Shri: Struggle and Love - Chapter 21 in Hindi Spiritual Stories by Shiv putri books and stories PDF | श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 21

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श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 21

वही गुरुदेव ने सार्थक को भी बात करने को बुलाया था 
जैसे ही सार्थक गुरुदेव के कक्ष के पास आया उसने श्री और गुरुदेव की बात सुन ली....

अब बिचारे सार्थक का तो दिल ही टूट गया था 🥺
क्यूंकि उसने सुना कि श्री अपनी आत्मग्लानि के कारण हरि को स्वीकार नहीं कर पा रही लेकिन उसके मन में हरि के लिए भावनाएं है . और अब वो भक्ति में भी इतनी प्रवीण हो चुकी है कि भक्ति मार्ग का त्याग कभी नहीं करेगी श्री अपने भगवान  नारायण के प्रति भी पूर्ण समर्पित है 🙌🏻 और गुरुदेव के हाथ में पूरा निर्णय है कि श्री संन्यास चुनेगी या गृहस्थी 🥺 लेकिन अब श्री कुछ भी चुने वो मेरी नहीं हो सकती 😔 क्यूं भगवान क्यूं सिर्फ इनसे ही तो प्रेम भाव किया था इनके शिवाय कोई और आई ही नहीं मन में 🥺
उसका दिल रोने लगा मन भारी हो गया उसने सोचा मैं तो अब तक अपने मन की बात श्री से कह भी न पाया और ये सुन लिया 😔 अच्छा  ही है नहीं तो बाद में और दुख होता मुझे 🥺

सार्थक भीतर कक्ष में आया ... बिल्कुल ऐसे जैसे उसने कुछ सुना ही न हो 😔 
सार्थक– गुरुदेव आपने बुलाया था
गुरुदेव— हाँ पुत्र ! आओ बैठो
सार्थक— जी गुरुदेव 

गुरुदेव श्री को देखते हुए — पुत्री आप जाइए अब विश्राम कीजिए हमें पुत्र सार्थक से जरूरी बात करनी है 
श्री — जी गुरुदेव 😔 

श्री अपने कक्ष में चली जाती है

अब गुरुदेव सार्थक से— पुत्र ! हम आपसे बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहते है 🙂
सार्थक— जी गुरुदेव 
गुरुदेव — पुत्र यू तो आप कभी झूठ नहीं बोलते फिर भी हम आपसे बोल रहे है जो बोलना सत्य बोलना पुत्र 
सार्थक — जी गुरुदेव 
गुरुदेव — पुत्र सार्थक क्या आप श्री के प्रति प्रेम भाव रखते है
सार्थक— गुरुदेव 😳😔 इन सब का कोई अर्थ नहीं हम प्रेम भाव रखते है परंतु क्षमा गुरुदेव मैने आपकी और श्री जी की बात सुन ली थी 🥺 श्री जी हरि जी से प्रेम करती है और हरि जी भी श्री से प्रेम करते है तो मेरे प्रेम का तो कोई मूल्य नहीं गुरुवर 😔 हम उन दोनों के बीच नहीं आयेंगे श्री की प्रसन्नता में ही मेरी प्रसन्नता है गुरुवर 🙂🙏🏻 
गुरुदेव सार्थक के सर पे हाथ फेरते हुए — पुत्र ! सार्थक आप अपने नाम की तरह ही सार्थक है यही आशा थी हमे आपसे पुत्र 🙌🏻 पुत्री श्री की खुशी हरि में भी है और उसकी भक्ति में भी 
हरि का भी यही कहना है कि वो श्री की खुशी चाहता है अगर श्री संन्यास भी के तब भी वह इसके संन्यास में उसका साथ देगा अगर श्री किसी और को अपने जीवन में चुने तब भी हरि केवल श्री की प्रसन्नता चाहता है उसे परखने के पश्चात ही हमे हरि अपनी पुत्री श्री  के लिए उत्तम वर प्रतीत हुए है 

सार्थक — जी गुरुदेव 🥹 हम भी यही मानते है 🙌🏻
गुरुदेव— परन्तु पुत्र ,श्री बहुत आत्मग्लानि में रहती है सबसे पहले उसे ये बात समझनी होगी कि बाहरी सुंदरता सब कुछ नहीं होती चाहे आप हो या हरि दोनों ही श्री से उसके बाहर के आकर्षण से नहीं उसके मन की सुंदरता से प्रेम करते है आप दोनों का प्रेम श्री के प्रति एक जैसा ही है आप दोनों ही श्री की खुशी चाहते है और आप दोनों ही श्री की खुशी के लिए  त्याग करने को भी तत्पर है 🙌🏻 इसलिए हे पुत्र ! आप अपने मन की बात श्री को बताईए 

