Adhurapan - 1 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 1

Featured Books
Categories
Share

अधूरापन - 1

समर्पित 

उन सभी स्त्रियों को जो किसी न किसी बंधन में जकड़ी हुई हैं।

प्रस्तावना

यह कहानी मेरा पहला सह-लेखन प्रयास है। मेरे और पृथ्वी गोहेल के विचारों को प्रस्तुत करने की एक कोशिश है। हम दोनों आशा करते हैं कि हमारा यह लेखन "अधूरापन"आपके जीवन में उत्पन्न होने वाले कई प्रश्नों के उत्तर खोजने में मददगार साबित होगा...

परिकल्पना
फाल्गुनी दोस्त

अध्याय - १

भार्गवी... हां, बिल्कुल सही सुना आपने। लक्ष्मी समान भार्गवी। भार्गवी यानी लक्ष्मी। जिसके नाम में ही लक्ष्मी समाई हो, वह तो मानो साक्षात देवी का ही अवतार हो!

वह अमृता की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रो रही थी। उसका रोना किसी का भी कलेजा कंपा दे ऐसा था। अमृता उसे शांत कराने का भरसक प्रयास कर रही थी, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिल पा रही थी। उसकी सारी कोशिशें व्यर्थ जा रही थीं।

और अमृता! उसकी आँखों में भी आँसू कहाँ नहीं थे? वह भी अपने आँसू पोंछती जा रही थी और भार्गवी को शांत कराने का प्रयास किए जा रही थी। अमृता के पास अब भार्गवी को सांत्वना देने के अलावा कोई रास्ता ही कहाँ बचा था? और यह रास्ता उन दोनों को कहाँ ले जाएगा, यह बात तो वे दोनों भी कहाँ जानती थीं?

भार्गवी को वह क्षण याद आया जब वह अपूर्व के साथ मण्डप में फेरे ले रही थी। सप्तपदी के वे सात वचन जो उसने और अपूर्व दोनों ने एक-दूसरे को दिए थे। पर क्या सही अर्थों में वे उन वचनों को समझे भी थे? क्या अपूर्व समझा था? या फिर इस घर का हर सदस्य, खास तौर पर इस घर की स्त्रियां भी समझी थीं? और अगर समझी थीं, तो फिर वे चुप क्यों थीं?

उसकी नज़र अपनी जेठानी अमृता पर पड़ी। मानो वह उससे सवाल कर रही हो, 'क्या आप भी मेरी जैसी ही स्थिति से नहीं गुज़री हैं? क्यों आपने बगावत नहीं की? क्यों आपने सब कुछ चुपचाप सह लिया?' और तभी उसके सामने खुद की ही एक आकृति दिखाई दी जो उससे पूछ रही थी, "भार्गवी! तू खुद क्या कर रही है? क्यों है तू मौन? उठा अपनी आवाज़! कब तक सहेगी? स्त्री को सहनशीलता की मूरत कहा जाता है, लेकिन जहाँ उसकी सहनशीलता की सीमा समाप्त होती है, वहीं से उसके शरीर में माँ दुर्गा का प्रवेश होता है।"

भार्गवी के चेहरे पर कई सवाल थे और वह इनके जवाब मानो अपनी जेठानी से माँग रही थी। पर जेठानी के पास तो खुद ही उत्तर कहाँ थे? वह तो स्वयं ही सवालों के जाल में फँसी हुई थी!

अमृता और भार्गवी दोनों एक तथाकथित धनी परिवार की बहुएं थीं! अमृता जेठानी और भार्गवी देवरानी। आज के ज़माने में कम ही देखने को मिले, ऐसा उन दोनों के बीच मेल-जोल था। दोनों बहुत समझदार थीं, इसलिए पूरे परिवार को इन दोनों बहुओं ने एक धागे में पिरोकर रखा था।

अमृता ने भार्गवी का मन थोड़ा शांत तो किया, लेकिन अब उसे सच्चाई स्वीकार करने के लिए थोड़ा समय देना ही उचित लगा। अमृता ने भार्गवी से कहा, "मैं तुम्हारे लिए जूस लेकर आती हूँ।" ऐसा कहकर अमृता रसोई में चली गई और भार्गवी को थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दिया।

अकेली होते ही फिर से भार्गवी का अंतर्मन उससे सवाल पूछने लगा। फिर वही सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं था!

