भूपेंद्र ने एलिमनी चुकाने के लिए बैंक से लोन लेना चाहा, लेकिन उसे लोन नहीं मिला क्योंकि उसके पुराने लोन की किस्तें रुकी हुई थीं। पहले वंशिका अपनी कमाई से आधी किस्त भरती थी, तो भूपेंद्र को पता भी नहीं चलता था, पर अब वह पूरी तरह दिवालिया हो चुका था। मजबूरी में उसे अपनी प्रिय कार बेचनी पड़ी और घर का आधा हिस्सा (अपना हिस्सा) गिरवी रखकर वंशिका की रकम चुकानी पड़ी। क्योंकि उस घर में आधा हिस्सा वंशिका का पहले से ही था।
उसी समय मौका देखकर शिखा ने अपनी माँ मनोरमा के कान भरे। "मम्मी, देख लिया न? भैया अब कंगाल हो चुके हैं और ये काया आपको नोच खाएगी। अभी कोर्ट में मामला गरम है, हाथों-हाथ भैया पर अपना गुज़ारा भत्ता बांधने का केस कर दो, वरना ये चुड़ैल आपको एक रोटी के लिए तरसा देगी।"
मनोरमा को समझ आ गया कि अब बेटा नहीं, कानून ही सहारा है। उन्होंने भारी मन से अपने ही इकलौते बेटे पर गुज़ारे भत्ते का केस ठोक दिया।
जैसे ही वे लोग घर पहुँचे, काया का बांध टूट गया। अब उसके सामने साहब नहीं, बल्कि एक कंगाल खड़ा था। उसे भूपेंद्र के कंगाल होने से ज्यादा गुस्सा वंशिका को कोर्ट से इतने रुपए देने का ऑर्डर मिलना और आखिरी में वंशिका की वो जहरीली मुस्कान थी। उसने सोचा नहीं था वंशिका जीत जाएगी। वंशिका की ये जीत उसके लिए बहुत बड़ी हार थी । बजाय चुपचाप आकर अपनी गृहस्थी संभालने के उसने हॉल में ही तांडव शुरू कर दिया।
"ये क्या नाटक लगा रखा है? गाड़ी बिक गई, आधा घर बिक गया और अब ये बुढ़िया भी पैसे माँगेगी?" उसने मनोरमा को धक्का देते हुए चिल्लाकर कहा। "सुन लो बुढ़िया! आज के बाद अगर कोर्ट का नाम लिया, तो सीधा घर से बाहर फेंक दूँगी।"
भूपेंद्र ने उसे रोकने की कोशिश की, "काया! होश में आओ, वह मेरी माँ है!"
काया ने पलटकर भूपेंद्र का कॉलर पकड़ लिया। "चुप रहो तुम! अपनी औकात देख ली तुमने? अब मेरी बात कान खोलकर सुन लो। महीने की पहली तारीख को तुम्हारी पूरी तनख्वाह मेरे हाथ में आएगी। अगर एक रुपया भी इधर-उधर हुआ, तो सीधे कोर्ट जाऊँगी और कहूँगी कि तुमने मेरे अकेलेपन का फायदा उठाकर मेरा बलात्कार किया और शादी का झांसा दिया। जेल की चक्की पीसते रह जाओगे, समझे?"
