अध्याय-૪
भार्गवी की बात सुनकर अपूर्व को भी लगा कि, वह खुद अपनी बहन को ही नहीं समझ पाया... जन्म से अपनी बहन के साथ है, फिर भी दोनों भाभियाँ हम सबसे ज़्यादा विश्वास बहन पर और इस घर की परवरिश पर रखती हैं। अपूर्व महसूस कर रहा था कि, रिश्ता चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, लेकिन वह रिश्ता कितना मज़बूत है, यह बात ज़्यादा मायने रखती है। अपूर्व ऐसा सोचकर तुरंत बोल पड़ा, 'गायत्री बहन, मुझे माफ़ कर दो। मुझसे आज बहुत बड़ी भूल हो गई... तुमने मेरे हाथ पर जो राखी बाँधी है, मैं उसकी भी लाज नहीं रख सका! कहते हैं, भाई-बहन का रिश्ता स्नेह का रिश्ता होता है, लेकिन मैं तो तुम्हें सही अर्थों में स्नेह भी नहीं कर पाया और उल्टा तुम पर ही बरस पड़ा। तुम पर स्नेह की वर्षा करने के बजाय मैं तो क्रोध की वर्षा कर बैठा। मुझे माफ़ कर दो। और भाभी! मैं आपसे भी माफ़ी माँगता हूँ, भाइयों के नाते जो साथ हमें अपनी बहन को देना चाहिए था, वह फर्ज़ आपको निभाना पड़ा... मुझे माफ़ कर दीजिए...'
राजेश अपने छोटे भाई की बात सुनकर और भी ज़्यादा शर्मिंदगी महसूस करने लगा। लेकिन घमंड क्या-कुछ नहीं करवाता? अहंकार सभी रिश्तों को तोड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। और राजेश!? राजेश को अपनी पत्नी की समझदारी से सभी के मन में पनप रही गलत बात का वर्चस्व खत्म होता हुआ दिखाई नहीं दिया। शायद उसकी वह दृष्टि अभी तक खुली ही नहीं थी। लेकिन अमृता क्यों अपनी मम्मी के सामने बोली, यही बात उसे इस समय ज़्यादा महत्वपूर्ण लग रही थी। वह मुँह बनाकर पैर पटकता हुआ कमरे में चला गया।
राजेश तो गुस्से में कमरे में चला गया, इसलिए रमेशभाई ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "मानस कुमार से बात कैसे करनी है, मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा। कैसे उनका सामना करें? कब से यही चिंता मुझे सता रही है।"
अमृता की सास तुरंत तिनककर बोल उठीं, "क्यों? यह आपकी दुलारी बहू अमृता है न? यही सब संभाल लेगी... आप क्यों चिंता करते हैं? कल सुबह ही अमृता और भार्गवी दोनों गायत्री को मानस कुमार से बात करके छोड़ आएँगी... क्यों, सही है न बहू? अब तो इस काम की ज़िम्मेदारी तुम्हें ही सौंप दी अमृता..." इतना कहकर रोब दिखाते हुए अंदाज़ में ज़ोर देकर बोलीं, "भव्या और सोनाली अंदर अकेली खेल रही हैं। मैं उनके पास जाती हूँ। बड़ों का सब जगह ध्यान होना चाहिए न!"
जाते-जाते मन ही मन बड़बड़ाती गईं, "मैं भी देखती हूँ अब कि, 'कैसे तुम मेरी मदद के बिना काम को पूरा करती हो?? आज जो तुमने मेरे ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत की है, देखना यह तुम्हें कितना भारी पड़ता है!' और मूँछों में मुस्कुराते हुए पोतियों के पास चली गईं...
रमेशभाई ने अमृताके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और बोल पड़े, "बेटी! तुमने मेरी आँखें खोल दीं... वरना आज जो अनजाने में मेरे हाथों पाप हो जाता, उसे किस जन्म में चुकाना पड़ता, यह तो कौन जाने! मैंने सचमुच कुछ अच्छे कर्म किए ही होंगे जो तुम दोनों समझदार बेटियों को हम इस घर की बहू के रूप में पा सके।"
गायत्री से कहा, "बेटा, जैसा तुम्हारी मम्मी ने कहा, दोनों भाभियाँ तुम्हारे साथ जाएँगी। मुझे पूरा यकीन है कि वे जो भी करेंगी, तुम्हारे भले के लिए ही करेंगी... दोनों भाभियों के मन में तुम्हारे लिए बहुत लगाव है। आज इस घर की ऐसी हालत की वजह शायद इतने सालों से मेरा मौन रहना है। घर में शांति बनी रहे, इसके लिए मैं हमेशा चुप ही रहा, लेकिन यह नहीं समझ पाया कि मेरा यह मौन ही एक दिन पूरे घर की बलि ले लेगा। मुझे माफ़ कर दे बेटी।"
आज की रात गायत्री के लिए बहुत कठिन रात थी। वह सोने की व्यर्थ कोशिश कर रही थी, लेकिन नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी... मन में बहुत उथल-पुथल मच रही थी। वह विचारों की उलझन में फँसी हुई थी। घड़ी भर ऐसे विचार आते कि, 'क्या मम्मी और भाई को मुझसे ज़्यादा अपना घमंड प्यारा है?' तो फिर लगता कि 'अगर इन दोनों भाभियों ने मेरा साथ न दिया होता, तो मेरा क्या होता? मैं अपनी बेटी भव्या को लेकर कहाँ भटकती?' ऐसे ही विचारों में वह सालों पहले की एक घटना में खो गई...
१२ साल पहले...
