Kalvachi-Pretni Rahashy books and stories free download online pdf in Hindi

कलवाची--प्रेतनी रहस्य - भाग(४८)

"मेरी इस विवशता पर तुम हँस रही हो कालवाची"!,वैशाली बना अचलराज बोला...
"ना चाहते हुए भी मुझे तुम्हारी बातों पर हँसी आ गई अचलराज"!,कर्बला बनी कालवाची बोली...
तब वैशाली बना अचलराज बोला...
"तुम्हें ज्ञात ही कालवाची! कल रात्रि उस राक्षस ने मेरे कपोलों पर प्रगाढ़ चुम्बन लिया वो तो मैंने सहन कर लिया ,किन्तु जब उसने मेरे अधरों को छूने का प्रयास किया तो मैंने उसके मुँख में मदिरा का पात्र घुसा दिया,उसके स्पर्श से ही मुझे घृणा हो रही है,मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यदि मैं सारा दिन भी इत्र के सरोवर में डूबा रहूँ तो तब भी उस राक्षस की दुर्गन्ध मेरी देह से नहीं जाने वाली",
अचलराज की बात सुनकर कालवाची ठहाका मारकर हँस पड़ी तो उसे हँसता देखकर अचलराज बोला....
"हँस लो...अब तुम भी हँस ही लो कालवाची!,ना जाने कब उस पापी से मेरे प्राण छूटेगें,किन्तु कालवाची तुमने ये नहीं बताया कि तुम्हारी भेंट गिरिराज के पुत्र सारन्ध से हुई या नहीं",
"नहीं! अभी मेरी भेंट सारन्ध से नहीं हुई ,मैं भी इसी प्रतीक्षा में हूँ कि कब मेरी भेंट उससे हो तो मैं भी उसे अपने प्रेमजाल में फँसाने का प्रयास करूँ",कर्बला बनी कालवाची बोली....
"शीघ्र ही प्रयास करो उससे भेंट करने का,तब तो हम सभी अपनी अगली योजना तैयार कर पाऐगें", वैशाली बना अचलराज बोला...
"वो सब तो ठीक है अचलराज! किन्तु अभी मेरे मन में एक विचार आ रहा है,तुम कहूँ तो बोलूँ",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"हाँ!कहो ना कालवाची!",अचलराज बोला...
"मैं ये सोच रही थी कि क्यों ना मैं और तुम महाराज कुशाग्रसेन से मिलने बंदीगृह में चले,ये देखकर आएं कि उनकी स्थिति कैसीं है?,वहाँ पहरा कैसा है,तब उसी अनुसार हम अपनी योजना बनाकर वहाँ दोबारा जा सकते हैं उन्हें वहाँ से मुक्त करवाने के लिए",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"तुम्हारा विचार तो अच्छा है किन्तु हम वहाँ जाऐगें कैसें? ,वहाँ तो अनगिनत सैनिक होगे,अत्यधिक कड़ा पहरा होगा",वैशाली बना अचलराज बोला...
"अरे!तुम ये क्यों भूल जाते हो कि मैं रुप बदल सकती हूँ,तुम्हारा भी और अपना भी",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"हाँ! मैं तो ये भूल ही गया तो बताओ हम दोनों कैसें जा सकते हैं महाराज कुशाग्रसेन के पास",वैशाली बने अचलराज ने पूछा...
तब कर्बला बनी कालवाची बोली...
"तुम गिरिराज का रूप धर लेना, मैं सेनापति बालभद्र का और वत्सला को किसी सैनिक का रुप धरवा देगें,तब हम तीनों सरलता से बंदीगृह में प्रवेश कर सकते हैं",कर्बला बनी कालवाची बोली..
"ये तो बहुत ही अच्छी योजना है",वैशाली बना अचलराज बोला...
"तो इसमें अब बिलम्ब नहीं कर सकते ,हमें बंदीगृह में आज रात्रि ही जाना होगा",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"आज रात्रि से तुम्हारा तात्पर्य है इसी समय",वैशाली बने अचलराज ने पूछा...
"हाँ!कदाचित! तुम सही समझे",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"तो चलो बिलम्ब किस बात का है,हम दोनों पंक्षी बनकर वत्सला के कक्ष में चलते हैं,वहाँ से वत्सला को लेकर बंदीगृह जाकर पुनः रूप बदल लेगें",वैशाली बना अचलराज बोला....
"तो चलो! अभी वत्सला के पास जाकर इस कार्य को परिणाम तक पहुँचाते हैं",कर्बला बनी कालवाची बोली...
अन्ततः दोनों ने अपना अपना रूप बदला और वातायन से वत्सला के कक्ष में पहुँचे,दोनों ने अपना रुप बदला ,उस समय वत्सला अपने बिछौने पर सोने जा रही थी,तभी अचलराज उसके समीप जाकर बोला...
"वत्सला...! ये सोने का समय नहीं है,हमें अभी किसी आवश्यक कार्य हेतु यहाँ से बाहर जाना होगा",