भूपेंद्र सन्न रह गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। जिस औरत के जिस्म के लिए उसने अपनी इज़्ज़त, अपनी पत्नी और अपना घर दांव पर लगा दिया था, वही आज उसे बलात्कार के झूठे केस में फंसाने की धमकी दे रही थी। भूपेंद्र के नीचे से ज़मीन खिसक गई। अब उसके पास न वकील को देने के लिए पैसे थे, न दोबारा कोर्ट-कचहरी लड़ने की ताकत। वह अपने ही बुने हुए जाल में एक बेबस शिकार की तरह तड़प रहा था, जबकि काया एक भूखी शेरनी की तरह उसे निगलने को तैयार खड़ी थी। भूपेंद्र अपनी ही आँखों के सामने अपना साम्राज्य ढहते देख रहा था, लेकिन काया का तांडव अभी खत्म नहीं हुआ था। काया अब उस बेकाबू आग की तरह थी जो सब कुछ भस्म कर देना चाहती थी। उसे जैसे ही पता चला कि वह एक ऐसे शख्स के साथ बँध गई है जिसके पास अब फूटी कौड़ी भी नहीं बची, उसकी नफरत और बदतमीजी सीमाएं लांघ गई।
"खड़े क्या हो मुँह उठाकर? जाओ, जाकर उस वंशिका के तलवे चाटो, शायद वो तरस खाकर थोड़े और पैसे दे दे!" काया ने चिल्लाते हुए मेज पर रखा पानी का गिलास फर्श पर पटक दिया। कांच के टुकड़े मनोरमा के पैरों के पास जा गिरे, लेकिन काया को कोई फर्क नहीं पड़ा।
मनोरमा ने कांपते हुए कहा, "बहू, ये क्या कर रही है? तमीज़ भूल गई क्या?"
"तमीज़?" काया ठहाका मारकर हँसी, "तमीज़ उन घरों में होती है जहाँ तिजोरियाँ भरी होती हैं। इस कंगाली के ढेर पर तमीज़ की उम्मीद मत रख बुढ़िया। और सुन, आज से इस घर के नियम मैं तय करूँगी। तू जो ये महारानी बनी बैठी रहती है न, कल से सुबह चार बजे उठकर झाड़ू-पोछा करेगी। कामवाली के पैसे अब तेरा बेटा नहीं दे पाएगा।"
भूपेंद्र ने हताशा में अपना सिर पकड़ लिया। "काया, चुप हो जाओ! माँ की तबीयत ठीक नहीं रहती।"
"तो मर क्यों नहीं जाती?" काया ने बड़ी बेहयाई से कहा। "वैसे भी इस घर पर अब बोझ ही है। और तुम... तुम जो ये साहब बनकर गजरे लाते थे, अपनी औकात देख ली? पंद्रह हजार की नौकरी में मेरा पाउडर भी नहीं आएगा। याद रखना भूपेंद्र, अगर पहली तारीख को पूरी तनख्वाह मेरे हाथ में नहीं आई, तो मैं वो ड्रामा करूँगी कि पुलिस तुझे घसीटते हुए ले जाएगी। मैं कह दूँगी कि तूने मुझे डरा-धमकाकर यहाँ रखा और मेरा फायदा उठाया। वैसे भी तूने पहली पत्नी के साथ जो किया, उसके बाद पुलिस तेरी एक बात नहीं सुनेगी।"
काया ने अपनी ड्रेस को झटके से ठीक किया और मनोरमा के पास जाकर उनके चेहरे के एकदम करीब अपना चेहरा ले आई। उसकी आँखों में एक अजीब सी वहशियत थी। "वंशिका तो भोली थी, जो अपमान सहकर निकल गई। मैं नहीं निकलूँगी। मैं तुझे और तेरे इस लाडले बेटे को इतना तड़पाऊँगी कि तुम खुद मौत की दुआ माँगोगे। अब इस घर में सिर्फ मेरा हुक्म चलेगा।"
उसने ज़ोर से पैर पटकते हुए रसोई का दरवाज़ा खोला और अंदर से बासी रोटियों का डिब्बा लाकर मनोरमा की गोद में फेंक दिया। "ले, खा इसे। अब ताज़ा खाने के ख्वाब देखना छोड़ दे। जब तक तू इस घर में है, तुझे वही मिलेगा जो मैं फेंकूँगी।"
भूपेंद्र यह सब देख रहा था, पर उसकी ज़ुबान को जैसे लकवा मार गया था। उसे अपनी हार का इतना गहरा अहसास पहले कभी नहीं हुआ था। जिस औरत के लिए उसने अपनी दुनिया उजाड़ी, वही आज उसे और उसकी माँ को कीड़े-मकौड़ों की तरह कुचल रही थी। भूपेंद्र को अब वंशिका की वह शांत गरिमा याद आ रही थी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। काया की बदतमीजी और धमकियों ने उसे जीते-जी नर्क के द्वार पर खड़ा कर दिया था।
काया की बदतमीजी अब उस स्तर पर पहुँच गई थी जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। वह भूपेंद्र, जिसे वह अब तक साहब कहकर पुकारती थी और जिसके तलवे चाटती थी, अब उसे वह सरेआम तू-तड़ाक पर उतर आई थी। उसकी आँखों में अब नफरत और ठगी जाने का अहसास नाच रहा था।
"सुनो कलेक्टर साहब!" काया ने भूपेंद्र की कमीज का कॉलर पकड़कर उसे अपनी ओर झटका। "ये जो तू भीगी बिल्ली बनकर कोप भवन में बैठा रहता है न, ये नाटक अब बंद कर। मुझे पैसे चाहिए, किसी भी हाल में!"
