कर्मवीर - 8

कर्मवीर

(उपन्यास)

विनायक शर्मा

अध्याय 8

कर्मवीर दो वर्षों बाद अपने गाँव आया था। उसे गाँव ज्यादा बदला हुआ नहीं दिखा। गाँव में उसे कोई तरक्की नहीं दिखी। रास्ते में सडक पर के कुछ गाँव में उसने देखा था कि कुछ पक्के मकान भी थे लेकिन उसके गाँव में स्थिति जस की तस बनी हुई थी। पूछने पर पता चला कि गाँव की बहुतायत आबादी शहर की ओर पलायित हो चुकी है। वहीं रोजगार करती है और अपना पेट भरती है। उसने शहरों में गाँव से जाने वाले मजदूरों की जिंदगी देख राखी थी उसने बस अब ये ठान लिया कि अब वो जो भी गाँव के लोगों को बाहर नहीं जाने देगा और अपने गाँव को फिर से वो उतना ही खुशहाल बनाएगा जैसे वो पहले था। समय के साथ उसका गाँव अपने आप को बदल नहीं पाया इसलिए उसके गाँव से खुशहाली जाती रही।

अब कर्मवीर पूरी तरह से जवान हो चुका था। लोगों को उसमें महावीर सिंह की छवि साफ़ साफ़ दिखने लगी थी। वो हू ब हू महावीर सिंह की तरह ही दिखने लगा था उसके बात करने का ढंग भी बिल्कुल महावीर सिंह की तरह ही था। शहरी परिवेश उसे थोड़ा सा भी बदल नहीं पाया था। उसने गाँव की मूलभूत समस्याओं की एक सूची बनानी तैयार की। क्या क्या किया जाए जिससे यहाँ के लोगों का जीवन सुखमय हो जाएगा। इसके लिए वो गाँव के सभी लोगों से मिलने लगा। अनुभव का साथ भी उसे अपने बाबूजी के रूप में मिल गया। वो उसे देख देख कर मन ही मन प्रफुल्लित होते रहते थे। गाँव के लोग भी उसकी तरीफ करते नहीं थकते थे कि इतनी अच्छी पढाई करने के बावजूद वो शहर छोड़कर लोगों की भलाई के लिए गाँव में रहने आ गया है। इसपर वो सबको समझाता था कि वो घर पर बैठे बैठे ही नौकरी भी कर रहा है वो प्राइवेट नौकरी कर रहा है। और बहुत जल्द ऐसी तकनीक भी आने वाली है कि सबकुछ घर बैठे ही हो जाएगा। कम्पूटर का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है और भारत में भी ये काफी तेज़ी से फैलने वाला है। इससे काम करने में भी बहुत आसानी होगी। लोग उसकी बातों को मजाक में लेते थे। लोग तो ये भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि घर बैठे ही वो नौकरी कैसे कर ले सकता है।

कर्मवीर ने पाया कि उसके गाँव में तो समस्याओं की कोई कमी ही नहीं है। जिस विद्यालय में पढ़ कर वो बड़ा हुआ उस विद्यालय में भी शिक्षकों की कमी है। शिक्षकों की बहाली ही नहीं हुई है पिछले दस सालों में। जितने पुराने शिक्षक थे वो सब अब सेवा निवृत हो चुके थे बस एक दो शिक्षकों की मदद से वो विद्यालय चल रहा था। कोई भी इसके लिए कुछ कर नहीं रहा था। इस समस्या के निदान के लिए वो विद्यालय के शिक्षक के पास गया।

“सर ये बताइए आप तीन लोग ही दसवीं तक कैसे पढ़ा लेते हैं ये उच्च विद्यालय है यहाँ तो इतने ज्यादा विषय होते हैं पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक कैसे पूरे विषय को पढ़ा सकते हैं। कोई प्राथमिक विद्यालय भी होता तो कोई बात थी लेकिन उच्च विद्यालय में तो हरेक विषय के शिक्षक का होना बहुत जरुरी है।”

“ये बताओ कर्मवीर कौन इस गाँव में इतने जागरूक हैं? तुम जब यहाँ थे तब तो बहुत बच्चे भी आते थे पढने क्योंकि उस वक्त पढाई भी हो जाती थी। लेकिन अब शिक्षक ही नहीं हैं तो पढाई क्या होगी। लोगों ने अपने बच्चों को यहाँ भेजा और वो बोर्ड परीक्षा में फेल हो गए। यहाँ तो ऐसे भी कम ही लोग हैं जिनके पास इतना धैर्य होता है कि वो अपने बच्चे को उच्च विद्यालय के बाद भी पाँच साल तक पढ़ायें और उसके बाद वो उन्हें कमा के कुछ दे। लोगों ने देखा कि बच्चे दसवीं में ही पास नहीं हो पा रहे हैं तो वो पाने बच्चों को पाचवीं छट्ठी तक पढ़ाने के बाद कमाई के लिए लगा देते हैं इससे उनके घर में कमाने वाला एक सदस्य भी बढ़ जाता है। कौन आता है यहाँ बोलने के लिए कि शिक्षकों की बहाली क्यों नहीं हो रही है या फिर विद्यालय में शिक्षक कम क्यों हैं। तुम्हारे बाबूजी अकेले क्या करेंगे इस गाँव का प्रधान भी तो नहीं करता कुछ बस साल डर साल वो भी अपना पैसा बनाने में लगा हुआ है।”

“लेकिन ये तो बिल्कुल ही गलत है न कि शिक्षकों की कोई बहाली ही नहीं आई है। अगर बहाली नहीं भी आई तो भी एकाएक इतने कम शिक्षक यहाँ कैसे बचे ये मेरी समझ नहीं आ रहा है।”

