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वजूद - 16

भाग 16

रात होने को थी तो उसने रात पुलिस चौकी के पास ही काटी। सुबह होने पर वो उस दुकान पर गया जहां से पुलिस चौकी का सिपाही उसके लिए रात के समय खाना और सुबह के समय नाश्ता लेकर आया था। वो दुकान के बाहर खड़ा हो गया। जब उसने देखा कि एक बार दुकानदार ने उसे देख लिया है तो उसने वहां बड़े से थाल में रखे समोसे उठाए और भागने लगा। दुकानदार ने उसे पकड़ लिया और दो-चार हाथ जमा दिए। फिर वो उसे पकड़कर सीधे पुलिस चौकी ले आया। उस समय इंस्पेक्टर वहीं मौजूद था। दुकानदार के साथ शंक को इस तरह देखकर इंस्पेक्टर के माथे पर कुछ देर के लिए शिकन आई। उसने दुकानदार से पूछा क्या हुआ, क्या किया है इसने जो तुम इसे ऐसे पकड़कर ला रहे हो ?

दुकानदार ने कहा- साहब चोरी करके भाग रहा था।

क्या चुराया है इसने ? इंस्पेक्टर ने फिर से पूछा।

साहब समोसे चुरा कर भाग रहा था।

कितने समोसे थे ?

साहब दो समोसे थे।

ठीक है ये पैसे लो और जाओ।

साहब इसका क्या ?

इसे हम देख लेंगे। इंस्पेक्टर ने कहा।

इंस्पेक्टर ने सिपाही को देखा और सिपाही बाहर नाश्ता लेने चला गया। तब इंस्पेक्टर ने शंकर को कुर्सी पर बैठाया और पूछा- भूख लगी है ?

शंकर ने ना में गर्दन हिला दी।

तो फिर समोसे क्यो चुराए ?

आपने ही कहा था कि यदि में चोरी करता तो आप मुझे एफआईआर दे देते।

शंकर की इस बात ने इंस्पेक्टर को अंदर तक झंझोड़कर रख दिया था। उसे शंकर पर दया भी आ रही थी और शंकर के भोलेपन पर वो हैरान भी हो रहा था कि आज की दुनिया में भी शंकर जैसे इंसान है। फिर उसने कहा तुमने एफआईआर के लिए समोसे चुराए थे ?

हां साहब। अब तो मैंने चोरी की है अब तो आप मुझे एफआईआर दे दो।

इंस्पेक्टर ने शंकर से कहा- शंकर ये रूपए लो और जाओ। तुम पर मैं केस नहीं बना सकता। इंस्पेक्टर ने पर्स से कुछ रूपए निकालकर शंकर को दिए।

क्यों साहब अब तो हमने चोरी की है, अब आप हम पर केस क्यों नहीं बना सकते।

इंस्पेक्टर कुछ कहने वाला था परंतु वो रूक गया और मन ही मन सोचने लगा कि यदि उसने कहा कि बड़े अपराध पर एफआईआर होती है तो फिर हो सकता है कि शंकर कोई बड़ा अपराध कर बैठे और किसी मुसीबत में पड़ जाए। फिर उसने कहा- अच्छा तुम्हें काम मिल जाए तो फिर तुम्हें एफआईआर नहीं चाहिए।

शंकर ने खुश होते हुए कहा- हां साहब दो वक्त की रोटी और सर छिपाने को जगह मिल जाए तो फिर एफआईआर नहीं चाहिए।

इंस्पेक्टर ने कहा- ठीक है मैं तुम्हें रोज के 50 रूपए, दोनों वक्त का खाना और रहने के लिए जगह दूंगा। उसके बदले तुम रोज सुबह इस चौकी में आओगे, झाडू पोंछा करोगे, यहां सफाई करोगे।

शंकर तुरंत राजी हो गया।

इंस्पेक्टर ने अपने घर के पास एक स्टोर रूम में उसके रहने की व्यवस्था कर दी। अब शंकर रोज चौकी आता सफाई करता, इंस्पेक्टर उसे 50 रूपए देता और शंकर फिर अपने उस कमरे पर चला जाता।

धीरे-धीरे वक्त बीता और दो महीने गुजर गए थे। वक्त के साथ गांव फिर से बसने लगा था। प्रधान गोविंदराम, सुखराम काका सहित गांव के कई लोग फिर से गांव में आकर रहने लगे थे। उन्होंने अपने घरों को भी दुरस्त करा लिया था और कुछ ने नए घर तैयार कर लिए थे। अब शंकर फिर से गांव जाने लगा था और गांव के लोगों से मिलने लगा था। कलेक्टर ऑफिस के बाबू ने इंस्पेक्टर को फोन किया कि शंकर की सहायत राशि को वापस भेजने का समय हो रहा है, यदि राशि एक बार चली गई तो शंकर को वह राशि फिर कभी नहीं मिल पाएगी। इंस्पेक्टर ने कहा कि गांव के पांच लोगों का लिखा हुआ मिलने के बाद राशि शंकर को मिल जाएगी ना ? बाबू ने हां कहा तो इंस्पेक्टर ने कहा कि वो गांव वालों से बात करेंगे। क्योंकि शंकर ने इंस्पेक्टर को बता दिया था कि गांव में कई लोग लौट आए हैं। शंकर उनसे मिलने के लिए भी जाता था।

बीते वक्त के दौरान भी शंकर में कुछ भी बदलाव नहीं आया था। अब भी गांव को कोई भी व्यक्ति उसे किसी काम के लिए बोलता तो वह काम कर देता था। हालांकि अब गांव वालों में अंतर जरूर आ गया था अब या तो वे शंकर को रूपए ही नहीं देते थे और यदि देते भी थे वो बहुत कम हुआ करते थे। हालांकि शंकर ने इस बात की कभी भी किसी से शिकायत नहीं की थी।

एक दिन शंकर के साथ इंस्पेक्टर भी गांव में आया। वह सीधे गांव के प्रधान गोविंदराम से मिला।

अरे इंस्पेक्टर साहब आप और हमारे गांव में ? कोई खास कारण ?

कुछ खास ही मान लीजिए प्रधान जी। ये समझ लीजिए कि आपकी मदद चाहता हूं।

अरे हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं, फिर बताइए कि हम क्या कर सकते हैं आपके लिए ?

मेरे लिए नहीं प्रधान जी। शंकर के लिए।

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