कर्मवीर - 6

कर्मवीर

(उपन्यास)

विनायक शर्मा

अध्याय 6

कर्मवीर पहली बार गाँव से बाहर शहर आया था। गणेश के लिए भी यही स्थिति थी। दोनों के लिए शहर बिल्कुल ही नया था। दोनों का कॉलेज अलग अलग था। शहर भी दोनों के एक ही था इसलिए कभी कभार मुलाक़ात हो ही जाती थी। कर्मवीर को शहरी जीवन बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा था लेकिन गणेश को शहर में बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था।उसे ऐसा लग रहा था कि कैसे कोई शहर की जिंदगी को बुरा कह सकता है।उसे तो यहाँ इतना ज्यादा मन लग गया कि उसने ये सोच लिया कि वो अब गाँव वापस ही नहीं जाएगा। उसके पिता भी किसी दूसरे शहर में काम करते थे और कमाकर पैसे भेजा करते थे। गाँव में उसकी माँ अकेली हो गयी थी। उसे कभी माँ की भी याद नहीं आती थी।

वहीं कर्मवीर गणेश से बिल्कुल उल्टी विचारधारा वाला लड़का था। उसे ये समझ नहीं आता था कि लोग शहरों में कैसे रह लेते है। ना तो यहाँ किसी के माँ बाप हैं ना ही गाँव का कोई सगा सम्बन्धी सब यहाँ बस अपनी ही जिंदगी जीने में लगे हुए हैं। किसी को किसी दूसरे से कोई मतलब नहीं है यहाँ पर। जल्दी से पढ़ाई ख़त्म हो और वो अपने गाँव जाकर रहना शुरू कर देगा। शहर की एक ही बात उसे बहुत अच्छी लगी थी और वो थी यहाँ पर बिजली की सुविधा उपलब्ध थी। बिजली से जिंदगी थोड़ी आसान हो जाती है ऐसा उसे लगा। पढ़ाई में यहाँ भी वो किसी को आगे नहीं आने दे रहा था। वहीं गणेश शहरी चकाचौंध में घुलता जा रहा था वो पढ़ाई में पीछे होता जा रहा था।

गणेश शहर आकर इतना ज्यादा रम गया था कि उसे कर्मवीर की भी याद नहीं रहती थी और वो उससे भी मिलने कभी नहीं जाता था। कर्मवीर का इस शहर में कोई भी अपना नहीं था ना तो अभी उसकी किसी से ज्यादा जान पहचान ही हो पायी थी। इसलिए वो हरेक हफ्ते गणेश से मिलने उसके कमरे पर चला जाता था। एक दिन जब वो गणेश के कमरे पर था तो कर्मवीर ने गणेश से पूछा,

“और बताओ पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?”

“अच्छी चल रही है तुम बताओ तुम शहर में कहाँ कहाँ घूम लिए।” गणेश ने लगभग कर्मवीर के प्रश्न पर ध्यान ना देते हुए पूछा।

“यार मुझे अभी घुमने फिरने में कोई दिलचस्पी नहीं है मैं बस एक बार अच्छे से पढ़ लूँ फिर घूमना फिरना तो होता ही रहेगा। अच्छा ये बता जो कक्षा में परीक्षाएँ होती है हरेक महीने उसमें तुम्हें इस बार कितना नम्बर आया है?” कर्मवीर ने एक बार फिर बात को मोड़ कर पढ़ाई की तरफ लाने का प्रयास किया।

“ठीक ठाक नम्बर आ गया। वैसे मैं तो कहूँगा कि अभी ही घूम लो बाद में कोई कुछ घूम नहीं पाता तुम तो वैसे भी गाँव में जाकर ही बसने की सोच रहे हो न।” गणेश भी अपनी बात को पढ़ाई से हटाने पर लगा रहा।

“हाँ रहूँगा तो मैं गाँव में ही लेकिन शहर भी घूम के देखूँगा जरूर कि इसमें ऐसा क्या आकर्षण है कि लोग इसकी तरह खिंचे खिंचे चले आते हैं। वैसे ये ठीक ठाक नम्बर का क्या मतलब होता है बताओ न कितना नम्बर आया है?” कर्मवीर ने फिर से बात को पढ़ाई की दिशा देने का प्रयास किया।

“यार इस बार मैं थोड़ी पढ़ाई नहीं कर पाया था तो नम्बर थोड़े कम आ गए मैं अगले महीने में पक्का देखना अच्छे नम्बर ले के आ जाऊँगा।” कहते हुए गणेश की नजर नीचे झुकी हुई थी वो कर्मवीर से नजर नहीं मिला पा रहा था।

“तुम मुझे साफ़ साफ क्यों नहीं बता रहे हो कि तुम्हें नम्बर कितना आया है?” कर्मवीर अब गणेश को डाँटने के लहजे में बोलने लगा। ऐसे भी कर्मवीर गणेश को अपना छोटा भाई ही समझता था। वो विद्यालय काल से ही उसपर थोड़ी कड़ाई रखता था यही कारण था कि दसवीं में उसने बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया था।

“कर्मवीर मुझे 45 प्रतिशत अंक आये हैं।” गणेश कर्मवीर से बिल्कुल भी नजर नहीं मिला पा रहा था।

“क्या! इसका मतलब तुम पढ़ाई से बिल्कुल दूर हो गए हो? देखो गणेश घूमना फिरना कम कर दो तुम्हें पता है न तुम्हारे पिता क्या करके तुम्हें यहाँ रख के पढ़ा रहे हैं। तुम अगर अपने बारे में नहीं सोच सकते हो तो कम से कम उनके बारे में तो सोचो। देखो गणेश ये घूमना फिरना न हमलोग जिंदगी में जब चाहें तब कर लेंगे लेकिन अगर एक बार सही समय पर सही ढंग से पढ़ाई नहीं की तो फिर कहीं भी घुमने के लायक नहीं रह जाओगे। लोग ताने मारेंगे कि शहर में जाकर पढ़ाई भी की और देखो आज बेकार घूम रहा है।” गणेश ने हर समय कर्मवीर को अपना बड़ा भाई ही माना था लेकिन आज कर्मवीर की बातें उसे बहुत ही ज्यादा चुभ रही थीं उसे लग रहा था कि कर्मवीर अब बोलना बंद कर दे बस। उसके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है ये उसे भी पता है। लेकिन अभी भी वो कर्मवीर का अनादर नहीं कर सकने लायक हुआ था।

“ठीक है यार अब मैं अच्छे से ही पढ़ाई करूँगा तुम बताओ तुम्हें कितने नम्बर आये?”

