Amrut Vaani in Hindi Spiritual Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 27

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अमृत वाणी - संत वाणी - 27

“ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रं, इति वेदान्त डिण्डिमः॥”

“केवल ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या है। जीव भी ब्रह्म से भिन्न नहीं है, जीव ही ब्रह्म है। यही सच्चे शास्त्रों का सार है, यही वेदान्त की घोषणा है।”

गहरे अर्थ की व्याख्या
यह वेदान्त का महावाक्य है। इसे समझने में अक्सर भ्रम हो जाता है। ‘मिथ्या’ का अर्थ ‘झूठ’ नहीं है। ‘मिथ्या’ का अर्थ है — ‘जैसा दिखता है, वैसा न होना।’

जैसे रस्सी को अंधेरे में देखकर सर्प समझ लिया जाए। सर्प वहां है नहीं, पर दिख रहा है। यह सर्प ‘मिथ्या’ है। प्रकाश आते ही सर्प गायब हो जाता है, केवल रस्सी रह जाती है। वैसे ही यह संसार है।

1. ब्रह्म सत्यं – इस जगत का मूल आधार, चेतना, ऊर्जा, परमात्मा – वही सत्य है। वह न जन्मता है, न मरता है। वही था, वही है, वही रहेगा। 

2. जगत् मिथ्या – उदाहरण: सोना सत्य है। सोने से बने कंगन, कुंडल, हार – ये रूप बदलते रहते हैं। आज कंगन है, कल पिघलकर कुंडल बन जाएगा। नाम-रूप बदलते हैं, सोना नहीं बदलता। वैसे ही यह संसार – शरीर, धन, पद, संबंध। ये सब बदलते रहते हैं। ये शाश्वत नहीं हैं। इसलिए मिथ्या हैं।

3. जीवो ब्रह्मैव नापरः – और सबसे क्रांतिकारी बात : व्यक्ति स्वयं ब्रह्म से अलग नहीं है। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं है। लहर को लगता है “मैं अलग हूं”, पर वह समुद्र ही है। अज्ञान के कारण व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन, नाम मान लेता है और दुख पाता है। ज्ञान होने पर अनुभव होता है – “अहम् ब्रह्मास्मि” यानि मैं ही ब्रह्म हूं।

सार : दुख का कारण है स्वयं को ‘शरीर’ मानना। आनंद का रहस्य है स्वयं को ‘ब्रह्म’ जानना।

जीवन प्रसंग: मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ
आदि शंकराचार्य जब मात्र 16 वर्ष के थे, तब वे पूरे भारत में अद्वैत वेदान्त का प्रचार कर रहे थे। उस समय मंडन मिश्र सबसे बड़े कर्मकांडी विद्वान थे। उनका नियम था कि शास्त्रार्थ में जो हारे, वह दूसरे का शिष्य बन जाए।

शंकराचार्य उनके द्वार पर पहुंचे। मंडन मिश्र ने शर्त रखी – “यदि मैं हारा तो संन्यास ले लूंगा, यदि आप हारे तो गृहस्थ बन जाएंगे।” शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। कई दिन चला। निर्णायक थीं मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी – भारती।

भारती ने देखा कि शंकराचार्य जीत रहे हैं। उन्होंने एक प्रश्न पूछा – “काम-शास्त्र पर चर्चा कीजिए।” शंकराचार्य बाल-ब्रह्मचारी थे, उन्हें व्यवहारिक ज्ञान नहीं था। उन्होंने 1 माह का समय मांगा। 

योग-शक्ति से उन्होंने एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया, गृहस्थ जीवन का अनुभव लिया, और लौटकर भारती के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए। मंडन मिश्र ने पराजय स्वीकार की।

प्रसंग से वाणी कैसे सिद्ध हुई?
मंडन मिश्र को लगता था – “मैं ब्राह्मण हूं, मैं विद्वान हूं, मैं गृहस्थ हूं” – यह ‘मैं’ शरीर और पद से जुड़ा था। यह ‘जगत्’ को ‘सत्य’ मानना है। 

शंकराचार्य ने सिद्ध किया कि ज्ञान शरीर पर निर्भर नहीं है। ‘मैं’ न ब्राह्मण है, न शूद्र, न गृहस्थ, न संन्यासी। ‘मैं’ तो शुद्ध चेतना है – ब्रह्म है। जब मंडन मिश्र को यह बोध हुआ, तो उन्होंने संन्यास ले लिया और ‘सुरेश्वराचार्य’ बन गए। 

