ये मेरी चार साल पुरानी रचना थी। जिसे मैने तब पब्लिश नहीं किया था क्योंकि लैपटॉप खराब हो गया था। उस समय मेरी ज्यादातर कहानियां फैमिली पर ही होती थी।
शहर की चकाचौंध से दूर, उस पुराने घर की दीवारें अब सिसक रही थीं। काया जा चुकी थी। जैसे ही उसे अहसास हुआ कि भूपेंद्र की जेब और उसका जिस्म अब उसके किसी काम के नहीं रहे, वह एक रात चुपचाप घर का बचा-कुचा कीमती सामान और गहने लेकर रफूचक्कर हो गई। वह किसी नए साहब की तलाश में निकल गई थी, क्योंकि उसकी फितरत में बसना नहीं, उजाड़ना लिखा था। चाहे उसकी उम्र जो भी हो गई हो ।
भूपेंद्र उस खाली घर में अकेला था... जो कि अब बिकने की कुछ ही दिनों में उसे खाली करना था। मनोरमा देवी अब बिस्तर से लग चुकी थीं, उनकी आवाज़ भी अब साथ छोड़ रही थी। भूपेंद्र ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ कभी उसने और वंशिका ने मिलकर चमेली की बेल लगाई थी। वह बेल अब सूखकर कांटा बन चुकी थी—ठीक वैसी ही जैसी भूपेंद्र की ज़िंदगी। उसने मेज पर पड़ा पुराना अखबार उठाया। उसमें वंशिका का इंटरव्यू छपा था। वह एक सफल उद्यमी के रूप में मुस्कुरा रही थी। भूपेंद्र ने कांपते हाथों से उन शब्दों को पढ़ा जो वंशिका ने कहे थे: "रिश्ते कभी बेवफाई से नहीं टूटते, रिश्ते तब टूटते हैं जब एक इंसान दूसरे के अस्तित्व को नकार देता है। मैंने घर नहीं छोड़ा था, मैंने उस अपमान को छोड़ा था जो मुझे हर दिन तिल-तिल मार रहा था। आज मैं खुश हूँ, इसलिए नहीं कि मैं सफल हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं स्वतंत्र हूँ।"
भूपेंद्र की आँखों से एक आंसू टपक कर उस तस्वीर पर गिरा। उसे आज अपनी सबसे बड़ी गलती समझ आई। उसे लगा था कि वह मर्द है, इसलिए वह कुछ भी कर सकता है। उसे लगा था कि वंशिका एक वस्तु है जिसे वह जब चाहे बदल सकता है। लेकिन आज हकीकत आईने की तरह साफ़ थी: भूपेंद्र अब सिर्फ एक नाम था, जिसकी कोई पहचान नहीं बची थी। उसका अहंकार ही उसका भक्षक बन गया।
मनोरमा ने जिस कुलवधू की चाह में वंशिका को प्रताड़ित किया, आज उसी बेटे ने उन्हें तिल-तिल मरने के लिए छोड़ दिया।
काया ने सोचा था कि वह दूसरों का घर फूंककर अपना महल खड़ा करेगी, पर वह भूल गई थी कि राख पर कभी महल नहीं बनते। उसने सपने देखे थे.. जिस तरह वंशिका और भूपेंद्र साथ कहीं जाते थे और लोग उन्हें सम्मान देते थे वैसे ही उसे भी देंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टा औरतें अपने बेटे पति को उससे दूर ही रखती। अगर वो बाहर दिख जाती तो बच्चों तक को डांटकर भगा देती थी कि उस घर के लोगों से बोलचाल की जरूरत नहीं।
उसी वक्त, शहर के दूसरे कोने में वंशिका अपने बच्चों के साथ रात का खाना खा रही थी। घर में हंसी-मज़ाक था, सुकून था और सबसे बढ़कर—सम्मान था। शबनम और महिमा भी वहाँ मौजूद थीं।
