने संकेत किया—आप आये तो थे किसी और कामके लिये और लग गये लोक-सुधार के कार्यमें। संकेत बाबा तुरन्त समझ गये और उसी दिन से मौन हो गये। स्लेटपर लिखकर बात करने लगे। फिर सन् 1956 की शरद् पूर्णिमासे बाबा ने काष्ठ मौन लेने का निर्णय किया। मौन लेने के पूर्व अपने अन्तिम प्रवचनमें बाबा ने कहा--"श्रीपोद्दारजी महाराज यदि गुलाबका एक सुन्दर पौधा हैं तो मैं उसकी एक शाखापर एक छोटा-सा गुलाब का फूल हूँ। मुझसे भी अधिक सुन्दर श्रेष्ठ एक नहीं अनेकानेक पाटल पुष्प खिला देने की क्षमता इस पौधेमें है। इस मौनमें भाईजी से बोलने की छूट बाबाने रख ली थी। इस काष्ठ मौनकी अवधिमें ही बाबा को काव्य-रचना का स्फुरण हुआ और इसी अवधिमें प्रियतम-काव्य की रचना हुई।

एक बार की बात है -- 2 जुलाई 1980 को पूज्य बाबा ने मुझे बुलाया। वे उस दिन बड़ी प्रसन्न मुद्रामें थे एवं बड़े स्नेहसे कुछ बातें बता रहे थे। उसी प्रसंगमें उन्होंने कहा कि मुझे अपने पूर्वके चार जन्मोंकी बातें याद है। मैंने जानने की जिज्ञासा की तो बोले -- इससे पहले वाले जन्ममें मैं बंगालके मैमनसिंहमें किसी बंगाली के घर महिलाके रूपमें था। वहाँ भी माँस-मछली नहीं खाता था। उसके पहले एक जन्ममें मैंने चाणक्य के परिवारमें जन्म लिया था। उसके करीब 1700 वर्ष पहले मैं और भाईजी एक माता-पिताके सहोदर भाई थे और जयदयाल जी गोयन्दका हमारे पिता थे। उसके पहले करीब 3500 वर्ष पूर्व ग्रीस के एथेन्स नगरमें था। मैंने सुकरात का नाम लिया तो बोले सुकरात तो नहीं था पर उनके साथ ही था जिसको वे जाते समय कुछ करने को बोल गये थे। इससे ज्यादा तुमको जानने की जरूरत नहीं है।

दूसरी बार 14 मई, 1984 को मैं बाबाके पास बैठा था, और भी कई भाई-बहिन बैठे थे। बाबा बोले जब मैं सामनेवाली कुटियामें रहता था, उन दिनों प्रायः रातमें 2-3 बजे उठ जाता था। एक दिन उठकर उत्तराभिमुख होकर बैठ गया तो देखा सामने महाप्रभु वल्लभाचार्य प्रकट हो गये, पासमें गाय खड़ी थी उसपर एक हाथ रखे हुए थे। मैंने खड़े होकर प्रणाम किया, तो बोले -- मैं तो गृहस्थ हूँ, आपको ऐसे प्रणाम नहीं करना चाहिये। मैंने कहा -- आप तो सन्यासियोंके भी परम पूज्य हैं तो बोले कुछ नहीं, मुस्कुराने लगे। थोड़ी देर बाद दीखने बंद हो गये। इसी तरह एक बार महाप्रभु चैतन्य के दर्शन हुए पर वह स्थान और घटना अभी याद नहीं है।

एक बार रतनगढ़में था, इसी तरह दो बजे उठा। देखता हूँ मेरे सामने श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उन दिनों तीन साल तक भाईजी को पाइल्स की बहुत तकलीफ रही थी। फिर अन्तमें अजमेरमें चिकित्सा कराने से ठीक हुई। श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले कि भाईजी को इतनी तकलीफ हुई यह तुम्हें भोगनी पड़ती। मैंने कहा– मैं समझा नहीं। तब बोले – यह तुम्हारा किया हुआ कर्म था। फिर अन्तर्धान हो गये। दिन होनेपर मैं भाईजी के पास जाकर उनसे पूछने लगा। पहले तो थोड़ी देर टालमटोल करते रहे। फिर मैंने थोड़ा जोर से कहा– मुझे उस सूत्रसे पता लगा है जो सर्वोपरि है। तब हँसने लगे, बोले मैं और आप दो थोड़े ही हैं। अभी तो आप मुझे 'कल्याण' का काम करने दीजिये बादमें किसी दिन बात करेंगे।

भाईजीने अपनी इह लीला का संवरण 22 मार्च 1971 के दिन किया। बाबा ने नित्य साथ रहनेका जो महाव्रत लिया था, उसे (11 मई 1939 से लेकर 22 मार्च 1971 तक) अक्षुण्ण रूपसे निभाया। भाईजीकी चिता गीतावाटिकामें ही प्रज्जवलित हुई। इसी दिन बाबाने गीतावाटिका में स्थित अपनी पुरानी कुटियाँका परित्याग कर चिता-स्थली के उत्तरी ओर पेड़के नीचे एक छोटेसे टिन-शेड के नीचे निवास करने लगे। अपने जीवन के शेष दिन उस परम पावन चिता-स्थलीका सजल नेत्रोंसे नित्य दर्शन करते हुए बिताये। 13 अक्टूबर 1992 के दिन पूज्य बाबाने अपने पाञ्चभौतिक कलेवर का परित्याग कर दिया। उस पावन कलेवरको उसी स्थानपर 14 अक्टूबर 1992 के दिन भूमि-समाधि प्रदान कर दी गयी। वहीं एक सुन्दर समाधि मन्दिरका निर्माण हो गया है, जो उनकी परम मंगलमयी स्मृति दिलाता रहता है।