भूपेंद्र का सिर चकराने लगा। उसे अपनी आँखों के सामने अंधेरा छाता हुआ महसूस हुआ। बेइज्जती और कंगाली के बोझ ने उसे इतना कमज़ोर कर दिया था कि उसे सच में चक्कर आने लगे। उसने दीवार का सहारा लिया और पूरी ताकत बटोरकर चिल्लाया, "बस कर काया! बहुत हुआ! अगर तूने अब एक शब्द भी और बोला, तो जो ये पंद्रह हजार की नौकरी कर रहा हूँ, उसे भी लात मार दूँगा। फिर सब मिलकर सड़क पर भीख माँगेंगे। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी!"
भूपेंद्र को लगा था कि नौकरी छोड़ने की धमकी सुनकर काया डर जाएगी, लेकिन काया के चेहरे पर एक डरावनी और वीभत्स मुस्कान फैल गई। उसने ज़ोरदार ठहाका लगाया जिससे पूरा हॉल गूँज उठा।
"नौकरी छोड़ देगा? छोड़ दे!" काया ने अपनी कमर पर हाथ रखकर निर्लज्जता से कहा। "तू क्या सोचता है, तू कमाएगा नहीं तो मैं भूखी मरूँगी? अरे, मुझमें वो दम है कि मैं कल ही चार मर्दों के सामने खुद को परोस दूँ और उनसे पैसा कमा लूँ। लेकिन याद रखना भूपेंद्र, जिस दिन मैं बाहर मुँह मारना शुरू करूँगी, उस दिन पूरे ज़माने में ढिंढोरा पीट दूँगी कि मेरा आदमी मुझे लेकर आता है और मुझसे धंधा करवाता है। सबको बता दूँगी कि तू अपनी अय्याशी के लिए अपनी ही औरत को दूसरों के बिस्तर पर भेजता है।"
यह सुनते ही भूपेंद्र और मनोरमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वे दोनों जैसे काठ मार गए हों। मनोरमा ने अपने दोनों कान बंद कर लिए, उनका शरीर थर-थर कांपने लगा। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस औरत को वे अपनी बहू मानेगी वह इतनी गिरी हुई और घटिया बात सोच भी सकती है।
भूपेंद्र की ज़ुबान तालू से चिपक गई। उसकी मर्दानगी, उसका अहंकार और उसका नाम—सब कुछ एक पल में काया के उस गंदे बयान ने कीचड़ में मिला दिया था। वह जानता था कि काया इतनी शातिर और बेगैरत है कि वह ऐसा कर भी सकती है।
हॉल में मौत जैसी खामोशी छा गई। काया वहीं सोफे पर पैर पसार कर बैठ गई और अपनी ड्रेस के किनारे को सहलाते हुए उन्हें चुनौती भरी नज़रों से देखने लगी। भूपेंद्र को अब समझ आ गया था कि उसने अपनी खुशहाल ज़िंदगी को आग लगाकर जिस शमा को गले लगाया था, वह दरअसल एक ऐसी आग थी जो केवल उसे जला नहीं रही थी, बल्कि उसकी नस्लों की इज़्ज़त को भी भस्म करने पर उतारू थी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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