Wajood - 19 in Hindi Fiction Stories by prashant sharma ashk books and stories PDF | वजूद - 19

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वजूद - 19

भाग 19

एक इंस्पेक्टर अविनाश ही था जो उसकी चिंता किया करता था परंतु उसका तबादला होने जाने के बाद से शंकर की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। अब शंकर की दाड़ी बढ़ गई थी, कपड़े भी फट गए थे। पैरों के जूते भी पूरी तरह से टूट चुके थे। टूटे जुते होने के कारण उसके पैरों में कई जख्म हो गए थे। अब हालात यह हो गई थी कि शंकर को काम करने में भी दिक्कत आती थी और वह लोगों के घरों पर भीख मांगने को मजबूर हो गया था।

सुखराम काका हो, प्रधान गोविंदराम हो, मेहर सिंह हो या गांव के और भी कई लोग थे परंतु किसी ने भी शंकर की इस हालत पर ध्यान नहीं दिया था। या अगर कोई शंकर को इस हाल में देखता भी था तो अपनी नजरें फेर लिया करता था। इस तरह से करीब तीन महीने और गुजर गए थे। अब शायद शंकर की किस्मत उस पर कुछ मेहरबान होने वाली थी। एक बार फिर इंस्पेक्टर अविनाश उसी पुलिस चौकी फिर से आ गया था। उसने आते ही सिपाही से शंकर के बारे में जानकारी चाही।

रामअवतार वो एक लड़का यहां रोज सफाई के लिए आया करता था उसका क्या हुआ ?

साहब आपके जाने के बाद नए साहब ने उसे आने से मना कर दिया। एक-दो बार वो आपके बारे में पूछने के लिए आया था फिर नहीं आया। दो महीने से मैंने भी उसे नहीं देखा है।

अच्छा दो महीने से वो यहां नहीं आया है। इंस्पेक्टर अविनाश ने चिंता जाहिर करते हुए यह बात कही थी।

हां साहब कम से कम दो महीने तो हो गए हैं। सिपाही ने फिर अपनी बात दोहराई।

ठीक है अगर वो तुम्हें कहीं दिखाई दे तो उसे सीधे यहां लेकर आ जाना। इंस्पेक्टर ने सिपाही से कहा।

सिपाही ने भी सिर्फ हां कहा और फिर अपने काम में लग गया। इधर इंस्पेक्टर अविनाश अब भी शंकर के बारे में ही सोच रहा था। पता नहीं कहां होगा, किस हाल में होगा। गांव वालों ने उसके लिए कुछ किया होगा या नहीं। उसे वो रकम मिल पाई होगी या नहीं। ऐसे कई विचार उसके दिमाग में चल रहे थे।

करीब दो दिन बीत गए थे और शंकर का अब तक कुछ पता नहीं चला था। इंस्पेक्टर अविनाश ने खुद ही गांव लाकर शंकर का पता लगाने के बारे में तय किया। वो उसी दिन गांव में प्रधान गोविंदराम से मिलने के लिए पहुंच गया।

आइए साहब आपका स्वागत है, इंस्पेक्टर अविनाश को देखकर गोविंदराम ने कहा।

नमस्कार प्रधान जी। बताइए कैसे हैं आप। गांव के अब क्या हाल है ?

जी, सब ठीक है। गांव भी हालांकि अब उस हादसे से धीरे-धीरे उबर रहा है। जो लोग गांव छोड़कर चले गए थे, धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं। कई सारे लोग तो वापस आ गए हैं कुछ का आना जारी है।

चलिए यह ठीक है कि गांव फिर से बस रहा है। इंस्पेक्टर ने कहा।

बस सरकार ने जो राशि दी थी उसी के सहारे गांव के लोग संभल पाए हैं। वरना उस हादसे ने तो किसी को कहीं का नहीं छोड़ा था। सरकार ने जो राशि दी उससे ही लोगों के नए घर बने हैं और फिर से काम धंधे को शुरू कर पाए हैं। कई लोग के पास खेत तो थे पर जोतने के लिए पशु ही नहीं बचे लोगों ने घर बनाने के साथ पशु भी खरीदे और फिर से खेतीबाड़ी शुरू की है।

चलिए अच्छा है सभी फिर से अपनी जिंदगी को पटरी पर लेकर आ रहे हैं। इंस्पेक्टर ने संतोष जाहिर करते हुए कहा।

वैसे आज आपका इस ओर चक्कर कैसे लग गया साहब। कोई जरूरी काम था क्या ? प्रधान से इंस्पेक्टर से पूछा।

हां काम तो था। आपको याद है आपके गांव में एक शंकर नाम का लड़का हुआ करता था। जिसके बारे में मैंने पहले आप से बात भी की थी। जिसका घर बाढ़ में बह गया और उसके भैया-भाभी भी बाढ़ में मारे गए थे।

हां, हां याद है। शंकर, हरी का भाई। बड़ा ही अच्छा लड़का था। हमेशा गांव के लोगों की मदद के लिए खड़ा रहता था। गांव का कोई भी व्यक्ति से उसे किसी काम के लिए बोल दे तो मना नहीं करता था। पर उस बेचारे को सरकार की ओर जारी की गई सहायता राशि मिल ही नहीं पाई।

मैं उसके बारे में ही पूछ रहा था। कई दिनों से वह नजर नहीं आ रहा है, क्या आपको पता है कि आजकल वो कहां है ? इंस्पेक्टर ने प्रधान से सवाल किया।

वैसे कुछ समय पहले तक तो गांव में नजर आता था। कई दिनों से दिखा नहीं है। हो सकता है यहां से शहर चला गया हो।

क्या वो शहर चला गया, इंस्पेक्टर ने चौंकते हुए पूछा।

पता नहीं है साहब। मैं तो बस एक अंदाजा लगा रहा हूं। क्योंकि करीब 1 महीने से वो गांव में नजर नहीं आया है।

अच्छा वैसे वो रहता कहां था ?

पता नहीं गांव के लोग एक दिन बता रहे थे कि कभी वो मंदिर में सोता था, तो कभी किसी की गौशाला में चला जाता था। गांव के लोगों के घर पहुंच जाता था और उसे जो खाने में मिल जाता बस वहीं खाकर गुजारा कर रहा था। प्रधान ने इंस्पेक्टर की बात का जवाब देते हुए कहा।

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