Money Vs Me - Part 19 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 19

Featured Books
Categories
Share

Money Vs Me - Part 19

इस हिस्से में शितिज की बेबस हालत, डर और ठाकुर साहब की चाल को थोड़ा और गहरा किया है, ताकि पाठक को महसूस हो कि शितिज अब सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि खुद फँस चुका है।

मैं पूरी रात सो नहीं सका।

ठाकुर साहब की जिंदगी में ऐसे खतरनाक काम भी होते हैं, ये मैंने कभी सोचा तक नहीं था। मैं चुपचाप बिस्तर पर पड़ा छत को घूरता रहा। कुछ देर पहले मेरी आँखों ने जो देखा था, उसके बाद जैसे मेरी जुबान से बोलने तक की ताकत छिन चुकी थी।

मैं खुद को एक पिंजरे में कैद ऐसे जानवर की तरह महसूस कर रहा था, जो अपनी मर्जी से साँस भी नहीं ले सकता।

बार-बार मेरी आँखों के सामने कश्यप का चेहरा आ रहा था।

उसकी घबराई हुई आँखें…

ठाकुर साहब के सामने उसकी गिड़गिड़ाहट…

और फिर वो आखिरी आवाज़।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

काश जो मैंने देखा था, वो सिर्फ एक बुरा सपना होता।

लेकिन तभी मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई।

मैं बुरी तरह चौंक गया।

कुछ पल तक मैं वहीं बैठा रहा।

फिर दोबारा दस्तक हुई।

मैंने भारी कदमों से दरवाज़े की तरफ बढ़कर उसे खोला।

सामने ठाकुर साहब खड़े थे।

उन्हें देखते ही मैं अनायास ही पीछे हट गया।

वो बिना कुछ कहे कमरे के अंदर आ गए।

कुछ पल तक मुझे देखते रहे।

फिर शांत आवाज़ में बोले—

“शितिज… शायद अब तुम्हें और कुछ बताने की जरूरत नहीं है।”

मैं चुप रहा।

“शायद तुम समझ चुके होगे कि मैं अपने दुश्मनों के साथ क्या कर सकता हूँ।”

उन्होंने कुछ पल रुककर मेरी तरफ देखा।

“और शायद ये भी समझ चुके होगे कि मैंने तुम्हें अपना राज़दार क्यों बनाया।”

मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया था।

मैंने उनकी तरफ देखा, लेकिन बोल नहीं पाया।

वो आगे बढ़े और कुर्सी पर बैठ गए।

“मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ।”

उनकी आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी।

“अगर कश्यप की मौत का राज़ कभी खुला…”

मेरी धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—

“तो तुम्हें ये ख़ून अपने सिर लेना होगा।”

मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

“तुम्हें कहना होगा कि कश्यप ने हम पर हमला किया था… और अपने बचाव में तुमने उसे मार दिया।”

मैं उन्हें अविश्वास से देखता रह गया।

मेरी साँसें तेज़ हो चुकी थीं।

मैं कुछ कहना चाहता था।

चीखकर कहना चाहता था कि मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।

लेकिन मेरी जुबान जैसे पत्थर हो चुकी थी।

ठाकुर साहब ने मेरी खामोशी को देखते हुए आगे कहा—

“आखिर हमने तुम पर इतनी मेहरबानियाँ तो की हैं, शितिज।”

उनकी आवाज़ में अब एक अजीब-सा अपनापन था।

लेकिन उस अपनापन के पीछे छिपी धमकी मैं साफ महसूस कर सकता था।

“उसके बदले तुम हमारे लिए इतना तो कर ही सकते हो।”

वो कुछ पल रुके।

फिर बोले—

“और एक तरह से… ये हमारे लिए तुम्हारे भरोसे का इम्तिहान भी होगा।”

मैं बस उन्हें देखता रहा।

मेरे पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक चुकी थी।

ठाकुर साहब कुछ देर मेरी खामोशी देखते रहे।

शायद उन्होंने मेरी चुप्पी को मेरी मंजूरी समझ लिया।

वो उठे और बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गए।

मैंने काँपते हाथों से दरवाज़ा बंद किया।

दरवाज़ा बंद होते ही मेरी ताकत जैसे जवाब दे गई।

मैं वहीं फर्श पर बैठ गया।

मेरे दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—

क्या किसी के खून का इल्जाम अपने सिर लेकर मुझे पूरी जिंदगी जेल में रहना होगा?