रात के १:३० बजे अमृता और राजेश के ज़ोर-ज़ोर से बात करने की आवाज़ों से शोभाबहन के कान खड़े हो गए... दोनों के बेडरूम एक ही दीवार से सटे हुए थे। आवाज़ इतनी भी तेज़ नहीं थी, लेकिन देर रात के एकदम सन्नाटे के कारण बातचीत सुनाई दे रही थी। शोभाबहन ने खिड़की खोलकर बात सुनने की कोशिश की...
राजेश ने कहा, 'तू क्या समझती है कि मैं ऑफ़िस में हूँ तो मुझे कुछ पता नहीं चलता? मेरा तेरी हर बात पर ध्यान रहता ही है। तू सब्ज़ी ले रही हो, दूध ले रही हो, गार्डन में टहल रही हो... मेरी आँखों पर पट्टी नहीं बँधी है...'
अमृता ने रुँधे हुए गले से जवाब दिया, 'हाँ, मैं मुस्कुराते हुए सब्ज़ी लेती हूँ, वे सब्ज़ी वाले भैया मेरे पापा की उम्र के हैं, और दूध वाले भैया! वे मुझसे उम्र में कितने छोटे हैं... सालों से इस घर के साथ रिश्ता है, तो अगर दूध लेते समय उनसे कोई बात हो गई, तो इसका मतलब... क्या राजेश, आप भी... और रही बात गार्डन की! तो वे तो हमारी सोसायटी के सभी जाने-पहचाने और अच्छे लोग ही हैं, उनके साथ अगर मैं हँस लूँ या बोल लूँ, तो इसमें क्या गलत हो गया?'
राजेश भड़के हुए लहज़े में बोला, 'तू तो अपना तेवर ऊँचा ही रखेगी न? मुझे पता ही था कि तू ऐसे ही जवाब देगी... तू बहुत होशियार है...'
अमृता बात की सफ़ाई देते हुए बोली, 'नहीं, मैं होशियार हूँ यह साबित नहीं कर रही, बल्कि जो सच है वही आपको बता रही हूँ। आप कुछ तो सोचिए, मैं आपकी पत्नी हूँ... मुझे क्या दिलचस्पी होगी दूसरों में?'
राजेश पूरी तरह से अपने आपे से बाहर हो चुका था। वह इतने गुस्से में था कि उसे यह भी होश नहीं था कि वह क्या बोल रहा है, 'मुझे भी यही समझ नहीं आ रहा कि तुझे मेरी किस बात से संतोष नहीं है? तू उन दो टके के लोगों के सामने हँस-हँसकर बातें करती है???? मैं तेरी नस-नस से वाकिफ़ हो गया हूँ... कल मैं तेरे घर और यहाँ सबको तेरे करतूत बता देने वाला हूँ... फिर तू अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते...'
अमृता पूरी तरह से सन्न रह गई थी... वह रोते हुए बोल उठी, 'मेरी मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है और पापा की भी एक बार एंजियोप्लास्टी हो चुकी है। आप प्लीज़ घर पर कोई बात मत बताना, मैं कल से सब्ज़ी लेने भी नहीं जाऊँगी, और दूध भी नहीं लूँगी, और बाहर सिर्फ़ आपके साथ ही निकलूँगी, इसके अलावा इस घर की चौखट भी पार नहीं करूँगी... लेकिन सचमुच राजेश, मैं सच ही कह रही हूँ। मुझे आपके सिवा किसी में कोई दिलचस्पी नहीं है...' अमृता के रोने की आवाज़ काफी देर तक आती रही, लेकिन राजेश टस से मस नहीं हुआ...
शोभाबहन पूरी बातचीत सुनने के बाद बड़बड़ाईं, "हाश! अब सब्ज़ी और दूध के बिल से मैं पैसे बचा सकूँगी... बड़ी आई थी घर की चाबी संभालने वाली... पहले पति को तो संभाल ले, वही तेरा काम है..."
यह सब शोभाबहन के सामने बैठी उनकी बेटी गायत्री सुन रही थी... वह १२वीं साइंस में थी, पढ़ते-पढ़ते वह भी बोल उठी, "क्या मम्मी! आप ऐसे क्यों भाभी को परेशान करती हो?"
शोभाबहन अपनी बेटी के इस सवाल का जवाब देते हुए बोलीं, "तू तो चुप ही रह। नहीं तो तुझे आगे पढ़ने नहीं दूंगी और शादी करा दूंगी... मैं तेरी माँ हूँ। घर की इन बातों में तुझे टाँग अड़ाने की ज़रूरत नहीं है, समझी??? तू तो पराए घर की बहू बनने वाली है। यह घर तेरा नहीं है।" गायत्री अब आगे कुछ न बोल सकी। माँ की इस बात ने उसके मुँह पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया था।
गायत्री अपनी पढ़ाई के शौक के कारण कुछ बोल नहीं पाई थी, लेकिन भाभी ने उस दिन भाई से जो वादा किया था, वह आज तक चुपचाप निभा रही थीं... उस रात की बातचीत भाई, भाभी, शोभाबहन और गायत्री के मन में ही दबी रह गई थी।
गायत्री को आज अपनी गलती का एहसास हुआ कि, 'भाभी सही थीं, फिर भी मैंने उनका साथ नहीं दिया... और चुप रहना ही बेहतर समझा। भाभी बड़े से बंगले में कैद होकर अपनी ज़िंदगी बिताने लगीं। चरित्र पर लांछन कितना पीड़ादायक होता है, यह आज खुद के अनुभव के कारण वह बहुत अच्छी तरह समझ पा रही थी।'
सुबह ६ बजे के अलार्म की आवाज़ से गायत्री बिस्तर से उठ बैठी... और मन ही मन बोल उठी, "जब जागे, तब सवेरा..."