“मुझे बहुत अच्छा लगा ये देखकर कि तुम मेरी समझाई बात को समझ रहे हो। वैसे भी यहाँ गाँव से इतनी दूर और कौन है हमदोनों का एक दूसरे के अलावा तुम्हें मैं नहीं समझाऊंगा और मैं अगर गलत रास्ते गया तो तुम मुझे नहीं समझाओगे तो और कौन आएगा हमदोनों को समझाने। मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है। शुरू शुरू में तो घर की इतनी याद आती थी कि मैं पढ़ाई बिल्कुल भी नहीं कर पाता था लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने ध्यान करना शुरू कर दिया और फिर से पुरानी लय वापस आ गयी। इस महीने जो क्लास टेस्ट हुआ उसमें मुझे 97 प्रतिशत अंक आये।” कर्मवीर ने दोगुनी ख़ुशी के साथ उत्तर दिया।

“अच्छा वाह यार तुम अपने आप को जरूर साबित कर के रहोगे मेरी शुभकामना तुम्हारे साथ है।”

“नहीं हमदोनों अपने आप को साबित करेंगे देख लेना केवल तुम जो इधर उधर में दिमाग लगा रहे उसे हटाकर फिर से पढाई में रम जाओ। अच्छा चलता हूँ फिर आता रहूँगा।”

“हाँ ठीक है।” गणेश ने कहा और उसे अपने छात्रावास के बाहर तक छोड़ने आया।

कर्मवीर वहाँ से चला गया लेकिन उसके मन में ये बात रह गयी कि गणेश अब पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहा है उसे अब घूमने का चस्का लग गया है। ये बहुत ही ज्यादा गलत हो गया है हो न हो ये संगत का ही असर है। वो जरूर किसी गलत संगत में पड़ गया है। हालाँकि आज मैंने उसे समझा दिया है लेकिन अगर वो मेरी बात नहीं माना तो फिर तो यूँ ही घूमता ही रह जाएगा। नहीं उसे पढ़ना ही होगा। उसे अपने मजदूर पिता के बारे में सोचना ही होगा वो बर्बाद नहीं हो सकता है। जब मैं यहाँ आया था तब मैं भी तो अच्छे से पढ़ नहीं पाता था लेकिन अब देखो अब मैं कितने अच्छे से पढ़ाई करने लग गया हूँ। वो भी अब मेरे समझाने के बाद अच्छे से ही पढ़ाई करने लग जाएगा। गणेश ऐसे नहीं रह सकता। ये तमाम बातें कर्मवीर के दिमाग में तब चल रही थीं जब वो गणेश के छात्रवास से अपने छात्रावास जा रहा था।

तीन महीने बीतने के बाद भी उसे अपने घर और अपने गाँव की उतनी ही याद आती थी। उसे हमेशा लगता था कि वो अपने पिता से बात कर ले। लेकिन छात्रावास में फोन होने के बावजूद उसके घर में फोन की गैरमौजूदगी के कारण वो अपने पिता से बात नहीं कर पाता था। वो आज गणेश से मिल के आया था इसलिए उसे अपने गाँव और अपने पिता की और अपनी माता की और भी याद आ रही थी। उसे मंगरू और अपने सभी जानवरों की याद आ रही थी। कुछ सालों पहले ही उसका शेरू मरा था तो महावीर सिंह बोल रहे थे कि वो दुसरा कुत्ता पाल लेंगे। लेकिन पक्की सडक के चक्कर में वो कोई कुत्ता नहीं ला पाए थे अब जब सडक बन गयी थी तो वो कुत्ता ला पाए कि नहीं ये सब जानने की जिज्ञासा कर्मवीर को खूब हो रही थी।

आज उसे अपने घर की याद इतनी आई कि उसने अपने पिता को चिट्ठी लिखने के लिए बैठ गया।

प्रिय बाबूजी,

चरणस्पर्श, मैं यहाँ सकुशल हूँ और उम्मीद करता हूँ हमारा पूरा परिवार और गाँव वाले भी बहुत ही मजे में होंगे। मेरी पढ़ाई बहुत ही सही चल रही है और इस महीने हुए क्लास टेस्ट में मुझे बाकी छात्रों में सबसे ज्यादा 97 प्रतिशत अंक मिले। मेरे बाद जिस लड़के को सबसे ज्यादा अंक आये उसके अंक बस 85 प्रतिशत ही थे। मैं कोशिश करूँगा कि अपनी पढाई में यही स्तर अंत तक बरकरार रखूँ। मैं आज गणेश के पास गया था। वो थोड़ी लापरवाही बरत रहा है लेकिन आज मैंने उसे इतनी डांट लगा दी कि वो भी तुरंत ही रास्ते पर आ जाएगा। उसका छात्रावास मेरे यहाँ से बस आधे घंटे की दूरी पर ही है। जब भी गाँव घर की ज्यादा याद सताती है तो मैं उसी के पास चला जाता हूँ लेकिन जब उससे मिलता हूँ तो गाँव की और भी ज्यादा याद आने लगती है।

मेरे छात्रावास में एक टेलिफोन है जब उसकी घंटी बजती है तो वो छात्र फोन की तरफ भागते हैं जिनके घरों में टेलिफोन है। मुझे फोन पर बात करने की तो ज्यादा इच्छा नहीं होती लेकिन मुझे गाँव देखने के बड़ा मन करता है। मेरा मन करता है कि मैं भाग के आ जाऊं और अपने आँगन में आकर बैठ जाऊँ, माँ मेरे लिए खाना बनाकर ले आये और मैं आपसे माँ से और मंगरू भैया से ढेर सारी बातें करता रहूँ। माँ के हाथ का खाना भी बहुत याद आता है। यहाँ कोई नहीं है जो माँ की तरह खाना बना के खिलाये। मेरा बड़ा मन करता है कि मन वहाँ आके एक बार अपनी गायों की पीठ सहलाऊं अपने बैलों के पीछे पीछे अपने खेतों में दौडू। लेकिन मैं फिर यही सोचकर यहाँ रुक जाता हूँ कि मैं यहाँ हूँ तो बस गाँव की भलाई के लिए ही हूँ। फिर अपनी पढाई पर ध्यान लगाता हूँ और फिर अपनी पढ़ाई में मस्त हो जाता हूँ। फिर मुझे अपना लक्ष्य ही नजर आने लगता है।

आप मेरी चिंता बिल्कुल ही छोड़ दीजियेगा जैसे ही गर्मियों की छुट्टियाँ होंगीं मैं घर आऊँगा और आप सब से मिलूँगा।

