कर्मवीर - 4

कर्मवीर

(उपन्यास)

विनायक शर्मा

अध्याय 4

एक हिंदी कहावत है न कि ‘होनहार वीरवान के होत हैं चीकने पात’। कर्मवीर भी जब बच्चा था तभी से दिख गया था कि वो बड़ा होकर डॉक्टर इंजिनियर बने न बने लेकिन एक अच्छा इंसान जरूर बन जाएगा। उसकी कर्मवीर अब दूसरी कक्षा में चला गया था और उसकी पढ़ाई भी ठीक ठाक ही चल रही थी। उसकी गिनती मेधावी छात्रों में होती थी। कक्षा में उसका स्थान पहला या दूसरा होता था। पढाई में जो भी उससे मदद माँगने आता वो उसकी मदद जरूर करता था। वो पूरी तल्लीनता से उसे सबकुछ समझाता था। विद्यार्थी भी उसके पास पानी समस्या लेकर आते थे क्योंकि वो किसी भी प्रश्न को मास्टर जी से ज्यादा अच्छे से हल कर देता था। सभी छात्र उसके बहुत अच्छे मित्र हो गए थे।

जिस मास्टर साहब के हाथ में महावीर सिंह ने कर्मवीर का हाथ थमाया था वो कर्मवीर को इस तरह बड़ा होते देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। वो अपने साथी शिक्षकों से कहते नहीं थकते थे कि विद्यालय तो किताबी ज्ञान के लिए है लेकिन मनुष्य असली शिक्षा अपने घर पर ही लेता है। कर्मवीर इसका जीता जागता उदाहरण है। देखिये ये बाकी बालकों से कितना अलग है क्योंकि इसके पिता पूरे गाँव से अलग हैं। सही ही कहा गया है कि आप जैसा बीज बोयेंगे फल भी वैसा ही पायेंगे। महावीर सिंह ने अपने बेटे को बचपन से ऐसी शिक्षा दी है कि वो बड़ा होकर अच्छा आदमी बनेगा ही बनेगा। और उसी अच्छी शिक्षा का असर ये है कि कर्मवीर न सिर्फ पढ़ाई में अच्छा है बल्कि इसमें इंसानियत भी कूट कूट कर भरी गयी है।

एक बार उसका एक बहुत ही अच्छा साथी विद्यालय नहीं आया उसे लगा कि कोई बात हो गयी होगी कल वो आ जायेगा। लेकिन अगले दिन भी उसका मित्र नहीं आया तो उसे थोड़ी चिंता हो गयी। वो उसका बहुत ही अच्छा मित्र बन गया था। उसका नाम गणेश था। गणेश मके तीसरे दिन भी विद्यालय नहीं आने पर उसकी व्याकुलता और बढ़ गयी और फिर उसने गणेश के एक पड़ोसी से पूछा कि अब वो विद्यालय क्यों नहीं आता है तो उसने कहा कि उसे कुछ पता नहीं। वो और दुखी हो गया। जब वो अपने घर गया तो उसने अपने पिता महावीर सिंह से ये बात कही। उसके पिता ने कहा कि कोई बात नहीं है अभी तीन दिन हुआ है हो सकता है कोई बात हो इसी कारण वो विद्यालय नहीं आ रहा होगा कुछ दिन और प्रतीक्षा कर ली जाए अगर उसके बाद भी वो विद्यालय नहीं आएगा तो वो उसके बारे में पता लगा के उसे बता देंगे।

कर्मवीर का मन तो उदास ही था लेकिन अपने पिता की बात उसने मान ली। अपने पिता पर उसे बहुत ही ज्यादा विश्वास था। उसे यकीन था कि उसके पिता उसके दोस्त को वापस विद्यालय लाने में उसकी मदद जरूर करेंगे। उसे कुछ दिन और प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए हो सकता है उसके पिता सही कह रहे हों और कुछ दिन बाद सचमुच उसका मित्र वापस आ जाए।