उनका तथाकथित उच्च परिवार! पर क्या यह परिवार सचमुच उच्च था? क्या इनके विचार उच्च थे? और इस घर की यह तथाकथित गृहलक्ष्मी!! क्या सच में उनके मन की गृहलक्ष्मी थी? जो परिवार लक्ष्मी की कीमत न समझे, उसने तो सरस्वती को भी लज्जित किया है ना?!!

अमृता और भार्गवी इस परिवार की लक्ष्मी? लेकिन उनके माध्यम से जन्म लेने वाली लक्ष्मी यदि जन्म ले, तो परिवार के लिए दुख का कारण बने??!!

हम कहते हैं कि जमाना बदल गया है, पर क्या लोगों की सोच बदली है? इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि विचार आज भी वही के वही हैं। लोग मिट्टी के मकानों से निकलकर बंगलों में रहने लगे हैं, फिर भी सच्ची लक्ष्मी को पा नहीं सके... इसमें बड़ा दोष स्त्री का ही है। जब तक घर की बुजुर्ग स्त्री ही स्त्री को न समझे, दिल से न स्वीकारे, तब तक ऐसा ही चलता रहेगा।

भार्गवी भी इससे अलग नहीं है। उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। भार्गवी एक बेटी की माँ है। जब वह दोबारा गर्भवती हुई, तो उसके गर्भ में एक बेटी पल रही है यह जानते ही उसका गर्भपात करा दिया गया था। वे अमेरिका में रहते थे, इसलिए वहाँ बच्चे का लिंग परीक्षण प्रतिबंधित नहीं था। लेकिन देश बदलने के बावजूद मनुष्य का स्वभाव कहाँ बदलता है? उसकी जिजीविषा भी कहाँ कम होती है? क्यों पुत्र का ही मोह? और वह भी अमेरिका जैसे देश में रहने के बाद भी??

तीसरी बार इस घटना की पुनरावृत्ति हुई थी। इसलिए भार्गवी बेहद दुखी थी। भार्गवी को गर्भपात की शारीरिक पीड़ा से ज़्यादा इस बात का दुख था कि एक स्त्री होने के बावजूद यह पाप उसकी इच्छा के विरुद्ध हुआ। उसका मन उससे पूछ रहा था, "तू यह क्या कर रही है? यह शरीर तेरा है, तो इस पर किसी और का अधिकार क्यों?"

केवल अमृता ही उसकी पीड़ा समझ सकती थी, लेकिन 'बड़ों की आज्ञा का पालन करना'—माता-पिता द्वारा दिए गए ये संस्कार ही उसके विरोध करने वाले कदमों में जंजीर बनकर बंध रहे थे।

अमृता जूस बनाकर भार्गवी के पास आई। उसने प्रेम से भार्गवी के सिर पर हाथ फेरा और जूस का गिलास उसके हाथ में देते हुए बोली, "भार्गवी, मैं माफी मानती हूँ कि मैं इस परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं दे सकी। लेकिन मैं तुमसे वादा करती हूँ कि आज के बाद इस घर में किसी भी स्त्री के साथ कोई भी अन्याय होगा, तो मैं उसे कतई बर्दाश्त नहीं करूँगी। चाहे जो भी परिणाम हो, पर अब बस... अन्याय सहन नहीं करना है।"

यह सुनते ही भार्गवी मानो बिजली के कौंधने से चौंक उठी। मानो जेठानी ने उसके मन की बात पढ़ ली हो! उसकी आँखों में बहते आँसू मानो उम्मीद की चमक बन गए। इस अप्रत्याशित वचन ने भार्गवी में एक नई उम्मीद जगाई कि अब उसे दोबारा ऐसा कोई काम करने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा।

भार्गवी को इस तरह उत्साहित देखकर अमृता बोली, "तुम्हारी आँखों में यह चमक हमेशा बनी रहे, मेरा यह प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाएगा।"

भार्गवी कुछ बोल न सकी, लेकिन उसका चेहरा बहुत कुछ कह रहा था। भार्गवी अपनी जेठानी से गले लग गई।