एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - ८
लेखिका "अनामिका"
°निहारिका का नज़रिया
मौसम में आज एक अलग ही मिठास थी। कॉलेज जाने के रास्ते पर निहारिका के कदम ज़मीन पर कम और हवा में ज़्यादा महसूस हो रहे थे। पहले प्यार का नया-नया अहसास इंसान को बिना बात मुस्कुराने पर मजबूर कर ही देता है। वह मन ही मन मलय की पुरानी बातों, उन छोटे-छोटे कॉल्स और देर रात तक चले मैसेजेस के बारे में सोचकर खिलखिला रही थी।
तभी बाज़ार के मोड़ पर उसकी नज़र ठिठक गई। सामने भीड़ के बीच वही खड़ा था, लेकिन अकेला नहीं। उसके साथ एक लड़की थी। वह दोनों बहुत करीब खड़े थे, खिलखिलाकर बातें कर रहे थे और उनके बीच की बेतकल्लुफ़ी साफ़ झलक रही थी। निहारिका के सीने में एक अनजाना-सा दर्द उठा। इससे पहले कि वह खुद को संभाल पाती, उसने देखा कि वह लड़की बड़े आराम से उसकी बाइक पर पीछे बैठ गई और वे दोनों मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए। रास्ते का सारा रंग जैसे एक पल में धुंधला हो गया।
°मलय का नज़रिया
दूसरी तरफ, सुबह से ही मलय का मन भी किसी अनजाने सुर में गा रहा था। वह अपनी बाइक से ऑफिस की तरफ निकला ही था कि उसे सड़क किनारे उसकी ऑफिस कलीग दिख गई, जो वहीं आसपास ही रहती थी।
मलय ने बाइक रोककर पूछा, "अरे! तुम यहाँ क्या कर रही हो, ऑफिस नहीं जाना क्या?"
"हाँ, बस ऑफिस के लिए ही निकल रही थी, बस स्टॉप की तरफ जा रही थी," कलीग ने जवाब दिया और मलय का खुशमिज़ाज चेहरा देखकर बोली, "वैसे आज तुम बहुत खुश लग रहे हो, क्या बात है?"
"बस, कुछ बातें खास हैं," मलय ने हंसते हुए कहा। फिर बेफ़िक्री में खुद ही ऑफर करते हुए बोला, "बस से क्यों जाओगी, आओ बैठो, साथ ही ऑफिस चलते हैं।"
उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि बिना किसी गलत इरादे के उठाया गया उसका यह एक छोटा-सा कदम, किसी का दिल भारी कर चुका था।
°निहारिका का नज़रिया
बाज़ार का वह नज़ारा देखते ही निहारिका की जैसे पूरी दुनिया थम सी गई थी। कॉलेज पहुँचकर भी उसका मन किसी क्लास में नहीं लग रहा था। दिल भारी था, इसलिए वह जल्दी ही घर लौट आई और गुमसुम अपने कमरे में बैठ गई।
उसका दिल बुरी तरह टूट चुका था, पर उससे भी ज़्यादा तकलीफ उस उलझन से थी जो उसके दिमाग में बार-बार उठ रही थी। ‘अगर उसकी ज़िंदगी में पहले से ही कोई थी, तो वह मुझसे इस तरह बात क्यों कर रहा था? और अगर वह सिर्फ़ कोई दोस्त थी, तो फिर छुपाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?’
वह चाहकर भी सोचना बंद नहीं कर पा रही थी। एक तरफ़ सच जानने की बेचैनी थी, तो दूसरी तरफ़ सच से सामना होने का डर।
स्क्रीन पर मलय के कॉल्स और मैसेजेस एक के बाद एक आ रहे थे। फ़ोन की वाइब्रेशन पूरे कमरे के सन्नाटे में गूँज रही थी, पर उसमें हिम्मत ही नहीं थी कि वह उसे उठाकर बात कर सके। वह बस स्क्रीन की जलती-बुझती रोशनी को चुपचाप देखती रही—जानते हुए भी कि जवाब देना होगा, वह फिलहाल उस सच से भाग रही थी।
°मलय का नज़रिया
दूसरी तरफ, मलय अपने पहले प्यार के खुमार में डूबा हुआ ऑफिस में बेहद खुश था। उसकी खिलखिलाहट देखकर सहकर्मी भी अंदाज़ा लगा रहे थे कि दाल में कुछ काला है।
लंच ब्रेक होते ही मलय ने निहारिका को कॉल किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने मैसेज छोड़ा, पर वहाँ से भी सन्नाटा ही रहा। मलय ने सोचा कि वह कॉलेज में दोस्तों के साथ बिजी होगी, इसलिए उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
लेकिन जब शाम को घर लौटने के बाद भी निहारिका ने न तो कोई कॉल उठाया और न ही मैसेज का रिप्लाई दिया, तब मलय के मन में घबराहट होने लगी—‘आखिर दिन भर से बात क्यों नहीं हुई? सब ठीक तो है न?’