एक एक दिन करके एक हफ्ता बीत गया लेकिन कर्मवीर का वो मित्र वापस विद्यालय नहीं आया। उसे बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था क्योंकि विद्यालय का सबसे अच्छा मित्र उसका वही था। उसके विद्यालय नहीं आने के कारण कर्मवीर इतना ज्यादा उदास रहने लगा था कि खाना भी ढंग से नहीं खा पा रहा था। उसकी माँ को ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसकी माँ ने एक दिन महावीर सिंह से कहा,

“देखिये जरा इसको एक हफ्ते से न तो ठीक से बात करता है और न ही ठीक से खाना पीना ही खा रहा है कुछ पूछिये इससे कि इसे हो क्या गया है। मैं पूछती हूँ तो कुछ बताता ही नहीं है ये मुझे।”

“अरे मुझे बताया था इसने इसका एक मित्र विद्यालय नहीं आ रहा है शायद इसी वजह से ये इतना ज्यादा दुखी है। मैंने बोला था इसे कि कुछ दिन में वो अपने आप विद्यालय आ जायेगा लेकिन लगता है वो अभी तक वापस नहीं आया है इसलिए वो उदास है रुको मैं इससे बात करता हूँ।”

“हाँ ठीक है बात कीजिये उससे और उसके मित्र को कहीं से ढूँढ के ले आइये।” कर्मवीर की माँ ने अपने बेटे की चिंता करते हुए कहा।

महावीर सिंह अपने बेटे के पास गए और उन्होंने उससे पूछा,

“क्या हुआ तुम्हारा मित्र अभी तक विद्यालय नहीं आया है क्या?”

“नहीं पिताजी वो अभी तक वापस नहीं आया है। आप कुछ कर भी नहीं रहे हैं उसे वापस लाने के लिए।” कर्मवीर ने बहुत ही उदासी भरे स्वर में कहा। उसका चेहरा बहुत ही ज्यादा उदास हो गया था।

“अरे ऐसी बात नहीं है मेरे ध्यान से थोड़ा उतर गया था और तुमने भी एक बार भी बीच में याद नहीं दिलाया अब मैं तुम्हारे मित्र को जरूर वापस ला दूँगा तुम चिंता मत करो।” पिता की इतनी बात सुनकर कर्मवीर का चेहरा थोड़ा खिल गया। महावीर सिंह ने भी प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरा और फिर से उससे बोलने लगे।

“अच्छा ये बताओ कि उसका घर कहाँ पर है उसके पिता का नाम क्या है और उसका नाम क्या है तभी तो मैं उसके घर जाकर देखूँगा कि वो विद्यालय क्यों नहीं आ रहा है।”

“मैं उसके पिता का नाम तो नहीं जानता हाँ उसका घर कहाँ है मैं बस ये जानता हूँ और मन पाने मित्र का नाम बता सकता हूँ उसका नाम गणेश है।”

“चलो ठीक है उसका घर कहाँ है ये भी बता दो फिर मैं पता करता हूँ कि तुम्हारा दोस्त किस कारणवश विद्यालय नहीं आ पा रहा है।” महावीर सिंह ने अपने बेटे से पूछा। कर्मवीर ने भी उसके घर का मोटा मोटा पता बता दिया और पिता से उसे ये आश्वासन मिला कि जल्द ही उसका मित्र उसके साथ विद्यालय में होगा। पिता से मिले इस आश्वासन से कर्मवीर थोड़ा खुश हो गया।

महावीर सिंह ने उस तरफ के एक व्यक्ति को बुलावा भेज दिया। अगर महावीर सिंह ने किसी व्यक्ति को याद किया है तो जरूर कोई न कोई जरुरी बात होगी ये सोचकर तलब किया हुआ आदमी भागा दौड़ा उनके पास आया। महावीर सिंह से कोई भी व्यक्ति डरता नहीं था लेकिन उनकी इतनी ज्यादा इज्जत करता था और उनके लिए कुछ भी कर पाने में अपना सौभाग्य समझता था। जब वो आदमी उनके घर आया तो उन्होंने उससे पूछा कि गणेश नाम का एक बच्चा जो उसके तरफ का है विद्यालय क्यूँ नहीं जा रहा है। उनके इस सवाल को सुनकर वो थोड़ा चौंक सा गया। उसे आश्चर्य हुआ उसे लग रहा था कि महावीर सिंह ने उसे किसी जरुरी काम के लिए याद किया होगा लेकिन एक बच्चे के विद्यालय नहीं जाने के कारण उसको याद किया जाना उसे अचंभित कर रहा था।

अपनी बोली में थोड़ा आश्चर्य मिश्रित करते हुए उसने महावीर सिंह से पूछा,

“महावीर सिंह जी एक बच्चे के विद्यालय नहीं जाने के कारण आप इतने व्यथिए क्यों हैं?”

“अरे क्या बताऊँ मैं मेरा बच्चा उस बच्चे का बहुत ही घनिष्ट मित्र है। पिछले एक हफ्ते से वो बालक विद्यालय नहीं आ रहा है इस कारण मेरा बच्चा बहुत उदास रह रहा है। उसे ना तो खाना अच्छा लग रहा है और ना ही वो ढंग से अपना कोई काम कर पा रहा है। ये तो हो गयी मेरे बच्चे की बात और अगर वो कोई भी बच्चा है और एक हफ्ते से विद्यालय नहीं गया है तो इसके पीछे जरूर कोई न कोई बात तो होगी। एक जिम्मेदार गाँववासी होने के नाते हमें ये पता लगाना चाहिए कि वो बच्चा विद्यालय क्यों नहीं जा रहा है। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकोगे तो बता दो मैं स्वयं ही उसके घर जाकर देख आऊँगा कि समस्या क्या है आखिर क्यों उस बच्चे ने विद्यालय जाना छोड़ रखा है।” महावीर सिंह ने अपनी बात बताने के साथ साथ उनसे निवेदन भी किया।

महावीर सिंह को ना बोलकर कोई भी व्यक्ति अपनी आत्मा को ही दुखी करता। इसलिए उस व्यक्ति ने भी कह दिया कि वो अभी ही जाकर पता करेगा कि वो बालक विद्यालय क्यों नहीं जा रहा है। साथ साथ उसने ये भी कहा कि,

“अगर आपको मेरा प्रश्न पूछा जाना उचित नहीं लगा तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरे पूछने के पीछे ऐसी कोई मंशा नहीं थी जिससे आपको तकलीफ हो।” ये बोलते वक़्त उस व्यक्ति को बहुत ही ग्लानि महसूस हो रही थी।

“ठीक है थोड़ा जल्दी पता कर दो कि आखिर बात क्या है।”

“जरूर।” कहकर वो आदमी वहाँ से चला गया।

जब वो आदमी गणेश के घर पहुँचा तो उसे पता चला कि गणेश अब कभी भी पढने नहीं जाएगा। वो अब बगल वाले गाँव में जो एक होटल है उसमे बर्तन धोने का कम करने लगा है। ये जानकर उस व्यक्ति को बहुत ही ज्यादा हैरानी हुई। एक सात आठ साल के बच्चे को काम पर लगा देना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगा। वो उसके घर के अन्दर गया तो उसकी माँ वहाँ उसे मिली। उसने गणेश की माँ से पूछा,

“आखिर ऐसा क्या हो गया जो बेटे की पढाई बंद करवा के उससे मजदूरी करवाने लग गयी?” इस प्रश्न पर उसकी माँ ने उसे देखा और पहले तो कुछ नहीं कहा। कुछ नहीं बोलता देख उस व्यक्ति ने एक बार फिर से उससे यही प्रश्न किया। अब वो औरत आग बबूला हो गयी। उसने कहा,

“अच्छा मजदूरी नहीं करेगा तो पेट कैसे भरेगा जरा ये बताना मुझे। इसी के जनम पर कर्जा हुआ था चुकाए नहीं चुक रहा है। गणेश का बाप जो भी कमा पाता है उससे तो बस दाल रोटी ही मुश्किल से हो पाती है अब वो कर्जा जो दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है उसे कैसे ख़त्म किया जाए ये बताओ।” गणेश की माँ से इस तरह का जवाब पाकर वो आदमी थोड़ा दुखी हो गया वो उसे क्या जवाब दे ये उसकी समझ से परे था। क्योंकि इस परिस्थिति में वो उस औरत की कोई मदद नहीं कर सकता था उसकी ही हालत कुछ इतनी ज्यादा मजबूत नहीं थी कि वो पैसे देकर उसका कर्ज चुका दे। वो चुपचाप अपने जैसा मुँह लेकर वहाँ से चला गया।

