Incompleteness - 9 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 9

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अधूरापन - 9

अध्याय - 9


अमृता अपने बेडरूम में दाखिल हुई। कमरे में कदम रखते ही उसके मन में विचार आया कि राजेश के मुंह से उसने कभी माफी शब्द नहीं सुना था, और आज अचानक पहली बार वह यह शब्द सुन रही थी, इसीलिए आधी तो वह ऐसे ही पिघल गई थी। अब तक बर्फ बनकर जी रही थी और परिवार को ठंडक दे रही थी, फिर भी उसकी कोई कद्र नहीं करता था; लेकिन आज अमृता अचानक राजेश के प्यार से पिघल गई थी। हर शादीशुदा औरत अपने पति के मुंह से ज़रा सी भी प्यार भरी बात सुन ले, तो उसका मन बहुत प्रफुल्लित हो ही जाता है! और अमृता ने तो इतने सालों तक सिर्फ अनबन या ताने ही सुने थे।

तेरी भावनाओं की चाह है मुझे बस,समझ जा तू और रख मुझे सदा थामकर।तेरी छोटी सी "प्रीत" की प्यास है मुझे बस,बनना चाहती हूँ सदा से तेरी ही प्यारी!

आज अमृता को भी मानो राजेश के प्रति कुछ ज़्यादा ही आकर्षण महसूस हो रहा था। वह खुद को राजेश की तरफ और अधिक आकर्षित महसूस कर रही थी। लेकिन हमेशा अपनी भावनाओं को एक कोने में दबाकर रखने के कारण, शायद अमृता भावनाओं को व्यक्त करना ही भूल गई थी। अब तक उसने अपनी भावनाओं को आवाज़ दी ही कहाँ थी! अमृता ने बिना किसी सवाल या बातचीत के "कोई बात नहीं" कहकर बात को यहीं विराम दिया।

राजेश को बहुत पछतावा हो रहा था। वह पश्चाताप की आग में जल रहा था। वहीं, प्यार भी बहुत था। लेकिन अब तक उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि उसकी माँ कोई गलत बात कह सकती है। उसकी मम्मी थोड़ी न कोई गलत बात कहेंगी? जो गलत बात राजेश के मन में घर कर गई थी, उसने रिश्ते को पूरी तरह से खोखला कर दिया था। माँ के अंधे प्यार की पट्टी जो अब तक राजेश की आँखों पर बंधी हुई थी, वह शायद अब खुलने लगी थी और दृश्य धीरे-धीरे साफ होते जा रहे थे।

राजेश के अनुसार अमृता उसके मनमुताबिक रहने लगी थी, इसलिए राजेश इस गलतफहमी में रहा कि अमृता झूठ ही बोल रही थी, लेकिन गलती मम्मी ने पकड़ ली, इसलिए अब सतर्क हो गई है और अब खुद के सीधे होने का नाटक कर रही है। 'जिसने एक बार बाहर मुंह मारा हो, वह जिंदगी में कभी नहीं सुधर सकता!' ऐसे तमाम गलत विचारों से राजेश अमृता से इतना दूर हो गया था कि प्यार का स्थान उनके जीवन में एक शब्द से ज़्यादा कुछ नहीं रह गया था।

लेकिन सच के आगे कौन जीत सकता है? सच कड़वा ज़रूर होता है, लेकिन वह कभी हारता नहीं है। अमृता भी सच्ची थी, इसलिए कुदरत को उसके साथ न्याय करना ही पड़ा। आज भले ही बारह साल बीत जाने के बाद बहुत देर हो चुकी थी, फिर भी आज राजेश मानो अमृता के लिए बहुत सम्मान और प्यार महसूस कर रहा था। राजेश बोला, "अमृता, कल भार्गवी के बजाय मैं ही तुम्हारे साथ अस्पताल चलूँगा।"

अमृता ने सिर हिलाकर ओके कहा।

राजेश अमृता के करीब गया और बोला, "अमृता! मैं सच में दिल से माफी मांगता हूँ। मैंने बहुत बड़ी गलती की। मैंने तुम्हारी और गायत्री की कल सुबह की बात सुन ली है।"

राजेश की यह बात सुनते ही अमृता की आँखें थोड़ी फटी की फटी रह गईं। अब उसे राजेश के बदले हुए बर्ताव का असली रहस्य समझ आया। अमृता कुछ और कहती, उससे पहले ही राजेश ने उसे गले लगा लिया। उसने अमृता को अपनी बांहों में भींच लिया और फिर अमृता के कान में धीरे से कहा—"आई लव यू।" अमृता शर्म के मारे पूरी तरह पिघल ही गई।

राजेश और अमृता के बीच गलतफहमी की जो दीवार थी, वह आज पूरी तरह से टूट गई। आज माँ द्वारा रचे गए कपट के सामने सच और प्यार की जीत हुई थी।

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दूसरी तरफ, मानस कुमार के दिन जैसे-तैसे बीत रहे थे। अगले तीन दिन भी इसी सोच में निकल गए कि—जब गायत्री कॉल नहीं कर रही, तो मैं क्यों करूँ? और गायत्री को तो अमृता भाभी ने कॉल करने से मना किया था, इसलिए वह तो कॉल करने ही नहीं वाली थी।

आज भी रात को सोनाली अपने पापा को बहुत याद कर रही थी। अमृता के कहने पर गायत्री ने मानस को कॉल किया।

मानस ने जैसे ही गायत्री का कॉल देखा, उसका सारा गुस्सा, अहम और झुंझलाहट तुरंत गायब हो गई। मानस ने कॉल उठाया और कहा, "हेलो...!"

गायत्री आवाज़ से ही अंदाज़ा लगा चुकी थी कि मानस का गुस्सा शांत हो गया है। जवाब देते हुए वह बोली, "हेलो! सोनाली आपको बहुत याद कर रही थी। आज वह ज़िद करके बैठ गई कि पापा से बात करने के बाद ही सोऊँगी, इसीलिए कॉल किया।"

मानस ने अपनी बेताबी दिखाते हुए पूछ ही लिया, "वरना तुम्हारा खुद का मन नहीं था कॉल करने का??"

गायत्री बोली, "बहुत मन था, लेकिन..."

"लेकिन... क्या? गायत्री? क्या तुम्हें मेरे बिना अच्छा लगता है? रोज़ तुम्हारे गले से चाय उतरती है मेरे बिना?"

गायत्री ने मानस कुमार की बात बीच में ही काट दी और संक्षेप में जवाब दिया, "नहीं।"

मानस कुमार बोले, "तो फिर ऐसी क्या अहंकार कि कॉल नहीं किया?"

गायत्री को न जाने क्या हुआ कि वह खिलखिलाकर हँस पड़ी...

मानस कुमार भी उसकी हँसी सुनकर खुद को रोक न सके और वे भी खिलखिलाकर हँस पड़े... सोनाली ने मोबाइल लिया और जैसे हमेशा बात करती थी, वैसे ही अपने पापा से बात करने लगी। सिर्फ छह ही दिनों में रिश्ता पहले जैसा ही नहीं, बल्कि उससे भी ज़्यादा मज़बूत और प्यार भरा हो गया...

पूरे दिखते जीवन में भी होती है अधूरी प्यास,

दोस्त!पुरुष के जीवन में स्त्री के बिना है अधूरापन खास।