“देखो कर्मवीर सभी गाँव वाले इस गाँव वाले की तरह अकर्मण्य नहीं होते हैं। कोई कोई गाँव वाले होते हैं जो सरकार को चिट्ठी लिखकर पूछते हैं कि उनके गाँव या उनके शहर या उनके कसबे में जो विद्यालय है उसमे शिक्षक क्यों नहीं है। सरकार चुप नहीं बैठ सकती वो एक चिट्ठी का जवाब नहीं देगी दो चिट्ठी का जवाब नहीं देगी, लेकिन बात जब आगे बढ़ जायेगी तो सरकार को फिर जवाब देते नहीं बनता है इसलिए जिस गाँव से कोई पूछताछ नहीं हो रही वहाँ से शिक्षक उठा कर सरकार उस जगह तबादला कर देती हैं जहाँ से पूछताछ हो रही है। और फिर वो मामला उस समय शांत हो जाता है। अब जैसे अभी तुम सरकार से सवाल करोगे कि तुम्हारे विद्यालय में तीन शिक्षक ही क्यों हैं तो हो सकता है कुछ दिनों में यहाँ कुछ और शिक्षक तबादला होकर भेज दिए जाएँ।” मास्टर जी ने एक बार फिर कर्मवीर को समझाया।

“लेकिन ये तो कोई स्थाई निवारण नहीं है न। एक जगह से मास्टर उठा कर दूसरी जगह अगर आप भेज भी रहे हैं तो भी आपके राज्य में शिक्षकों की कमी तो बरकरार ही रहेगी न!” कर्मवीर ने अपना सवाल मास्टर जी से पूछा।

“हाँ वो तो है ही लेकिन तुम सरकार से जबरदस्ती शिक्षकों की बहाली भी तो नहीं करवा सकते न।”

“क्यों नहीं करवा सकते सर जब स्थाई निवारण ही यही है तो फिर सरकार को बहाली करनी पड़ेगी। ऐसे तो काम नहीं चलेगा। शिक्षा का जो हाल मेरे गाँव में है वही हाल दूसरे भी गाँव में होगा। इसे तो सुधारना ही होगा।” कर्मवीर ने जवाब दिया।

“वो बहुत बड़ी लड़ाई होगी और उसके लिए बहुत ही ज्यादा भाग दौड़ भी करनी पड़ेगी।”

“हाँ तो जब मैंने ये ठान ही लिया है कि मुझे बस यही काम ही करना है तो फिर केवल अपना गाँव ही क्यों पूरा राज्य क्यों नहीं। और वैसे भी अभी इस गाँव में काम करने के लिए बहुत कुछ बचा है लेकिन शिक्षा सबसे पहले स्थान पर आता है इसलिए मैंने शुरुआत इसी से की है।”

“चलो मैं भगवान् से मनाता हूँ तुम सफल हो जाओ।” मास्टर जी ने कर्मवीर के सर को सहलाते हुए उसे आशीर्वाद दिया।

कर्मवीर वहाँ से सीधे घर गया और कॉपी कलम लेकर कुछ योजना बनाने लगा। उसे देखकर महावीर सिंह ने उससे पूछा,

“क्या हुआ तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?”

“बाबूजी आपको पता नहीं है शिक्षा का क्या हाल है यहाँ पर।”

“मुझे सब पता है विद्यालय में अब कोई शिक्षक ही नहीं बचा है पढ़ाई करवाने के लिए। दो तीन साल पहले मैंने कुछ चिट्ठी लिखी थी सरकार को तो एक शिक्षक भेजकर हमारे गाँव पर एहसान कर दिया गया था। अब मैं अकेला आदमी कितना सारी चीजों को देखता रहूँगा और तुम्हें तो पता ही है कि खेती भी दो सालों से उतनी सही नहीं चल पा रही है तो थोड़ी परेशानी तो उसे लेकर भी हो रही है।”

“हाँ बाबूजी आप अकेले कितना करेंगे लेकिन अब आप बिल्कुल भी चिंता नहीं कीजिये अब मैं आ गया हूँ न इस गाँव को मैं एकदम आदर्श गाँव बना कर ही दम लूँगा। लेकिन बाबूजी ये वाली समस्या तो सिर्फ इस गाँव की ही नहीं है। ये तो पूरे राज्य की समस्या है। इसके लिए थोड़े बड़े पैमाने पर सोचने की जरुरत है।”

“तब तो वो तुम ही सोच सकते हो बेटे तुम पढ़े लिखे हो मैं अब उतना सोच भी नहीं सकता अब बुढापे में न तो शरीर चलता है न ही दिमाग। लेकिन मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि तुम पढ़ लिखकर एक अच्छे इंसान बन पाए। बस अब इस गाँव को तुम्हारी जरुरत है तुम इस गाँव का अच्छे से ख्याल रखो।”

“बिल्कुल बाबूजी।” बोलकर कर्मवीर फिर से अपनी कॉपी और कलम के साथ लग गया।

उसने तय किया कि वो सरकार को चिट्ठी लिखेगा कि उसके सरकार में शिक्षकों की भारी कमी है और इसे दूर करने के लिए शिक्षकों की अविलम्ब बहाली निकाली जाए। उसने यही चिट्ठी सरकार को लिख भी दी लेकिन एक आम आदमी की चिट्ठी पर कितना ध्यान दिया जाता है। उसकी चिट्ठी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। एक महीने इंतज़ार के बाद उसने सरकार को पुनः ख़त लिखा उसमें उसने पहले लिखी चिट्ठी का भी जिक्र किया था। और साथ साथ ये भी बताया कि पिछली दफा भी इसलिए उसने चिट्ठी को साधारण डाक से नहीं भेजकर रजिस्टर्ड डाक से भेजा था ताकि सरकार ये बहाना न बना सके उसके पास उसकी चिट्ठी पहुँची ही नहीं।

