Ghungroos - 10 in Hindi Horror Stories by Shree Kriti books and stories PDF | घुँघरू - 10

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घुँघरू - 10

उन पलों में स्वप्निल सब भूल गया ... श्राप ... शंखचूड़नी ....... तभी लागातार बजते मोबाइल के रिंग ने जैसे उसे वापस खींच कर हकीकत की दुनिया में ला खड़ा किया था। उसके डैडी का कॉल था, डैडी ने उसे तुरन्त पैलेस वापस बुलाया था। स्वप्निल घबरा उठा, भ‌ई ऐसी क्या आफत आ ग‌ई अब पैलेस में ! स्वप्निल को यूँ घबराया देख शर्लिन ने पूछा, 
" स्वप्निल ! इज एवरीथिंग ऑलराइट ? "

स्वप्निल कुछ लम्हा जैसे एक हसीन ख़्वाब में खोया हुआ था, छन्न से जैसे ये ख्वाब टूटा, बदसूरत हकीकत सामने मुंह बाये खड़ा था ... आवाज को रूखा करते हुए वो बोला, 
" आइ डोन्ट थिंक सो ! "

शर्लिन स्वप्निल के आवाज में अनायास आई इस रुखाई पर चौंक उठी, 
" क्या हुआ ? "

" अभी बताने का वक्त नहीं है। "

" कहाँ जा रहे हो? "

" पैलेस, डैड ने मुझे बुलाया है, जाना होगा। "

स्वप्निल की रुखाई से शर्लिन बेहद आहत हो गई, रुंधे गले से पूछा, 
" स्वप्निल व्हाई यू पुश मी अवे ? "

" आई'म नॉट पुशिंग यू अवे, आई'म प्रोटेक्टिंग यू ...अगर समझ सको तो समझो । "

इतना कहकर स्वप्निल तेजी से कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल गया ... पीछे छोड़ गया गुमसुम - हताश शर्लिन को। घर पहुँच कर स्वप्निल ने देखा कि उसके डैडी लगभग अपने ही उम्र के एक शख़्स से बैठे बातें कर रहे थे। यूँ तो सब नॉर्मल दिखाई दे रहा था पर उसके डैडी के साथ बैठा शख़्स कोई आम आदमी नहीं था ... कुछ तो खास था उस शख़्स में। गौतम देव रॉय स्वप्निल का परिचय उस शख़्स से करवाया, 
" बेटा ! इनसे मिलो, ये हैं मेरे खास दोस्त डॉ. कृष्ण कुमार पार्थसारथी ! "

स्वप्निल आश्चर्य से भर गया क्योंकि आजतक अपने डैडी के किसी दोस्त से नहीं मिला था ... उनके कोई दोस्त थे ही नहीं। स्वप्निल के चेहरे पर आते जाते भावों को शायद पार्थसारथी ने पढ़ लिया इसलिए उसकी हाथ बढ़ाते हुए बोले, 
" तुम्हारी मम्मा अलका मेरी ममेरी बहन थी, सो कॉल मी मामा ! "

स्वप्निल मुस्कुराया और आगे बढ़ के  डॉ. पार्थसारथी के पांव छू लिए। 

"  के.के एक साइकेट्रिस्ट है, पैरासाइकोलॉजी का एक्सपर्ट है। इतने सालों से यह अमेरिका में था, इंडिया वापस ये सिर्फ हमारी मदद करने के लिए आया है। "

स्वप्निल को बात अब समझ में आई, उसके डैडी डॉ. पार्थसारथी के जरिए उसकी मदद करना चाहते थे ... यह मौका भी एकदम माकूल था, उसके दादा जी कनाडा गए हुए थे यानि नो इंटरप्शन। शायद वो यह नहीं चाहते थे कि जो  उनके साथ हुआ वो उनके बेटे के साथ दोहराया जाये। तभी डॉ. पार्थसारथी ने कहा, 
" स्वप्निल मुझे सब पता है... आंखों से सब देखा था, तब मैं गौतम और खासकर अलका की मदद नहीं कर सका था मगर इस बार वो सब तुम्हारे साथ नहीं होगा। " 

