काव्य संग्रह : 'खिचड़ी' की राम कथा
खिचड़ी केवल भोजन नहीं, संस्कृति है। यूपी की मिट्टी की सौंधी खुशबू है। अमीर-गरीब, बच्चे-बूढ़े, स्वस्थ-बीमार - सबको भाने वाली। झट से बनने वाली, सबको तृप्त करने वाली। ठीक वैसे ही इस संग्रह की कविताएँ हैं - सरल, सहज, सुपाच्य और संस्कारों से भरपूर।
इस 'खिचड़ी की राम कथा' में क्या-क्या है?
1. 'खिचड़ी की राम कथा' - हास्य का तड़का
एक विदेशी यूपी आया, खिचड़ी खाई, नाम भूल गया। फिर 'खा चिड़ी, उड़ चिड़ी' रटते-रटते पिटता रहा। अंत में जब 'खिचड़ी' याद आई तो खुशी से 'जय श्री राम' बोल उठा। यह कविता हँसाते-हँसाते सिखाती है कि बिना सोचे-समझे बोलने का क्या परिणाम होता है। साथ ही भारतीय भोजन और 'राम नाम' की महिमा भी बताती है।
2. 'बुढ़ापा' - अनुभव का नमक
बुढ़ापा अभिशाप नहीं, आशीर्वाद है। यह कविता उस दौर की विवशता, तन्हाई और अपनों की उपेक्षा को शब्द देती है, पर अंत में यही संदेश देती है - बुजुर्ग घर की नींव हैं। इनका सम्मान ही असली संस्कार है। 'जड़ों की ओर लौट चलें' का मूल मंत्र यही है।
मेरा प्रयास क्या है?
मैं डॉ. वंदना शर्मा, एक शिक्षिका हूँ। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते महसूस किया कि आज का बालक मोबाइल में खोया है, जड़ों से कटा है। उसे हँसी चाहिए, कहानी चाहिए, पर संस्कार के साथ। 'खिचड़ी' उसी प्रयास का नाम है। इसमें हास्य है तो भक्ति भी है, दर्द है तो उम्मीद भी है। यूपी की मिट्टी की बात है तो राम नाम का जाप भी है।
किसके लिए है ये 'खिचड़ी'?
उस हर बच्चे के लिए जो दादी-नानी की कहानी सुनना चाहता है।
उस हर युवा के लिए जो बड़ों का दर्द समझना चाहता है।
उस हर बुजुर्ग के लिए जो सम्मान का हकदार है।
और उस हर भारतीय के लिए जिसे 'खिचड़ी' और 'राम नाम' दोनों से प्यार है।
अंत में बस इतना ही -
यह संग्रह अधूरा है आपके बिना। आप पढ़ेंगे, बच्चों को सुनाएँगे, तभी 'खिचड़ी की राम कथा' सम्पूर्ण होगी।
तो आइए, इस 'खिचड़ी' की राम कथा "का स्वाद चखिए।
और हाँ, अंत में बोलना ना भूलिए - जय श्री राम |
- डॉ. वंदना शर्मा
पांडव नगर new delhi
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*शीर्षक: बुरा आपा/बुढ़ापा
*- डॉ वंदना शर्मा*
जब साथ ना दे कोई अपना
जब साथ ना दे शरीर अपना
जब लगे हाथ काँपने
जब लगे पाँव डगमगाने
जब दाँत गायब हो जाएँ मुँह से
जब नजर लगे धुँधलाने
जब अपने भी कर दें बेगाना
वो दौर बहुत रुलाता है
हाय बुढ़ापा बहुत सताता है
जब याद कुछ नहीं रहता है
जब शरीर की सुध नहीं रहती है
जब बच्चे आँख दिखाते हैं
जब रिश्ते नजर चुराते हैं
जब जग बैरी हो जाता है
जब अकेलापन बहुत सताता है
जब पैसा काम नहीं आता है
वो दौर बहुत रुलाता है
हाय बुढ़ापा बहुत सताता है
बुढ़ापा जब बन जाए बुरा आपा
ऐसी जिंदगी से मन भी भर जाता है
वो दौर बहुत रुलाता है
हाय बुढ़ापा बहुत सताता है।
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
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मुझे हारने ना देना भगवान
प्रार्थना
मुझे हारने ना देना भगवान
लोग मेरी हार का इंतजार किए बैठे हैं
बस तेरा ही एक सहारा है
रिश्तेदार तो सारे किनारा किए बैठे हैं
बिखरी तो जरूर, लेकिन टूटी नहीं मैं
मुझे टूटा देखने के लिए पत्थर लिए बैठे हैं
अपनों की भीड़ में भी तन्हा हूँ महादेव
मेरे अपनों को खुश रखना, जो