इस चिट्ठी में उसने पिछली चिट्ठी को संलग्न किया साथ साथ उसने पिछली बार वाला रजिस्टर्ड डाक का नम्बर भी टंकित किया था। और सरकार को ये धमकी भी दे दी थी कि अगर सरकार का कोई जवाब नहीं आया तो वो ये किसी भी समाचार पत्र में भी छपवा सकता है और वो एक समाचार पत्र के लिए ही काम करता है। वास्तव में वो जिस संस्था के लिए काम करता था वो एक समाचार एजेंसी ही थी और इससे उसी तरह के कुछ काम लेती थी।

चिट्ठी भेजने के बीसवें दिन कर्मवीर को सरकार की तरफ से जवाबी खत मिला उस ख़त में साफ़ साफ़ लिखा मिला कि राज्य में शिक्षकों की कोई भी कमी नहीं है अगर उसे ऐसा लगता है तो वो सरकार को बताये कि किस विद्यालय में उसे शिक्षकों की कमी लग रही है सरकार उस कमी को दूर करने का हर संभव प्रयास कर सकती है लेकिन इस बात को बिल्कुल भी नहीं माना जा सकता है कि राज्य में शिक्षकों की कमी है।

सरकार द्वारा यह जवाब पाकर कर्मवीर थोड़ा मायूस हो गया उसे अब लगा कि अब क्या किया जा सकता है। सरकार ने तो अपना पक्ष रख दिया है और अपनी मंशा भी जाहिर कर दी है। वो कोई भी बहाली नहीं निकालने वाली है। अब क्या किया जाए घर में बैठा वो यही सोच रहा था कि तभी महावर सिंह उसके कमरे में आये।

“क्या हुआ बेटा इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?”

“ये देखिये।” बोलते हुए उसने सरकार द्वारा भेजी गयी चिट्ठी उनके हाथ में थमा दी। महावीर सिंह ने पूरी चिट्ठी पढ़ी और फिर कहा,

“तुम्हें क्या लगा था बेटा भलाई का काम इतना आसान काम होता है। अब तुम्हें पता चलेगा कि अगर निःस्वार्थ भाव से भी किसी की सेवा करना चाहो तो फिर कितनी ज्यादा दिक्कत आती है। तुम तो खैर यहाँ निःस्वार्थ भाव से भलाई भी नहीं कर पा रहे हो। इन सारे कामों के पीछे तुम्हें अपने गाँव को आगे ले जाने का स्वार्थ छिपा हुआ है।”

“आप सही कह रहे हैं बाबूजी लेकिन मैं भी हारकर बैठने वालों में से नहीं हूँ। हूँ तो मैं भी आपका बेटा ही। मेरी भी जिंदगी मेरा ये गाँव ही है मैं अपने इस गाँव को मरते नहीं देख सकता चाहे उसके लिए मुझे कुछ भी क्यों नहीं करना पड़े।” कर्मवीर ने महावीर सिंह को जवाब दिया और फिर महावीर सिंह वहाँ से मुस्कुरा कर चले गए।

कर्मवीर अपना दिमाग लगाता रहा उसे सरकार को हारने का बस एक ही तरीका नजर आया। अगर उसे पता चल जाए कि पूरे राज्य में कितने विद्यालय हैं और हरेक विद्यालय में कितने शिक्षक हैं और वास्तव में वहाँ सुचारू रूप से पढाई चलने के लिए कितने शिक्षकों की आवश्यकता है तो फिर वो पता लगा सकता है कि पूरे राज्य में कितने शिक्षकों की कमी है और एक बार ये डाटा मिल गया तो सरकार से लड़ना चुटकियों का काम हो जाएगा। लेकिन इतना ज्यादा जानकारी उपलब्ध कहाँ से होगी वो इसी सोच में डूब गया। पहले उसने सोचा कि सारे डीएम को चिट्ठी लिख कर उनसे ये डाटा ले ले। लेकिन फिर वो ये सोच कर रुक गया कि अगर वो उसे ये डाटा नहीं देते हैं तो फिर वो कर क्या लेगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो करे क्या।

इस समस्या का कोई समाधान नहीं मिल पा रहा था और वो रात दिन परेशान रह रहा था। उसे कई रातों से नींद नहीं आई थी। उसके बाबूजी ने उसे समझाया भी कि उसे तो इस गाँव से मतलब है न तो फिर सरकार को चिट्ठी लिख कर ये बता दे कि उसके गाँव में इतने शिक्षकों की कमी है तो सरकार खुद ही उसके गाँव में शिक्षक भेज देगी और फिर इस गाँव की समस्या का हल तो हो जाएगा। इसपर वो कहता था कि इससे इस गाँव की समस्या तो हल हो जायेगी लेकिन फिर किसी दूसरे गाँव के लिए समस्या खड़ी हो जायेगी और इस गाँव के लिए तो कम से कम मैंने अपनी जिंदगी देने के बारे में सोच भी लिया है कई दूसरे गाँव होंगे जिनके बारे में सोचने वाला कोई नहीं होगा। इसलिए ये स्थाई निवारण नहीं है। स्थाई निवारण के लिए कुछ और ही करना पड़ेगा।

कई अन्य रातों की तरह ही जब उसे एक रात और नींद नहीं आ रही थी तो रात के नौ बजे उसकी संस्था से फोन आया। फोन महावीर सिंह ने ही उठाया तो उधर से बोला गया कि उन्हें कर्मवीर जी से बात करनी है।

