Incompleteness - 3 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 3

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अधूरापन - 3

अध्याय-३

गायत्री सभी के चेहरे देखकर समझ गई कि सब इस बात से उलझन में हैं कि अचानक यह क्या हो गया? गायत्री ने बात का खुलासा करते हुए कहा, "मैंने आप सभी से एक बात छिपाई है।"

गायत्री इतना ही बोली थी कि उसके मम्मी, पापा और दोनों भाई तुरंत भवें तानकर धैर्य खो बैठे और एक साथ बोल पड़े, 'क्या छिपाया है तुमने? ऐसा क्या डर था कि तुम्हें ऐसे कुछ छिपाना पड़े?'

गायत्री अभी कह ही रही थी कि परिवार गुस्से में आकर उसकी उलझन बढ़ाने लगा था। उसे समझ नहीं आया कि, 'अभी तो मैंने कोई बात भी नहीं की है और ये लोग इस तरह प्रतिक्रिया क्यों दे रहे हैं?' लेकिन अमृता भाभी ने तुरंत इस बात पर ध्यान दिया और सभी से शांति से कहा कि थोड़ा धैर्य रखिए। वह क्या कह रही है, सुनिए तो सही... इस तरह उसकी बात सुने बिना कैसे राय दी जा सकती है? हम सभी को पहले उसकी बात पूरी तरह से सुननी चाहिए, उसके बाद ही किसी फैसले पर पहुँचना चाहिए।

अमृता की बात सुनकर परिवार के सभी लोग शांत हुए और गायत्री ने फिर से बात बताते हुए कहा, 'जब मेरी मानस से शादी हुई थी, तब मैं ऐसे किसी वादे से नहीं बँधी थी कि मैं नौकरी नहीं करूँगी।' और मानस ने भी मुझसे ऐसी कोई बात साफ़ नहीं की थी कि उसे मेरा नौकरी करना बिल्कुल पसंद नहीं आएगा... समय बीतता गया और मानस की आमदनी से घर चलाना बहुत मुश्किल होने लगा और ऊपर से बेटी की ज़िम्मेदारी भी जुड़ गई। इसलिए मैंने नौकरी के लिए ज़िद की थी, लेकिन वे मेरी बात से सहमत नहीं हुए। पर मुझे घर चलाने के लिए नौकरी करनी ही पड़े ऐसी स्थिति थी, इसलिए मैं उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ही नौकरी करने लगी... वैसे भी अमेरिका जैसे देश में एक इंसान की कमाई से घर नहीं चल सकता.. मैंने समझदारी दिखाकर नौकरी की, ताकि आज एक घर के अलावा कुछ बचत भी हो सके और वहाँ इंडिया में रहने वाले सास-ससुर तथा बाकी परिवार का ख़र्च भी हम आराम से उठा सकें।

गायत्री अभी बात कर ही रही थी कि उसकी मम्मी बीच में ही बोल उठीं, "लंबी-लंबी बातें मत कर। जो कहना है, सीधे-सीधे कह न!..." मानो किसी को अपनी बेटी की बात सुनने में कोई दिलचस्पी ही न हो।

लेकिन सिर्फ़ गायत्री के पापा को उसकी पूरी बात सुनने में दिलचस्पी थी। उन्होंने कहा, "तू पूरी बात बता बेटा.. तभी तो असल बात समझ आएगी।"