शबनम ने हंसते हुए कहा, "वंशिका, सुना है उस घर की लाइट कट गई है। काया भी भाग गई।"
वंशिका ने शांत भाव से अपनी प्लेट में निवाला लिया और कहा, "शबनम, अब मुझे उस घर की खबरों में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैंने उन्हें बहुत पहले ही माफ कर दिया था, इसलिए नहीं कि वे माफी के काबिल थे, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं अपने मन में उनके प्रति नफरत का बोझ लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहती थी। उनकी सज़ा अब मैं नहीं, उनके अपने कर्म तय करेंगे।"
महिमा ने मुस्कुराते हुए वंशिका का हाथ दबाया। "यही एक मज़बूत औरत की असली पहचान है, वंशिका। तुमने लड़ाई लड़ी, तुम जीतीं, और अब तुम उस जीत के शोर से भी ऊपर उठ चुकी हो।"
भूपेंद्र ने घर का मुख्य दरवाज़ा बंद किया। बाहर अंधेरा था। वह अंधेरा जो उसने खुद अपने हाथों से अपनी ज़िंदगी में भरा था। उसे अब किसी से कोई शिकायत नहीं थी। उसे समझ आ गया था कि: "गुनाह औरत करे या मर्द, अदालत भले ही देर कर दे, लेकिन कुदरत का कानून कभी नहीं चूकता। उसने जो बोया था, वही काटा।"
वंशिका की सफलता उस आग की तरह थी जिसने भूपेंद्र के अहंकार को जलाकर राख कर दिया था। अब उस राख में न कोई पछतावा बचा था, न कोई भविष्य। सिर्फ एक खालीपन था, जो उसे ताउम्र साहब कहकर चिढ़ाता रहेगा।
कहते हैं कि समय के पास हर किसी के लिए एक तराजू होता है। वह तौलता सबको है, बस वक्त का इंतज़ार करता है। जिस काया ने सोचा था कि वह जिस्म की नुमाइश और मक्कारी के दम पर पूरी दुनिया जीत लेगी, आज वही काया वक्त के थपेड़ों से जर्जर होकर सड़क की धूल चाट रही थी।
भूपेंद्र का घर छोड़कर भागते वक्त उसने सोचा था कि वह उन गहनों और नकदी के दम पर किसी नए शहर में नया शिकार ढूँढ लेगी। लेकिन पाप की कमाई में बरकत कहाँ?
जिस टैक्सी वाले के साथ वह शहर छोड़कर भाग रही थी, उसी ने सुनसान रास्ते पर काया को नशीला पदार्थ सुंघाकर उसकी सारी जमा-पूंजी, गहने और यहाँ तक कि उसका मोबाइल और इज्जत भी लूट लिया। जब काया की आँख खुली, तो वह एक अजनबी हाइवे के किनारे पड़ी थी—तन पर वही फटेहाल कपड़े और पास में धेले भर की कौड़ी नहीं।
आज इतने साल बाद, काया की स्थिति देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह वही महारानी है जिसने एक हँसता-खेलता परिवार उजाड़ दिया था। उसकी वह देह, जिस पर उसे कभी गुमान था, अब कुपोषण और बीमारियों की वजह से हड्डियों का ढांचा बन चुकी थी। चेहरे की वह चमक, जिसे वह मेकअप से चमकाती थी, अब झुर्रियों और काली राख में तब्दील हो गई थी।