“हेल्लो मैं कर्मवीर बोल रहा हूँ।”

“हाँ जी हेल्लो। सॉरी आपको तकलीफ तो नहीं दी दरअसल मैं आपकी कम्पनी से बोल रहा हूँ जिस कम्पनी के लिए आप काम कर रहे हैं दरअसल काम ही कुछ ऐसा आ गया कि इतनी रात को आपको फोन करना पड़ा। अभी हमारी कम्पनी ने के सर्वे किया है। ये सर्वे इस चीज के लिए था कि एक विशेष शहर जो कि काफी ज्यादा विकसित होने का दावा करता है, में कितने आदमी रात को बिना खाना खाए सोते है। इसके लिए हमारी पूरी टीम दो हफ्ते से तीन शहरों में दौड़ रही थी आज वो सब पूरा हो गया। आपको बस इसपर अच्छे से विस्तृत रिपोर्ट अगले हफ्ते तक बनाकर देनी है जिसे कंपनी अपनी पत्रिका में छापेगी। सारा डाटा कल तक आपके घर पहुँच जाएगा और क्या लिखना है कैसे लिखना है ये मैं आपको अभी ही समझा देता हूँ। काम थोड़ा जरुरी है और जल्द ख़त्म करना है इसलिए आपको तकलीफ दी है इसके लिए मैं माफ़ी भी मांगता हूँ।”

“ठीक है कोई बात नहीं काम हो जाएगा।” कर्मवीर ने कहा और फिर फोन रख दिया।

कर्मवीर ने फोन रख दिया और फिर सोचने लगा कि शिक्षकों की जो कमी है वो कैसे दूर की जाएगी। उसे अब कुछ सूझ ही नहीं रहा था। वो सोचते सोचते सो गया। अगले दिन उसके कम्पनी वाले उसके काम करने के लिए जरुरी दस्तावेज लेकर उसके पास आ गए। उसने सोचा जब शिक्षकों की कमी दूर करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है तो फिर क्यों न कम्पनी का काम पूरे मन से कर लिया जाए। वो जो दस्तावेज उसकी कम्पनी ने भेजे थे उसे गौर से पढने लगा। पूरा ध्यान लगा कर जब उसने पढ़ना शुरू किया तो उसने पाया कि उसकी कम्पनी के कई लोग इस काम में लगे हुए थे कि शहर में कितने सारे लोग भूखा सोते हैं इस बात का आँकड़ा निकाला जाए। वो एकाएक तेज़ी से सारे दस्तावेज पढ़ गया। फिर उसने पाया कि उसकी समस्या का हल तो उसकी कम्पनी के पास ही है। उसने बिना देर किये अपनी कम्पनी में फोन लगा दिया।

“हेल्लो”

“हाँ जी हेल्लो मैं कर्मवीर बोल रहा हूँ।”

“हाँ कर्मवीर साहब बताइये आपके पास दस्तावेज पहुँच गए न?” कम्पनी के मेनेजर ने फोन पर उससे पूछा।

“हाँ सर दस्तावेज तो मुझे मिल गए लेकिन एक सवाल मेरे मन में आ रहा है।”

“हाँ हाँ बताइए कैसा सवाल आ रहा है आपके मन में। जो भी संशय वगैरह है वो अभी ही ख़त्म कर लीजिये लेकिन रिपोर्ट एकदम उम्दा होनी चाहिए ऐसे ही आपके लिखे रिपोर्ट के कारण हमारी कम्पनी का बहुत नाम हो रहा है इसके लिए कम्पनी ने आपको स्पेशल पॅकेज देने के बारे में सोचा है। बहुत जल्द आपको बता देंगे कि क्या विशेष कम्पनी आपको देने वाली है। खैर आप बताइए आपके मन में सवाल क्या है।” कम्पनी के मेनेजर ने प्रश्न किया।

“सर अभी अभी आपने कहा कि आप मुझे कुछ स्पेशल पैकेज देने वाले हैं।”

“जी हाँ बिल्कुल लेकिन उसमे अभी थोड़ा समय लगेगा।”

“सर मुझे कोई भी स्पेशल पैकेज नहीं चाहिए बस आप ये बता दीजिये कि आपकी कम्पनी ने जो सर्वे का काम किया है क्या एक सर्वे मेरे लिए कर सकती है क्या?”

“आप बताइए अगर मुम्किन हुआ तो जरूर हम करवा देंगे आपके लिए सर्वे।” मेनेजर ने सकारत्मक जवाब दिया जिससे कर्मवीर का मनोबल बढ़ गया।

“सर मेरे राज्य में उच्च विद्यालय में शिक्षकों की बहुत कमी है उसी बात का सर्वे करवाना है। मैंने सरकार को ख़त लिखा जिसका जवाब देते हुए सरकार ने ये दावा किया कि राज्य में शिक्षकों की कोई भी कमी नहीं है। लेकिन मुझे ये पता है कि राज्य में शिक्षकों की कमी है। अगर सर्वे में ये बात साबित कर पत्रिका में निकाल दी जाए तो फिर सरकार को शिक्षकों की बहाली करनी ही पड़ेगी और मेरे राज्य में शिक्षा के स्तर में सुधार हो जाएगा।”

“अगर ऐसी बात है तो क्यों नहीं किया जा सकता है सर्वे। आप थोड़े ही दिन इंतज़ार कीजिये ये रिपोर्ट तैयार कीजिये और जैसे ही हमारी फील्ड में दौड़ने वाली टीम छुट्टी से वापस आएगी तो उसके बाद यह सर्वे करवा लिया जाएगा। आप बस अपनी रणनीति भी तैयार रखियेगा।”

मेनेजर के इस आश्वासन से कर्मवीर बहुत ही ज्यादा खुश हो गया। जो कुछ दिनों से वो बिल्कुल ही बुझा बुझा सा रहने लगा था आज एकाएक उसमे ताजगी सी आ गयी। उसे लगा जैसे उसके हाथों में कोई अमूल्य निधि किसी ने थमा दी है। वो दोगुने उत्साह के साथ रिपोर्ट तैयार करने लगा। आज शाम को वो वर्जिश करने भी गया था और शाम में बहुत ही अच्छे मूड में बैठा था महावीर सिंह ने उसे देखते ही समझ लिया कि जरूर कोई अच्छी खबर है उसके लिए।

“क्यों कर्मवीर सरकार ने शिक्षकों की बहाली निकाल दी है क्या?” महावीर सिंह ने कर्मवीर से मजाक ही किया।

“नहीं बाबूजी अभी तो सरकार ने कोई बहाली नहीं निकाली है लेकिन बहुत जल्द सरकार को बहाली निकालनी होगी।” कर्मवीर ने भी उनके मजाक का उसी अंदाज में उत्तर दिया।

“क्यों भाई ऐसा क्या हो गया?”

“बाबूजी मैं जिस कम्पनी में काम करता हूँ न वो कम्पनी सर्वे करने का कम करती है। ये बात तो मुझे भी पता थी लेकिन मैं इस बात पर ध्यान ही नहीं दे रहा तह कि इससे भी कोई फायदा हो सकता है। अभी हाल ही में मेरी कम्पनी ने एक सर्वे का कम किया और मुझे उसकी रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। जब मैं रिपोर्ट तैयार कर रहा था तभी दिमाग में ये योजना आई कि हमारा काम भी तो सर्वे करने का ही है। एक बार सर्वे कर के बस यह दिखा दिया जाए कि फलाने विद्यालय में इतने शिक्षक होने चाहिए जबकि इतने ही मौजूद है और जब पूरे राज्य का डाटा एक बार दे दिया जाएगा तो फिर सरकार के पास बहाली निकालने के अलावा कोई भी चारा नहीं बचेगा। रह गयी बात कि इतना बड़ा सर्वे करेगा कौन अतो अभी अभी मेरे मेनेजर ने सहमती जता दी है। कि जिस प्रोजेक्ट पर अभी काम चल रहा है उस प्रोजेक्ट के ख़त्म होते ही वो मेरे सुझाए सर्वे के लिए काम करना शुरू कर देंगे।”

“अरे वाह ये तो बहुत ही अच्छी बात है। अगर ऐसा हो जाए तो इसे मैं एक नयी शुरुआत भी मानूँगा। ये सरकार से लड़ने का एक बहुत ही बड़ा हथियार साबित होगा। इसीलिए कहते हैं कि लोगों को पढ़ना लिखना चाहिए। देखो मैं कम पढ़ा लिखा था इसीलिए न कभी कभी हारकर रुक भी जाना पड़ता था। लेकिन जिसके पास शिक्षा है उसके पास ही असली हथियार है। चलो ठीक है मेरा तो आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है ही। तुम इसी तरह लोगों की सेवा करते रहो और मुस्कुराते रहो।”

“हाँ बाबूजी देख लीजियेगा बहुत ही जल्द राज्य के सारे विद्यालयों में जितनी संख्या में होने चाहिए उतने ही शिक्षक मौजूद होंगे।”

कर्मवीर ने उस सर्वे की बहुत ही अच्छी रिपोर्ट तैयार कर के अपनी कम्पनी को दी। उस रिपोर्ट के बाद कम्पनी का बहुत नाम हो गया। अन्य अखबारों में भी कम्पनी के इस सर्वे को जगह मिली और सभी सरकारें अपने यहाँ के शहरों में गरीब लोगों के लिए कुछ न कुछ करने लग गयी। अब बारी थी उस सर्वे की जो कर्मवीर चाहता था। कर्मवीर ने महीना ख़त्म होते ही अपने मैनेजर को याद दिलाया कि उसे उसके राज्य के हरेक गाँव के स्कूल का सर्वे करना है।

मेनेजर ने भी कहा कि उसे पूरा याद है और बहुत ही जल्द सर्वे का कम काम शुरू हो जाएगा। कर्मवीर ने पूरी तरह से पानी रणनीति बना ली और खुद जाकर एक दिन मैनेजर के हाथों में थमा कर आ गया। उस योजन में यही था कि सर्वे करने वाले हरेक गाँव और हरेक शहर में जाकर ये पता करेंगे कि उस विद्यालय को चलाने के लिए कितने शिक्षक होने चाहिए और वास्तव में कितने शिक्षक उस विद्यालय में कार्यरत हैं। मेनेजर ने कहा कि इसी हफ्ते ये काम हो जाएगा लेकिन चूँकि कर्मवीर ने बहुत अच्छा काम किया था और पिछले सर्वे पर तो उसने और भी गज़ब की रिपोर्ट तैयार की थी इसलिए उसे जो विशेष पैकेज कम्पनी की तरफ से मिलने वाला था वो तो लेना ही पड़ेगा। और वो भी उसकी जो भी इच्छा हो वो। वो कुछ भी माँगा सकता है बहुत ज्यादा महँगी चीज भी पूरी कर दी जायगी। इस पर कर्मवीर ने कहा,

“एक बार ये सर्वे पूरा हो जाए उसके बाद मैं आपसे विशेष पैकेज की माँग जरूर करूँगा। आप चिंता मत कीजिये मैं वो छोड़ने वाला भी नहीं हूँ। और वो अच्छा ख़ासा महँगा भी रहेगा।”