आपका प्यारा बेटा

कर्मवीर

कर्मवीर ने चिट्ठी लिखी और अगली ही सुबह उसे पोस्ट कर दी। महावीर सिंह भी बहुत दिनों से उसके पास जाना चाह रहे थे लेकिन खेतों में काम होने की वजह से वो जा नहीं पाए थे। अब खेतों का भी काम ख़त्म हो गया था तो वो सोच रहे थे कि एक बार जाकर कर्मवीर से मिल लिया जाए। उन्होंने मंगरू से कहा भी कि वो कर्मवीर के पास शहर जाने का रेल टिकट ले ले कुछ दिनों बाद का वो दोनों चलेंगे उससे मिलने मंगरू भी खुश हो गया था। वो टिकट लेने जाता उससे पहले ही कर्मवीर की चिट्ठी आ गयी। कर्मवीर की चिट्ठी पढ़कर महावीर सिंह भाव विह्वल हो गए। उन्होंने चिट्ठी अपनी पत्नी की तरफ बढ़ा दी वो इस कदर सोच में डूब गए थे कि वो ये भी भूल गए थे कि उनके घर में बस वो और कर्मवीर ही लिख पढ़ सकते है। मंगरू और उनकी पत्नी को कुछ भी पढ़ना लिखना बिल्कुल भी नहीं आता। पत्नी ने जब उन्हें ध्यान दिलाया तो उन्हें ध्यान आया। फिर उन्होंने मंगरू और अपनी पत्नी दोनों को बैठाकर कर्मवीर की चिट्ठी पढ़कर सुनाई। कर्मवीर की माँ चिट्ठी सुनकर रो पड़ी तो मंगरू के भी आँखों में आँसू आ गए थे।

अगले दिन ही मंगरू शहर जाने का टिकट ले आया। कुछ दिनों बाद का टिकट था और एक एक दिन काटना महावीर सिंह के लिए मुश्किल हो रहा था। मंगरू ने साथ जाने के लिए अपना भी टिकट लिया था। वो भी कर्मवीर से मिलने के लिए अतिउत्साहित था। महावीर सिंह रोज उससे तारीख पूछते और हो खुश होकर बताता कि अब इतने दिन ही शेष रह गए हैं। उसके इस जवाब पर महावीर सिंह कहते थे कि तुम्हें इतने दिन ही लग रहे हैं और मुझे लग रहा है जैसे कितने बरस और बाकी हैं। एक तो इतने दिनों में ही मेरा बुरा हाल हो गया है अपने बेटे से मिले बगैर। लगा रहा है वो भी कितने सालों से मुझसे दूर है।

कर्मवीर की माँ चार दिन पहले से ही उसके लिए खाने के लिए कुछ न कुछ बना रही थी। उसकी हर पसंद ना पसंद का उसे ख्याल था। हरेक चीज याद कर कर के वो बना रही थी मन तो उसका भी था कि वो भी साथ जाकर कर्मवीर को देख आये लेकिन उसने महावीर सिंह से कुछ कहा नहीं। उसने सोचा कि जब वो आएगा तब ही वो उसे देख लेगी अभी उसके पति मिलके आ जाएँगे और जो बताएँगे उसी से वो उसे देखा मान लेगी पति की नजरों से ही देख लेगी वो अपने लाल को। अपने बेटे के बारे में सोच सोच कर वो बहुत रोमांचित हो जा रही थी। कभी सोचती वो मोटा हो गया होगा। फिर सोचती कि नहीं वहाँ उसे यहाँ की तरह खाना कहाँ मिलता होगा जो वो मोटा हो जाएगा। बेचारा पतला ही हो गया होगा। क्या कर सकता है अब शहर में जैसा खाना मिलेगा उसी से गुजारा करना पड़ेगा न । देखो तो चिट्ठी में ही उसने लिख दिया है कि उसे वहाँ का खाना पसंद नहीं आ रहा है। लेकिन क्या किया जाए जिंदगी सँवारने के लिए त्याग करना पड़ता है इसलिए ये करना ही पड़ रहा है उसे। नहीं तो अपने बाबूजी की तरह ही मैट्रिक पास रह जाएगा। कोई बात नहीं जब पढ़ाई ख़त्म करके यहाँ वापस आ जाएगा तब उसे जी भर के उसके पसंद की चीजें खिलाऊँगी।

देखते देखते महावीर सिंह के शहर जाने की तारीख भी आ गयी। माँ ने ढेर सारा खाना तैयार कर लिया था और इन्होंने भी कुछ पैसे रख लिए थे अपने बेटे को देने के लिए। महावीर सिंह बहुत दिनों बाद ट्रेन में बैठ रहे थे वहीं मंगरू तो पहली बार ट्रेन में बैठा था। मंगरू को ट्रेन में बैठकर बहुत अजीब लग रहा था। जब ट्रेन जोर से चलती थी तब वो महावीर सिंह से कहता,

“बाबूजी मुझे बहुत डर लग रहा है। ट्रेन इतनी ज्यादा हिल रही है कि मुझे लग रहा है कि मैं ट्रेन से नीचे गिर जाऊँगा।”

“अरे नहीं रे पगले ट्रेन की बनावट इस तरह की है कि कोई भी आदमी ट्रेन से नीचे नहीं गिर सकता। और ये तेज़ नहीं चलेगी तब तो बैलगाड़ी अपने पास है ही उसी से पहुँचते महीनों दिन में। तुम पहली बार चढ़ रहे हो न इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है। मैं भी जब पहली बार ट्रेन पर चढ़ा था तो मुझे भी ऐसा ही लगा था। लेकिन तब की ट्रेन और अब की ट्रेन में बहुत अंतर हो गया है।”

“हाँ बाबूजी मुझे डर तो लग रहा है ट्रेन पर बैठकर लेकिन अच्छा भी खूब लग रहा है। मैं जब भी अपने गाँव में पटरी से ट्रेन को गुजरते देखता था तो मुझे लगता था कि मैं भी एक दिन इस ट्रेन में बैठकर कहीं जाऊं लेकिन मैं कहाँ जा सकता था सो मैं सोचता था कि मैं कभी ट्रेन नहीं चढ़ पाऊंगा। लेकिन देखिये कर्मवीर के बहाने ही मैं भी ट्रेन चढ़ गया।” उसकी इस बात पर महावीर सिंह ने थोड़ा हँस दिया।

कुछ देर और मंगरू ट्रेन की सीट पकड़ कर बैठा रहा उसके उसके बाद वो आराम से बैठ गया अब उसका डर लगना कम हो गया। उसने फिर से महावीर सिंह से कहा,