गायत्री ने कहा, 'हम दोनों के सहयोग से सब कुछ अच्छे से सेट हो रहा है। लेकिन मानस को अब ऐसा शक होने लगा है कि मेरा मेरे बॉस के साथ कोई चक्कर है... इसी वजह से अब मैं जब भी खुश होती हूँ, अच्छे से तैयार होती हूँ... तब वे मुझ पर शक करते रहते हैं। मैं उनके मन से ऐसे विचार कैसे निकालूँ? मुझे यही समझ नहीं आ रहा। मैं खुश इसलिए होती हूँ क्योंकि अब घर चलाने की चिंता कम हो गई है, लेकिन यह बात मैं मानस को कैसे समझाऊँ? मुझे तो शुरू से ही तैयार होने का शौक था और पहले भी जब-जब मैं तैयार होती थी, तब तो मानस को मैं बहुत पसंद आती थी। आज भी मैं वैसे ही तैयार होती हूँ। लेकिन मानस की सोच में अब बदलाव आ गया है। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि मैं अपने बॉस के लिए तैयार होती हूँ। आज ऑफिस से घर आते समय वर्कलोड की वजह से देर हो गई, तो मुझसे कहने लगे कि, "तू अपनी मर्ज़ी से ही जीती है..." ऐसा कहकर कितना झगड़े और घर से निकाल दिया.. मैं अपने ससुराल में फोन पर सब कैसे बताऊँ? वे इंडिया में हैं और हम यहाँ। मैं लाचार होकर यहाँ आई हूँ...' इतना बोलते-बोलते गायत्री की आँखों से आँसू बहने लगे।

गायत्री की मम्मी तुरंत बोल उठीं कि, 'नौकरी की वजह से अगर ऐसा शक हो रहा है, तो नौकरी छोड़ और घर संभाल। यूँ ही तो मानस को तुझ पर शक नहीं हुआ होगा न? ज़रूर तूने ही ऐसा कुछ किया होगा! ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती! तू मानस को अच्छी तरह समझ पाई होती, तो बात इतनी बढ़ती ही नहीं!'

मम्मी की बात से दोनों भाई भी सहमत थे। उन्होंने भी अपनी माँ की बात में हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, "हाँ मम्मी, आपकी बात सही है।" और उनके पापा तो क्या बोलना और क्या कहना, इसी सोच में अभी भी उलझे हुए थे।

गायत्री तो परिवार की बात सुनकर अवाक ही रह गई, मानो शरीर का खून ही सूख गया हो... ऐसी उसकी हालत थी। आँसू पोंछना तो दूर, किसी ने प्यार से सिर पर हाथ फेरकर यह भी नहीं कहा कि, "मानस का इस तरह शक करना बिल्कुल सही नहीं है। तू चिंता मत कर!" गायत्री को एक पल के लिए तो लगा कि, 'क्या ये मेरे ही माता-पिता और मेरे ही भाई हैं?' आज पहली बार उसे अपना परिवार अजनबी जैसा लगा।

इस चर्चा के दौरान अमृता और भार्गवी की नज़रें मिलीं। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा... अमृता ने आँखों के इशारे से भार्गवी को शांत रहने के लिए कहा और खुद आज पहली बार बड़ों के बीच बोल उठी, 'गायत्री बहन, आप चिंता मत कीजिए। मुझे आप पर और इस घर की परवरिश पर पूरा भरोसा है। मैं आपके साथ हूँ। क्योंकि अगर एक बार आप चुप रह गईं, तो यह शक हमेशा के लिए आपके जीवन में घर कर जाएगा और इसे जड़ से मिटाने के लिए मैं हमेशा आपके साथ हूँ।'अमृता के शब्द घर की दीवारों को भी हिला दें, इतने शांत और वज़नदार थे। परिवार झूठे बड़प्पन में शर्मिंदा होकर ग्लानि महसूस करने लगा।

अमृता की सास को उसकी यह बात हज़म नहीं हुई। वे बहुत क्रोधित हो गईं और बोलीं, 'हम लड़की वाले हैं, इसलिए ससुराल वाले जो कहें वही बात मानें तभी बेटी सुखी रहती है। तुझे संसार के बारे में क्या पता? ये बाल ऐसे ही धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं! ज़िंदगी के अनुभव से कह रही हूँ अमृता!' गुस्से से वे तिलमिला उठी थीं। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि उनकी बहू आज उनके ख़िलाफ़ जाकर बात कर रही थी, जो उनसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ।लेकिन अमृता ने तो तय कर ही लिया था कि "अब वह किसी भी स्त्री के साथ होने वाले अन्याय के आगे घुटने नहीं टेकेगी।" तो यहाँ तो अपने ही घर की लक्ष्मी पर वे खुद दोष लगा रहे थे, तो वह चुप कैसे रहती?

