Words and Truth - Part 12 in Hindi Poems by Shivraj Bhokare books and stories PDF | शब्द और सत्य - भाग 12

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शब्द और सत्य - भाग 12


34.यह 'एक दिन' तुम्हारी मौत का दिन है!

तुम कहते हो, "एक दिन बदलूँगा दुनिया," पर वह दिन कभी आता क्यों नहीं?
भीतर जो सड़ रहा है ढोंग का ढेड़, वह तुम्हें कभी नजर आता क्यों नहीं?
'एक दिन'—यह तुम्हारी चेतना का सबसे बड़ा और शातिर झूठ है,
सत्य से भागने के लिए, तुम्हारे आलसी मन को मिली खुली छूट है।

तुम दुनिया बदलने निकले हो, जबकि खुद अपनी ही वासनाओं के गुलाम हो,
बाजार के इशारे पर नाचते हो, और दावों में बड़े-बड़े महापुरुष के नाम हो।
अभी जो विकृति है तुम्हारे भीतर, उसे तुम आज, इसी क्षण नहीं बदलते,
और उम्मीद करते हो कि कल कोई चमत्कार होगा, जिससे तुम्हारे कर्म हैं संभलते?

यह 'कल' और 'एक दिन' सिर्फ अहंकार को जिंदा रखने की एक दवाई है,
ताकि आज तुम्हें अपनी कायरता न देखनी पड़े, जो तुमने भीतर छुपाई है।
दुनिया बदलने का यह जो खोखला और चमकीला सपना है,
यह असल में आज की जिम्मेदारी से बचने का एक बहाना है।

वेदांत कहता है: जो है, वह बस 'अभी' है, इसी वर्तमान के क्षण में,
भविष्य तो बस एक कल्पना है, जो नाच रही है तुम्हारे भ्रमित मन में।
अगर सचमुच कोई क्रांति करनी है, तो पहले इस 'मैं' को सूली पर चढ़ाओ,
जो खुद को कल पर टाल रहा है, पहले उस चोर को पकड़ कर लाओ।

दुनिया को तुम्हारी बड़ी-बड़ी बातों की नहीं, तुम्हारी जागृति की जरूरत है,
उठो! अभी बदलो खुद को, क्योंकि टालमटोल ही इस संसार की सबसे बड़ी मुसीबत है!
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35. तुम जीवित नहीं हो, तुम सिर्फ एक लाश हो!

तुम कहते हो तुम जिंदा हो, क्योंकि तुम्हारी सांसें चलती हैं,
क्योंकि तुम्हारी नसें दौड़ती हैं और बाजार की दुकानें चलती हैं।
पर जरा आँख खोलकर देखो इस जीते-जी मर जाने के मंज़र को,
तुमने खुद ही दफन कर दिया है अपने भीतर के समंदर को।

जिस दिन तुम्हारी 'जिज्ञासा' मरी, तुम उसी दिन मर चुके थे,
जब तुमने सवाल पूछना छोड़ दिया, तुम तभी खाक हो चुके थे।
अब तुम बस एक रोबोट हो, जो समाज के इशारों पर चलता है,
सुबह दफ्तर जाता है, शाम को खाता है और बिना जिए ढलता है।

कहाँ गया वह 'साहस' जो सच के लिए अकेले खड़े होने का दम रखता था?
अब तो तुम भीड़ का हिस्सा हो, जहाँ हर कोई डर के साये में जाता था।
तुमने अपनी सुरक्षा को ही अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच मान लिया,
और इस कायरता के समझौते को 'समझदारी' का चमकीला नाम दे दिया।

तुम्हारी 'चेतना' पर तो सदियों पुरानी मान्यताओं की धूल जमी है,
भीतर कोई क्रांति नहीं, कोई तड़प नहीं, बस एक गहरी कमी है।
तुम परंपराओं की गुलामी करते हो और उसे अपनी संस्कृति बताते हो,
अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर, तुम खुद को होश में जताते हो।

सांसों का चलना मात्र ज़िंदगी नहीं, वह तो पशुओं की भी चलती हैं,
ज़िंदगी तो वह है जहाँ हर क्षण सत्य को जानने की भट्टियाँ जलती हैं।
जो डर गया, जो झुक गया, जो रूढ़ियों के पिंजरे में बंद हो गया,
समझो इस धरती पर उसका अस्तित्व ही पूरी तरह नष्ट हो गया।

उठो! और इस जीते-जी मरने की गहरी बेहोशी से खुद को आज आज़ाद करो,
अपनी जिज्ञासा को फिर से जगाओ, और इस इंसानी जीवन को मत बर्बाद करो!
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36.आईना दोषी नहीं है, दोष तेरे चेहरे का है!

तुम पत्थर लेकर दौड़ पड़े हो उस शख्स को मार गिराने,
जो आया था सिर्फ तुम्हें, तुम्हारी ही सूरत का सच दिखाने।
तुम चिल्ला रहे हो कि वह 'कड़वा' है, वह 'अपमान' करता है,
पर सच तो यह है कि वह तुम्हारे झूठे अहंकार की धज्जियां उड़ता है।

आईना दोषी नहीं है मेरे यार, दोष तो तेरे इस बदसूरत चेहरे का है,
जिस पर सदियों से झूठ, मक्कारी और ढोंग का पर्दा गहरा है।
तुमने खुद को बड़ा ज्ञानी, बड़ा धर्मात्मा, बड़ा शांत मान रखा था,
उसने बस सच का प्रकाश डाला, और तुम्हारा यह भ्रम टूट कर बिखर गया था।

सच दिखाने वाले से तुम्हें नफरत इसलिए नहीं कि वह झूठ बोल रहा है,
तुम्हारी नफरत का कारण यह है कि वह तुम्हारी वासनाओं की पोल खोल रहा है।
वह तुम्हारी कायरता, तुम्हारे डर और तुम्हारी गुलामी को बेनकाब करता है,
इसीलिए तुम्हारा यह बीमार 'अहंकार' उससे थर-थर कांपता और डरता है।

तुम चाहते हो कोई ऐसा गुरु मिले, जो तुम्हें पुचकारे और थपकी दे,
जो तुम्हारे झूठ को आशीर्वाद दे और तुम्हारी बेहोशी को थोड़ी और हवा दे।
पर जो सच्चा होगा, वह तुम्हारी पीठ नहीं थपथपाएगा, वह तो सीधे चोट करेगा,
तुम्हारे भीतर जो सड़ांध छिपी है, वह उसे पूरी निर्दयता से बाहर खींचेगा।

यह नफरत असल में सत्य से नहीं, बल्कि अपनी ही असलियत देखने के डर से है,
क्योंकि तुम जानते हो कि अगर सच को मान लिया, तो तुम्हारी यह झूठी दुनिया बेअसर है।
छोड़ो आईने को तोड़ने की यह बचकानी और कायर जिद्द,
झुक जाओ सत्य के आगे, क्योंकि इसी आत्म-समर्पण में छिपी है तुम्हारी मुक्ति की हद!
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सत्य और असहमति का पुराना संबंध है। यदि ये शब्द आपको चुनौती देते हैं, तो उन्हें विरोध नहीं, विचार का निमंत्रण समझिए।