Amrut Vaani in Hindi Anything by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 28

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अमृत वाणी - संत वाणी - 28

संत गुरु अर्जुन देव जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के लालच और दिखावे को छोड़कर निष्काम भाव से कर्म करने का सच्चा मार्ग दिखाती है।

“सेवा करत होइ निहकामी।
तिस कउ होत परापति सुआमी।।”

हिंदी अर्थ : जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ, लालच या फल की इच्छा के समाज और जीवों की सेवा करता है, केवल उसी पवित्र इंसान को साक्षात परमात्मा की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सफल हो जाता है।

अक्सर लोग इस कसौटी को सुनकर सोचते हैं कि क्या अपने परिवार के लिए कमाना या अपनी सुख-सुविधाओं के लिए इच्छा रखना गलत बात है? लेकिन गुरु अर्जुन देव जी यहाँ गृहस्थ जीवन या कर्म करने का विरोध नहीं कर रहे हैं। वे केवल यह समझा रहे हैं कि जब हमारी हर सेवा या मदद के पीछे कोई न कोई छिपा हुआ स्वार्थ होता है, तो वह कर्म हमें कभी आत्मिक शांति नहीं दे सकता। इस संसार में जब कोई व्यक्ति किसी की थोड़ी सी मदद करता है, तो वह बदले में मान-सम्मान या किसी बड़े फायदे की उम्मीद करने लगता है। संत कहते हैं कि असली धार्मिकता किसी सौदेबाजी में नहीं, बल्कि बिना किसी शर्त के दूसरों की राह आसान करने में प्रकट होती है।

गहरे अर्थ की व्याख्या
सिर्फ बाहरी रूप से खुद को बहुत बड़ा परोपकारी दिखाना मन को एक झूठी संतुष्टि तो दे सकता है, लेकिन जब तक हमारे भीतर बदले में कुछ पाने की चाहत रहेगी, तब तक हमारा वह पुण्य अधूरा रहता है। जो व्यक्ति समाज में इस उम्मीद से दान देता है कि लोग उसकी वाह-वाही करेंगे, उसका वह दान परमात्मा के दरबार में कभी स्वीकार नहीं होता। जब मनुष्य दूसरों की सेवा करते समय अपने नाम और पहचान की भूख को पूरी तरह मिटा देता है, तब उसके भीतर एक असीम शांति का जन्म होता है। बिना किसी दिखावे के गुप्त रूप से किसी लाचार की मदद करना ही सबसे बड़ी भक्ति है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप अपने आस-पास के सामाजिक जीवन से बहुत सरलता से समझ सकते हैं। मान लीजिए किसी दफ्तर या समाज में कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने उच्च अधिकारियों या रसूखदार लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है क्योंकि उसे पता है कि भविष्य में उससे उसका कोई बड़ा काम निकल सकता है। लेकिन वही व्यक्ति जब अपने घर के पास किसी असहाय या बीमार बुजुर्ग को देखता है, तो उसकी मदद करने में आनाकानी करता है क्योंकि उसे पता है कि वहाँ से उसे कुछ वापस नहीं मिलने वाला। उसका यह व्यवहार उसकी सेवा को एक व्यापार बना देता है। लोग उसके इस स्वार्थ को तुरंत भांप लेते हैं और उसकी भलाई केवल एक नाटक साबित होती है।

इसके विपरीत, खुद गुरु अर्जुन देव जी के जीवन का एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। जब लाहौर में भयंकर अकाल और महामारी फैली, तो वे स्वयं गलियों में जाकर बीमार और कुष्ठ रोगियों की सेवा करने लगे। वे अपने हाथों से उनके घाव साफ करते, उन्हें भोजन कराते और उनके बिस्तर बिछाते थे। उन्होंने कभी किसी से इस बात की प्रशंसा नहीं चाही कि वे इतने बड़े गुरु होकर यह काम कर रहे हैं। उनके इसी निष्काम सेवा भाव ने हजारों लोगों के दिलों को बदल दिया और समाज में आपसी प्रेम की एक नई मिसाल कायम की।

विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका उठ सकती है कि क्या फिर हमें अपने करियर और तरक्की को छोड़कर केवल समाज सेवा में ही लग जाना चाहिए? गुरु जी कर्म छोड़ने को नहीं कहते। वे सिर्फ यह समझा रहे हैं कि जीवन की दौड़ में आगे बढ़ते हुए भी अपने भीतर के सेवा भाव को मरने मत दो। सफल होने का अर्थ केवल खुद के बारे में सोचना नहीं है। असली प्रगति वह है, जहाँ आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी स्वार्थ के किसी रोते हुए चेहरे पर मुस्कान ला सकें और इसके बदले में किसी धन्यवाद की भी उम्मीद न रखें।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति की भलाई उसके बड़े-बड़े विज्ञापनों या नाम की पट्टियों से नहीं मापी जा सकती। चाहे कोई कितना भी बड़ा दानी होने का दावा करे, जब तक उसकी मदद के पीछे कोई निजी स्वार्थ छिपा है, उसका वह पुण्य अधूरा है।

★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि किसी की मदद करना परमात्मा की सेवा है और इसमें हमारा कोई अहसान नहीं है, तो हमारे मन का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं दूसरों का भला कर रहा हूँ।” अपनी क्षमताओं का उपयोग चुपचाप दूसरों के आंसू पोंछने में करना और सदा विनम्र बने रहना ही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।

आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे ऐसा निष्काम हृदय दें कि मैं हमेशा बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद कर सकूं। मेरे भीतर कभी भी भलाई करने का अहंकार या बदले में कुछ पाने की इच्छा जन्म न ले और मैं सदा आपकी शरण में सुरक्षित रहूं। 🙏”