Me Papan aesi jali - 27 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(२७)

सरगम को सफर में एक परिवार मिल गया था,जिनसे बातें करते करते और उनके बच्चों के साथ खेलते खिलाते सरगम का सफर अच्छे से कट गया था और फिर ट्रेन लगभग सुबह के चार बजे बनारस पहुँच गई,वो परिवार भी बनारस ही जा रहा था और वें सभी भी बनारस रेलवें स्टेशन पर उतरे और सरगम उन्हें अलविदा कहकर रेलवें प्लेटफार्म के बाहर आई ,जहाँ बिलकुल सन्नाटा था,इक्का दुक्का लोग ही दिख रहे थे वो भी चाय की टपरियों पर और फिर सरगम कुछ दूर चली और फिर सोचा पहले पता तो देख लूँ कि मुझे जाना कहाँ है तब तो रिक्शेवाले या टैक्सी वाले को पता बता पाऊँगीं और फिर सरगम ने एक लैम्पपोस्ट के नीचे अपना बैग जमीन पर रखकर उस पते को अपने पर्स से निकाला जिसमें कि शिवसुन्दर शास्त्री जी का पता लिखा था और वो लैम्पपोस्ट के उजाले में उस पते को पढ़ने लगी,तभी एक चोर वहाँ आया और सरगम का बैग ले भागा....
सरगम ने चोर को अपना बैग ले जाते देखा तो वो भी उसके पीछे पीछे भागी,उस बैग में ऐसा कुछ बेसकीमती सामान तो नहीं था लेकिन सरगम के सारे सर्टिफिकेट उसी बैग में थे,उसमें कपड़े वगैरह बस होते तो वो उस चोर को जाने देती,लेकिन उसमें उसके सर्टिफिकेट थे इसलिए उसे मजबूरी में उस चोर के पीछे भागना पड़ा,सरगम चोर के पीछे पीछे चोर...चोर...कहकर भाग ही रही थी कि अचानक ठोकर खाकर वो जमीन पर गिर पड़ी और चोर उसकी पहुँच से दूर हो गया था और तभी चोर को किसी ने सड़क पर आगें से धर दबोचा और उसकी पिटाई करने लगा,तब तक सरगम भी जमीन से उठकर वहाँ पहुँच गई थी और फिर वो उस चोर की पिटाई करने वाले शख्स से बोली....
"बस कीजिए,रहने दीजिए,मेरा सामान मिल गया यही बहुत है मेरे लिए",
सरगम की आवाज़ सुनकर वो शख्स रुका और उसने जैसे ही सरगम को देखा तो बिना पलकें झपकाए एकटक उसे देखता ही रहा और फिर सरगम ने भी उस शख्स पर निगाह डाली,वो शख्स भी लम्बे कद का था,गोरा रंग,सुन्दर नैन-नक्श,बिखरे और बड़े बाल,दाड़ी बढ़ी हुई और शर्ट के ऊपर के दो तीन बटन खुले हुए,मतलब उसका हुलिया देखकर यही लग रहा था कि वो भी किसी गुण्डे से कम नहीं है और फिर सरगम ने उससे कहा...
"जाने दीजिए इस चोर को,उसके किए की सजा आप उसे दे चुके हैं",
"आप कहती हैं तो ठीक है लेकिन ये माँफी के काबिल नहीं है",वो शख्स बोला....
"रही होगी बेचारे की कोई मजबूरी,नहीं तो वो ऐसा काम क्यों करता"?,सरगम बोली...
तभी वो चोर रोते हुए बोला....
"दीदी!दो दिनों से भूखा हूँ इसलिए चोरी की,चाय की दुकान में काम करता था,दुकानदार ने दुकान से निकाल दिया तो क्या करता"?
"कोई बात नहीं,तुम जाओ और ये लो कुछ रूपए,कुछ खरीदकर खा लेना",सरगम ने पर्स से रूपए निकालते हुए कहा"
और फिर वो चोर वो रूपये लेकर वहाँ से चला गया तो उस शख्स ने सरगम से कहा....
"आप तो बड़ी दरियादिल हैं देवी जी! फट्ट से रूपए निकाल कर दे दिए, वो चोर था चोर"
"चोर हुआ तो क्या हुआ,इन्सान भी तो था ,दो दिनों से भूखा था बेचारा ,सो दे दिए रूपए",सरगम बोली...