थोड़ी देर में वो महावीर सिंह के पास पहुँचा। उसका चेहरा उतरा हुआ देखकर महावीर सिंह थोड़े सहम से गए। उन्हें ये लग गया कि कहीं उस बच्चे गणेश को तो नहीं कुछ हो गया। बड़ी ही हडबडाहट में उन्होंने उस आदमी से पूछा,

“क्या हुआ तुम इतने उदास क्यों हो?”

“क्या करूँ बात ही ऐसी है।” उस व्यक्ति की ये बात सुनकर महावीर सिंह का चेहरा बिल्कुल ही बेरंग हो गया। उन्हें जो संदेह था वो यकीन में तब्दील हो गया। आगे बिन कुछ सोचे उन्होंने उससे प्रश्न किया,

“क्या हुआ उस बच्चे को?” उन्हें इस तरह घबरा कर प्रश्न पूछता देख वो आदमी समझ गया कि महावीर सिंह कुछ गलत सोच रहे हैं।

“बच्चे को कुछ नहीं हुआ है।” उस व्यक्ति ने तुरंत ही महावीर सिंह को जवाब दिया।

“तो फिर वो बच्चा विद्यालय क्यों नहीं जा रहा है?” अब महावीर सिंह थोड़े सामान्य थे।

“क्योंकि वो बच्चा अब एक होटल में नौकरी करने लगा है।” उस व्यक्ति ने अपने चेहरे से सारे भावों को लुप्त करते हुए उत्तर दिया।

महावीर सिंह के लिए ये भी किसी बुरी खबर से कम नहीं थी। उन्हीं के लड़के की उम्र का एक लड़का अगर अभी से ही कमाई के लिए भेज दिया गया हो तो इससे बुरा उनके गाँव के लिए और क्या हो सकता है। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो अपनी प्रतिक्रिया कैसे दें। क्या कहें और क्या पूछें। फिर भी उन्होंने प्रश्न किया।

“आखिर ऐसी क्या विवशता आ गयी कि एक सात साल के बालक को विद्यालय भेजना बंद करके काम पर भेज दिया गया पैसे कमाने के लिए?” उस व्यक्ति ने उन्हें सारी राम कहानी समझा दी। उन्होंने तुरंत कहा।

“आज रात में उसके घर जाया जाएगा। जरा पता तो किया जाए कि कितना कर्ज लिया गया था और अब भी कितना शेष रह गया है?” उस व्यक्ति ने भी हाँ में जवाब दे दिया।

रात होते ही दोनों लोग गणेश के घर पहुँचे। गणेश के घर में सारे लोग खाना खा चुके थे और अब सोने की तयारी चल रही थी। उस व्यक्ति को देखके गणेश में माँ ने अपनी भौंहें सिकोड़ ली। वो ये सोचने लगी कि ये फिर से वापस क्यों आ गया? गणेश का बाप महावीर सिंह को देखकर काफी खुश हो गया। वो ये कहने लगा कि,

“आपके जैसा महान आदमी आज हमारे घर कैसे? हमारा तो घर ही पवित्र हो गया आज आपके चरण पड़ गए यहाँ।” गणेश का बाप महावीर सिंह को पहचानता था लेकिन महावीर सिंह उसे नहीं पहचानते थे। गणेश के बाप की इस बात पर उन्होंने जवाब दिया।

“सही कह रहे हो तुम तुम्हारे इस घर को पवित्र करने की जरुरत है अब।” उनकी इस बात को सुनके गणेश का बाप थोड़ा चौंक गया, उसे समझ नहीं आया कि उससे गलती क्या हो गयी। आम तौर पर महावीर सिंह बहुत ही सुलझे इंसान थे वो इस तरह की बातें तो बिल्कुल नहीं किया करते थे लेकिन आज उनकी बातों से लग रहा था जैसे वो गणेश के पिता को डांट रहे हैं। उसने तुरंत अपने मन में उठ रहे बवंडर को शांत करने के लिए महावीर सिंह से प्रश्न किया।

“आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि मेरे घर को पवित्र करने की जरुरत हो गयी?”