“बाबूजी जिस शहर में कर्मवीर रह रहा है वो तो बहुत बड़ा शहर होगा। वहाँ तो ढेर सारे लोग होंगे। बहुत सारी कम्पनियां भी होंगी। लेकिन मैंने देखा था कर्मवीर के विद्यालय में जो नाटक हुआ था उसमें दिखाया था कि जितना ज्यादा बड़ा शहर होता है उतने ही कम लोग वहाँ पहचानने वाले होते है। फिर उस शहर में रहने से क्या फायदा बाबूजी जहाँ हमें कोई पहचानने वाला ही नहीं है।”

“तुम्हार कहना बिल्कुल सही है मंगरू लेकिन आजकल लोगों की सोच बदल रही है जो शहर में जाकर रह रहा है उसे लोग ज्यादा सुखी मानते हैं। उसे लोग ज्यादा समझदार मानते है। लोग मानते हैं कि वो अच्छा कमा खा रहा है। उसे भी हर महीने हाथ में पैसे मिल जाते हैं तो वो मन मुताबिक़ उसका इस्तेमाल कर लेता है। लेकिन भविष्य क्या है ये वो नहीं सोचता अगर शहर में कोई मुसीबत में पड़ जाए तो कौन उसकी मदद करेगा ये उसे नहीं पता और न ही इस बारे में वो सोचना चाहता है। बस आँख बंद करके सभी शहर की ओर भाग रहे हैं। हमारे लोग आँख बंद करके शहर की ओर भाग रहे हैं और जो विदेशी पर्यटक आते हैं वो हमारे गाँव घूमना चाहते हैं।”

“क्या सच में बाबूजी विदेशी लोग हमारे गाँव घूमना चाहते हैं।” मंगरू ने अत्योत्साह में पूछा।

“अरे हमारे गाँव कहने का मतलब है भारत के गाँव।”

“अच्छा।” मंगरू ने कहा। कुछ सहयात्री भी उनकी बातें सुन रहे थे और उनकी बात में शरीक भी हो गये।

ट्रेन रुकी और फिर कर्मवीर के दिए पते पर जाने के लिए महावीर सिंह ने एक गाडी बुक की। गाड़ी उनको सीधे कर्मवीर के छात्रावास तक ले गया और वहाँ उतार दिया। चूँकि उस दिन इतवार था इसलिए कर्मवीर कॉलेज नहीं गया था वो बाहर भी घुमने नहीं जाता था इसलिए वो छात्र वास पर ही मौजूद मिला। मंगरू रास्ते भर गाड़ी की खिड़की से सड़क किनारे बड़ी बड़ी इमारतों को देखता रहा और महावीर सिंह से उन इमारतों के बारे में प्रश्न करता रहा। महावीर सिंह उसे बहुत ही धैर्य के साथ उत्तर देते रहे। अभी गाडी वाला गाडी से महावीर सिंह के द्वारा लाया गया सामान बाहर निकाल ही रहा था कि कर्मवीर ने अपने कमरे की खिड़की से देखा कि उसके पिता और मंगरू छात्रवास के मुख्य दरवाजे के बाहर खड़े हैं।

कर्मवीर भागता हुआ उनके पास पहुँचा और दोनों के पैर छुए।

“बाबूजी आप अचानक ही आग गए बेकार ही आप तंग होने के लिए आ गए अभी मैं कुछ महीनों बाद ही तो आने वाला था एक बार गर्मी की छुट्टी हो जाती फिर मैं यहाँ रहकर क्या करता गाँव ही आता न छुट्टियों में बेकार में आपलोगों को तकलीफ हुई होगी रास्ते में। मंगरू भैया भी परेशान हुए होंगे और वहां माँ भी अकेली हो गयी होगी। और इतना ज्यादा सामान क्या लेकर आ गये सारी चीजें तो हैं ही मेरे पास।” कर्मवीर ने उन दोनों को बोलने का कोई भी मौक़ा नहीं दिया। जैसे ही उसने दोनों के पैर छुए उसके बाद दनादन बोलने लग गया। जब बोलके वो शांत हुआ तब महावीर सिंह ने कहा,

“अब हमें कमरे तक भी ले चलोगे या फिर सारी शिकायत यहीं कर दोगे। अन्दर चलो आराम से बैठ कर बातें करेंगे और ये जो सामन है ये सब तुम्हारी माँ ने दिया है तुम्हारे लिए मैं कुछ भी लेकर नहीं आया।”

“अरे हाँ हाँ मैं भी कितना पागल हूँ आपलोगों को अन्दर ले जाने के बदले आपलोगों से बस बहस कर रहा हूँ। चलिए चलिए अन्दर चलते हैं।” बोल कर कर्मवीर ने अपने दोनों हाथों में सामन उठाया और आगे आगे चलने लग गया। महावीर सिंह चार थैलों में सामन लेकर आये थे दो थैले पीछे से लेता हुआ मंगरू आ रहा था और महावीर सिंह सबसे पीछे से उसे अनुशरण कर रहे थे।

तीनों लोग कर्मवीर के कमरे में पहुँचे कर्मवीर ने कमरा बड़े ही अच्छे ढंग से व्यवस्थित कर रखा था। एक कोने में भगवान् की तस्वीर थी। ऊपर पंखा लगा था और एक कुर्सी और मेज थी जिसपर कुछ किताबें राखी हुई थीं। चादर जो बिछी हुई थी वो भी बहुत ही साफ थी। महावीर सिंह को इतना व्यवस्थित कमरा देखकर हार्दिक ख़ुशी हुई। कर्मवीर ने स्विच दबाया और पंखा घुमने लग गया। पंखा घूमता देख मंगरू को बहुत आश्चर्य हुआ उसने अभी तक बिजली नहीं देखी थी और ना ही बिजली से चलती चीज ही उसने देखी थी उसके गाँव में ना तो बिजली थी और ना ही बिजली से चलने वाली चीज। एक बल्ब सौर ऊर्जा से जलता था जिसे वो बिजली से चलने वाली चीज नहीं मानता था।

मंगरू काफी देर तक पंखे को घूमता हुआ देखता रहा। महावीर सिंह और कर्मवीर दोनों समझ गए कि इसे बिजली से चलने वाले उपकरण देख कर थोड़ी हैरानी हो रही है।

“क्या देख रहे हो मंगरू भैया?” कर्मवीर ने मंगरू से पूछा।

“नहीं कर्मवीर मैं देख रहा हूँ कि किस तरह बिजली के होने से जिंदगी सुखमय हो जाती है। बताओ एक स्विच दबाया और पंखा घुमने लग गया नीचे बैठे तीन लोगों को गर्मी से राहत दे रहा है इससे ज्यादा और क्या चाहिए?” उसकी इस बात पर महावीर सिंह और कर्मवीर दोनों मुस्का दिए।

थोड़ी देर और बिजली और पंखे पर बातें होती रही फिर कर्मवीर ने पूछा,

“और बताइए बाबूजी गाँव में सब कैसा है?”