अनसुलझी घबराहट और एक कोशिश :
°निहारिका का नज़रिया
पहली बार दिल टूटने का दर्द क्या होता है, निहारिका आज अंदर ही अंदर गहराई से महसूस कर रही थी। उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था और वह खुद को कमरे में बंद किए उदास बैठी थी।
जब कॉलेज जाने का वक्त हुआ, तो माँ ने कमरे में आकर पूछा, "बेटा, आज कॉलेज नहीं जा रही?" निहारिका ने नजरें चुराते हुए तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया। वह घर से बाहर ही नहीं निकली और पूरा दिन यूँ ही भारी मन से बीत गया।
°मलय का नज़रिया
दूसरी तरफ, मलय की हालत बिगड़ती जा रही थी। अगली सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते वक्त भी उसका सारा ध्यान फोन की स्क्रीन पर ही था। लगातार दो दिन से कोई बात न होने की वजह से उसका डर और घबराहट चरम पर पहुँच चुके थे—‘अचानक क्या हो गया? तबीयत ठीक है या घर पर कोई बात हो गई?’ जब कॉल्स और मैसेजेस का कोई जवाब नहीं मिला, तो मलय ने हिम्मत जुटाई। उसने तय किया कि वह इस सन्नाटे को ऐसे ही नहीं रहने देगा। वह सुबह-सुबह उसी रास्ते पर जाकर खड़ा हो गया, जहाँ से निहारिका रोज़ कॉलेज के लिए गुज़रती थी।
कुछ दिनों बाद जब निहारिका हिम्मत जुटाकर कॉलेज के लिए निकली, तो रास्ते में मलय को देखकर उसके कदम ठिठक गए। मलय अपनी बाइक किनारे खड़ी किए हाथ में ऑफिस बैग लिए इंतज़ार कर रहा था। निहारिका घबराकर सोचने लगी कि आगे बढ़े या नहीं, तभी मलय की नज़र उस पर पड़ गई। वह तुरंत आगे आया और घबराते हुए ढेर सारे सवाल पूछने लगा, "क्या हुआ? तुम ठीक तो हो? न कॉलेज जा रही हो, न कॉल-मैसेज उठा रही हो?" निहारिका ने बस इतना कहा, "कुछ नहीं, बस तबीयत ठीक नहीं थी।"
मलय उसकी इस अजनबी सी बेरुखी से उलझन में था ही कि तभी वही लड़की आ पहुँची, जिसे निहारिका ने उस दिन देखा था। उसने मलय के पास आकर सहज अंदाज़ में पूछा, "अरे! तुम यहाँ क्या कर रहे हो, ऑफिस नहीं जाना? और यह कौन है?"
उस लड़की की बेफ़िक्र मौजूदगी और मलय के साथ उसकी नज़दीकी निहारिका को अंदर ही अंदर चुभ गई। उसे लगा जैसे वह उन दोनों के बीच कोई तीसरी इंसान है।
खुद को संभालते हुए उसने कहा, "अच्छा, आप लोग बात कीजिए, मैं चलती हूँ।"
वह जैसे ही जाने के लिए मुड़ी, मलय ने फौरन उसका रास्ता रोक लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी। मलय ने निहारिका की आँखों में देखते हुए पूछा, "क्या हुआ निहारिका? तुम अचानक ऐसे क्यों रिएक्ट कर रही हो?"
तभी उस लड़की ने मलय की तरफ देखकर कहा, "चलो भी मलय, देर हो रही है।"
उसकी उस बेफिक्र आवाज़ और सहजता ने निहारिका के मन में शक की जगह पक्की कर दी। निहारिका को लगा कि मलय उससे कुछ छिपा रहा है, जबकि वह बेखबर थी कि वह लड़की सिर्फ मलय की एक अच्छी दोस्त और सहकर्मी है।
आठवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....