मेरे आँसू देखने को बेताब बैठे हैं
जिसकी किस्मत आपने स्वयं लिखी हो
उसे हारा देखने के लिए नजरें गड़ाए बैठे हैं |
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
#hindipoetry #motivational #vandnaSharma
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*शीर्षक: अष्टांग योग - जीवन का आधार*
*- डॉ वंदना शर्मा*
*21/6/26*
डंका आजकल बज रहा है योग का
अपना फोटो सब पोस्ट कर रहे जोर का
पर योग है क्या नहीं सब जानते
सिर्फ आसन को ही योग मानते
अष्टांग योग एक प्रक्रिया है
तीसरा चरण इसका आसन है
मन को पहले पवित्र करो
बुरे विचारों का त्याग करो
दया, करुणा, क्षमा का अभ्यास
ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट से दूरी
समय से उठना, समय से सोना
जिंदगी में अनुशासन, नियम जरूरी
स्वस्थ शरीर बने आसन से
भोजन व स्वाद के लिए प्रत्याहार जरूरी
करें प्राणायाम, और ध्यान
इनसे होता मन स्वस्थ और प्रसन्न
मानसिक बीमारियों से बनी रहे दूरी
इसीलिए जीवन में अष्टांग योग है जरूरी
जो इसका करे नियमित पालन
उसकी डॉक्टर और दवाई से बनी रहेगी दूरी
ऋषि-मुनियों का वरदान है ये
भारत की जीवन शैली दुनिया की शान है ये
देख सारा दिन मोबाइल, कमर झुकी, दुनिया की
हुई आँखें खराब, स्वास्थ्य बेहाल
मोबाइल से थोड़ी दूरी बनाओ
जिंदगी में जीना है तो अष्टांग योग अपनाओ
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*डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर
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-- खिचड़ी की राम कथा
हास्य कविता
एक विदेशी आया घूमने यू पी
देख हमारा यूपी हुआ गदगद
पहुँचा एक मित्र के यहाँ
बनी थी जहाँ भोजन में खिचड़ी
भा गई उसे बहुत , बोला
क्या नाम है इसका, इसमें स्वाद बड़ा
सुनकर नाम, खुशी से बोला खिचड़ी
यही रटता जा रहा था रास्ते में
खिचड़ी खिचड़ी खिचड़ी
लगी ठोकर गिरा नीचे
जब तक सँभला नाम भूला
रटने लगा अब नया मिसरा
खा चिड़ी, खा चिड़ी, खा चिड़ी
मिला राह में एक ग्रामीण
उड़ा रहा अपनी फसलो से चिड़िया
दिया पीट उसे कसकर, बोला
उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी रटा कर
उड़ चिड़ी, करता जो आगे बढ़ा
एक शिकारी ने धो डाला
जो बैठा था जाल बिछाए
उसे कुछ ना समझ आया, बोला शिकारी
आते जाओ फँसते जाओ
यही अब रटते जाओ
बेचारा यात्री यही रटता
जा रहा था
कुछ दूर ही चला था,
कुछ चोरों ने पीटा बहुत बोले
लाते जाओ रखते जाओ
ऐसा बोलो चलते जाओ
घबराया यात्री | यही लगा रटने
दूसरे गाँव पहुँचा ही था मिली एक अर्थी रास्ते में
वहाँ ग्रामीणों ने धो डाला
क्या दिमाग नहीं है लाला
कुछ तो अच्छा बोलो, सोच समझकर मुँह खोलो
बोलो ऐसा किसी का ना हो
ऐसा किसी का ना हो रटे जा रहा था
सामने से आई बारात,
बारात ने धो डाला, बड़ा मारा
बोला, ऐसा सबका हो, ऐसा सबका हो
ऐसा सबका हो कहते-कहते पहुँचा
अगले गाँव जहाँ लगी थी
एक झोपड़ में आग, वहाँ भी
लोगों ने उसका बजाया बाजा
बेचारा रोते-रोते पहुँचा घर
पिट-पिट कर हुआ बेहाल
लगी थी भूख जोरों की
जैसी ही उसके बच्चे ने पूछा
क्या खाओगे, सारा गुस्सा उगला उस पर
ये मारा वो मारा, देखकर उसके
ऐसे ढंग देखी बोली बीबी
क्या खिचड़ी बनाओगे बच्चे की
खुशी से दो फुट उछला
चिल्लाया हाँ याद आया
खाऊँगा मैं खिचड़ी
खिचड़ी की राम कथा सम्पूर्ण
तो बोलो जय श्री राम |
---dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi