A Simple Love Story - 9 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | एक आम सी प्रेम कहानी - 9

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एक आम सी प्रेम कहानी - 9

एक आम सी प्रेम कहानी 
भाग - ९
लेखिका "अनामिका"
गलतफहमी का अंत :
​मलय के रोकने पर जैसे ही निहारिका मुड़ी, उस लड़की ने मलय से पूछा, "क्या हुआ? कहीं यह वही तो नहीं, जिसके बारे में सोचते हुए तुम आजकल ऑफिस में इतने खुश रहते हो?"
​निहारिका ने यह सुनकर अनजान बनने का नाटक किया और कहा, "क्या? क्या हुआ?"
​मलय ने बात संभालते हुए कहा, "कुछ नहीं... यह मेरी ऑफिस कलीग है। यहाँ पास में ही रहती है और रोज़ अपने बॉयफ्रेंड के साथ ऑफिस जाती है। कभी बॉयफ्रेंड व्यस्त हो, तो मैं लिफ्ट दे देता हूँ। ये कुछ भी बोलती रहती हे इसके बातों पर ज्यादा ध्यान मत दो।"
​यह सुनते ही निहारिका का दिल हल्का हो गया। वह अपनी ही बेतुकी ओवरथिंकिंग पर मन ही मन हँस पड़ी।
​मलय ने पूछा, "क्या हुआ? तुम मुस्कुरा क्यों रही हो?"
​निहारिका ने बात संभालते हुए कहा, "कुछ नहीं! आपके हाथ में फाइल्स हैं, आपको देर हो रही होगी। आप दोनों ऑफिस जाइए, मुझे भी कॉलेज में असाइनमेंट जमा करना है।"
​वह जाने लगी, तो मलय ने टोका, "अरे रुको, सुनो तो!"
​निहारिका ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं शाम को कॉल करूंगी, तब बात करते हैं।" यह कहकर वह आगे बढ़ गई और मलय भी राहत की सांस लेकर अपनी कलीग के साथ ऑफिस के लिए निकल गया।
​पूरा दिन निहारिका अपनी बेतुकी गलतफहमियों और बुने हुए ख्याली पुलावों पर सोच-सोचकर खुद पर ही हंसती रही। उसका दिल पूरी तरह हल्का हो चुका था।
​दूसरी तरफ, मलय का पूरा दिन अजीब सी उधेड़बुन में बीता। निहारिका का दो दिनों तक गायब रहना और फिर अचानक यूं सामान्य बनकर बात टाल देना उसे समझ नहीं आ रहा था। वह उसके इस बदलते बर्ताव को लेकर पूरे दिन परेशान रहा।
रात को खाने के बाद मलय जैसे ही अपने कमरे में गया, अचानक उसका फोन बज उठा। उसने हड़बड़ाहट में कॉल उठाया।
​दूसरी तरफ निहारिका थी, जो उसे छेड़ते हुए बोली, "क्या बात है, बड़े हड़बड़ा रहे हैं? लगता है मेरी कॉल का ही बेसब्री से इंतज़ार हो रहा था... काफी मिस किया लगता हे?"
​मलय ने भी बात संभालते हुए कहा, "हाहा, मिस तो करूँगा ही ना! दो दिन से कोई मिला ही नहीं था जिसकी टांग खींच सकूं। वैसे तुम तो बड़े आराम से रही होगी, कोई परेशान करने वाला जो नहीं था!"
​फिर मलय ने थोड़ा गंभीर होकर पूछा, "वैसे सच-सच बताओ, दो दिन से बात क्यों नहीं कर रही थी?"
​निहारिका थोड़ा झिझकते हुए घबराहट में बोली, "अरे सच में... बताया तो था, तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी। पर अब बिल्कुल ठीक हूँ।"
​इसके बाद दोनों के बीच की झिझक मिट गई। उनके बीच वही पुरानी छोटी-छोटी बातें, प्यारी नोकझोंक और हंसी-मजाक का दौर फिर से शुरू हो गया।
ऐसे ही कुछ दिन हँसी-ख़ुशी बीत गए।
​एक दिन मलय अपनी माँ के साथ मॉल में शॉपिंग कर रहा था। माँ कपड़ों को लेकर उससे राय माँगी जा रही थीं, लेकिन मलय का ध्यान तो कहीं और ही था और वह बस बेमन से "हाँ-हाँ" में जवाब दिए जा रहा था।
​तभी हड़बड़ाहट में एक लड़की सीधे मलय से टकरा गई और उसके हाथ से सारा सामान ज़मीन पर बिखर गया। सामान उठाने के लिए जब दोनों नीचे झुके और नज़रें मिलीं, तो दोनों हैरान रह गए। सामने निहारिका खड़ी थी। दोनों मन ही मन सोचने लगे—'यह यहाँ इस वक्त कैसे?'
