अध्याय-७
मानसकुमार को अमृताभाभी की एक-एक बात दिल को छू गई। भाभी तो चली गईं, लेकिन उनकी बातें मानसकुमार के मन में बार-बार गूंज ही रही थीं। उनके मन में अमृताभाभी के वे शब्द बार-बार प्रतिध्वनित हो रहे थे। वे अमृता की बातों पर मंथन करने लगे और उस आत्ममंथन के परिणामस्वरूप आज उन्होंने ऑफिस में भी छुट्टी के लिए ईमेल भेज दिया। उनका मन कहीं लग ही नहीं रहा था। मन में एक अलग ही प्रकार की पीड़ा महसूस हो रही थी। कभी वे कमरे में टहलते, तो कभी मोबाइल चलाते, लेकिन मन को शांति नहीं मिल रही थी। उनके मन के सारे सवाल सिर्फ हलचल ही नहीं मचा रहे थे, बल्कि हर सवाल का जवाब यही कह रहा था कि कहीं न कहीं वे खुद ही गलत हैं, और यही बात उन्हें महसूस हो रही थी।
देखा जाए तो कोई भी इंसान तुरंत अपनी गलती नहीं स्वीकारता, वैसे ही मानसकुमार भी कबूल नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए मोबाइल के हेड ऑफिस से वह लिस्ट भी मंगवाई, जिससे कॉल और टेक्स्ट मैसेज की पूरी जानकारी मिल सके। हेड ऑफिस से १ घंटे में ही सारी जानकारी मानसकुमार के मोबाइल में आ गई... मानसकुमार की आंखें फटी की फटी रह गईं, क्योंकि कॉल लिस्ट में मानस के नंबर और खुद उनके इंडिया वाले नंबर ही सबसे ज्यादा थे। और बॉस के साथ कॉल का समय तो बढ़कर मुश्किल से २ या ३ मिनट का ही हर बार रहता था। उन्होंने ध्यान से देखा तो उन्हें यह भी समझ आया कि बॉस के कॉल तो ज्यादातर मिस ही हुए थे। यह तो अभी एक ही जानकारी थी, जिसने मानसकुमार की आधी आंखें खोल दी थीं।
मानसकुमार के मन में थोड़ी शांति हुई, लेकिन क्या शक के वहम को इतनी जल्दी दूर किया जा सकता है? मानसकुमार ने गायत्री के एक-एक टेक्स्ट मैसेज को ध्यान से पढ़ा, लेकिन हर मैसेज ऑफिस की फाइल या किसी डॉक्यूमेंट की डिटेल का ही था। एक भी मैसेज में ऐसी कोई जानकारी नहीं थी जिसके जरिए दोनों के रिश्ते को किसी भी तरह से अवैध संबंध (अनैतिक संबंध) का नाम दिया जा सके। सुबह से रात हो गई। इस सारी जानकारी की बारीकी से जांच करने के बाद भी मानसकुमार के हाथ में ऐसी कोई जानकारी नहीं आई जो यह साबित करे कि गायत्री हद पार कर चुकी है।
मानस खुद भी अब थक चुके थे। अथक प्रयास करने के बावजूद उनके हाथ में ऐसा कुछ नहीं आया, जैसे शक के कीड़े उनके मन में कुलबुला रहे थे। वे थककर कोल्ड ड्रिंक बनाने उठे और अचानक गायत्री ने उन्हें पीछे से पकड़कर, उनके कंधे पर अपना सिर टेकते हुए बड़े ही प्यार से कहा, "अभी भी आपको मेरे प्यार पर भरोसा नहीं हुआ???"
अचानक ही मानसकुमार के हाथ से कोल्ड ड्रिंक का गिलास नीचे गिर गया और उनके मन का वह भ्रम टूट गया कि गायत्री उनके पीछे खड़ी है। कल्पना में बसी गायत्री की आवाज ने मानसकुमार का खुली आंखों से देखा गया खूबसूरत सपना तोड़ दिया। वे पीछे मुड़कर देखने लगे, लेकिन वहां तो कोई नहीं था। मानसकुमार को समझ ही नहीं आया कि अचानक क्या हुआ? लेकिन अब मानो उनका सारा गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो रहा था। मानस को तुरंत याद आया कि ऑफिस से उनके आने से पहले ज्यादातर वह आ ही चुकी होती थी और उनकी पसंद की चाय भी गायत्री ने बना रखी होती थी, लेकिन पी नहीं होती थी... क्योंकि वह हमेशा चाय मानस के साथ ही पीती थी। अहा! गायत्री उनका कितना ख्याल रखती थी न! मानो गायत्री की हर बात याद आते ही अब उन्हें सिर्फ पछतावा ही करा रही थी। मानस को अब अफसोस हो रहा था कि उन्होंने क्या कर दिया। लेकिन मर्द ठहरे! वे भला इतनी आसानी से अपनी बात से पीछे कैसे हटते? मन में हुआ कि सुबह से गायत्री ने चाय पी होगी, फिर भी क्या उसने मुझे याद किया? और ऐसा सोचकर वे मन ही मन उदास हो गए।
इधर अमृता और भार्गवी जैसे ही घर पहुंचे, उनकी सास शोभाबेन ने ताने मारना शुरू कर दिया, "आ गई वापस सूखे मुंह! जिस काम में मेरी सलाह न ली गई हो, वह काम ऐसे ही थोड़ी पूरा होता है?"
रमेशभाई ने आज पहली बार अपनी पत्नी शोभा को बोलते हुए बीच में ही टोका.. "शोभा! अभी बहुओं को घर में आकर बात तो करने दो, बिना कुछ जाने बोलना सही नहीं है।"
अमृता और भार्गवी ने घर में प्रवेश किया। वहां मानसकुमार से जो भी बातचीत हुई थी, वह पूरी बात अमृता ने घर के हर सदस्य को बताई। बात खत्म होते ही शोभाबेन तुरंत बोलीं, "इन १५ दिनों में तू क्या उखाड़ लेगी? मानसकुमार के पैर पकड़कर विनती करके गायत्री को छोड़कर आने की जरूरत थी.. और वहां उसके ससुराल में भी फोन करके कहने की जरूरत थी कि हमारी बेटी से अब दोबारा कोई गलती नहीं होगी!"
गायत्री अपनी मां के ये शब्द बर्दाश्त नहीं कर सकी। आज उससे भी अब बोला ही गया, "मम्मी, क्या आपसे जिंदगी में कभी कोई गलती हुई ही नहीं?? मेरी कोई गलती न होने के बावजूद आप ऐसा बोल रही हैं। शायद अगर मैंने गलती की होती, तो मेरे लिए आपके पास उम्मीद का कोई दरवाजा ही नहीं बचता, है न?"
रमेशभाई बोले, "बेटा! शांत हो जा। मुझे पूरा भरोसा है कि अमृता की बात मानसकुमार को जरूर समझ आएगी और वे फिर से तुझे लेने जरूर आएंगे!"
गायत्री अपने पापा से लिपटकर रो पड़ी, "इसमें मेरी बेटी सोनाली का क्या कसूर?"
अमृता ने गायत्री के आंसू पोंछते हुए कहा, "सोनाली का कोई कसूर नहीं है, लेकिन कभी-कभी पिछले जन्म का हिसाब-किताब ही ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर देता है। आप जरा उस कमरे में जाकर देखिए तो सही, भव्या और सोनाली दोनों कितनी मस्ती, शरारत और आनंद से खेल रही हैं। क्या वे इससे पहले कभी इस तरह खेली हैं?"
अमृता इतना ही बोली थी कि अचानक उसे चक्कर आ गए।