Shakunpankhi - 14 in Hindi Moral Stories by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | शाकुनपाॅंखी - 14 - रातभर सो न सका वह

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शाकुनपाॅंखी - 14 - रातभर सो न सका वह

21. रातभर सो न सका वह

हाहुलीराय चाहमानों का सामन्त था पर वह इस समय नाराज़ होकर काँगड़ा में रह रहा था। पृथ्वीराज के सामन्त जैतराव ने भरी सभा में उसे श्वान कह दिया था। उसके अहं को ठेस लगी और उसने दिल्लिका और अजय मेरु से अपने को अलग कर लिया। पृथ्वीराज ने हाहुलीराय को मनाने के लिए चन्द को तैयार किया ।
चन्द यह जानते थे कि हाहुलीराय को अपने पक्ष में करना कठिन है। पर यह आपत्ति काल था। सैन्य संगठन को शक्तिशाली बनाना आवश्यक था। धरती की पुकार को अनुभव करते हुए वे काँगड़ा पहुँचे । चन्द को देखकर हाहुलीराय अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने राजकवि के स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिए। पर चन्द ने जब अपने आने का मन्तव्य बताया तो वह भड़क उठा। हाहुली का सम्पर्क शाह से हो चुका था। गोरी ने आश्वासन दिया था कि जीत होने पर आधा पंजाब हाहुली को दे दिया जाएगा।
'राजकवि, पृथ्वीराज के पक्ष में मैं क्यों जाऊँ? भरी सभा में मुझे अपमानित किया जाता रहा और महाराज मौन रहे। उनके साथ बड़े बड़े शूरमा हैं, उसमें मेरी कौन सी बिसात?"
"ऐसा मत कहो रावल जी यह समय विवाद करने का नहीं है।' चन्द ने समझाते हुए कहा।
'मैं तो संसारी जीव हूँ, महाकवि । लाभ हानि विचार कर काम करता हूँ। शाह ने मुझे आधा पंजाब देने को कहा है। पृथ्वीराज से मुझे क्या मिलेगा?" हाहुली की इस बात से चन्द दुःखी हुए। वे पृथ्वीराज की ओर से कुछ देने का वायदा नहीं कर सकते थे। 'आपने कान्यकुब्ज के युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया और अब राजा का साथ छोड़ रहे हो। देश और समाज क्या कहेगा?"
'समाज के कहने की बहुत चिन्ता नहीं करता मैं। आप आए हैं, यह अवश्य चिन्ता का विषय है।'
'यही सही। मेरे आने के कारण ही थोड़ा सहयोग करो। महाराज ने किसी आशा से
मुझे भेजा है।'
'अच्छा चलो एक काम करते हैं.......।’
"क्या?"
'देवी जालपा के मंदिर में चलकर पृथ्वीराज और शाह के नाम पर चिट्टी निकालते हैं। जिसके नाम पर चिट्ठी निकलेगी, उसका साथ दूंगा।' कहते हुए हाहुलीराय मुस्करा उठे ।
'माँ से आशीष लेना तो उचित है। पर अपनी धरती के साथ होने में भी सन्देह संगत नहीं लगता।' चन्द तर्क देते रहे। हाहुलीराय के साथ चन्द भी जालपा मंदिर गए। माँ जालपा देवी की स्तुति की। देवी से पृथ्वीराज पर कृपा करने की प्रार्थना की। अर्चना में लीन चन्द भाव विहल हो गए। हाहुली राय ने माँ से कहा 'माँ, पृथ्वीराज की सभा में मेरा अपमान हुआ है। मैं उसका बदला लेना चाहता हूँ। शाह का साथ देकर ही मैं अपना भला कर सकता हूँ। माँ मेरी सहायता करो।' चन्द माँ की देहरी पर आँखें बन्द कर बैठे थे । हाहुलीराय मंदिर से बाहर आ गए। बाहर से किवाड़ बन्द कर दिया। एक सैनिक टुकड़ी को लगाकर निर्देश दिया कि महाकवि चन्द को बन्दी बनाकर रखा जाय। उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर व्यवस्था की जाए। स्वयं शहाबुद्दीन गोरी से मिलने चल पड़ा।
लाहोर में शहाबुद्दीन गोरी ने अपने सभी शूरवीरों को इकट्ठा कर एक बैठक की। जिन सैनिकों को पिछली हार में उसने दंडित किया था, वे सब आ गए हैं। शाह को विश्वास दिलाया है कि वे इस बार किसी भी स्थिति में मैदान से नहीं हटेंगे। शाह को यकीन दिलाने के लिए सबने पवित्र कुरान की शपथ ली। शाह कुछ आश्वस्त हुए, पर पिछली हार कचोटती रही। लूट में बहुत कुछ मिलने की उम्मीद सैनिकों में नया उत्साह भर रही थी। शाह ने अपने अमीरों, सिपहसालारों को संबोधित करते हुए कहा, 'फतह से कम कतई नहीं।' सभी ने आश्वस्त किया कि फतह करके ही रहेंगे। शाह ने किमामुल मुल्क रुहुद्दीन हम्ज़ा को संकेत से बुलाया। हम्ज़ा को देखकर ही लोग भय खाते थे। सिर चंडूल, दाढ़ी बढ़ी हुई और शरीर पर मोटा चोगा। हम्जा शाह के निकट आ गए। 'सुनो हम्जा', शाह ने कहा, 'तुम्हें हिन्द के राजा पृथ्वीराज के पास पैगाम लेकर जाना है और यह अन्दाज़ लेना कि उसकी तैयारी कैसी है?"