​उतने में ही माँ पीछे मुड़ीं और दोनों को यूँ साथ देखकर त्योरियां चढ़ाकर बोलीं, "यह क्या चल रहा है? कौन है यह लड़की?"
​मलय ने घबराकर हड़बड़ाहट में कहा, "माँ... यह मेरी दोस्त है, निहारिका..."
​माँ ने भवें सिकोड़ते हुए निहारिका को सर से लेकर पांव तक देखा। निहारिका ने झट से हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते किया। निहारिका की सादगी, ख़ूबसूरती और सरल स्वभाव को देखकर माँ का गुस्सा पल भर में गायब हो गया।
​उन्होंने प्यार से पूछा, "तुम यहाँ अकेली आई हो या किसी के साथ? और क्या करती हो?"
​निहारिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "नमस्ते आंटी! मैं अकेली ही आई हूँ। कॉलेज के बाद कुछ ज़रूरी सामान लेना था, तो बस यहाँ आ गई।"
​कुछ औपचारिक और मीठी बातों के बाद निहारिका उनसे विदा लेकर अपने घर निकल गई, और मलय भी अपनी माँ के साथ घर की ओर रवाना हो गया।
घर पहुँचते ही माँ ने चाबी टेबल पर रखी और मुस्कुराते हुए बोलीं, "मुझे तो वो लड़की बहुत पसंद आई। सच-सच बता, क्या वो सिर्फ़ तेरी दोस्त ही है?"
​मलय थोड़ा शर्माया और घबराते हुए बोला, "माँ! तुम भी न... कुछ भी बोलने लगती हो!" यह कहकर वह सीधे अपने कमरे में चला गया।
​थोड़ी देर बाद मलय ने निहारिका को कॉल किया। बातें करते-करते मलय बोला, "मेरी माँ थोड़ा ज़्यादा बातें करती हैं... अगर तुम्हें उनकी किसी बात का बुरा लगा हो, तो आई एम सॉरी।"
​निहारिका हँसते हुए बोली, "अरे नहीं-नहीं! आंटी तो बहुत प्यारी हैं।" फिर उसने थोड़े नटखट अंदाज़ में पूछा, "वैसे... आपने आंटी से कहा कि मैं आपकी दोस्त हूँ? अच्छा! तो हम दोस्त कब बने?"
​मलय भी उसका मिज़ाज समझ गया और टांग खींचते हुए बोला, "क्यों? क्या हम दोस्त नहीं हैं? और क्या अब मुझे तुमसे दोस्ती करने के लिए भी कोई स्पेशल फॉर्म भरना पड़ेगा?"
​निहारिका ने चुलबुले अंदाज़ में जवाब दिया, "हाँ! और ज़्यादा होशियारी दिखाई न, तो फॉर्म रिजेक्ट भी हो सकता है!"
​दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़े और उनके बीच वही मीठी नोकझोंक फिर से शुरू हो गई।
ऐसे ही कुछ दिन और बीत गए।
​एक शाम डिनर टेबल पर मलय, उसके पापा और माँ साथ बैठकर खाना खा रहे थे। तभी माँ अचानक बोलीं, "अरे हाँ मलय, वो तुम्हारी दोस्त... क्या नाम था उसका? निहारिका! वो अब कैसी है? बात होती है उससे?"
​मलय ने खाना खाते हुए कहा, "हाँ, वो ठीक है। पढ़ाई चल रही है उसकी... कभी-कभार बात हो जाती है। पर अचानक आपको उसकी याद क्यों आई?"
​माँ मुस्कुराते हुए बोलीं, "कुछ नहीं, बस जब से उससे मिली हूँ, मुझे वो बहुत जानी-पहचानी सी लग रही है। उसका चेहरा मेरी बचपन की एक सहेली से बहुत मिलता है।"
​यह सुनकर पापा हँस पड़े और बोले, "तुम्हें तो दुनिया का हर इंसान जाना-पहचाना ही लगता है!"
​माँ ने तुरंत टोकते हुए कहा, "अरे, मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ! सच में मुझे ऐसा ही लग रहा है।"
तीनों के बीच ऐसे ही हल्की-फुल्की बातें होती रहीं और डिनर का माहौल खुशनुमा बना रहा। लेकिन मलय के दिमाग में माँ की बात घूम रही थी कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि वो निहारिका को जानती हैं l 
नौवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....