अब वह एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले भटकती और उन घरों में बर्तन साफ करने का काम ढूंढती जैसे घरों में कभी वह मेहमान बनकर जाने का सपना देखती थी। जिन औरतों के सामने वह कभी इठलाकर चलने के सपने देखती थी, आज वही औरतें उसे अपने दरवाजे की जूती बनाकर रखती थीं।
"ऐ कलमुँही! ढंग से मांज ये कड़ाही, ज़रा भी चिकनाई रही तो धक्के मारकर बाहर निकाल दूँगी," एक घर की मालकिन ने उस पर चिल्लाते हुए कहा।
काया ने चुपचाप सिर झुका लिया। उसकी आँखें भर आईं। उसे आज वंशिका बहुत याद आई। वह वंशिका, जिसने उसे अपनी सगी बहन की तरह मान दिया था, जिसने उसे अपनी रसोई की चाबियाँ सौंपी थीं, जिसने उसे कभी नौकरानी नहीं समझा।
काया के मन में अक्सर यह ख्याल आता—"क्यों भागी थी मैं भूपेंद्र को छोड़कर? कम से कम एक छत तो थी। भले ही कंगाली थी, पर वहाँ मेरा डर तो था। यहाँ तो हर राह चलता आदमी मुझे गंदी नज़रों से देखता है और हर औरत मुझे कीड़ा समझती है।" लेकिन अब पछताने का कोई लाभ नहीं था। अब समाज में कोई वंशिका नहीं बची थी जो उस पर दोबारा विश्वास कर सके। विश्वास का वह धागा उसने खुद अपने हाथों से जला दिया था।
दोपहर की तपती धूप में काया शहर के एक मुख्य चौराहे पर खड़ी थी। वह अब इतनी गिर चुकी थी कि घरों में बर्तन मांजने के बाद बाकी समय वह सिग्नल पर खड़ी गाड़ियों के सामने हाथ फैलाती थी। भूख उसे अपनी गरिमा बेचने पर मजबूर कर चुकी थी।
तभी ट्रैफिक सिग्नल पर लाल लाइट हुई। एक चमचमाती सफ़ेद एसयूवी आकर रुकी। काया की आदत हो गई थी हर गाड़ी के पास जाकर गिड़गिड़ाने की। वह अपनी फटी साड़ी का पल्लू संभालते हुए उस गाड़ी की खिड़की के पास पहुँची।
"कुछ दे दो साहब... बड़ी भूख लगी है... ऊपरवाला भला करेगा। बच्चे सुखी रहेंगे..." वह चिरौरी करने लगी।
गाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे उतरा। कार के भीतर एसी की ठंडी हवा का एक झोंका काया के चेहरे से टकराया, जिसने उसे एक पल के लिए भूपेंद्र के उस बेडरूम की याद दिला दी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र ड्राइवर सीट पर बैठी महिला पर पड़ी, काया के जैसे प्राण ही सूख गए।
सामने एडवोकेट महिमा बैठी थीं। वही महिमा, जिसने वंशिका को न्याय दिलाया था और जिसकी तीखी नज़रों से काया हमेशा डरती थी। महिमा ने अपनी आँखों से सनग्लासेस हटाए और बड़ी गहराई से काया के उस वीभत्स रूप को देखा। महिमा उसे एक पल में पहचान गई थीं।
महिमा ने अपने पर्स से सौ रुपये का एक नोट निकाला, लेकिन उसे काया को थमाने के बजाय अपने हाथ में पकड़ कर रखा। उनकी आवाज़ में वही पुराना रोब और सख्ताई थी।
"काया? तो आखिरकार कुदरत ने तुम्हें वहीं ला खड़ा किया जहाँ तुम्हारी असली जगह थी," महिमा ने सपाट लहजे में कहा।
काया ने शर्म के मारे अपना चेहरा ढक लिया। "मैम... मैं..."