“गाँव में तो सब ठीक ठाक है, लेकिन जब से तुम यहाँ आये हो घर पर किसी का मन नहीं लगता है न ही मेरा न तुम्हारी माँ का और न ही ये मंगरू खुश रहता है। सभी तुम्हारे बिना बेचैन रहते हैं। मैं तो बहुत दिन पहले ही यहाँ तुम्हारे पास आ जाता लेकिन खेतों में काम चल रहा था तो मैंने सोचा कि काम निबटा लूँ तभी जाऊँगा। अब जब आने की तैयारी कर ही रहा था कि तुम्हारी चिट्ठी आ गयी। तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर तुम्हारी माँ और मंगरू दोनों का बुरा हाल था। एक मैं ही था जो थोड़ा साहसी निकला मैं नहीं रोया तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर।”

“बाबूजी झूठ मत बोलिए मैंने देखा था जब आप माँ जी को चुप रहने को कह रहे थे तब आपकी भी आँखें गीली थीं।” मंगरू ने हँसते हुए कहा।

अपने परिवार का इस तरह से प्यार देखकर कर्मवीर की आँखें भी भर आयीं। महावीर सिंह की ऑंखें भी उस समय फिर से नम होने लगी थीं कि इसी बीच कर्मवीर ने कहा,

“अच्छा चलिए अब झोला खोलिए और दिखाइये कि उसमे मेरे लिए क्या क्या आया है। कुछ खाने का भी है मेरे लायक या आपलोग यूँ ही वजन ढो कर यहाँ आ गए हैं?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं भाई तुम्हारी माँ ने जो प्रेम भरकर तुम्हारे पास भेजा है वो देखो और खाओ तुम। तुम्हारी माँ को इस बात से बड़ी चिंता हो गयी कि उसे मन के काबिल खाना नहीं मिल रहा है उसका तो बस चलता अतो वो साल भर का खाना एक साथ बना के दे देती लेकिन मेरे मना करने पर उसने बस महीने भर का ही खाना भेजा है तुम्हें। वैसे यहाँ के खाने का असर तुम पर दिख भी रहा है तुम पहले से बहुत दुबले हो गये हो।”

“हाँ कर्मवीर तुम दुबले हो गये हो अपनी सेहत का ख्याल रखो।” मंगरू ने झोल खोलते हुए कहा।

“अरे अब आपलोग इतना खाना जो लेकर आ गये हैं मेरे लिए देखिएगा एक ही हफ्ते में फिर से मोटा हो जाऊँगा।” कर्मवीर ने कहा और फिर सभी झोले से भांति भांति के पकवान निकाल के खाने लगे।

महावीर सिंह वहीं उस चारपाई पर लेट गए और कर्मवीर और मंगरू नीचे चादर बिछाकर लेट गए। अब लेटे लेते बातें हो रही थीं। महावीर सिंह ने बहुत ही ख़ुशी जाहिर की कि अब भी कर्मवीर उसी तरह पढ़ाई कर रहा है। अचानक उन्हें याद आया कि गणेश भी तो इसी शहर में आकर पढ़ रहा है। उन्होंने उसके बारे में जानने की इच्छा जाहिर की। करमवीर ने उन्हें बता दिया कि अभी उसकी पढाई ठीक नहीं चल रही है शायद वो किसी गलत संगत में पड़ गया है वो घुमने फिरने पर ज्यादा ध्यान देने लग गया है। इस महीने जो क्लास टेस्ट हुआ उसमे भी उसे बहुत कम नम्बर आया। महावीर सिंह ने कहा,

“तुम ही उसका ख्याल रखना तुम उसे समझाओ कि अभी पढ़ लिख ले तो आदमी बन जाएगा तुम्हें तो पता ही है कि उसका बाप किस तरह उसे पढने के लिए पैसे भेजता है।” महावीर सिंह की बात सुनकर कर्मवीर ने बताया कि वो उसके पास गया था और उसे समझा कर आया है। कर्मवीर ने उन्हें बताया,

“मैं उसके पास गया था तो वो मुझसे पूछने लगा कि यहाँ घूमे हो, वहाँ घूमे हो? मैंने उसे कहा कि नहीं मैं कहीं नहीं घूमा हूँ। मैं पहले पढ़ाई ख़त्म कर लूँगा उस के बाद तो जीवन पड़ा हुआ हुआ है घुमने फिरने के लिए। जब भी मैं पढ़ाई की बात करता था वो बात बदल देना चाहता था फिर जैसा कि आपने कहा मैं भी उसे समझा कर आया कि उसके पिता क्या कर के उसे यहाँ रख के पढ़ा रहे हैं ये उसे नहीं भूलना चाहिए। तब जाकर उसे मेरी बातें समझ आई और उसने पढ़ाई करने का वादा किया है। अब वो मन लगाकर पढ़ेगा और अगले महीने होने वाले टेस्ट में वो अच्छा नम्बर लेकर आएगा ये उसने वादा किया है।” कर्मवीर की बातें सुनकर महावीर सिंह को बहुत ही तसल्ली मिली। उनका बेटा शहर आकर भी थोड़ा सा भी बदला नहीं था।

तीनों उसी तरह लेटे रहे और फिर ट्रेन में थके होने के कारण महावीर सिंह और मंगरू सो गए। कर्मवीर की भी आँख लग गयी। वो भी सो गया। एक डेढ़ घंटे बाद कर्मवीर की आँख खुली तो उसने देखा कि उसके पिता और मंगरू सो रहे हैं। उसने उन्हें तकलीफ देना उचित नहीं समझा। वो सोच रहा था कि वो उनके लिए कुछ खाना मँगवा ले लेकिन कर्मवीर की माँ ने उनके साथ खाने का इतना व्यंजन भेज दिया था कि उसे अभी बहुत दिनों तक कुछ और मंगवाने की कोई जरुरत ही नहीं थी। थोड़ी देर बाद ही वो दोनों भी जग गए।

“कर्मवीर अब तो लगता है शाम भी हो गयी है चलो कहीं घुमने चलते हैं।” मंगरू ने कर्मवीर से कहा।

“मंगरू भैया मुझे तो बाहर ज्यादा कुछ देखा हुआ नहीं है एक काम करते हैं गणेश को भी साथ ले लेते हैं उसे घुमने वाली जगहें पता हैं। वो हमलोगों को भी अच्छा घुमा देगा।” कर्मवीर ने उत्तर दिया।

“नहीं घूमने की कोई जरुरत नहीं है अगर मंगरू को घूमना भी है तो मैं उसे आज और कल घुमा दूँगा और परसों दिन भर आराम करके शाम में ट्रेन पकड़ लेंगे।” महावीर सिंह ने बीच में हस्तक्षेप किया।

“नहीं बाबूजी मैं भी साथ में चल चलूँगा घूमने के लिए। आप लोगों के बहाने ही मैं भी घूम लूँगा। मैं अभी छात्रावास के फोन से गणेश को फोन करता हूँ वो यहाँ आ जाएगा और फिर हम सब चलेंगे घूम आयेंगे। मंगरू भैया सही कह रहे है।” कर्मवीर ने उत्तर दिया।

“ठीक है तुम्हारा मन है घूमने का तब तो ठीक है बुला लो गणेश को।” महावीर सिंह ने कर्मवीर से कहा।

कर्मवीर छात्रावास के फोन से गणेश को फोन करने चला गया। उसने गणेश के छात्रावास का नम्बर मिलाया।

“हेल्लो मैं कर्मवीर बोल रहा हूँ मैं गणेश का मित्र हूँ, मुझे गणेश से बात करनी है क्या आप उसे बुला देंगे?” कर्मवीर ने फोन पर कहा।

“हाँ ठीक है आप प्रतीक्षा कीजिये मैं एक मिनट में बुलाता हूँ।” उधर से आवाज आई और कर्मवीर कान में फोन सटाए गणेश की प्रतीक्षा करने लगा।

“हेल्लो कौन बोल रहा है?” उधर से आवाज आई। कर्मवीर आवाज पहचान गया था। उसने कहा,

“हाँ गणेश मैं बोल रहा हूँ, कर्मवीर।”

“हाँ कर्मवीर बोलो आज फोन पर कैसे याद कर लिया मुझे। वो अतो संयोग था कि मैं तुम्हें अभी मिल भी गया नहीं तो थोड़ी देर और बाद अगर तुम फोन करते तो मैं तुम्हें मिलता भी नहीं।” उधर से गणेश ने उत्तर दिया।

“क्यों कहाँ जा रहे हो तुम?” कर्मवीर के इस प्रश्न पर गणेश चुप हो गया था। थोड़ी देर चुप्पी रही फिर कर्मवीर ने पूछा,

“हेल्लो गणेश तुम कहीं जा रहे हो क्या अभी?”

“हाँ यार एक क्लासमेट है उसी का आज जन्मदिन है। चूँकि आज छुट्टी का दिन है तो उसने भी सोचा कि आज उसका जन्मदिन बाहर ही कहीं मनाया जाए। उसी के जन्मदिन की तैयारी में हमलोग अभी निकलने वाले हैं। बताओ तुमने क्यों याद किया?” थोड़ी देर सोचने के बाद गणेश ने जन्मदिन का बहाना बना लिया था।

“यार दरअसल बाबूजी और मंगरू भैया आये हुए हैं। मंगरू भैया को थोड़ा शहर घुमने का मन हुआ तो मैंने सोचा कि तुम्हें तो शहर देखा हुआ है तो तुम भी हमलोगों के साथ होते तो ज्यादा बेहतर होता। खैर छोड़ो मैं ही उन्हें घुमा लाऊंगा कोई बात नहीं।” कर्मवीर थोड़ा उदास हो गया। गणेश पहले ही आज बाहर शराब पीने की योजना बना चुका था और वो अपने शराबी दोस्तों को मना नहीं कर सकता था। कर्मवीर को मना करने में उसे थोड़ी ग्लानि तो हो रही थी लेकिन उसने ज्यादा नहीं सोचा। उसने एक बार भी नहीं पूछा कि बाबूजी कब तक रहेंगे या आज नहीं तो कल जब क्लास ख़त्म हो जायेगी तब वो आ जायेगा और उनके साथ घूम लेगा।

“सॉरी यार अगर मैंने पहले से योजना नहीं बनाई होती तो मैं तो जरूर आता। अभी मैं निकल रहा हूँ सभी कमरे पर आये हुए है। ठीक है मैं रखता हूँ।” गणेश ने अंग्रेजी के नए सीखे शब्द का बहुत ही सुन्दर उपयोग किया। उसने अपने आप को व्यस्त दिखाते हुए जल्दी ही फोन भी रख दिया। कर्मवीर का चेहरा उदास हो गया।

अपने चेहरे को सामान्य करता हुआ जैसे ही वो कमरे में घुसा, मंगरू ने पूछा,

“ये बताओ कर्मवीर यहीं से बैठे बैठे बैठे तुमने टेलिफोन से गणेश से बात कर ली।”

“हाँ मंगरू भैया टेलिफोन का तो यही फायदा ही है चेहरा नहीं दिखता लेकिन बात हो जाती है।” कर्मवीर ने मंगरू को उत्तर दिया।

“मैं भी यहाँ से जाने के बाद घर में एक टेलिफोन जरूर लगवा लूँगा। तब हमसब भी कर्मवीर से जब मन चाहे तब बात कर लिया करेंगे। इसके छात्रावास में फोन तो है ही।” महावीर सिंह ने मंगरू को उत्तर दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए तीनों चुप हो गये थे।

चुप्पी फिर से महावीर सिंह ने तोड़ी

“अच्छा तुम अभी गणेश को फोन करने गए थे न वो यहाँ आ रहा है क्या?” महावीर सिंह ने कर्मवीर से पूछा।

“नहीं बाबूजी दरअसल वो अपने किसी साथी के साथ जन्मदिन मनाने जा रहा है। उसने कहा कि वो उसका बहुत ही करीबी दोस्त है और बहुत पहले से ही उसने जन्मदिन की तैयारी का जिम्मा गणेश को ही दे रखा है इसलिए उसका आज आना तो बहुत ही मुश्किल है वो आज नहीं आ सकता है। वो कल के बारे में बोल रहा था तो मैंने कह दिया कि कल से तो क्लास शुरू हो जायेगी तो आने की कोई जरुरत नहीं है। ऐसे ही उसने अभी तक पढ़ाई थोड़ी कम की है। कोई बात नहीं बाबूजी चलिए हमलोग ही चलते हैं घूम के आते हैं। मंगरू भैया जब हमारे साथ रहेंगे तो ऐसे ही मजा आ जाएगा।” कर्मवीर के इतना कहते ही तीनों खिलखिला के हँस दिए।

“वैसे तुमने सही किया जो उसे कल घुमने के लिए आने के लिए मना कर दिया। घूमना फिरना तो फिर होता ही रहेगा अभी वो जो पढ़ाई में पिछड़ गया है उसकी भरपाई कर ले पहले। चलो हमलोग तैयार होकर चलते हैं घूमने के लिए।” महावीर सिंह ने कहा।