“अरे कोई बात नहीं कम्पनी तुमसे इतना ज्यादा कमा रही है कि तुम्हें कोई भी महंगा पैकेज देने में कम्पनी को कोई भी दिक्कत नहीं आने वाली है। तुम चिंता मत करो।”

कर्मवीर वापस गाँव लौट आया और दो दिन बाद उसे उसके मैनेजर का फोन आया कि सर्वे का काम शुरू हो गया हा और चूँकि आदमियों की थोड़ी कमी है इसलिए एक महीने का समय लगेगा। उसने अपने मेनेजर का धन्यवाद करते हुए यह याचना भी की कि उसका नम्बर सर्वे कर रहे हरेक आदमी को दे दिया जाए और एक दिन में जितन भी सर्वे हो पाए वो उसे किसी बूथ से या फिर कहीं से भी उसे बता दे ताकि साथ साथ ओ रिपोर्ट भी तैयार करता रहे और सर्वे खत्म होने के बाद जो अतिरिक्त समय लगता है रिपोर्ट तैयार करने में उससे बचा जा सके। मैनेजर ने उसकी यह बात भी मान ली।

अब रोज जितना सर्वे होता था उसकी रिपोर्ट उसके पास आ जाती थी। जितने भी लोगों ने सर्वे किया था उसमे से कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने उसे यह सूचना दी हो कि जितने शिक्षक चाहिए थे उतने शिक्षक उस विद्यालय में कार्यरत हो। कर्मवीर के लिए ये सारी ख़बरें सुकून देने वाली ही थी। धीरे धीरे करके सर्वे पूरा हो गया। और सर्वे की समाप्ति के बाद यह पता चला कि जितने शिक्षक वास्तव में होने चाहिए थे उसके आधे शिक्षक भी विद्यालय में कार्यरत नहीं है।

कर्मवीर ने एक बहुत ही अच्छी और लम्बी रिपोर्ट तैयार की जिसमे राज्य के हरेक विद्यालय में उपस्थित शिक्षकों की संख्या थी कितने शिक्षक उपस्थित होने चाहिए थे ये बात थी और उस चिट्ठी को भी उसने उस रिपोर्ट में लगाई थी जिसमे सरकार ने उसे ये जवाब दिया था कि राज्य में शिक्षकों की कोई भी कमी नहीं है। रिपोर्ट में सरकार से यह साफ़ साफ़ पूछा गया था कि सरकार का अब क्या जवाब है। चूँकि कर्मवीर ने सरकार द्वारा भेजी चिट्ठी भी उस रिपोर्ट में प्रकाशित कर दी थी इसलिए अब ये लड़ाई सीधे सीधे कर्मवीर और सरकार के बीच ही मानी जा रही थी।

इस रिपोर्ट को भी सभी समाचार पत्रों ने हाथो हाथ लिया। कर्मवीर के पिता ने अख़बार में जब यह खबर पढ़ी तो वो भागते हुए कर्मवीर के पास आये। उनके साथ गाँव के कुछ और लोग भी कर्मवीर को बधाई देने आये।

“बधाई हो बेटे जो जंग तुमने शुरू की है उसमे दिख रहा है कि तुम सरकार के नाको चने चबवा दोगे।” गाँव के एक चाचा जो महावीर सिंह के साथ अभी उसके घर आये थे ने कर्मवीर को शाबाशी देते हुए कहा।

“अभी तो लड़ाई मैंने बस अपनी तरफ से शुरू की है चाचा जी जीत तो मैं तब मानूँगा जब पूरे राज्य में जितने शिक्षकों की कमी है उतने शिक्षकों की बहाली हो पाएगी। अभी तो इसे बस एक शुरुआत ही समझिये।”

“लेकिन पढाई लिखाई का कितना फायदा होता है ये दिख रहा है महावीर सिंह जी हम सब से ज्यादा पढ़े लिखे थे तो हमेशा गाँव के बारे में ही सोचते रह गए और उनका बेटा जब आज इस गाँव में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा है तो इस गाँव में रहते हुए ही पूरे राज्य का भला करने के लिए काम कर रहा है। सभी को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी चाहिए।” गाँव के ही एक व्यक्ति ने कहा।

“स्कूली शिक्षा तो जरुरी है ही चाचा, लेकिन जो शिक्षा घर पर मेरे बाबूजी ने दी है न मैं उसके कारण ही आज ऐसा बन पाया हूँ कि मेरे सामने आपलोग मेरी बड़ाई कर रहे हैं और मेरे बाबूजी का सीना चौड़ा हो रहा है। ये सब बाबूजी की दी हुई शिक्षा का ही असर है।”

“हाँ बेटे जुग जुग जियो और अपना नाम रोशन करते रहो।” एक व्यक्ति ने कहा और फिर सारे लोग वहाँ से चले गए।

देखते ही देखते पूरे राज्य में कर्मवीर का नाम फ़ैल गया। हरेक अखबार में ये खबर आने लगी कि एक लड़का कैसे अकेले सरकार के खिलाफ लड़ गया और सरकार को कुछ बोलते नहीं बन रहा है। सभी अखबार यहाँ तक कि टी वी वाले भी कर्मवीर के साक्षात्कार के लिए उसके पास आने लगे थे। पहले तो वो किसी से कोई बात कर ही नहीं रहा था लेकिन जब एक हफ्ते तक उसकी खबर लगातार अखबारों में निकलने लगी और कुछ जगह लोगों ने शिक्षकों की बहाली के लिए शांतिपूर्ण विरोध भी किया तो उसके यहाँ भीड़ और भी ज्यादा बढ़ने लगी। अब इस भीड़ को शांत करने के लिए आखिर कार उसने सभी प्रेस वालो को एक दिन समय दे ही दिया।