“और नहीं तो क्या जिस घर में सात साल के बच्चे को पढ़ाई छुड़ाकर मजदूरी पर लगा दिया जाए उससे ज्यादा अपवित्र घर और कौन सा हो सकता है?” महावीर सिंह की ये बात उस व्यक्ति को बहुत बुरी लगी मगर वो महावीर सिंह का इतना लिहाज करता था कि उसने कोई भी जवाब नहीं दिया लेकिन उसकी पत्नी को ये बातें बर्दाश्त नहीं हुईं और वो अन्दर वाले कमरे से ही बोल पड़ी।

“हाँ अमीर लोगों को कुछ समझ नहीं आता है उन्हें तो ये घर तब अपवित्र लगेगा ही जब हम अपने बच्चे को मजदूरी करने के लिए भेजेंगे। तब नहीं लगेगा जब कोई महाजन हमारे घर में घुसकर हमें गालियाँ देकर चला जाएगा।” गणेश की माँ की ये बात सभी को बुरी लग गयी। विशेष तौर पर गणेश के पिता को। उसने तो उसे डाँटते हुए कहा।

“जब तुम्हें पता नहीं है कि किस्से कैसे बात करनी है तो फिर बोल क्यों देती हो?” उसे गुस्सा करते देख महावीर सिंह को अच्छा नहीं लगा।

थोड़ी देर के लिए शान्ति हो गयी और फिर महावीर सिंह ने गणेश के पिता से कहा।

“हमलोग यहाँ तुम्हारे घाव को कुरेदने के लिए नहीं आये हैं बल्कि महलम लगाने ही आये हैं। ये बाताओ किससे कर्ज लिए हो और कितना कर्ज लिए हो?”

“अपने ही गाँव के सेठ से लिया था कर्ज। जब गणेश हुआ था तो सरकारी हॉस्पिटल में नहीं हो पाया था उसे शहर के क्लिनिक ले जाना पड़ा था कुल सात हजार खर्च आ गया था दवाई और ऑपरेशन मिला के फिर वहाँ से आते आते दस हजार खर्च हो गया था। मेरे पास उस समय भी एक भी पैसा नहीं था आज भी एक भी पैसा नहीं है। जब जब मेरे पास थोड़ा थोड़ा पैसा हुआ मैं देता ही रहा साथ सालों में दस हजार तो दे चुका हूँ लेकिन वो कहते हैं अभी भी सूद मिला के तीस हजार हो रहा है। अब हम गरीब आदमी बताइये कहाँ से अकेले कमा के इतना पैसा देंगे। सोचे थे कि शहरी के साथ शहर ही चले जाते लेकिन फिर इन लोगों का ख्याल कौन रखेगा यहाँ पर यही सोच के नहीं गया। अब बताइए अपने बच्चे को कमाने नहीं भेजेगे तो क्या करेंगे। पढ़ेगा तो कब तक उस सेठ की गाली सुनता रहेगा?”

“तुम घबराओ मत कल जब तुम फुर्सत में रहोगे तब चलना मेरे साथ उस सेठ के पास मैं तुम्हारा हिसाब करवा दूँगा उससे मुझे वो अच्छे से जानता है। वैसे अभी कितने पैसे होंगे तुम्हारे पास?” महावीर सिंह की ये बात सुनकर गणेश के पिता को थोड़ा सुकून मिला। चूँकि महावीर सिंह सभी की कोई न कोई मदद जरूर करते थे इसलिए उसे लगा कि वो उसके लिए भी कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेंगे।

“मेरे पास तो बड़ी मुश्किल से अभी पंद्रह सौ रूपये जमा हो पाए है।”

