अध्याय-२
भार्गवी अपनी जेठानी के गले लग गई और मानो दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए मूक सहमति दे रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और दोनों के भीतर एक अटूट ऊर्जा का संचार हुआ। मानो दोनों एक ही माँ की बेटियाँ हों, वैसा ही एक जैसा अनुभव कर रही थीं।
हाँ, लेकिन जो भार्गवी के साथ हुआ, उसका मलाल तो दोनों के मन में था ही और उससे उपजा दर्द मानो दोनों के अंदर शूल की तरह चुभ रहा था। लेकिन अब आगे ऐसा कुछ भी नहीं होने देंगे, इस विचार पर दोनों का मन पक्का हो चुका था।
दर्द से उठी आँधी का तूफ़ान हूँ मैं,
रोशनी में छिपा हुआ, अँधेरा हूँ मैं।
अधूरा गाया हुआ एक गान हूँ मैं,
फैलाऊँगी प्रकाश अब, माचिस की तीली हूँ मैं।
रात के खाने का समय हो गया था। रात के भोजन के लिए पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हो गया था। पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर एक साथ ही खाने बैठता था, यह परंपरा उनके घर में सालों से चली आ रही थी। आज तो सब की पसंद का खाना बनाया गया था। सबकी थालियाँ परोस दी गई थीं और सब लोग मानो कुछ हुआ ही न हो, ऐसे भोजन का स्वाद ले रहे थे। लेकिन भार्गवी और अमृता?!! उन दोनों के गले से तो एक निवाला भी कहाँ उतर रहा था? गले में अटका हुआ वह निवाला दोनों के मन में फाँस की तरह चुभ रहा था।
दोनों के हृदय में एक छोटे से जीव की हत्या का आक्रंद गूँज रहा था। अभी थोड़े समय पहले ही हुए एक निर्दोष जीव की मौन चीखें उनके कानों में गूँज रही थीं। और दोनों खुद को कुछ भी न कर पाने में असमर्थ महसूस कर रही थीं। दोनों इस घर की लक्ष्मी होने के बावजूद अपने ही घर की लक्ष्मी की रक्षा नहीं कर सकी थीं।
भार्गवी, जो 3 महीने से अपने गर्भ में पल रहे जीव को महसूस कर रही थी, वह सिर्फ 'बेटी पल रही है' यह पता चलते ही "बेटी तो इस घर में नहीं ही चाहिए" ऐसे कहे गए अपने ही परिवार के शब्द बार-बार उसके मन पर हावी हो रहे थे। और बार-बार वे गुँजार उसके कानों में गूँज रहे थे और उसने अपने कान बंद कर लिए। उसे बार-बार वही पल याद आ रहे थे, और वह याद आते ही वह अंदर से बुरी तरह काँप उठती। उसे ज्यादा दुख उसे इस बात का था कि उसका पति भी इस बात में उसका साथ देने के बजाय अपने परिवार का ही साथ दे रहा था। मानो बच्चा उसका हो ही नहीं।
दरअसल, बेटी या बेटे के जन्म के लिए जिम्मेदार तो पुरुष ही होता है। पुरुष के अंदर मौजूद X या Y गुणसूत्र (Chromosome) पर ही बच्चे के जन्म का लिंग तय होता है। लेकिन यह पढ़ा लिखा कहा जाने वाला समाज आज भी स्त्री को ही क्यों जिम्मेदार ठहराता है? भार्गवी को हर चीज में वही दृश्य अपनी आँखों के सामने दिखता था, जो अस्पताल में उसके साथ सारी सर्जरी की गई थी। हर एक क्रिया और उससे भी ज्यादा खुद सहनी पड़ी वह पीड़ा... ऐसी पीड़ा जो उसके शरीर को तो कष्ट पहुँचा ही रही थी, लेकिन मन को छलनी कर देने जैसी वेदना दे गई थी।
मेरे मन की यह वेदना तो है असह्य,
दिखावा मेरा अलग है भीतर-बाह्य!
अब कभी नहीं रहने दूँगी कोई अधूरापन;
मेरा मन तो न रहेगा सदा के लिए गुह्य!
अपूर्व के शब्दों ने भार्गवी की जाग्रत-मूर्छा अवस्था को झकझोरा... "भार्गवी, थोड़ी खीर देना। बहुत बढ़िया बनी है।"
भार्गवी ने खीर परोसी... अपूर्व खीर पी रहा था और भार्गवी अपने आँसू..... और यह वेदना दूर बैठी अमृता महसूस कर रही थी।
लगभग दो-चार दिन ऐसे ही बीत गए.. अब फिर पहले की तरह अमृता और भार्गवी अपनी सच्चाई को बहुत जल्द पचाकर सामान्य जीवन जीने लगी थीं। लेकिन कहते हैं न कि माता-पिता के पुण्यों का फल बच्चे को मिलता है, वैसे ही उनके पापों का फल भी बच्चों को न चाहते हुए भी मिलता ही है। क्योंकि कुदरत की लाठी सीधी नहीं पड़ती, लेकिन जब पड़ती है तो करारा झटका देती है, यह बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं.. और यह मनुष्य अवतार दूसरों की जिंदगी को बखूबी समझ सकता है, लेकिन अपनी जिंदगी की सीख को समझने में इतनी देर लगा देता है कि तब तक ईश्वर के घर से बुलावा आ जाता है.. चलिए देखते हैं कि इस परिवार पर ईश्वर की लाठी की मार कैसे पड़ती है।
रात के समय पूरा परिवार रोज की तरह ही खाना खा रहा था। अभी सबने आधा खाना ही मुश्किल से खाया होगा कि तभी घर की डोर-बेल बजी।
भार्गवी ने दरवाजा खोला। सामने उसकी इकलौती ननद अपनी इकलौती बेटी के साथ, एक बैग लेकर खड़ी थी। भार्गवी ने प्यार से मुस्कुराते हुए स्वागत किया, लेकिन उसकी ननद गायत्री की आँखें नम थीं। और उसके हाव-भाव से साफ पता चल रहा था कि जरूर कोई तकलीफ सहकर वह यहाँ अपने मायके आई थी।
अमृता तुरंत उठकर वहाँ दौड़ी आई और हाथ से बैग ले लिया। गायत्री अपनी अमृता भाभी के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। तब जाकर पूरे परिवार का ध्यान गया कि कौन आया है। अभी तक कौन आया है, इस तरफ किसी का ध्यान नहीं था। सब अभी खाने में ही मशगूल थे। थोड़ी देर बाद सबका ध्यान अपने घर की लक्ष्मी की तरफ गया। दरवाजे पर गायत्री को आया देखकर सबने उसका स्वागत किया।
अपूर्व ने कहा, "आओ, अंदर आओ और शांति से बात करना। चल, पहले खाना खा ले।"
गायत्री अंदर आई और सबने जैसा कहा, वैसे ही खाना खाया और अपनी बेटी भव्या को भी खिलाया। सबकी नजरें अब गायत्री पर टिक गई थीं।