उसके बाद तीनों घूमने जाने के लिए तैयार हो गए। मंगरू ने झोले से अलग किस्म की कमीज निकाली और पहन ली।

“अरे मंगरू तुम्हारे पास ये कमीज कहाँ से आई?” महावीर सिंह ने प्रश्न किया।

“बाबूजी वो अपने गाँव का शहरी है न जो सबसे पहले शहर गया था, उसी से मंगवाई थी मैंने ये कमीज। वो हर बार अलग अलग किस्म की कमीज पहन कर गाँव आता था तो मुझे वो अच्छी लगती थी। जब कर्मवीर दसवीं पास कर गया तो मुझे पता था ये आगे की पढ़ाई के लिए शहर आएगा ही और ये शहर आएगा तो मुझे भी एक न एक बार तो शहर घूमने का मौक़ा जरुर मिलेगा तो मैंने पहले से ही शहरी से एक कमीज मँगवा ली थी।” मंगरू के बातों पर कर्मवीर और महावीर सिंह दोनों हँस पड़े। मंगरू तो बताते हुए भी शर्मा रहा था जब ये दोनों लोग उसपर हँसने लगे तब उसे और भी ज्यादा शर्म आ गयी।

“क्यों बाबूजी ये कमीज मुझपर अच्छी नहीं लग रही क्या?” मंगरू ने शर्माते हुए पूछा।

“नहीं ऐसी बात नहीं है मैंने पहली बार तुम्हें पहने देखा इसलिए तुमसे पूछ रहा हूँ।” महावीर सिंह समझ गए कि अगर अब ज्यादा कुछ बोला गया तो उसे बुरा लग जाएगा और जिस कमीज को उसने इतने जतन से मँगवाया है वो उसे पहनेगा नहीं।

तीनों लोग तैयार होकर बाहर घूमने के लिए निकल गए। कर्मवीर ने शहर का एक नक्शा खरीद लिया और मुख्य मुख्य घूमने वाली जगहों को चिह्नित कर लिया। मंगरू के लिए शहर सपने जैसा था उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सभी जगह सड़कें बनीं हुई है। सभी जगह सडक के किनारे बड़ी बड़ी बत्तियाँ लगी हुई हैं। घर बहुत कम ही थे जो छप्पर के थे। ज्यादातर घर पक्के के ही बने थे और ऊँचे भी गाँव के मुकाबले बहुत थे। वो शहर की चकाचौंध से बहुत ज्यादा प्रभावित था। उसके चेहरे पर उभरते भावों को पढ़ते हुए कर्मवीर ने मंगरू से प्रश्न किया,

“क्या हुआ मंगरू भैया कैसा लग रहा है शहर घूमकर आपको?”

“बहुत मजा आ रहा है कर्मवीर मैं तो होता तो रोज यहाँ घूम ही रहा होता। गाँव से कितना अच्छा होता है शहर!”

“ये बस घूमने के लिए अच्छा है मंगरू भैया जो यहाँ रहते हैं उनसे पूछिए। आपने विद्यालय में मेरा नाटक देखा था कि नहीं! अभी हम तीनों पहचान के लोग एक साथ चल रहे हैं तो मजा भी आ रहा है और अच्छा भी लग रहा है। भगवान न करे लेकिन अगर अभी आप खो गए न तो कोई आपको मेरे कमरे तक भी नहीं पहुँचायेगा। ऐसा होता है शहर। और जैसा आपको लग रहा है न शहर को देखकर ऐसा ही जो शुरू से शहरों में ही रह रहे हैं उन्हें गाँव जाकर लगता है। हम गाँव वालों को शहरों की चकाचौंध प्रभावित करती है और शहर वाले गाँव की सादगी, शान्ति और भाईचारे पर मरते है।” मंगरू ने कर्मवीर की बातें सुन तो ली लेकिन उसे ज्यादा समझ नहीं आया।

“कर्मवीर बिल्कुल सही कह रहा है।” महावीर सिंह ने कहा। फिर तीनों आगे बढ़ते रहे।

कर्मवीर उन्हें एक पार्क ले गया जहाँ झूले वगैरह लगे हुए थे। मंगरू ने देखते ही पूछा,

“आज यहाँ पर मेला लगा हुआ है क्या?”

“नहीं मंगरू भैया यहाँ पर ऐसा कुछ नहीं है कि मेला लगेगा तभी झूले वगैरह लगते हैं यहाँ हर रोज ये झूले और बाकी चीजें लगी ही रहती हैं। जिसे जब छुट्टी मिलती है वो यहाँ आकर आनन्द उठाता है।” कर्मवीर ने मंगरू की जिज्ञासा शांत की। मंगरू झूला झूला। उसके बाद वो लोग वहाँ से भी चले गए। सडक किनारे लगी खाने की कुछ चटपटी चीजें भी तीनों ने खाई और लगभग आधा शहर घूमने के बाद वो लोग रात को घर पहुँच गए। जब रात को वो लोग घर लौट रहे थे अताब भी कुछ लोग सडक पर मौजूद ही थे। गाड़ियाँ भी चल ही रही थीं। ये बात भी मंगरू को अजीब लगी। उसने फिर पूछा,

“कर्मवीर यहाँ लोग सोते कब हैं। देखो इतनी रात हो गयी है तब भी लोग गाड़ियों में इधर से उधर जा रहे हैं।”

“ये शहर है मंगरू भैया यहाँ तो कुछ लोग रात में काम भी करते हैं।” कर्मवीर ने उत्तर दिया। उसकी इस बात पर मंगरू की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने कोई सवाल नहीं किया।

तीनों छात्रावास पहुँच गए और फिर सो गए। खाना सबने बाहर खा ही लिया था। महावीर सिंह और मंगरू को रात में इतनी देर तक जागने की आदत नहीं थी इसलिए सुबह वो लोग देर तक सोते रहे। कर्मवीर चूँकि रात में जागकर पढाई करता था इसलिए उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा वो नियत समय पर जगा और अपने कॉलेज चला गया। वो जब वापस आया तो शाम हो चुकी थी। मंगरू फिर से घूमने की योजना बना रहा था महावीर सिंह भी दिन भर कमरे पर बैठे बैठे ऊब चुके थे वो भी जाने के लिए तैयार हो रहे थे। उनलोगों को तैयार होता देख कर्मवीर ने भी कहा कि मैं भी तैयार हो जाता हूँ।

“नहीं आज तुम्हें जाने की कोई जरुरत नहीं है तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो।” महावीर सिंह ने कहा। कर्मवीर का भी बाहर घूमने का कोई मन नहीं था। इसलिए उसने इसके बाद कुछ नहीं कहा। महावीरी सिंह और मंगरू दोनों घुमने के लिए बाहर चले गए।