उन्होंने समझ लिया कि वाद-विवाद, पद, प्रतिष्ठा – ये सब ‘मिथ्या’ हैं। सत्य केवल ‘ब्रह्म’ है, जो सबके भीतर एक समान है।

व्यावहारिक उदाहरण
1. हानि होने पर : व्यक्ति का शेयर मार्केट में 10 लाख डूब गया। यदि वह मानता है “मैं केवल शरीर हूं, पैसा ही सब कुछ है”, तो उसे भारी दुख होगा। परंतु यदि उसे बोध है कि “पैसा आया-गया, नाम-रूप बदला, पर मैं – चेतना – तो वही हूं। मैं नष्ट नहीं हुआ”, तो वह शांत रहेगा। यह ‘जगत् मिथ्या’ का बोध है।

2. अपमान होने पर : किसी ने भरी सभा में अपशब्द कहे। यदि व्यक्ति मानता है “मैं इस नाम, इस पद, इस शरीर से बंधा हूं”, तो अहंकार को चोट पहुंचेगी। परंतु यदि बोध है कि “अपमान शब्दों का हुआ, शरीर का हुआ। मैं तो वह साक्षी हूं जो यह सब देख रहा है। मैं ब्रह्म हूं, मुझे कोई छू नहीं सकता”, तो वह मुस्कुरा देगा। यह ‘जीवो ब्रह्मैव’ का अनुभव है।

3. मृत्यु के भय में : जब समझ आ जाता है कि “मैं शरीर नहीं हूं, मैं शाश्वत ब्रह्म हूं। शरीर वस्त्र बदल रहा है, मैं नहीं बदल रहा”, तो मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। यही गीता का “न जायते म्रियते वा कदाचित्” है।

विरोधाभास का समाधान
यह प्रश्न उठता है – “यदि जगत् मिथ्या है, तो क्या कर्म करना छोड़ दें? क्या परिवार, समाज, देश के लिए कार्य करना व्यर्थ है? क्या शंकराचार्य पलायन सिखाते हैं?” 
बिल्कुल नहीं। यही सबसे बड़ा भ्रम है। 

शंकराचार्य ने स्वयं 32 वर्ष की आयु में पूरे भारत की 3 बार पैदल यात्रा की, चार मठ स्थापित किए, सैकड़ों ग्रंथ लिखे। यदि जगत् मिथ्या था, तो वे इतना कर्म क्यों करते?

उनका कहना है – “मिथ्या को मिथ्या जानकर कर्म करो।” जैसे नाटक का कलाकार जानता है कि यह भूमिका मिथ्या है, फिर भी वह अपना पात्र पूरी निष्ठा से निभाता है। रोना है तो रोता है, हंसना है तो हंसता है, पर भीतर से जानता है “मैं राजा नहीं हूं, मैं कलाकार हूं।”

वैसे ही संसार में रहना है, कर्तव्य निभाना है, पर भीतर से जानना है “मैं यह शरीर नहीं हूं, मैं ब्रह्म हूं।” आसक्ति छोड़नी है, कर्म नहीं। यही गीता का निष्काम कर्मयोग है, यही शंकराचार्य का अद्वैत है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ दुख की दवा : जब भी दुख आए, खुद से पूछें – “क्या यह शरीर को हो रहा है या मुझे? मैं बदलने वाले को देख रहा हूं या मैं ही बदल रहा हूं?” दृष्टा बनते ही दुख कम हो जाएगा।

★ निर्भयता का सूत्र : जो बदलेगा, वह ‘मैं’ नहीं हूं। जो नष्ट होगा, वह ‘मैं’ नहीं हूं। मैं तो वह सत्य हूं जो सदा था और सदा रहेगा।

★ समता का भाव : जब ‘जीवो ब्रह्मैव’ का बोध हो जाता है, तो दूसरों में भी वही ब्रह्म दिखता है। फिर घृणा, द्वेष, ऊंच-नीच का भाव समाप्त हो जाता है।

★ सच्ची मुक्ति : ‘मैं शरीर हूं’ इस भ्रम से मुक्त होना ही वास्तविक संन्यास है।

आज की पावन प्रार्थना
“हे आदि गुरु शंकराचार्य, हे अद्वैत के प्रवर्तक, अज्ञान का अंधकार दूर करें। यह बोध प्रदान करें कि मैं नाम नहीं, रूप नहीं, पद नहीं, शरीर नहीं – मैं सच्चिदानंद ब्रह्म हूं। जगत के परिवर्तन में मन विचलित न हो, सदा साक्षी भाव बना रहे। अहम् ब्रह्मास्मि। 🙏”