कर्मवीर के दिए समय से पहले ही सारे प्रेस वाले उसके खेतों पहुँच चुके थे। जैसे जी कर्मवीर आया तो सभी प्रेस वाले उसकी तरफ कैमरा लेकर दौड़ गए। कर्मवीर ने अपने खेतों की ओर इशारा करते हुए कहा,

“मैं परदे पर अभिनय करने वाला कोई हीरो नहीं हूँ जो आप मेरी तस्वीर लेकर टी वी या फिर अखबार में दिखायेंगे। अगर आप कुछ दिखाना चाहते हैं तो उन्हें दिखाइये जो खेतों में काम कर रहे हैं उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं ये बस बच्चे ही हैं। लेकिन इन्हें कमाई पर लगा दिया गया है क्योंकि इनके पास कोई भी चारा ही नहीं है। ये स्कूल जाकर भी क्या कर सकते हैं। वहाँ कोई इन्हें पढ़ाने वाला है नहीं तो फिर ये वहाँ जाकर अपना समय बर्बाद क्यों करें। अभी पास के शहरों में कुछ प्राइवेट स्कूल भी खुल रहे हैं उस विद्यालयों में पढने के बारे में तो ये बच्चे और इनके मात पिता सपनों में बी नहीं सोच सकते। ये यूँ ही खेतों में काम करने को बाध्य हो जाते हैं और जब थोड़े और बड़े होते हैं तो इन्हें लगता है कि इस तरह खेतों में मजदूरी करके वो जितना कमा ले रहे हैं अगर इतनी मेहनत वो शहर जाकर कर लेंगे तो फिर और भी ज्याद पैसा कम लेंगे। शायद वो एक दो पैसे ज्यादा भी कमा लेते हों लेकिन ना तो वहाँ उनके रहने का कोई ठिकाना होता है और न ही उनके खाने की कोई व्यवस्था होती है अगर शहरों में ठीक से खाना खा लिया तो एक दिन की पूरी कमाई उसी में चली जाती है फिर शहर जाने का फायदा क्या उहुआ।

लेकिन ये नौबत आती ही क्यों है। क्योंकि उन्हें ना तो विद्यालय में कोई पढ़ाने वाला है और न ही उन्हें कोई ये बताने वाला है कि पढ़ाई करने के क्या फायदे हैं। वो बेचारे बच्चे वही करेंगे जो वो कर रहे हैं लीजिए उनकी तस्वीर लीजिये कुछ कहानी अखबारों में लिख सकते हैं तो उनके बारे में लिखिए।” कर्मवीर अपनी बात बोल रहा था और पत्रकार और संवाददाता उसकी बात लिखने के साथ साथ उसकी तस्वीर और खेत में काम करते बच्चों की तस्वीर ले रहे थे।

“अच्छा क्या आप एक बात का जवाब दे सकते हैं कि आपने इतनी अच्छी पढाई की और बचपन से लेकर अभी तक आप हर इम्तिहान में प्रथम ही आये हैं। न सिर्फ विद्यालय महाविद्यालय बल्कि आप ने विश्व विद्यालय में भी पहला स्थान पाया है। इतनी अच्छी पढाई और इतनी अच्छी डिग्री होने के बावजूद आप इस गाँव में ही क्यों हैं, आपको तो शहर में अच्छी खासी तनख्वाह पर अच्छी खासी नौकरी भी मिल सकती थी फिर सबकुछ छोड़ छाड़ कर इस गाँव में आकर बस गाँव के लिए सेवा करके आपको नहीं लगता कि आपकी पढाई बर्बाद जा रही है। सरकार अगर कल कोई शिक्षक बहाल करने से मना कर दे तो फिर तो आपकी लड़ाई भी व्यर्थ चली जायेगी।” एक पत्रकार ने कर्मवीर से प्रश्न किया।

“देखिये मुझे लगता है अभी आपको थोड़ी और पढाई करने की जरुरत अगर आप ऐसा सोचते हैं कि पढ़ाई का सही उपयोग तभी है जब नौकरी कर ली जाए। और अगर आपलोग ये सोच रहे हैं कि मैं यहाँ बेरोजगार बैठा हूँ तो मैं आपलोगों को ये बता दूँ कि हाँ मैंने सच में इतनी पढाई कर ली है कि अपने गाँव में बैठे बैठे ही नौकरी कर लेता हूँ। और आपलोग जितने सवाल मुझसे कर रहे हैं उतने ही सवाल अगर आप सरकार से कर लें तो मुझे पक्का यकीन है कि सरकार को शिक्षकों की बहाली करनी ही पड़ेगी।” इतना बोलकर कर्मवीर खेतों में बने अपने डेरे में चला गया और सारे अखबार वाले अपने रस्ते लौट गए।

अगले दिन अखबार में कर्मवीर के साक्षात्कार को बड़ी ही प्रमुखता के साथ छपा गया। उसके उस बात का बहुत ही ज्यादा जिक्र मिला जिसमे उसने बच्चों के खेतों में काम करने की बेबसी समझाई थी। कर्मवीर के द्वारा कराये गए सर्वे ने जैसे आन्दोलन का रूप ले लिया। विद्यार्थियों के एक दस्ते ने कर्मवीर का नाम लेकर उसे समर्थन करते हुए विधानसभा का घेराव तक कर लिया।जब बात बिल्कुल ही बिगडती दिख गयी तो सरकार ने शिक्षकों की बहाली की घोषणा कर दी। लोग इसे कर्मवीर की बहुत बड़ी जीत के रूप में देखने लगे थे लेकिन कर्मवीर ने अभी अपने आप को जीता हुआ नहीं पाया था। कर्मवीर का साफ़ कहना था कि जब तक शिक्षक बहाल नहीं हो जाते वो इसे अपनी जीत नहीं मानेगा।