"देवी जी! ये बनारस है ,चोर उचक्कों का शहर ,यहाँ किसी की बात पर इतनी जल्दी भरोसा करने लायक नहीं है",वो शख्स बोला...
"शक्ल से तो आप भी मुझे चोर उचक्के नजर आते हैं",सरगम बोली...
तब वो शख्स सरगम की बात पर थोड़ा मुस्कुराया और सिर खुजलाते हुए बोला....
"मेरा हुलिया देखकर आप ऐसा कह रहीं हैं ना!"
"नहीं! मैं आपका हुलिया देखकर ऐसा नहीं कह रही, अभी आपने उस चोर को जो इतनी बेरहमी से पीटा उसे देखकर कह रही हूँ",सरगम बोली...
"ओह...तो ये बात है,लेकिन मैं उसकी तरह चोर उचक्का नहीं हूँ,शरीफ घर से हूँ,हाँ!गलत बात पर गुस्सा जरूर आ जाता है और फिर मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता",वो शख्स बोला....
"आप पढ़े लिखे भी मालूम होते हैं क्योंकि आपका लहजा तो यही बता रहा है",सरगम बोली...
"क्या करूँ देवी जी! पढने लिखने का कोई मतलब नहीं हुआ क्योंकि अभी तक बेरोजगार हूँ,इतनी डिग्रियाँ लेने का भी कोई फायदा नहीं है,सब अलमारी में बंद पड़ीं हैं",वो शख्स बोला...
अब सरगम उस शख्स से ज्यादा बात नहीं करना चाहती थी और उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी,इसलिए वो उस शख्स से बोली...
"जी!बहुत बहुत शुक्रिया आपका! जो आपने मेरा बैग बचा लिया अब मैं चलती हूँ"
"जरा सम्भलकर जाइएगा,ध्यान रखिएगा फिर से कोई चोर उचक्का पीछे ना पड़ जाए",वो शख्स बोला...
"जी! ध्यान रखूँगीं"
और ऐसा कहकर सरगम अपना बैग लेकर कुछ कदम आगें बढ़ी तो उसने मन में सोचा क्यों ना मैं शास्त्री जी का पता इसी इन्सान से पूछ लूँ और फिर वो पीछे मुड़ी और उस शख्स से बोली....
"जरा ठहरिए"
"जी!आपने मुझसे कुछ कहा क्या"?,उस शख्स ने पूछा...
"जी!आप ही को पुकारा मैंने",सरगम बोली...
"अहोभाग्य मेरे,जो आपने मुझे पुकारा",
और ऐसा कहकर वो शख्स सरगम के पास आया और सरगम ने उसे वो पता दिखाया और उससे बोली...
"जी!क्या आप बता सकते हैं कि इस पते पर मुझे किस रोड और किस गली से होकर जाना होगा"?
उस शख्स ने उस पते को पढ़ा और सरगम से बोला...
"ये तो बिल्कुल पास ही है ,आप तो वहाँ पैदल ही जा सकतीं हैं,बस उस रास्ते पर चोर उचक्कों का खतरा थोड़ा ज्यादा है",वो शख्स बोला...
"अच्छा! ",सरगम परेशान होकर बोली...
"आप चोर उचक्कों की बात सुनकर इतना परेशान मत होइए,अगर आप कहें तो मैं आपको वहाँ तक छोड़ सकता हूँ",वो शख्स बोला...
"आपको मेरे लिए इतनी तकलीफ़ उठाने की जरूरत नहीं है",सरगम बोली...
"इसमें तकलीफ़ की क्या बात है देवीजी? आप हमारी मेहमान हैं",सरगम बोली...
"मैं आपकी मेहमान कैसें हुई",?सरगम ने पूछा...
"क्योंकि आप हमारे शहर आईं हैं और ये तो साफ पता चलता है कि आप इस शहर की तो नहीं हैं,इसलिए आप हमारी मेहमान हुईं",वो शख्स बोला....
"ओह...तो बड़े दिमागदार हैं आप",सरगम बोली...
"तारीफ़ के लिए शुक्रिया देवी जी!",वो शख्स बोला...
"मैं आपकी तारीफ़ नहीं कर रही हूँ",सरगम बोली...
"वो भी मुझे पता है",वो शख्स बोला...
"आपको तो पहले से ही सब पता हो जाता है",सरगम बोली...
"अभी तो आपने कहा ना कि दिमागदार हूँ मैं,इसलिए शायद",वो शख्स बोला....
