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शाकुनपाॅंखी - 15 - सावन चिरई ना घर छ्वाड़इ

22. सावन चिरई ना घर छ्वाड़इ

किमामुल मुल्क रुहुद्दीन हम्जा भागते हुए महाराज पृथ्वीराज की सभा में उपस्थित हुए। शूरमाओं का जमावड़ा था। चामुण्ड, जामराय, कूरम्भ, पावस पुण्डीर, मदन सिंह परिहार, जैतराव, गुरुराम पुरोहित सहित अनेक वीर सभा में बैठे हुए थे। हम्ज़ा ने महाराज को आदाब किया और शाह की चिट्ठी का ख़रीता निकाला। महाराज के संकेत पर गुरुराम पुरोहित ने खरीता लिया। कातिब को पढ़ने के लिए दिया। उसने पढ़ना शुरू किया- या तो कानों में गुलामी का छल्ला पहन इस्लाम कुबूल करो या........।’
पत्र पढ़ते ही पूरी सभा तमतमा उठी। चामुण्ड राय से रहा नहीं गया। खड़े हो गए और कहने लगे, 'शाह भूल गए जब नायकी देवी ने उन्हें पानी पिला दिया था। घघ्घर की लड़ाई भी याद न रही। पिछले साल बीन बीन कर मारे गए। किसी तरह जान बची। आज चुनौती देने आए हैं।'
"पुरानी बात भूल जाना ही अच्छा हम मैदान में मिलेंगे।' महाराज ने शालीनता से कहा। पर अनेक सामन्त उबलते रहे। हम्जा शूरों की शक्ति का आकलन करते रहे। महाराज की शालीनता से भी वे प्रभावित हुए। युद्ध की भयंकरता का अनुमान लगाते हुए हम्ज़ा विदा हुए। महाराज ने राजर्षि सामन्त सिंह से परामर्श कर युद्ध की तैयारी का निर्देश दिया। राजकुमार को दिल्लिका का भार सौंप तलवार भेंट की। कन्हपुत्र ईश्वर, निड्डुर पुत्र वीर चन्द, कदम्बवास पुत्र प्रताप, जैल पुत्र कर्ण को राजकुमार का सहायक नियुक्त कर महाराज ने सभी को अश्व और तलवारें भेंट में दी। गुरुराम पुरोहित ने मंत्र पाठ कर सभी को आशीष दिया।
अजयमेरु की सुरक्षा का दायित्व हरिराज पर था। वे सैन्यदल के साथ पूरी तरह सन्नद्ध थे। महाराज रानी इच्छिनी से टीका लगवा कर संयुक्ता के अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए। वे अपने को रोक नहीं सके। संयुक्ता का गाढ़ आलिंगन लिया।
'मैं भी साथ चलूँगी,' संयुक्ता ने कहा।
"इसकी आवश्यकता नहीं है। मैं इतना असमर्थ नहीं हूँ कि नारियों को युद्ध भूमि में उतरना पड़े।' महाराज ने संयुक्ता को पार्श्व में बिठाते हुए कहा । 'जो सुन रही हूँ महाराज, उससे मुझे संतोष नहीं हो रहा है। शाह अपनी पूरी शक्ति से मैदान में उतरा है। हम अपने अनेक वीरों को गवाँ चुके हैं। ऐसी स्थिति में....।' संयुक्ता की वाणी में कसक थी।
'तुम्हारा अस्त्र उठाना क्या आवश्यक है?" महाराज हँस पड़े। 'हर बार शाह को हमसे हारना ही पड़ा है। इस बार भी उसे हारना ही होगा। तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।'
'पिता जी आपकी सहायता नहीं कर रहे हैं। हाहुलीराय शाह के साथ हैं, धीर पुण्डीर भी नहीं रहे।' संयुक्ता कठिनाइयाँ गिनाती रही।
'तुम्हारी बात सच है पर कठिनाई इतनी नहीं है कि तुम्हें मैदान में उतरना पड़े। युद्ध हम लोगों के लिए पर्व के समान है। योद्धा पीठ नहीं दिखाते, प्राण दे देना उचित समझते हैं। तुम तो देख ही चुकी हो प्रिये। केवल अपने सौ सामन्तों के बल पर हम तुम्हारे पिता से रास्ते भर लोहा लेते रहे।' 'पर हमने अपने सत्तावन वीरों की आहुति दे दी प्राणप्रिय, तभी हम दिल्लिका का द्वार देख सके।'
'आग में कूदने से कोई भयभीत नहीं है प्रिये ।'
'पर इतना ही तो पर्याप्त नहीं है। भरत की इस भूमि को सुरक्षा भी प्रदान करनी है। मैं भी यदि इसमें कुछ सहयोग कर पाती। अश्वारोही की भूमिका में मैं तनिक भी पीछे नहीं रहूँगी।'