अमृता ने आज तो अब तक बाँधकर रखा हुआ सब्र का बाँध तोड़ ही दिया और यह बाँध अब बह निकला था। उसने अपनी सास को करारा जवाब दिया, 'सही बात है मम्मीजी। लेकिन हमने बेटी को ब्याहा है, कोई उसका सौदा नहीं किया है। और रही बात घर को अच्छे से चलानेकी, तो वे तो कुँवरजी से नहीं हो रहा तभी तो गायत्री बहन को नौकरी करनी पड़ी न? और इसमें ग़लत भी क्या है? और अगर हम ही अपने घर की लक्ष्मी का साथ न दें, तो यह तो सही नहीं है न? हम जानते हैं कि गायत्री बहन सही हैं, तो हम क्यों कुँवर जी की ग़लत बात को बढ़ावा दें? अगर आज हम आवाज़ नहीं उठाएँगे, तो कुँवर जी गायत्री बहन को और ज़्यादा दबाने की कोशिश करेंगे, और क्या कोई भी इंसान बंदिशों में रहकर कभी खुश रह सकता है? वह मन ही मन घुटता ही रहेगा। इस बात को मुझसे ज़्यादा तो आप बड़ी और अनुभवी हैं, इसलिए बेहतर जानती होंगी। सही कहा न मम्मीजी?"

अमृता के पति राजेश को अमृता का इस तरह बोलना पसंद नहीं आया। वह बुरी तरह चिल्लाया, "चुप हो जा अमृता! वरना एक थप्पड़ गाल पर पड़ जाएगा।"

अमृता ने तो बगावत का बिगुल फूँक ही दिया था। अब वह भला डरने वाली थी? वह शांति से बोल उठी, 'हाथ उठाकर तो देखिए। मेरी एक ही शिकायत आपको जेल की सलाखों के पीछे धकेलने के लिए काफ़ी होगी। अपनी पत्नी पर हाथ उठाना एक कानूनी अपराध है।'

यह सुनकर राजेश तिलमिला गया। कभी ऊँची आवाज़ में बात तक न करने वाली अमृता को आज इस तरह जवाब देते देखकर वह बर्दाश्त नहीं कर सका। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उसका हाथ उठ ही गया, लेकिन उसे बीच में ही गायत्री ने रोक लिया और बोली, "भैया, आप इस तरह मत झगड़िए। मैं भाभी के बदले माफ़ी माँगती हूँ। बात को यहीं ख़त्म कीजिए।"

घर का माहौल देखकर सालों से चुप रहने वाले घर के बड़े-बुज़ुर्ग रमेशभाई की आँखें आज अमृता ने खोल दी थीं। वे बोले, "राजेश, बहू बिल्कुल सही कह रही है। वह जो बोली, उसका एक-एक शब्द सच है। अपने झूठे अहंकार को दूर कर और शांति से सोच बेटा! तुझे सिर्फ़ सामने जवाब मिला तो तू इतना गरम हो गया, तो हमारी बेटी के चरित्र पर मानस कुँवर ने उंगली उठाई, तो यह तुझे कैसे बर्दाश्त हो गया? तुझे गुस्सा क्यों नहीं आया?"राजेश को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ और वह शर्मिंदगी महसूस करने लगा।

उधर अमृता के चेहरे पर चमक आ गई। उसने इशारा करके भार्गवी से बात की कमान अपने हाथ में लेने को कहा।भार्गवी बोली, "मुझे भी अमृता भाभी की बात सही लग रही है। हमें गायत्री बहन का साथ देना ही चाहिए।"

अब भार्गवी क्या करेगी? क्या वह भी अमृता की तरह बगावत करेगी? गायत्री को अब सिर्फ़ अपनी दोनों भाभियों से ही उम्मीद बची थी। वह उम्मीद भरी नज़र से अपनी भाभियों की तरफ़ देखने लगी।