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वजूद - 25

भाग 25

बात क्या है डॉक्टर ? मैं आता हूं पर आप कुछ तो बताइए ?

इंस्पेक्टर वो... वो... शंकर बिना बताए कहीं चला गया है। आप बस जल्दी से आ जाइए। डॉक्टर ने इंस्पेक्टर अविनाश को सिर्फ इतना ही बताया और फोन कट कर दिया।

हैलो... हैलो डॉक्टर... हैलो...। इंस्पेटर अविनाश बार-बार डॉक्टर को पुकार रहा था परंतु फोन कट हो चुका था। इंस्पेक्टर अविनाश तुरंत ही चौकी से बाहर निकला, अपनी बाइक उठाई और हॉस्पिटल की और दौड़ा दी। कुछ ही देर में इंस्पेक्टर अविनाश हॉस्पिटल पहुंच गया था। वो सीधे डॉक्टर के केबिन में चला गया।

कहां गया शंकर डॉक्टर ? इंस्पेक्टर अविनाश ने सीधा सवाल डॉक्टर से किया।

पता नहीं इंस्पेक्टर। हमने उसकी बहुत तलाश की पर वो कहीं नहीं मिला। डॉक्टर इंस्पेक्टर के सवाल का जवाब देते हुए कहा।

नहीं मिला से क्या मतलब है डॉक्टर आपका। पहली बात तो यह है कि कोई भी हॉस्पिटल से बाहर चला जाता है और किसी को कुछ पता ही नहीं होता। इंस्पेक्टर ने एक बार फिर डॉक्टर से सवाल किया।

पता चल जाता तो फिर यह बात होती ही क्यों इंस्पेक्टर। डॉक्टर ने भी अपनी सफाई पेश की।

कब से लापता है शंकर है ?

यह भी नहीं पता। मैं सुबह आया था उसके कमरे का दरवाजा बंद था। मैंने सोचा कि वो रोज की तरह टहलने गया होगा। पर 12 बजे भी वो कमरे में नहीं था। उसके बाद हमने उसकी तलाश की, अपने स्टाफ से भी पूछा पर आज उसे किसी ने नहीं देखा था।

आखिरी बात वो अपने कमरे में कब देखा गया था। इंस्पेक्टर ने फिर डॉक्टर से सवाल किया।

आपके जाने के बाद से उसे किसी ने नहीं देखा। डॉक्टर ने जवाब दिया।

मतलब मेरे जाने तक वो कमरे में ही था। उसके बाद शायद रात को वो अपने कमरे से बाहर निकला होगा। इंस्पेक्टर अविनाश ने अंदाज लगाया।

क्या मेरे जाने के बाद कोई उससे मिलने के लिए आया था ? इंस्पेक्टर ने फिर से सवाल किया।

नहीं आपके जाने के बाद कोई उससे मिलने के नहीं आया। डॉक्टर ने जवाब दिया।

वो मुझे कल कुछ परेशान भी लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वो किसी गहरी सोच में है। मैंने पूछा भी पर उसने कुछ बताया नहीं। इंस्पेक्टर ने फिर कहा।

मैंने भी पहले उसे समझाया था। पर शायद वो जीना ही नहीं चाहता था। डॉक्टर ने अपनी बात कही।

जीना ही नहीं चाहता था मतलब ? तो क्या उसने... ? इंस्पेक्टर अविनाश ने एक अंदेशा जाहिर किया।

नहीं, नहीं मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि उसने कोई गलत कदम उठा लिया है। मेरा कहने का मतलब है कि वो हमेशा उदास ही रहता था। मुझे ऐसा लगता था कि उसके साथ जो कुछ भी हुआ है उससे वो थक गया था। डॉक्टर ने कहा।

हां, उदास तो वह रहता था। मैंने भी उसके कई बार समझाया था पर वो बात सुनता था पर शायद उसे समझ नहीं रहा था। इंस्पेक्टर अविनाश ने डॉक्टर की बात का समर्थन किया।

एक ओर जहां अविनाश शंकर के लिए परेशान था, दूसरी ओर शंकर का कहीं को पता नहीं था। शंकर उस हादसे के बाद टूट गया था। फिर गांव के लोगों की बेरूखी और फिर अस्पताल में गांवों वालों की बातों ने उसे लगभग बिखेरकर रख दिया था। उसके पास जीने की कोई उम्मीद नहीं बची थी। वो अभी समझ नहीं पा रहा था कि अविनाश को उसकी कितनी चिंता है। अविनाश जानता था कि शंकर के लिए दुनिया कितनी कठोर है। पर शंकर था जिसे लगता था कि वो अच्छा है तो पूरी दुनिया अच्छी है। दुनिया और दुनिया के लोग कब रंग बदल लेते हैं उसे इस बात का पता नहीं था। उसे यह भी नहीं पता था कि यहां इंसानों के चेहरे पर कितने मुखौटे होते हैं। उसे तो बस लगता था कि गांव में हर कोई उसका काका है, काकी है, भाई है और बहन है, पर वो गलत था।

काफी तलाश के बाद भी शेकर का कोई पता नहीं चला था। अविनाश एक ओर शंकर के यूं अचानक चले जाने से दुखी था वहीं वो उसकी तलाश में सफल ना हो पाने के कारण हताश भी हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। हालांकि वो कुछ दिन और चौकी में रहा और फिर प्रमोशन होने के बाद उसका फिर से तबादला हो गया। अब वो चौकी की जगह एक थाने का इंचार्ज था। अच्छी यह थी कि उसके थाना क्षेत्र में ही शंकर का गांव भी आता था। इसलिए वो यह बात जानता था कि शंकर की कभी ना कभी कोई खबर उस तक पहुंच ही जाएगी। हालांकि वो अब भी शंकर की तलाश में लगा था। डेढ़ महीना बीत गया था और शंकर की अब तक कोई खबर ना थी। एक दिन अविनाश गांव में जा पहुंचा और प्रधान से मिला।

आइए-आइए साहब तरक्की मिलने के बाद आप पहली बार हमारे गांव आए हैं। प्रधान ने अविनाश को देखकर कहा।

जी, प्रधान जी। बस तरक्की हो गई है तो काम भी बढ़ गया है, इस कारण समय नहीं मिल पाता। चौकी पर था तो बस तीन-चार गांव ही थे, अब तो पूरे 45 गांवों को देखना पड़ता है।

हां, साहब तरक्की जिम्मेदारी से मिलती है और जिम्मेदारी लाती भी है।

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