" मगर मेरी मदद तभी होगी जब ये श्राप टूटेगा और घुँघरू की रूह आजाद हो जायेगी। इस श्राप के कारण ही घुँघरू प्रेत योनि में  इतने सालों से भटक रही है। घुँघरू की मुक्ति ही इस मुश्किल का हल है। "

स्वप्निल की बात को काटते हुए डॉ. पार्थसारथी बोले, 
" हूंहहह ! तो तुम घुँघरू की मुक्ति चाहते हो मगर इस श्राप से घुँघरू यानि शंखचूड़नी बंधी हुई है, वह खुद ऐसा होने नहीं देगी, अगर देखा जाये तो। "

" कोई तो रास्ता होगा ? "

" एक रास्ता है पर मैं बता दूँ, यह खतरनाक है ... बहुत खतरनाक। क्या ये खतरा तुम उठाने के लिए तैयार हो? "

" शी'इज इन पेन मामा ... लॉट्स ऑफ़ पेन ! मुझे ये खतरा तो उठाना ही होगा। "

स्वप्निल की बातें सुनकर डॉ. पार्थसारथी बहुत ही ध्यान से उसे देखने लगे कि तभी गौतम देव रॉय गुस्से से चिल्लाये, 
"  के.के तुम्हें मैंने अपने बेटे की हिफाज़त के मकसद से यहाँ बुलाया था मगर तुम तो उस के ही जान को दांव पर लगाने पर तुले हो ... नहीं, ऐसा मैं कुछ नहीं होने दूंगा। "

" तुम शायद भूल गए गौतम पर मुझे याद है, जब स्वप्निल का जन्म हुआ था तो कुछ दिनों बाद अचानक से एक योगी यहाँ... इस पैलेस में आये थे। उन्होंने सिर्फ इसे आर्शीवाद नहीं दिया, इसके बारे में एक भविष्यवाणी भी की थी ... याद है, 
' जन्म से तो है क्षत्रिय यह बालक परन्तु आत्मा में है ओज एक सतचित - तेजस्वी ब्राह्मण की, 
वर्षों पूर्व प्रारंभ हुई जो श्राप की गाथा, घड़ी अब आयेगी उसके समापन की ।
स्पर्श मात्र से ही सदियों से धधकती ज्वाला हो जायेगी शीतल, 
अंततोगत्वा स्वयं बता देगी वो मार्ग अपने तर्पण की ।।। '

गौतम देव रॉय हकबकाये से डॉ. पार्थसारथी का मुंह देखने लगे मगर डॉ. पार्थसारथी ने अपनी बात जारी रखी, 
" तुम उस भविष्यवाणी को तब भी नहीं समझ पाये थे, अब भी समझ नहीं पाये हो। याद करो जरा, मैं अक्सर तुमसे स्वप्निल के बारे में हर एक बात पूछा करता था। वो इसलिए गौतम क्योंकि मैं ये पक्का कर लेना चाहता था कि भविष्यवाणी का जो अर्थ मैंने समझा है, वो सच है या नहीं। 
मैं अंततः इस निर्णय पर पहुँचा कि मैं बिल्कुल सही सोच रहा था ... अब स्वप्निल से मिलने के बाद तो मैं हंड्रेड परसेंट श्योर हो गया हूं ... सतचित - तेजस्वी ब्राह्मण यानि आचार्य चैतन्य...... !!! "

अब तक हतप्रभ - खामोश खड़ा स्वप्निल चकित नजरों से कभी अपने डैडी तो कभी डॉ. पार्थसारथी को देखते हुए बोला, 
" यह असंभव है !!! "

" यही सच है । "

" मुझे इस बारे में कभी किसी ने कुछ नहीं बताया। क्या आप मुझे इस बारे में डिटेल में बतायेंगे प्लीज? "

गौतम देव रॉय डर से भरी नजरों से डॉ. पार्थसारथी को देखते हुए इनकार में सिर हिलाया मगर डॉ. पार्थसारथी ने इस की बिल्कुल परवाह नहीं की ... उन्होंने स्वप्निल की ओर देखते हुए जवाब दिया, 
" तुम्हारे जन्म के ठीक इक्कीस दिन बाद इस पैलेस में यकायक एक वृद्ध योगी आये ... लगभग अस्सी वर्ष की उम्र, सिर पर जटा, तमाम बदन पर भस्म, हाथों में त्रिशूल ... तापसी रूप महादेव की तरह दिखाई पड़ते थे। भाग्य से उस समय मैं भी पैलेस में मौजूद था। हम सब सन्न खड़े उनको देख रहे थें जिन्होंने कड़क कर आवाज दी और यह भविष्यवाणी की। आवाज ऐसी जोरदार थी कि सब के कलेजे दहल उठे और फिर वो जैसे यकायक आये थे वैसे ही जाने कहाँ लुप्त हो गये। "

इतना कहके डॉ. पार्थसारथी ने जोर की सांस ली ... उन वृद्ध योगी के बारे में सुनके ही स्वप्निल के रोंगटे खड़े हो गए थे, वह धीरे से बोला, 
" आई'म गेटिंग गूज़बंप्स ! "

" सोचो जरा, हमारा क्या हाल हुआ होगा पर इसके अलावा श्राप वाली बात मेरे मन में अटक गई, इस मूर्ख गौतम ने राजा साहब के बातों में आके कभी हमें श्राप वाली बात बताई ही नहीं ... अलका को भी नहीं। आखिरकार बहुत पूछने पर इसने सारा किस्सा जब मुझे बताया तो मुझे अलका की चिंता होने लगी पर समय तब तक हाथ से निकल चुका था। अलका की तबियत आये दिन बिगड़ जाती और एक दिन ..... ! "

डॉ. पार्थसारथी कहते - कहते एकदम से चुप हो गए, जैसे अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश कर रहे हों । पर स्वप्निल के डैडी ने अपने आंसुओं को छुपाने की कोशिश नहीं की, सिसकियां भरते हुए बोले, 
" मैं श्रापित होने की बात को बकवाद मानता था, यह मेरी गलती थी और इसी एक गलती की सज़ा मरते दम तक भुगतुंगा के.के.......। "

वो आगे कुछ कह न सके, फूट फूट के रो पड़े मगर स्वप्निल और डॉ. पार्थसारथी अपनी पीड़ा में जड़ बन कर बैठे रहे। आखिरकार कुछ समय बाद स्वप्निल ने इस मनहूस चुप्पी को तोड़ा और बोला, 
" तो योगी जी के भविष्यवाणी का क्या अर्थ समझा था आपने मामा ? "

" यही कि तुम्हारे रूप में आचार्य चैतन्य का पुर्नजन्म हुआ है सिंहल वंश में, घुँघरू को उसके पीड़ाओं से मुक्त करने के लिए....। "

" तो अब वक़्त आ गया है, घुँघरू से रूबरू होने का। "

" हाँ ! "

" मैं तैयार हूँ ! "

" ऐसे नहीं ! शंखचूड़नी बहुत भयंकर प्रेतात्मा होती है, उससे यूँ जा भिड़ना तो मूर्खता होगी। मैं एक तांत्रिक को जानता हूँ, अखिलेश शास्त्री। "

" तांत्रिक ! ? "