"किन्तु! जाना कहाँ है"?,वत्सला ने पूछा..
"बंदीगृह और कहाँ",कर्बला बनी कालवाची बोली...
"परन्तु वहाँ क्यों जाना है",?,वत्सला ने पूछा...
"तुम कितने प्रश्न पूछती हो वत्सला! अचलराज इसलिए मैं नहीं चाहती थी कि हम किसी और को अपनी योजना में सम्मलित करें,",कालवाची बोली...
"सखी! तुम तो क्रोधित हो गई,तुमसे अधिक शीघ्रता मुझे है गिरिराज से प्रतिशोध लेने की",वत्सला बोली...
तब कर्बला बनी कालवाची बोली...
"मैं क्रोधित नहीं हो रही हूँ सखी! मैं केवल इतनी चाहती हूँ कि ये कार्य जितना शीघ्र हो जाए तो उतना ही अच्छा!,महाराज कुशाग्रसेन को अपना राज्य मिल जाएं,इसके पश्चात अचल और भैरवी विवाह कर लें अन्ततः मैं भी इस प्रेतनी जीवन से मुक्त होने के लिए कौत्रेय के संग चामुण्डा पर्वत पर तंत्रेश्वर के पास मानवी रूप लेने चली जाऊँगीं",
"हाँ! सखी! तुम्हारा ये स्वप्न शीघ्र ही पूर्ण होगा,चलो अब बिलम्ब मत करो,चलो अब सभी का रूप बदलो और रूप बदलकर हम सभी बंदीगृह चलते हैं",वत्सला बोली...
और कालवाची ने सभी को पंक्षी रुप में बदल दिया,अन्ततः सभी बंदीगृह पहुँचे,बंदीगृह के समीप जाकर उन्होंने इधर उधर देखा ताकि कोई भी उन्हें रुप बदलते हुए ना देख सकें,वें बंदीगृह के उस कोने में गए जहाँ अत्यधिक अँधेरा था और वहाँ तीनों अपना रूप बदलकर बंदीगृह के मुख्य द्वार पर पहुँचे,वहाँ पहरे पर उपस्थित सभी सैनिकों ने महाराज गिरिराज को प्रणाम किया,जो कि अचलराज बना था,कालवाची ने सेनापति बालभद्र का रुप धारण किया था और वत्सला ने किसी साधारण से सैनिक का रुप धारण किया था,तब महाराज गिरिराज बने अचलराज ने द्वार पर उपस्थित सैनिकों से कहा...
"हमें बंदीगृह के भीतर जाना है ,कृपया!द्वार खोलो",
अचलराज की इस बात से बालभद्र बनी कालवाची क्रोधित हो उठी और बोली....
"महाराज! आप यहाँ के राजा है,आपको सैनिकों की अनुमति नहीं चाहिए होती है आप तो सैनिकों को अनुमति दिया करते हैं",
"ओहो....हम भूल गए थे सेनापति!",गिरिराज बना अचलराज बोला...
"महाराज!आप ये कैसें भूल गए कि आप वैतालिक राज्य के राजा हैं",बालभद्र बनी कालवाची बोली...
"भूल तो सभी हो सकती ना सेनापति बालभद्र"!,गिरिराज बना अचलराज बात को सम्भालते हुए बोला....
"चलिए अब बंदीगृह के भीतर चलते हैं,वहाँ जाकर आपके शत्रु कुशाग्रसेन से मिलते हैं,नहीं तो पुनः आपसे कोई ना कोई भूल हो जाएगी",बालभद्र बनी कालवाची बोली...
"हाँ...हाँ...सेनापति बालभद्र,चलिए ना!",गिरिराज बना अचलराज बोला...
दोनों के झूठे अभिनय से वत्सला मन ही मन मुस्कुरा रही थी,साथ उसको ये भी भय था कि कहीं हम सभी का भेद ना खुल जाएं ,अन्ततः सभी महाराज कुशाग्रसेन के समीप गए और अचलराज ने महाराज कुशाग्रसेन से पूछा...
" और कुशाग्रसेन कैसें हो,आनन्द तो आ रहा है ना यहाँ",
वहाँ और भी सैनिक उपस्थित थे इसलिए अचलराज को महाराज कुशाग्रसेन से विवशतावश ऐसा वार्तालाप करना पड़ा...
"दुष्ट,कपटी,यहाँ क्या लेने आया है तू,मेरा राज्य हड़पकर तुझे संतुष्टि नहीं मिली ,जो अब यहाँ मेरा परिहास उड़ाने चला आया ", महाराज कुशाग्रसेन बोलें....
तब बालभद्र बनी कालवाची बोली....
"कुशाग्रसेन तुम हमारे महाराज को समझने का प्रयास क्यों नहीं करते,क्या पता वें तुम्हारी भलाई हेतु यहाँ आएं हो",
"भलाई और मेरी,ये कपटी भला मेरी क्या भलाई करेगा",महाराज कुशाग्रसेन क्रोधित होकर बोले...
तभी सेनापति बालभद्र ने जो कि कालवाची बनी थी,सभी सैनिकों को आदेश दिया....
"मेरा आदेश है कि सभी सैनिक इस कक्ष से बाहर जाएं,सिवाय के एक के",
उसने वत्सला को वहीं रोकते हुए कहा,जब सभी सैनिक बाहर चले गए तो अचलराज महाराज कुशाग्रसेन से मद्धम स्वर में बोला....
"महाराज मैं अचलराज,सेनापति व्योमकेश का पुत्र और ये कालवाची"
ये सुनकर महाराज कुशाग्रसेन आश्चर्यचकित हो उठे....

क्रमशः...
सरोज वर्मा....