"चुप रहो!" महिमा ने उसे टोकते हुए कहा। "आज जो तुम्हारे हाथ फैले हुए हैं न, ये उस विश्वासघात की कीमत है जो तुमने उस औरत के साथ किया जिसने तुम्हें अपनी छत दी थी। तुमने एक घर जलाया था काया, आज तुम्हारी अपनी आत्मा उस आग में जल रही है। ये सौ रुपये मैं तुम्हें भीख के तौर पर नहीं, बल्कि एक सबक के तौर पर दे रही हूँ।"
महिमा ने नोट काया की ओर बढ़ाया और आगे कहा, "याद रखना, जिस्म की नुमाइश और दूसरों का हक छीनकर कोई कभी सुखी नहीं रहा। तुमने वंशिका को रुलाया था, आज ये पूरा शहर तुम्हें रुला रहा है। अब कोई तुम्हें छत नहीं देगा, क्योंकि तुमने भरोसे का कत्ल किया है। जाओ, अब अपनी बाकी ज़िंदगी इसी मलबे में गुज़ारो।"
सिग्नल हरा हो गया। महिमा ने नोट नीचे गिरा दिया और अपनी गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ा दी। काया घुटनों के बल सड़क पर बैठ गई। धूल उड़ी और उसके चेहरे पर जम गई। वह सौ रुपये का नोट उठाने के लिए जब आगे बढ़ी, तो उसे अहसास हुआ कि आज उसके पास पैसा तो आया है, पर उसकी रूह पूरी तरह नंगी हो चुकी है।
सड़क के दूसरी तरफ एक बड़े डिजिटल बोर्ड पर वंशिका का विज्ञापन चल रहा था। काया ने ऊपर देखा—एक तरफ शिखर पर खड़ी वंशिका थी, और नीचे धूल में सनी वह खुद। यही कर्मों का अंतिम न्याय था।
काया अब सिर्फ एक भिक्षापात्र बनकर रह गई थी। वह समझ चुकी थी कि सुंदरता ढल जाती है, जवानी चली जाती है, लेकिन इंसान का किया हुआ धोखा साये की तरह उसका पीछा कभी नहीं छोड़ता। भूपेंद्र पागल हो चुका था, मनोरमा दम तोड़ रही थी, और काया अब ज़िंदा लाश थी। जिस घर में उसे सम्मान मिला था उस घर को उसने नष्ट कर दिया था। उसके स्वार्थ ने, लालच ने न सिर्फ एक गृहस्ती बर्बाद कर दी थी बल्कि खुद की लाइफ भी।
वहीं दूसरी ओर, वंशिका ने साबित कर दिया था कि एक औरत जब अपने स्वाभिमान के लिए उठ खड़ी होती है, तो वह न केवल अपना साम्राज्य खड़ा करती है, बल्कि उन लोगों को धूल चटा देती है जिन्होंने उसे कमज़ोर समझा था।
कहने को तो औरत ही औरत की दुश्मन कही जाती है जो कि सत्य भी है। लेकिन पुरुष का बचाव क्यों कर दिया जाता है? अगर काया ने सेंध लगाई तो उसे बढ़ावा देने वाला कौन था? उसके सामने अपनी पत्नी को नीचा दिखाने वाला कौन था? एक सास अपनी बहु को कंट्रोल में रखने के लिए किसी ओर को महत्व क्यों देती है?
गलती वंशिका की भी थी... उसने खुद कुछ न करने के बजाय अपनी सास और नंद के भरोसे बैठ गई की ये दोनों काया को निकाल देंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अगर रिश्ता हमारा है तो बचाना भी हमें ही होता है। लेकिन तब जब उसके बचने की संभावना हो।
--- समाप्त ---
खैर, वास्तव में ऐसा बहुत कम होता है जैसा अंत में मैने लिखा..। क्योंकि अधिकांश घरों में लड़कियां वापस मायके पहुंच जाती है जहां उनकी दोबारा शादी करवा दी जाती है। या फिर मायके लौटने के बाद वो लड़कियां हीनभावना का शिकार होकर घरवालों से झगड़ने लगती है... भाभी के लिए सास बनने की कोशिश करने लगती है.. अपनी मां के कान भरने लगती है कि मेरी सास तो मेरे साथ ऐसा करती थी आपने भाभी को बहुत खुली छूट दे रखी है। या फिर लड़की के घरवाले ही उसे रातदों ताना मारते रहते हैं कि ससुराल में भी ऐसे ही जुबान चलाती होगी, काम नहीं करती होगी तभी निकाल दिया या फिर दूसरी ले आए।
लेकिन ये कहानी थी.... तो कहानी में तो हम ऐसा पॉजिटिव अंत लिख ही सकते हैं। 🙂