"बातों को घुमाना तो कोई आपसे सीखे",सरगम बोली...
"तो आप भी सीख लीजिए मुझसे",वो शख्स बोला...
"क्या सीखूँ आपसे",सरगम ने पूछा....
"बातों को घुमाना और क्या?",वो शख्स बोला....
फिर उसकी बात सुनकर सरगम हँस पड़ी और बोली....
"बड़े ही दिलचस्प इन्सान हैं आप",
"जी! बचपन से ही मैं ऐसा हूँ",वो शख्स बोला....
सरगम फिर से उसकी बात पर हँस पड़ी और फिर उसके साथ शास्त्री जी के घर जाने को राजी हो गई और फिर इसी तरह बातें करते करते दोनों शिवसुन्दर शास्त्री जी के घर भी पहुँच गए और फिर उस शख्स ने शास्त्री जी के घर का दरवाजा खटखटाया और एक वृद्ध व्यक्ति ने दरवाजा खोला और फिर उस शख्स के साथ में सरगम को देखकर वें वृद्ध व्यक्ति बौखला उठे और वें अपनी छड़ी लेकर उस शख्स की ओर दौड़ पड़े फिर उसे उस छड़ी से मारते हुए वें उससे बोले....
"नालायक! दो दिन बाद घर लौटा है और वो भी एक लड़की के साथ,आवारागर्दी तक तो ठीक था अब तू घर में लड़कियांँ भी लाने लगा,कलंकी....! तूने मेरे कुल का नाम डुबो दिया.....शीलवती !तुम भी वहाँ ऊपर से देख रही हो ना अपने लौंडे की करतूतें....अच्छा हुआ कि तुम मरकर ऊपर चली गई नहीं तो इसकी करतूतें देखकर तुम्हें आत्महत्या करनी पड़ जाती.....हे!भगवान मुझे ऊपर बुला ले,मैनें कैसीं कुलकलंकी औलाद पैदा की है"
और ऐसा कहकर वो वृद्ध व्यक्ति उस शख्स को जोर जोर से छड़ी से मारने लगे तो वो शख्स चिल्लाया....
"बाबा!आप गलत समझ रहे हैं,मैं तो इस लड़की को जानता भी नहीं हूँ,ये तो आपसे मिलने आई है"
"क्या बक रहा है तू",?उन वृद्ध सज्जन ने पूछा...
"मैं सही कह रहा हूँ बाबा! आप इसी लड़की से ही क्यों नहीं पूछ लेते कि वो कौन है,आपको तसल्ली हो जाएगी",वो शख्स उन वृद्ध सज्जन से बोला...
तब उन वृद्ध सज्जन ने सरगम से पूछा कि वो कौन है तो सरगम ने अपने पड़ोसी की लिखी हुई चिट्ठी उन्हें दे दी और फिर जब वृद्ध सज्जन ने वो चिट्ठी पढ़ ली तो सरगम से बोले...
"ओह....तो तुम सरगम त्रिपाठी हो",
"जी!",सरगम बोली....
और वें वृद्ध सज्जन कोई और नहीं शिवसुन्दर शास्त्री थे और फिर वें सरगम से बोलें....
"आओ...बिटिया...भीतर आओ"
"और मैं",उस शख्स ने पूछा...
"तू भी आजा नालायक",शास्त्री जी बोलें....
"बाबा! पहले पूछ तो लिया करो कि क्या बात है? आप तो बस लट्ठ लेकर मुझ पर डट पड़े,ये भी नहीं देखते कि कौन खड़ा है पास में,कौन नहीं",वो शख्स बोला...
तब शास्त्री जी ने सरगम से पूछा....
"बिटिया! ये नालायक तुम्हें कहाँ मिला",?
"जी! इन्होने ही तो चोर से मेरा बैग बचाया और जब मैनें इनसे यहाँ का पता पूछा तो ये मुझे यहाँ ले आए लेकिन इन्होंने ना अपना नाम बताया और ना ये बताया कि इनसे आपका रिश्ता क्या है"?,सरगम बोली...
तब शिवसुन्दर शास्त्री जी बोलें....
"बिटिया!ये मेरा नालायक बेटा राधेश्याम शास्त्री है",
"बाबा! कभी तो इज्जत दे दिया करो,दूसरों के सामने भी बेइज्जती ही करते रहते हो",राधेश्याम शास्त्री बोला...
और फिर सरगम राधेश्याम की बात पर हँस पड़ी....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....