कर्मवीर - 1

कर्मवीर

(उपन्यास)

विनायक शर्मा

अध्याय 1

आज की सुबह महावीर सिंह के लिए सबकुछ बदलने वाली सुबह थी। सबकुछ पहले जैसा ही था। सूरज भी पूरब से ही निकला था, मुर्गे ने भी बांग दिया था। चिड़िया भी उसी तरह चाह्चाती हुई अपने घोंसलों से बाहर निकली थी। महवीर सिंह के बैल भी उसी तरह खेत में जाने वाले थे, गायों ने भी उतना ही दूध दिया था जितना वो रोज देती थीं। अपनी दिनचर्या में रमे महावीर सिंह को भी नहीं पता था कि ये सुबह उनके लिए विलक्षण है। कुछ अद्भुत, कुछ नया और कुछ बहुप्रतीक्षित चीज होने वाली है आज के दिन उसकी जिंदगी में। वो अपनी गायों को चारा देने के बाद अपने बैलों को लेकर अपने खेत जा चुके थे।

महावीर अपने जानवरों से बहुत प्यार करते थे। वो ना सिर्फ अपने जानवर बल्कि किसी भी जानवर से बहुत प्यार करते थे। उनके पास छह गायें और चार बैल के अलावा एक कुत्ता भी था, जो उनका बहुत बफादार था। वो हमेशा उनके साथ रहता था। चूँकि महावीर सिंह एक निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी थे तो गाँव वाले उनकी बात पर भरोसा करने लगे थे और कभी कभार किसी चीज को लेकर उनसे मार्गदर्शन माँगने भी आ जाते थे। महावीर सिंह को भी जो उचित लगता था वो अपनी राय जरूर देते थे। ज्यादातर समय में गाँव वाले उनकी बातों से सहमत ही होते थे। और कभी अगर कोई उनकी बात से सहमत नहीं होता तो वो उससे असहमति का अच्छा सा तर्क माँगते थे और तर्क से संतुष्ट हो जाने के बाद चाहे वो आदमी उनसे छोटा हो या बड़ा, वो उसकी बात मान लेते थे। यही उनका बडप्पन था और इसी वजह से गाँव वाले उनका बहुत ज्यादा सम्मान भी करते थे।

जो कुत्ता वो पाल रहे थे वो उन्हें एक दिन सड़क किनारे लंगड़ाता हुआ मिला। बहुत ही ज्यादा दर्द से तड़प रहा था। महावीर सिंह के अन्दर इंसानियत की अविरल धार फूटती रहती थी। वो इंसानी गुणों से लबरेज इंसान थे। चाहे सजीव हो निर्जीव, आदमी हो या जानवर, जैसे भी बन पड़ता था वो उसकी मदद जरूर करते थे। ये तो फिर भी कुत्ता था, धरती का सबसे वफादार जानवर। वो उस घायल कुत्ते को अपनी गौशाला में ले आये जहाँ उनकी गायें और बैल रहते थे। उसका पहले खुद से प्राथमिक उपचार किया और उसके बाद उसे डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ दीं और फिर उसकी थोड़ी सेवा करने को कहा। महावीर सिंह को सेवा से बड़ा धर्म तो कुछ लगता ही नहीं था। वो अपने जानवरों की इतनी सेवा करते थे कि उनकी गायें पूरे इलाके में सबसे ज्यादा दूध देती थीं और बैल भी बाकी बैलों की अपेक्षा जल्दी ही खेत जोत देते थे।

कुत्ता पूरी तरह स्वस्थ हो गया और महावीर सिंह का एकदम वफादार भी। महावीर सिंह ने उसका नाम शेरू रखा था क्योंकि उन्होंने उसे खिला पिलाकर शेर जैसा कर दिया था। वो इतना बड़ा था कि कोई भी उसे यूँ ही देख के डर जाए। वो भी महावीर सिंह के प्रति अपनी कृतज्ञता जरूर निभाता था। एक बार विधायक का आम चुनाव अता। महावीर सिंह के गाँव में करीब अस्सी घर थे और करीब ढाई सौ वोटर। तो विधायक का एक प्रत्याशी चाहता था कि महावीर सिंह उसके लिये वोट करने के लिए गाँव वालों को बोलें और बदले में ये उन्हें पैसे देने का वादा कर रहा था। महावीर सिंह को ये बात बेहद बुरी लगी। पैसे ना लेकर भी अगर वो प्रत्याशी अच्छा होता तो वो गाँव वालों से उसके पक्ष में वोट करने की अपील कर सकते थे लेकिन इस तरह उन्हें कोई रिश्वत देने का प्रयास करे ये उन्हें पसंद नहीं आया। उन्होंने उस प्रत्याशी के बारे में पता किया तो पता लगा कि वो कई आपराधिक मामलों में संलिप्त रह चुका है और वो चुनाव बस इसलिए लड़ रहा है ताकि वो अपनी जेब भर सके। एक दूसरे प्रत्याशी के बारे में उन्हें पता चला कि उसने अभी अभी अपनी पढाई ख़त्म की है और बिल्कुल सेवा भाव से राजनीति करना चाहता है। उन्होंने पूरे गाँव को उस सच्चे प्रत्याशी को वोट देने की अपील कर दी। ये बात उस गुंडे को बुरी लगी और उसने उनपर जानलेवा हमला करने की कोशिश कर दी। कुछ गुंडों को उनकी गौशाला पर भेज कर उनकी पिटाई करने को कहा। इतनी पिटाई कि वो दम तोड़ दें।

चार लोग डंडों के साथ उनकी गौशाला पर गए और उन्हें सोया पाकर उनपर ताबड़तोड़ डंडे बरसाने लगे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ पाया। लेकिन इतने में ही शेरू दौड़ता हुआ आया और फिर सारे गुंडों को काट काटकर लहुलुहान कर दिया। कुछ गुंडे उसे भी मारने लगे थे लेकिन इतने में महावीर सिंह ने भी गुंडों पर पलटवार किया और फिर चारों की इतनी पिटाई हुई कि वो वहाँ से भाग भी नहीं पाए। चारों को पुलिस के पास ले जाया गया जहाँ उन्होंने उस गुंडे प्रत्याशी का नाम उगल दिया और उसके बाद उस प्रत्याशी को जेल से चुनाव लड़ना पड़ा और इस तरह उस दिन शेरू ने न सिर्फ अपनी बफादारी निभाई बल्कि अपने मालिक के प्राणों की भी रक्षा की। उस दिन से महावीर सिंह शेरू को और ज्यादा प्यार करने लगे थे।

तो आज की सुबह जो महावीर सिंह के लिए कुछ अद्भुत, कुछ अनोखा, कुछ चिरप्रतीक्षित, लाने वाली थी वो आखिर क्या चीज थी। महावीर सिंह के घर में उनकी पत्नी के अलावा बस उनका एक नौकर ही था, जिसे वो अपने बेटे से कम नहीं मानते थे। महावीर सिंह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे। वो कभी भी उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे। महावीर सिंह की उम्र चालीस होने को थी और उनकी पत्नी भी पैंतीस साल की हो गयी थी। उनके आजतक कोई संतान नहीं हो पाया था जिसके कारण उनकी पत्नी दुखी रहती थी। दुखी तो महावीर सिंह भी रहते थे लेकिन वो अपनी पत्नी के सामने दर्शाते नहीं थे, वो हमेशा ये कहते थे कि हमारा बेटा ये है न हमारा मंगरू। मंगरू उनके नौकर का नाम था। वो अपने नौकर को अपने बेटे की तरह ही मानते थे। वो भी उन्हें अपने बाप से कुछ कम नहीं समझता था।

काफी दिनों तक उन्होंने कई वैध को दिखा लिया कई मंदिरों के चक्कर काट लिए कितने धाम पर जाकर उन्होंने मन्नतें माँग ले थीं लेकिन कुछ ना हो सका था। लेकिन इस वर्ष जैसे भगवान् का भी दिल इस नेक इन्सान की पीड़ा देखकर द्रवित हो गया। उनकी पत्नी गर्भवती हो गयी थी। उनकी ख़ुशी का तो जैसे कोई पार ही नहीं रहा था। वो अपने पड़ोस की एक चाची को बुलाकर कहते कि उनकी पत्नी का ख्याल रखा करे क्योंकि महावीर सिंह के अलावा और कोई है नहीं उनकी जिंदगी में। चाची भी मजाक में बोल देती कुछ कुछ लेकिन वो उसका अपनी बेटी की तरह ख्याल रखने लगी थी। महावीर सिंह पूरे गाँव के साथ इतने अच्छे थे कि हर व्यक्ति उनकी मदद बिना कुछ सोचे समझे करने को तैयार रहता था। चाहे उन्हें किसी तरह की मदद की जरुरत कभी भी पड़ जाए कोई भी आदमी हमेशा तत्पर रहता था।क्योंकि महावीर सिंह भी पूरे गाँव के लिए चौबीस घंटे हरेक मौसम में एक पैर पर खड़े रहते थे।

आज सुबह जब मंगरू दौड़ता दौड़ता खेतों में आया तो उन्होंने उससे पूछा कि वो इस तरह क्यों भागा भागा आ रहा है?

“जल्दी चलिए काका काकी बुला रही हैं अम्मा के पेट में बहुत दर्द है।” मंगरू ने हाँफते हुए महावीर सिंह से कहा। मंगरू महावीर सिंह को काका और उनकी पत्नी को अम्मा कहता था। बगल वाली जो चाची थीं उन्होंने मंगरू को भेजा था महावीर सिंह के पास। आज अचानक सुबह में महावीर सिंह की पत्नी के पेट में दर्द उठ चुका था। यूँ तो महावीर सिंह बहुत ही साहसी और निडर व्यक्ति थे लेकिन अपनी पत्नी के बारे में ये सुनकर वो थोड़ा डर से गए।

“क्या हो गया मंगरू, तेरी अम्मा ठीक तो है न?” उन्होंने मंगरू से घबराते हुए प्रश्न किया।

“मुझे लग रहा है कि आप पिता बनने वाले हैं शायद यही वाला दर्द अम्मा के पेट में हो रहा है। शायद आज ही अपने घर में कोई खुशखबरी आने वाली है। शायद आज ही मैं भाई बनने वाला हूँ।” मंगरू ने उत्साहित होते हुए कहा।

“ठीक है मंगरू तू चल मैं बैलों को किनारे बाँध कर तुरंत आता हूँ। तब तक तू देख वहां किसी चीज की जरुरत तो नहीं है।” बोलकर उन्होंने जल्दी से मंगरू को विदा किया। ठीक है कह कर मंगरू भी जिस तरह से दौड़ता आया था उसी तरह दौड़ता वापस भी चला गया।

मंगरू के जाने के महावीर सिंह विचारों के सागर में गोते लगाने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि जब उनका बच्चा होगा तो उनकी प्रतिक्रिया कैसी होगी। लड़का होगा तो उसका क्या नाम रखा जाएगा और यदि लड़की हुई तो उसे वो किस नाम से बुलायेंगे। जब उनका बच्चा बड़ा होकर उन्हें पिताजी पिताजी कहेगा तो उन्हें कैसी अनुभूति होगी और जब वो अपने बच्चे को पहली बार गोद में उठाएंगे तो उन्हें कैसा लगेगा। सबकुछ कितना नया और अलग होगा उनके लिए। बिल्कुल ही अलग। अपना बच्चा अपनी गोद में कितना अलग एहसास होगा ये उनके लिए। अगले ही पल उन्हें ये ख्याल आता कि उनकी पत्नी अभी किस पीड़ा में होगी। जब वो बच्चा पैदा करेगी तब उसे कितनी तकलीफ में होगी। कितना दर्द उसे अकेले सहना पड़ेगा। चाहकर भी ये वो दर्द बाँट नहीं पायेंगे।

उन्होंने बैलों को किनारे बाँधा और फिर तेज़ी से अपने घर की ओर चल दिए। घर पर पहुँचते ही उन्होंने देखा कि कुछ लोग उनके घर के बाहर खड़े थे। फिर बात वही थी जिसे भी पता चला वो भागता हुआ उनके घर की ओर निकल गया। जब वो अपने घर पहुँचे तो सभी लोग मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देख रहे थे। उन्होंने किसी से कुछ नहीं पूछा और पाने घर में घुस गए। घर के अन्दर गए और बाहर वाले कमरे में बैठ गए। उन्हें लगा था कि उनकी पत्नी दर्द के मारे कराह रही होगी लेकिन तब तक वो बच्चे को जन्म दे चुकी थी। वो बाहर वाले कमरे में बैठे रहे इतने में चाची आयीं और बोलीं,

“मुबारक हो लड़का हुआ है और माँ बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।” चाची के मुँह से इतना सुनते ही महावीर सिंह की ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना नहीं रहा।

“क्या मैं देख सकता हूँ?” उन्होंने बहुत ही ज्यादा उत्सुकता के साथ चाची से पूछा।

“हाँ हाँ क्यों नहीं भाई जाओ जाओ देखो तुम्हारी तरह एकदम सुन्दर हुआ है तुम्हारा बेटा। मेरा आशीर्वाद है जिस तरह तुम्हारी तरह देखने में हुआ है उसी तरह गुणों में भी तेरी ही तरह हो।” चाची ने आशीर्वाद देते हुए महावीर सिंह को अन्दर जाने की इजाजत दे दी।

“चाची देखना वो मुझसे भी ज्यादा व्यवहार कुशल होगा। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ तुम गाँव वाले तो यूँ ही झूठी मुठी मेरी बड़ाई करती रहती हो। देखना मेरा बेटा गाँव के लिए और क्या क्या करेगा। अब तो आ गया मेरा भी ख्याल रखेगा और इस गाँव का भी।” महावीर सिंह ने कमरे के अन्दर जाते हुए अपने बडप्पन का परिचय देते हुए कहा। चाची भी उनके पीछे पीछे उस कमरे में पहुँचीं।

अन्दर खड़ी एक औरत ने महवीर सिंह के बेटे को उनकी गोद में देते हुए कहा,

“ये बिल्कुल आप पर ही गया। नाक नक्श बिल्कुल आपकी तरह ही रंग भी आपकी तरह ही गोरा है और लम्बा भी आपकी तरह ही होगा। बस व्यवहार में आपके जैसा हो जाए तो और क्या चाहिए होगा। आपने गाँव के लिए इतने अच्छे काम किये हैं कि मेरा इस बच्चे को आशीर्वाद है कि वो बिल्कुल आप जैसा ही होगा।” उस स्त्री ने भी अपने आशीर्वादों से उस नौनिहाल को स्नात कर दिया।

“अरे नहीं मैं तो इसके सामने कुछ भी नहीं हूँ। ये तो बहुत ही ज्यादा यशस्वी लग रहा है। आप देखिएगा इसके यश का गान न सिर्फ इस गाँव में होगा बल्कि दूर दूर तक ये अपने कार्यों से लोगों की भलाई करेगा। आप इसके चेहरे पर तेज़ देख रही हैं, ये लोगों की भलाई करने के लिए ही पैदा हुआ है और भलाई ही इसका पहला कर्तव्य होगा। मैं इसे यही समझा बुझा कर बड़ा करूँगा।” महावीर सिंह ने अपने बेटे को गोद में उठाते हुए कहा और भावविभोर हो गए।

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