जिस जिंदगी को मैं अपनी किस्मत का सबसे बड़ा तोहफा समझ रहा था…

जिस बंगले को देखकर मैं खुद को उसका मालिक बनने के सपने दिखा रहा था…

जिस दौलत के लिए मैंने अपनी पुरानी जिंदगी तक छोड़ दी थी…

आज उसी दौलत की कीमत मेरे सामने खड़ी थी।

और कीमत थी—

मेरी पूरी जिंदगी।

मुझे अब समझ आने लगा था कि ठाकुर साहब ने मुझे इतना करीब क्यों किया था।

उन्होंने मुझे अपना बेटा नहीं बनाया था।

उन्होंने मुझे अपना भरोसेमंद आदमी नहीं बनाया था।

उन्होंने मुझे एक ऐसा मोहरा बनाया था, जिसे जरूरत पड़ने पर अपने सारे गुनाहों के आगे खड़ा किया जा सके।

और सबसे डरावनी बात ये थी कि अब मैं उनका राज़ जान चुका था।

इसका मतलब था—

या तो मुझे उनके लिए झूठ बोलना होगा…

या फिर मुझे अपनी जान बचाने के लिए उनसे दूर जाना होगा।

लेकिन क्या ठाकुर साहब जैसे आदमी से दूर जाना इतना आसान था?

उस रात पहली बार मेरे मन में एक फैसला पैदा हुआ।

मुझे इस बंगले से निकलना होगा।

लेकिन उससे पहले मुझे ऐसा रास्ता ढूँढना था, जिसमें ठाकुर साहब को मेरे भागने की खबर तक न हो।

क्योंकि अब मुझे यकीन हो चुका था—

अगर उन्हें मेरे भागने का पता चल गया, तो अगली रात कश्यप की तरह किसी और का नाम उनकी फाइल में लिखा होगा।

और वो नाम…

शायद मेरा होगा।

इस हिस्से में शितिज के पलायन, अपराधबोध और अपने पुराने घर लौटने की भावनात्मक बेचैनी को थोड़ा और गहरा किया है, ताकि अगले अध्याय में उसके अतीत और वर्तमान को जोड़ा जा सके।

मैंने अपना पुराना बैग निकाला और उसमें पहनने के लिए कुछ कपड़े और जरूरत का थोड़ा-बहुत सामान रख लिया।

मेरे हाथ काँप रहे थे।

बार-बार मन में यही डर उठ रहा था कि कहीं कोई मुझे देख न ले।

मैं रात के और गहराने का इंतज़ार करने लगा।

घड़ी में करीब चार बज रहे थे, जब मैंने आखिरकार हिम्मत की।

दरवाज़ा धीरे से खोला और दबे पाँव बंगले के पीछे वाले गेट की तरफ बढ़ गया। चारों तरफ सन्नाटा था। गार्ड की नजरों से बचते हुए मैं किसी तरह बाहर निकल आया।

बाहर सड़क पर एक टैक्सी मिल गई।

मैं तुरंत उसमें बैठ गया।

“स्टेशन चलोगे?”

ड्राइवर ने सिर हिलाया और गाड़ी आगे बढ़ा दी।

गाड़ी के शीशे से पीछे छूटते बंगले को मैं आखिरी बार देख रहा था।

वही बंगला, जहाँ कुछ दिन पहले तक मुझे अपना भविष्य दिखाई देता था।

और आज…

मैं वहाँ से एक अपराधी की तरह भाग रहा था।

पूरे रास्ते मेरे दिमाग में एक ही सवाल घूमता रहा—

आखिर मेरे साथ ये सब क्यों हुआ?

क्या ये मेरे लालच की सज़ा थी?