" डोन्ट वरी, यह कोई अनपढ़ मूढ़ तांत्रिक नहीं हैं। मेरे प्रोफेसर थे पर तंत्रमंत्र के भी प्रगाढ़ विद्वान हैं। तुम्हारे स्पर्श से ही घुँघरू की समृति जागेगी पर यूँ ही वो तुम्हें स्पर्श थोड़े ही कर लेगी ... सदियों की पीड़ा ने उसे निर्मम बना दिया है। उसे एक पार्टिकुलर जगह पर बुलाना होगा- उसकी शक्तियों को तंत्रमंत्र से कमज़ोर करना होगा- बांधना होगा, तभी जाकर हमारा काम बनेगा वरना नहीं और यह सब हमारे वश की बात नहीं। हमें अखिलेश शास्त्री की मदद लेनी ही होगी लेकिन......। "

" लेकिन क्या मामा ?"

" किसी फिमेल बॉडी की जरूरत होगी जिसमें घुँघरू की आत्मा को बांधा जा सके.......। "

तभी दरवाजे से एक आवाज़ आई, 
" मैं इसके लिए तैयार हूँ । "

सबने पलट कर देखा एक लड़की दरवाजे पर खड़ी थी, तभी स्वप्निल हैरान सा बोला, 
" शर्लिन ! "

वो अंदर आती हुई बोली, 
" तुम अपना फोन कॉफी हाउस में ही छोड़ आये थे, वही वापस करने आई थी। पर देखो ना, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है स्वप्निल, सॉरी पर मैंने तुम लोगों की सारी बातें सुन ली - समझ भी गई.... मैं तैयार हूँ। "

स्वप्निल हतप्रभ सा बोला, 
" नहीं... बिल्कुल नहीं ! तुम पागल हो क्या ? "

डॉ. पार्थसारथी के होंठों पे मुस्कान आ गई, उन्होंने पीछे से स्वप्निल को तंग करने की नीयत से कहा, 
" क्यों भॉंजे ? जब ये लड़की सामने से आकर हमारी मदद करना चाहती है तो तुम क्यों बीच में रोड़ा अटका रहे हो। हमारा काम बन रहा है... बन जाने दो। "

स्वप्निल ने चिढ़ कर कहा, 
" आप कुछ देर चुप रहो मामा। "

डॉ. पार्थसारथी नाटक सा करते हुए बोले, 
" हाय ! ये आजकल के लड़के, वाहहहहह ! खूबसूरत बला सामने आई नहीं कि मामा को ही चुप करा देतें हैं ... बहुत खूब बच्चे। "

स्वप्निल बुरी तरह झेंप गया मगर शर्लिन आगे बढ़ कर वहाँ खड़े डॉ. पार्थसारथी और गौतम देव रॉय को नमस्ते किया और बोली, 
" मैं शर्लिन डी 'क्रूज़ हूँ, मैं आप लोगों का हर तरह से साथ देने को तैयार हूँ। "

डॉ. पार्थसारथी ने इस बार गंभीर होकर पूछा, 
" मगर क्यों ? "

शर्लिन ने एक नज़र स्वप्निल को देखा और मद्धम स्वर में बोली, 
" मैं खुद नहीं जानती ! "

" जान पर भी आफत आ सकती है। "

" मुझे परवाह नहीं। वैसे भी इस शंखचूड़नी ने मेरा जीना मुहाल कर रखा है ... आइ जस्ट वान्ट टू फिनिश हर स्टोरी   नाउ। "

डॉ. पार्थसारथी ने अर्थ भरी नजरों से स्वप्निल की ओर देखा फिर बोले, 
" ठीक है फिर यह तय रहा। तुमलोग बैठो, मैं प्रोफेसर शास्त्री से बात कर के आता हूँ। "

स्वप्निल शर्लिन के करीब आकर बैठ गया ... उसका हाथ अपने हाथों में लेकर मद्धिम स्वर में बोला, 
" इट्स डू-ऑर-डाई टाइम......! "

शर्लिन बस मुस्कुराई .... हाथों के बंधन को और गाढ़ा कर लिया ......... 


क्रमशः ...................