सार्थक 😳— परंतु गुरुदेव 🥺 श्री तो हरि से प्रेम करती है अगर अगर हमने अपने मन की बात श्री को बताई तो हमारी और श्री की मित्रता टूट जाएगी गुरुवर 😔 सब कुछ सह लु परन्तु श्री की नाराजगी नहीं कम से कम हम दोनों अच्छे दोस्त बन के तो रह सकते है न गुरुदेव 🥺

गुरुदेव — पुत्र अगर हम आपसे ये बात बोल रहे है कि आपको अपने मन की बात श्री को बतानी चाहिए तो कुछ सोच के ही बोल रहे है आप ही उसे ये एहसास दिलाएंगे कि मन की सुंदरता ही प्राथमिक है और वादा कीजिए हमारी पुत्री श्री इतनी आसानी से किसी से मित्रता खत्म नहीं करती आप उन्हें समझाएंगे की चाहे जो भी हो आप दोनों की मित्रता में कोई अंतर नहीं आएगा 

सार्थक — 😔 गुरुदेव आज तक आपकी कोई बात नहीं टाली तो  ये तो आपका आदेश है मैं ये करने के लिए भी तत्पर हु मैं कहूंगा श्री से अपने मन की बात 🥺 
गुरुदेव – ठीक है पुत्र जाईये अब रात्रि हो गई है विश्राम कीजिए 
सार्थक — जी गुरुदेव 😔 


वही दूसरी तरफ श्री अपने कक्ष में बैठी है ....
गीता जी — बेटा श्री तुम सार्थक से थोड़ा दूर रहो हम मानते है सार्थक बहुत अच्छा बच्चा है और तुम दोनों दोस्त हो लेकिन हम नहीं चाहते कि हरि कुछ गलत समझे या उसको बुरा लगे तुम दोनों को साथ देख के
श्री — माँ जितना हम हरि जी को जानते है हमे नहीं लगता हरि जी की सोच इतनी छोटी होगी कि वो मेरी और सार्थक जी की मित्रता पे कोई प्रश्न उठाए मेरी और सार्थक जी की मित्रता बहुत पवित्र है माँ 
गीता जी — हाँ बेटा 

वही हरि अपने कमरे की तरफ जा रहा था तभी उसे श्री की बात सुनाई दी....
उसकी तो सारी overthinking खत्म हो गई 😅 
और वो अपने ऊपर ही हंसते हुए मैं भी क्या क्या सोच रहा था श्री सार्थक से प्यार नहीं करती वो तो बस सार्थक को अपना मित्र ही मानती है 😌 ये तो बहुत अच्छी बात है ☺️ और कितना बुद्धू हु मैं श्री मेरी आंखों के छुपे आँसू भी देख लेती है मेरी चिंता करती है 😌 यानी कि हो सकता है श्री मेरी प्रियतमा कही न कही मुझसे प्रेम करती है 😚 हाय प्रभु जी काश ऐसा ही हो 🙂‍↕️😌

हरि खुश होते हुए अपने कक्ष में चला गया 

रात्रि बहुत हो गई सब शयन करने चले गए ... 
लेकिन आज सार्थक की आंखों से नींद कोसों दूर थी वो अपने कक्ष में पूरी रात रोता रहा 🥺 उसका मन बहुत भारी था उसके कानों में बार बार श्री की बात सुनाई दे रही थी ...( हमारे मन में हरि जी के लिए भावनाएं है परंतु अब हम प्रभु नारायण की भक्ति मार्ग का त्याग भी नहीं करेंगे ) .... 

श्री की ये बात सार्थक के कानों में गूंजी जा रही थी आज तक वो इतना असहाय कभी न हुआ 🥺 
सार्थक श्री की तस्वीर देखते हुए अपने मन में— ठीक है श्री आप हरि जी से प्रेम करती है मैं आपके प्रेम का सम्मान करूंगा श्री 😔 परंतु गुरुदेव ने अब मुझे अपने मन की बात आपको बोलने का आदेश दिया है 🥺 श्री बस आप नाराज मत होना कम से कम हमारी मित्रता तो बनी रहेगी न श्री 🥺


देखते है आगे की कहानी में क्या होगा बने रहे मेरी कहानी (श्री) में 🫶🏻