हुँकारी भरते हुए हम्ज़ा ने झुककर आदाब किया। आकर तैयारी की और थोड़े से सवारों को अपने साथ लेकर चल पड़े।
हाहुलीराय के पहुँचने पर शाह ने उसकी बड़ी आवभगत की। हाहुली ने शाह को यह भी बताया कि वह पृथ्वीराज के सखा कवि चन्द को भी जालपा मंदिर में बंदी बना आया है। अब युद्ध में वे पृथ्वीराज का सहयोग नहीं कर पाएँगे। शाह बहुत खुश हुआ। उसने हाहुली को गले लगा लिया। इसी समय धर्मायन का भेजा हुआ थावक एक पत्र लेकर उपस्थित हुआ। उसने पत्र शाह को दिया। धर्मायन ने दिल्लिका से पत्र में लिखा था कि पृथ्वीराज पर हमला करने का यही समय है। उसके बहुत से शूरमा कान्यकुब्ज युद्ध में खप गए हैं। जो बचे हैं, उनमें तालमेल नहीं है। यदि देर की जाएगी तो पृथ्वीराज को हराना कठिन होगा। चिट्ठी कातिब ने पढ़ी और हाहुली ने भी उसे बाँचा खुश होकर धावक को इनाम दे विदा किया।
हाहुली भी काफी उत्साह में थे। उन्हें आधा पंजाब का सपना प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा था।
धर्मायन ने शाह को पत्र तो भेजा ही, वे मंत्री सोमेश्वर से भी मिले।
दोनों में शाह के प्रकरण पर बात हुई। धर्मायन ने शाह की ओर से सोमेश्वर के लिए जागीर का प्रस्ताव किया। सोमेश्वर लालायित तो हुए किन्तु उन्होंने अपनी चाल को गोपनीय रखा। प्रताप सिंह को भी शाह के पक्ष में करने में धर्मायन सफल हुए। सोमेश्वर और प्रताप सिंह की सलाह पर धर्मायन पृथ्वीराज के अश्वपाल से भी मिले। वह इनकार कर गया। धर्मायन को लगा कि कहीं भंडाफोड़ हो गया तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। उसने अश्वपाल को थन देकर चुप रहने का संकेत किया। तब भी धर्मायन आश्वस्त नहीं हुए। उन्हें अपने ऊपर तलवार लटकती दिखाई पड़ने लगी। वे सोमेश्वर और प्रताप सिंह से मिले। स्थिति से अवगत कराया। तीनों ने गुप्त मंत्रणा की। काषार्पण की दस थैलियाँ लेकर वे तीनों रात में अश्वपाल के घर पहुँचे। अश्वपाल घर के बाहर ही सो रहा था। धर्मायन ने उसे धीरे से जगाया। मंत्री सोमेश्वर को देखकर वह चौंक गया। उनके लिए आसन लाने उठा पर सोमेश्वर ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया। एक झुरमुट के निकट चारों खड़े खड़े बात करने लगे। आज दिन में अश्वाध्यक्ष ने अश्वपाल को डाट दिया था। वह बहुत दुःखी था। दिन में ही धर्मायन का प्रस्ताव उसके मस्तिष्क में कौंधा था। पर तब वह यही सोचता रहा कि अश्वाध्यक्ष का बदला महाराज से लेना उचित नहीं है।
रात में सोमेश्वर ने दसों थैलियाँ उसके हाथ में पकड़ाकर कहा, 'इसे घर में रख आओ।' अश्वपाल तब भी खड़ा रहा। 'तुम कोई सहायता न भी कर सको तब भी इसे रख आओ। शाह ने तुम्हारी लड़की के विवाह के लिए यह उपहार भेजा है। वह तुम्हारी सहायता करना चाहते हैं। शाह का यह स्वभाव है। वे सभी ज़रूरतमंदों की मदद करते रहते हैं। तुमसे वे कुछ चाहते नहीं । तुम्हें इसके बदले कुछ करना या देना नहीं है। वे तुम्हारी इज्जत करते हैं। तुम्हारे काम की प्रशंसा करते हैं। अब मुझे ही देखो। मैं महाराज चाहमान नरेश का मंत्री हूँ पर शाह मुझ पर भी विश्वास करते हैं। कभी न कभी कोई न कोई उपहार भेजते ही रहते हैं। किसी के दिए उपहार को न लेना, उसका अपमान है। इसे ले जाओ। घर में रख आओ।' सोमेश्वर कहते रहे। 'पर मैं.....।' अश्वपाल के शब्द अटक गए। 'तुम्हें कुछ नहीं करना है, कहा न... ... यह कोई उत्कोच नहीं है। हम लोग महाराज पृथ्वीराज के सेवक हैं, बने रहेंगे।' सोमेश्वर ने जोड़ा 'मन नहीं.' अश्वपाल फिर लड़खड़ा गया।
'यह समझ लो, यह धन भगवान ने दिया है। छप्पर फाड़ कर दिया है। इसके बदले कोई कुछ चाहता नहीं। हम लोग चल रहे हैं पर यह बात किसी से कहने योग्य नहीं । छप्पर फाड़कर जो मिलता है उसकी चर्चा नहीं की जाती। समझ गए। कहीं भनक न लगे।' सोमेश्वर ने यह सीख दी और तीनों चल पड़े। अश्वपाल तर्क वितर्क करता रहा। यह उचित नहीं है मन बार बार कहता पर काषार्पण भरी दस थैलियाँ सामने थीं, बिल्कुल प्रत्यक्ष थैली तो रख लिया पर रात भर वह सो नहीं सका।