शायद हाँ।

मैंने दौलत के सपने देखे थे। मैंने बिना कुछ सोचे ठाकुर साहब पर भरोसा कर लिया था। मुझे लगा था कि मेरी जिंदगी बदल रही है।

लेकिन जिंदगी बदलने और जिंदगी बर्बाद होने के बीच कितना छोटा-सा फर्क होता है, ये अब समझ आ रहा था।

मैं अंदर से बुरी तरह घबरा चुका था।

बार-बार कश्यप का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता।

खून से सना उसका चेहरा…

उसकी डरी हुई आँखें…

और ठाकुर साहब के हाथ में उठी हुई पिस्तौल।

कई बार तो मुझे ऐसा लगने लगता कि जैसे सच में कश्यप को मैंने ही मारा हो।

मैं आँखें बंद कर लेता।

लेकिन वो दृश्य पीछा नहीं छोड़ता।

मैं सोच भी नहीं पा रहा था कि ठाकुर साहब मेरे इस तरह छोड़कर चले जाने के बारे में क्या सोच रहे होंगे।

क्या उन्हें मेरे भागने का पता चल गया होगा?

क्या वो मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई करेंगे?

क्या वो मुझे ढूँढने के लिए अपने आदमियों को भेजेंगे?

इन सवालों ने मुझे अंदर तक हिला दिया था।

लेकिन फिलहाल मैं इनके बारे में सोचना नहीं चाहता था।

मुझे बस वहाँ से दूर जाना था।

कुछ देर बाद टैक्सी अचानक रुक गई।

“साहब, स्टेशन आ गया।”

मैंने चौंककर बाहर देखा।

मैं स्टेशन पहुँच चुका था।

टैक्सी का किराया चुकाकर मैं अपना बैग उठाए टिकट काउंटर की तरफ बढ़ गया।

काउंटर के सामने खड़े होकर मैं कुछ पल सोचता रहा।

न जाने क्यों…

मेरे मुँह से अचानक मेरे अपने शहर का नाम निकल गया।

मैंने अपने शहर की टिकट बुक कर ली।

टिकट हाथ में आते ही मेरे अंदर एक अजीब-सी बेचैनी हुई।

मैं प्लेटफॉर्म पर जाकर एक बेंच पर बैठ गया।

और तभी…

बहुत दिनों बाद नहीं…

सालों बाद मुझे नानी के घर की याद आई।

पता ही नहीं चला कितने साल गुजर चुके थे।

नानी कैसी होंगी?

घर में अब कौन-कौन होगा?

क्या कोई मुझे पहचान भी पाएगा?

और अगर पहचान लिया…

तो मैं उनसे क्या कहूँगा?

कि मैं कहाँ था?

किस जिंदगी में चला गया था?

और अब अचानक वापस क्यों लौट आया?

मेरा दिमाग लगातार मुझसे सवाल कर रहा था।

मैंने अपना सिर पीछे टिकाया और आँखें बंद कर लीं।

इतने सालों में मैंने अपने उस पुराने घर को शायद यादों में ही कहीं दबा दिया था।

लेकिन आज…

जब मेरे पास लौटने के लिए दुनिया में कुछ नहीं बचा था…

तो वही पुराना घर मुझे अपना आखिरी सहारा लग रहा था।

दूर कहीं ट्रेन के आने की आवाज़ सुनाई दी।

मैंने आँखें खोलीं।

प्लेटफॉर्म पर हलचल बढ़ने लगी थी।

मैंने अपना बैग कसकर पकड़ लिया।

कुछ ही देर में मेरी ट्रेन सामने आकर रुक गई।

मैं धीरे-धीरे उठा।

ट्रेन में चढ़ते हुए मैंने आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा।

मेरी पुरानी जिंदगी पीछे छूट रही थी।

और सामने…

एक ऐसी जिंदगी मेरा इंतज़ार कर रही थी, जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था कि वो मुझे कहाँ ले जाएगी।

मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।

ट्रेन चल पड़ी।

मैंने खिड़की से बाहर देखा।

शहर की रोशनियाँ धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही थीं।

और मेरे मन में सिर्फ एक बात थी—

काश नानी का घर मुझे वैसे ही अपना ले, जैसे कभी मेरा हुआ करता था।