'कौन कहता है कि तुम पीछे रहोगी? पर......अभी तुम अश्वरोही बन निकलो, यह आवश्यक नहीं है। हाँ, इतना अवश्य है कि दिल्लिका पर अचानक कोई संकट आ जाए तो यहाँ के लोगों की सुरक्षा में राजकुमार की सहायता करना।' 'आपका आदेश शिरोधार्य है', संयुक्ता ने सिर झुका स्वीकार किया।
दमामें की ध्वनि के साथ ही सेना तैयार होने लगी। उसके साथ तुरही, मुरज सब एक साथ बज उठे। रणभेरी की ध्वनि के साथ ही महाराज भी उठे। संयुक्ता ने अश्रुपूरित नेत्रों से तलवार से उंगली चीरकर टीका लगाया। महाराज भी अभिभूत हो उठे ।
'नववधू हूँ, सच है पर देश और समाज की सुरक्षा पहले.....।' कहते हुए संयुक्ता ने पृथ्वीराज के अधरों पर अपना अधर रख दिया। उसी की स्मृति सहलाते पृथ्वीराज चल पड़े। सेना का संचालन चामुण्डराय कर रहे थे। उन्होंने वही पाग बांधी जिसे पृथ्वीराज ने पहनाया था। राजर्षि सामन्त सिंह, जैतराव परमार के नेतृत्व में सेनाएँ निकलीं। सावन की फुहार सेना का स्वागत कर रही थी। कभी मेघ भी गर्जन कर देते । बदली छाई हुई थी। अपने अश्वों को नचाते, ठहनाते अश्वरोही निकल रहे थे। हाथियों के झुण्ड सवारों के साथ अठखेलियाँ करते।
मार्ग में पेड़ों पर झूला डालकर झूलते बच्चे उत्सुकता से सेना को जाते देखते रहे। ग्रामवासी जहाँ तहाँ कृषि कार्य में लगे थे। महाराज हाथी पर सवार थे। उनके साथ एक सुन्दर नील लोहित अश्व कोतल चल रहा था। यह महाराज पृथ्वीराज के लिए था। युद्ध में वे अश्वारोही के रूप में भी उतरते थे। चरवाहों का झुण्ड अपने ढोर चरा रहा था। सैन्य बल को प्रस्थान करते देखकर एक चरवाहा अत्यन्त मीठे किन्तु उत्तेजक स्वर में गा उठा........ 'सावन चिरई ना घर छ्वाड़य, ना बनिजरा बनिज का जायँ ।
वहि सावन मा उनहिं निकारेउ, आल्हा संग लहुरवा भाय।'
आवाज़ महाराज के कानों में पड़ी। उन्होंने एक सैनिक को संकेत कर गायक चरवाहे को बुलाने के लिए कहा। सैनिक एड़ लगाकर चरवाहे के पास पहुँचा। गायक से बताया, 'महाराज बुला रहे हैं।' गायक कुछ सहमते हुए चल पड़ा। अन्य चरवाहे भी उसके पीछे चल पड़े। सामने आने पर गायक ने महाराज को प्रणाम किया। महाराज को प्रसन्न देखकर वह कुछ आश्वस्त हुआ । 'यह गायन कहाँ से सीखा?" महाराज ने पूछा।
'महाराज मोर ननिऔरा महोबा में हते। वहीं तें सीखों।'
'यह गायन किसका है?"
'लोग कहत हयँ कि यहु राजकवि जागनिक बनायउ।'
'बहुत अच्छे स्वर में गाते हो। कभी हम तुम्हारा गायन शान्ति पूर्वक सुनेंगे। अभी तो दूसरे काम की जल्दी है।’ पृथ्वीराज ने संकेत किया और एक अश्वारोही सिक्कों की थैली चरवाहे के हाथ पर रखने के लिए आगे बढ़ा। महाराज आगे निकल गए।
'माई कहइ गायन कइ दम्म न लऊँ?"
'यह गायन का मूल्य नहीं है। महाराज की ओर से प्रोत्साहन है....।' 'माई कहइ दान न लऊँ? हाथ सों काम करउँ पूरो परो।'
सैनिक असमंजस में पड़ गया। दौड़कर महाराज तक गया। उनसे निवेदन किया कि गायक ने दम्म नहीं लिया। महाराज एक क्षण ठिटके, फिर कहा, 'चलो।' पर चरवाहे की वाणी उनके मन मस्तिष्क में गूँजती रही- 'सावन चिरई ना घर छ्वाड़इ, ना बनिजरा बनिज का जायें।
सावन में ही चामुण्डराय ने एक बार महोबा घेरा था। आज सावन में ही वह शाह को घेरने जा रहे हैं। सावन में नववधुएँ मैके किलोल करती हैं पर संयुक्ता के लिए सब कुछ दिल्लिका ही है।
गायक के साथ सभी चरवाहे ढोरों के पास लौट गए। गायक का मन फिर उमग उठा। उसने कसकर आलाप लिया-
सावन चिरई ना घर छ्वाड़इ, ना बनिजरा बनिज का जायँ ।
सोइ सावन मां सैन चलो हइ, देखउ का पर राम रिसायँ ?