एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - १०
लेखिका "अनामिका"
अगले दिन जब वे दोनों कैफ़े के बाहर टहल रहे थे, मलय बोला, "कल रात घर पर तुम्हारी बात हो रही थी।"
निहारिका ने हैरान होकर पूछा, "मेरी बात?"
"हाँ, माँ तुम्हें याद कर रही थीं। बोल रही थीं कि तुम उन्हें बहुत जानी-पहचानी सी..."
मलय अपनी बात पूरी कर पाता, उससे पहले ही पीछे से एक कड़क आवाज़ आई, "तुम यहाँ इसके साथ क्या कर रही हो?!"
दोनों ने घबराकर पीछे मुड़कर देखा तो निहारिका की माँ गुस्से में खड़ी थीं। वे चिल्लाते हुए बोलीं, "तुम घर से पढ़ाई का बहाना बनाकर निकलती हो और यहाँ यह सब चल रहा है? कौन है यह लड़का?"
वे अभी डांट ही रही थीं कि पास के बाज़ार में मौजूद मलय की माँ भी वहाँ पहुँच गईं। उन्होंने आगे आकर कहा, "आप हैं कौन? और मेरे बेटे को इस तरह उल्टा-सीधा क्यों बोल रही हैं?"
जैसे ही निहारिका की माँ पीछे मुड़ीं, दोनों औरतें एक-दूसरे का चेहरा देखते ही दंग रह गईं। पल भर में उनका गुस्सा गायब हो गया और चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई—वे दोनों एक दूसरे को गले से लगा बैठी। ये देख कर मलय और निहारिका पुरी तरहा हैरान हो गये।
कुछ पल बाद...
कैफे के अंदर का माहौल शांत और खुशनुमा है। चारों टेबल पर बैठे गरम कॉफी की चुस्कियां ले रहे हैं।
मलय की माँ: (कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए मुस्कुराकर) "सच में, इतने सालों बाद तुमसे मिलकर पुरानी सारी यादें ताजा हो गईं। मुझे तो पहले लगा कि कौन है जो मेरे बेटे से ऐसे बदतमीजी से बात कर रहा है!"
निहारिका की माँ: (हंसते हुए) "अरे मत पूछो! जब मैंने निहारिका को किसी लड़के के साथ देखा, तो मैं तो घबरा ही गई थी। कितना गुस्सा आ रहा था कि पता नहीं कौन सा लड़का है! पर अब जब पता चला कि वो तुम्हारा मलय है, तब जाके दिल को तसल्ली मिली।"
मलय की माँ: (यादों में खोते हुए) "हाँ यार, सच में कितने साल हो गए। याद है हम उस शादी में मिले थे? वही तो हमारी आख़िरी मुलाकात थी, उसके बाद तो कभी बात करने का मौका ही नहीं मिला!"
निहारिका की माँ: "हाँ सच में, कितना वक़्त बीत गया ना! और तुम्हारा बेटा... उस शादी में देखा था तब तो कितना छोटा लगता था कॉलेज जाने बाला था सायद। अब देखो कितना ज़िम्मेदार और मैच्योर लग रहा है!"
मलय की माँ: "अरे, तुम्हारी निहारिका भी तो तब कितनी छोटी सी थी! जब देखा था तब शायद सातवीं क्लास में ही थी ना? और अब देखो, कितनी बड़ी और प्यारी हो गई है।"
(दोनों की बातें सुनकर निहारिका और मलय एक-दूसरे की तरफ़ देखते हैं। दोनों के दिमाग में अचानक एक ही ख़्याल आता है—'कहीं ये उसी शादी की बात तो नहीं कर रहे?' और देखते ही देखते, दोनों उस पहली मुलाकात की पुरानी यादों में खो जाते हैं...)
मलय की माँ: (अचानक चहकते हुए) "अरे हाँ! मुझे अचानक याद आया... तुम्हें याद है उस शादी में इन दोनों को साथ देखकर हम दोनों ने क्या कहा था? 'ये दोनों साथ में कितने प्यारे लग रहे हैं! अगर बड़े होकर मौका मिला, तो इन दोनों की शादी ज़रूर करवाएँगे।'"
निहारिका की माँ: (हँसते हुए यादों में खोकर) "हाँ! तुम भी न, क्या-क्या बातें याद रखती हो! सही कह रही हो, उस दिन हम दोनों ने मज़ाक-मज़ाक में ही सही, पर कहा तो यही था कि अगर सब ठीक रहा तो..."
मलय: (अचानक बीच में ही बोल पड़ता है) "अब सिर्फ़ पुरानी बातें क्यों कर रही हैं आप लोग? मैं तो निहारिका को अभी भी पसंद करता हूँ!"
(मलय की बात सुनते ही कैफे में अचानक सन्नाटा छा जाता है। दोनो की मायें और निहारिका—तीनों पूरी तरह से शॉक हो जाती हैं।)
(निहारिका की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। वह मन ही मन तो मलय को पसंद करती ही थी, और उसे यह भी मालूम था कि मलय के दिल में भी उसके लिए कुछ है। लेकिन उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ़ टांग खिंचाई और मस्ती-मज़ाक ही हुआ था, कभी ऐसी कोई संजीदा या प्यार भरी बात नहीं हुई थी। ऊपर से अचानक माताओं के सामने मलय का यह बेबाक इक़रार! निहारिका को समझ ही नहीं आता कि वो मुस्कुराए, शर्माए या हैरान हो... वह बस गुमसुम चुपचाप बैठी रहती है।)
(वहीं दूसरी तरफ़, जैसे ही मलय के मुँह से ये शब्द निकलते हैं, उसका अपना दिमाग़ भी ठनक जाता है। वह मन ही मन घबराकर सोचता है—'शिट यार! ये मैंने क्या बोल दिया और वो भी यहाँ, आंटी और मम्मी के सामने!')
कैफे के उस असहज सन्नाटे को अचानक मलय के फोन की रिंगटोन ने तोड़ दिया। हड़बड़ाहट में उसने जेब से फोन निकाला, तो स्क्रीन पर उसके बॉस का नाम चमक रहा था।
बॉस की सख्त आवाज़ आई, "मलय, कल सुबह की मीटिंग के लिए वो अर्जेंट फाइल तुरंत रेडी करो। तुम्हें वो फाइल ढूंढकर कल सुबह हर हाल में साथ लानी है!"
यह फोन कॉल मलय के लिए किसी जीवनदान से कम नहीं था। उसे इस भारी माहौल और अपनी ही बात के सन्नाटे से भागने का एक बेहतरीन बहाना मिल गया था। उसने काम का हवाला दिया, जिसके बाद चारों ने जाने की इजाजत ली और मलय, उसकी माँ, निहारिका और उसकी माँ अपने-अपने घर के लिए निकल पड़े।
घर के लिए निकल तो गया, पर मलय के दिमाग में वही सब बातें घूम रही थीं कि उसने यह क्या बोल दिया! अब निहारिका उसके बारे में क्या सोच रही होगी? यही सब सोच-सोचकर वह पूरे रास्ते परेशान होता रहा।
दसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....