“कोई बात नहीं ये रूपये तुम अभी अपने पास ही रखना और कल से अपने बेटे को विद्यालय भेजना शुरू कर दो फिर से और कल तुम मेरे पास आ जाना समय निकाल के चलेंगे उस सेठ के पास।” एक बार फिर से महावीर सिंह की बात सुनकर गणेश के पिता को बड़ा सुकून मिला और महावीर सिंह और उनके साथ आया व्यक्ति वहाँ से चले गए।

अगले दिन गणेश विद्यालय पहुँचा उसे देखकर कर्मवीर बहुत खुश हुआ। जब कर्मवीर ने उससे पूछा कि वो विद्यालय क्यों नहीं आ रहा था तो उसने उसे सारा वृत्तान्त समझा दिया। गणेश ने कर्मवीर को ये भी बताया कि उसेक पिता कल रात को उसके घर गए थे और उसके पिता की तकलीफ दूर करने की बात कर के गये हैं। एक बार फिर से कर्मवीर को अपने पिता पर बहुत गर्व हुआ और एक बार फिर वो अपने पिता की तरह बनने के लिए प्रेरित हो गया।

गणेश का पिता अगले दिन दोपहर में महावीर सिंह के घर पर गया। महावीर सिंह ने अपने पास बीस हजार रूपये जमा कर रखे थे।उन्होंने अपनी पेटी से पैसे निकाले और फिर कुरते की जेब में रख कर गणेश के पिता के साथ सेठ के घर की ओर बढ़ चले। गणेश के पिता को थोड़ा भी इल्म नहीं था कि महावीर सिंह ने अपने पास पैसे रख रखे है। वो पूरे रास्ते उनसे यही कहता जा रहा था कि वो बहुत ही दुष्ट सेठ है। वो आपके कहने से मुझे बख्शने वाला नहीं है आप देख लीजियेगा उसकी बात को नजर अंदाज करते हुए दोनों लोग उस सेठ के घर पहुँच गए।

सेठ घर पर ही मौजूद था। महावीर सिंह को देखकर तो वो बहुत खुश हुआ लेकिन गणेश के पिता को देखकर उसका मुँह उतर गया। उसने बड़े ही अदब से महावीर सिंह को कहा,

“अरे आज आप कहाँ से हमारे घर का रास्ता भूल गए?”

“आपसे कुछ काम पड़ गया था।’ महावीर सिंह ने भी हँसते हुए उत्तर दिया।

“आपके किसी भी काम आ सकूँ इसमें मेरा भाग्य ही होगा। आइये आइये यहाँ बैठिये।” उसने कुर्सी की तरह इशारा करते हुए महावीर सिंह से कहा।

“तुम भी यहाँ बैठो।” महावीर सिंह ने बैठते हुए गणेश के पिता को भी बैठने के लिए कहा। एक कुर्सी पर वो भी बैठ गया।

चाय आ गयी। चाय का कप उठाते हुए महावीर सिंह ने कहा,

“आपका काम मुझे बहुत पसंद है समय पर आप लोगों की जो मदद करते हैं सचमुच उनकी दुआओं की वजह से आप बहुत तरक्की करेंगे।” महावीर सिंह की इस बात पर सेठ थोड़ा झेंप गया।

“अरे कहाँ पूरा गाँव तो आपका गुणगान करता है।”

“वो तो गाँव वाले जाने। लेकिन मैं आपसे साफ़ साफ एक बात भी खाना चाहूँगा। और वो ये कि जरूरत के वक्त दिए पैसे को वसूलने का तरीका आपका थोड़ा गलत है गरीबों को पैसा इकट्ठा करने में थोड़ा समय लगता है। चूँकि यही आपका व्यापार है तो आप भी अगर पूरी धनराशि माफ़ करने लगे तो आपका ही पेट चल पाना मुश्किल हो जाएगा लेकिन गरीबों को थोड़ा धन और थोड़े समय की मोरव्वत दे दिया कीजिये और सख्ती थोड़ी कम करें आप तो मैं दावा करता हूँ आप भी पूरे गाँव में पूजे जाएँगे। क्योंकि मैं हर समय गाँव वालों की मदद नहीं कर सकता लेकिन आप कर सकते है।” उनकी इस बात पर सेठ थोड़ा शर्मा सा गया क्योंकि वो माहावीर सिंह का बहुत लिहाज करता था। वो समझ गया कि वो गणेश के पिता की सिफारिश ले के आये हैं।