शीघ्र ही शिक्षकों की बहाली के फॉर्म निकले परीक्षाएं हुईं और शिक्षकों की बहाली पूरे राज्य में हो गयी। एक बार फिर से अखबार वालों ने कर्मवीर को घेर लिया।

“आप युवाओं के प्रेरणास्रोत बन गए हैं आप क्या कहना चाहेंगे।”

“मेरे जैसे बाबूजी सभी को मिलें।” कहकर कर्मवीर रोने लगा।

“लोग आपके जैसा बेटा पाना चाहते हैं और आप कह रहे हैं कि आपके जैसे बाबूजी सबको मिलें।” एक पत्रकार ने प्रश्न किआ।

“आप इस गाँव के नहीं हैं अगर आप इस गाँव के होते तो मुझसे ये प्रश्न कभी नहीं करते। जरा सोचिये अगर मेरे बाबूजी ने मुझे ठीक नहीं पाला होता, मुझे अच्छी शिक्षा नहीं दी होती, अगर उन्होंने मुझे यह नहीं बताया होता कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, अगर मैं उन्हें इस शिक्षा को खुद अक्षरशः पालन करते नहीं देखता तो सोचिये आज जो मैं हूँ क्या आज मैं ये होता? क्या इतनी सी उम्र में ही अखबार वाले मेरा इतनी बार साक्षात्कार ले चुके होते? जरा मुझे बताइए? ये मेरी पहली जीत है। किसी सरकार या किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं या मेरे फैसले की पहली जीत है।” अपनी बात करके कर्मवीर एक बार फिर से भावुक हो गया।

कर्मवीर अपना इंटरव्यू देने के बाद घर आया। उसे देख महावीर सिंह बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा,

“बेटे तुमने जो ठाना वो पूरा किया। मुझे लग रहा है मैं गर्व से मर न जाऊं। मेरे बेटे ने अपने गाँव की भलाई करने का फैसला लिया और फिर उसने पूरे राज्य के बच्चों का भला किया सभी माँ बाप तुम्हें बहुत धन्यवाद और दुआएं देंगे और तुम और भी आगे बढोगे। “ कर्मवीर महावीर सिंह के बातें सुनकर थोड़ा भावुक हो गया।

अगले दिन सारे अखबार में कर्मवीर के बारे में ही छपा। उसके पिता महावीर सिंह ने आज अखबार वाले को बोलकर सारा अखबार ही घर में मँगवा लिया। और फिर वो अपनी पत्नी को हरेक अखबार पढ़ के बता रहे थे कि उसमे क्या लिखा हुआ है। मंगरू भी वहां बैठ के हरेक समाचार पत्र को बहुत ही गौर से सुन रहा था। जब एक आधे घंटे बाद महावीर सिंह ने लगभग सारे अखबार से कर्मवीर वाली खबर पढ़ ली तो मंगरू ने उनसे पूछा,

“ये बताइए बाबूजी हमारा कर्मवीर तो बहुत बड़ा आदमी बन गया है। जिधर देखो लोग उसकी ही बात कर रहे हैं। अभी मैं खाद लाने कल बगल वाले गाँव में गया था तो लोग कर्मवीर के बारे में ही बातें कर रहे थे और कसम से बाबूजी जब दुकानदार ने मेरी ओर इशारा कर के ये बताया न कि कर्मवीर मेरा ही भाई है तो मेरा सीना तो ख़ुशी के मारे चौगुना हो गया। सच भगवान् ऐसा भाई सभी को दें।”

“वही तो मंगरू हमारा कर्मवीर शहर जाकर भी नहीं बदला। वैसे मैं किसी की बुराई नहीं करूँगा क्योंकि सभी की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। लेकिन तुम गणेश को देखो वो भी पढने में सही ही था। उसने तो शहर में अच्छी नौकरी भी पकड़ ली लेकिन देखो वो बस अपना रहन सहन सुधारने में लगा हुआ है उसने गाँव के लिए क्या किया कितना किया ये सबको पता है। मैं ये मानता हूँ कि वो बहुत ही गरीब था और उसको अपना रहन सहन सुधारना ही था लेकिन फिर भी कुछ तो किया जा सकता था गाँव के लिए उसने अभी तक ढेले भर काम नहीं किया है गाँव के लिए। अरे जब पढ़े लिखे लोग जो अपनी जिंदगी में अच्छा कर रहे हैं वो नहीं सोचेंगे गाँव के बारे में तो फिर और कौन सोचेगा। मैं मानता हूँ कि कर्मवीर की तरह अपना सबकुछ गाँव के लिए नहीं दिया जा सकता लेकिन फिर भी कुछ तो किया जा सकता है न।”

“हाँ बाबूजी बात तो आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।” मंगरू ने उत्तर दिया।

“सभी के सोचने का अलग अलग तरीका होता है उस बेचारे ने बचपन से गरीबी ही देखी है तो पहले अपने आप को मजबूत कर लेना चाहता होगा फिर कुछ करेगा गाँव के लिए आपलोग इतना जल्द किसी को कैसे आकलन कर सकते हैं?” कर्मवीर की माँ ने हस्तक्षेप किया जिससे महावीर सिंह और मंगरू दोनों उनकी बात से सहमत हुए।

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