“वैसे तो मैं बहुत नरम ही रहता हूँ लेकिन जब थोड़ी देर होती है तो थोड़ी सख्ती भी बरतनी पड़ती है।”

“हो सकता है आप अपनी जगह सही हों। खैर मैं इसके सम्बन्ध में कुछ बात करने आया हूँ। आप जानते होंगे इसे।”

“हाँ जानता तो हूँ इसके यहाँ तीस हजार रूपये बाकी है।”

“मैं इसका हिसाब ख़त्म करना चाहता हूँ। इसने बताया कि इसने दस हजार रूपये लिए थे। और दस हजार सात सालों में दे भी चुका है लेकिन सूद मिला के अभी भी तीस हजार बच रहा है। आप ऐसा कीजिये बीस हजार लेके इसका खाता बंद कर दीजिये। इससे इसकी भी जान बच जायेगी और आपका भी कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ेगा।”

“अब जब आप कह रहे हैं तो आपकी बात सर आँखों पर।” सेठ के इतना कहते ही उन्होंने अपनी जेब से बीस हजार रूपये निकाले और सेठ को दे दिया। सेठ ने भी अपने रजिस्टर से गणेश के पिता का नाम हटा दिया। गणेश का पिता मुँह फाड़े महावीर सिंह को देखता रह गया।

वहाँ से चलते वक्त गणेश के पिता ने कहा,

“मुझे नहीं पता मैं ये पैसे कैसे वापस करूँगा लेकिन मैं जल्द ही वापस करने की कोशिश करूँगा।।”

“उसकी कोई जरुरत नहीं है तुम अपने बेटे को विद्यालय भेजना कभी बंद नहीं करना जब वो पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बन जाएगा तब मैं पूरे हक के साथ बीस हजार रूपये वापस ले लूँगा।” उनकी ये बात सुनकर गणेश का पिता रो पड़ा और उनके पैर छूकर वहाँ से चला गया।

महावीर सिंह जब घर आये तो उनके बेटे ने उन्हें बताया कि आज गणेश विद्यालय आया था। इसपर उन्होंने जवाब दिया कि

“हाँ मैंने भी पता किया था कि वो बीमार है मैं तुम्हें बताने ही वाला था कि तुम्हारा दोस्त बीमार है वो कुछ ही दिनों में फिर से विद्यालय आने लगेगा लेकिन मैं तुम्हें बता नहीं पाया था।” कर्मवीर ने देखा कि उसके पिता ने गणेश के परिवार पर जो एहसान किया है वो उसे भी नहीं बताना चाह रहे हैं। अपने आप को इतने महान पिता की संतान होता देख वो बहुत ही ज्यादा गौरवान्वित हुआ। अब उसने उन्हें थोड़ा तंग करने का मन बना लिया। कर्मवीर ने अपने पिता से पूछा कि

“क्या आप उसके घर भी गए थे?” महावीर सिंह उसका यह प्रश्न सुनकर इस असमंजस में पड़ गए कि कहीं उसे सारी बातें पता तो नहीं चल गईं।

“न नहीं तो।” उन्होंने लडखडाते हुए कहा।

“ओ तो आपको कैसे पता चला कि वो बीमार है?” कर्मवीर ने फिर से प्रश्न किया।

“बेटा तुम तो देखते ही हो मेरे पास पूरे गाँव के लोग आते रहते हैं एक आदमी आया था गणेश के घर के भी तरफ से उसी से पूछा तो उसने बता दिया था।”

“अच्छा।” कर्मवीर ने कहा फिर दोनों बाप बेटों में दूसरी बात होने लगी। कर्मवीर का दृढ़ निश्चय एक बार फिर बढ़ गया कि वो अपने पिता की तरह ही नेक इंसान बनेगा और लोगों की सेवा से बड़ा उसका कोई भी कर्म नहीं होगा तभी वो अपने नाम को सार्थक कर पायेगा।

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