दोनों फिर से आज रात को बाकी का आधा शहर घूम के आये थे। अगले दिन अब दोनों को वापस जाना था। जब वो कमरे में आये तो कर्मवीर पढ़ रहा था। उन तीनों ने उसके उसके बाद खाना खाया और फिर तीनों सो गए। आज उन दो लोगों ने बाहर में कम ही खाया था इसलिए रात्रि भोजन तीनों साथ में कर पाए। अगले दिन फिर कर्मवीर उनदोनों से जल्द जगा और फिर कॉलेज चला गया। जब वो वापस आया तो महावीर सिंह और मंगरू अपना सामन तैयार कर चुके थे। तीनों सामन लेकर बाहर निकले और फिर टैक्सी पर बैठकर रेलवे स्टेशन चले गए। कर्मवीर ने उन दोनों को ट्रेन में बिठाया और फिर वापस अपने छात्रावास पर आ गया।

गणेश महावीर सिंह के आने की खबर जानने के बाद भी उनसे एक बार भी मिलने कर्मवीर के छात्रावास नहीं आया। ये बात कर्मवीर को बहुत बुरी लगी। महावीर सिंह जाते जाते भी एक बार कर्मवीर को गणेश का ख्याल रखने के लिए कह गए थे। कर्मवीर को ये सब सोचकर और भी बुरा लग रहा था, फिर भी वो अपने दिल को ये कहकर तसल्ली दे रहा था कि हो सकता है उसे समय ही नहीं मिला होगा। अच्छा इस इतवार को मैं ही उसके पास चला जाऊँगा माँ ने जो पकवान दिए हैं वो भी उसे दे आऊँगा। वो भी खुश हो जाएगा।

रविवार को उसने सोचा था कि वो सुबह सुबह ही चला जाएगा लेकिन उसने सोचा कि अगर छुट्टी के दिन ज्यादा पढ़ाई कर ली जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। शाम में तो वैसे भी पढ़ाई नहीं हो पाती शाम में ही वो उसके पास जाएगा। उस दिन दिन भर कर्मवीर ने पढ़ाई की उसके बाद शाम को वो गणेश के छात्रावास घर से आये पकवान लेकर गया। शाम में जब वो उसके कमरे में घुसा तो उसके होश ही उड़ गए। जमीन पर चादर बिछी हुई थी पाँच लड़के गोलाकार होकर बैठे हुए थे एक रेडिओ पर संगीत बज रहा था और पाँचों लड़कों के बीच में शराब की बोतलें थीं और कुछ नमकीन रखा हुआ था। कर्मवीर ये सब देखकर बिल्कुल ही स्तब्ध रह गया। उसने सोचा था कि गणेश थोड़ा बहुत ही बिगड़ा है लेकिन इस कदर वो गणेश को देखकर एकदम हिल गया। गणेश की भी दशा ऐसी ही थी। उसका भी नशा हिरन हो गया था। वो क्या बोले उसे समझ नहीं आ रहा था और कर्मवीर क्या बोले ये इसे समझ नहीं आ रहा था। कुछ मिनट तक मौन सभी एक दूसरे को देखते रहे। फिर कर्मवीर ने झोला कमरे के एक कोने में रखते हुए कहा,

“ये बाबूजी लेकर आये थे माँ ने अपने हाथों से बनाकर दिया है। बाबूजी को कहकर भी भेजा था माँ ने कि कुछ गणेश को भी जरूर दे दीजियेगा। तुम उन दो दिनों में आये नहीं तो आज मैं हो लेकर आ गया। चलो तुम सभी आनन्द लो मैं चलता हूँ।” गणेश की तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले। जब कर्मवीर उसके कमरे से बाहर जाने लगा तो उसने बस एक बार कर्मवीर का नाम लिया। कर्मवीर ने पीछे पलट कर देखा फिर गणेश ने कुछ नहीं कहा। कर्मवीर फिर से जाने को हुआ तो गणेश ने कहा,

“कर्मवीर मैं कल तुम्हारे कमरे पर आता हूँ कल वहीं बात करेंगे।” कर्मवीर को तो गणेश पर बेइंतेहा गुस्सा आ रहा था लेकिन उसने उसे कुछ नहीं कहा। जाते जाते बस वो बोल गया,

“ठीक है।” इतना कहकर वो उसके कमरे से बाहर गया और सोच में डूबा हुआ अपने कमरे पर आ गया।

अगले दिन गणेश उसके कमरे पर गया।कर्मवीर शाम में यूँ ही बैठा हुआ था। आमतौर पर कर्मवीर शाम में एक दो घंटे पढ़ाई नहीं ही करता था। उस दिन भी वो कमरे के बाहर बरामदे में टहल रहा था। गणेश ने आते ही बोलना शुरू कर दिया,

“मुझे माफ़ कर देना कर्मवीर उस दिन मैं तुम्हें बैठने को भी नहीं बोल पाया।” कर्मवीर को लग रहा था कि गणेश ने पिछली बार पढाई में जरा सी लापरवाही की बात कही थी तो वो उसे डांट कर आ गया था और फिर उसे समझा कर भी आया था। मगर आज तो उसे लगा रहा था जैसे वो कुछ बोलने की ही स्थिति में नहीं है। कर्मवीर गणेश की तरफ देखता हुआ चुप रहा। गणेश ने ही फिर से कहा,

“कर्मवीर देखो मैं शराब नहीं पीटा लेकिन बहुत दिनों बाद जब कुछ दोस्त आ गए और जिद करने लगे तो मैं बस उनके साथ बैठ गया। वो मेरे कमरे में इसलिए आये थे क्योंकि मेरा कमरा थोड़ा बड़ा है और उसमें सामान थोड़ा कम है।” गणेश ने अपना बचाव करने की कोशिश की।

“तुम्हे क्या लगता है मेरे आस पास शराब पीने वाले लड़के नहीं रहते हैं क्या, लेकिन मुझे तो कोई नहीं कहता कि अपना कमरा मुझे शराब पीने के लिए दे दो। हाँ, पढ़ाई के लिए सारे लड़के आते हैं और मैं साथ में पढ़ाई भी करता हूँ उनके। और दूसरी बात तुम मझसे झूठ भी बोलने लग गए हो। मैंने अपनी आँखों से देखा था कि तुम भी शराब पी रहे थे।” कर्मवीर के इतना बोलते ही गणेश की नजरें नीची हो गईं।

“कर्मवीर मैं तुमसे याचना करता हूँ कि ये बात किसी को मत बताना। मैं बस ऐसे ही कभी कभार गाहे बे गाहे पी लेता हूँ। मैं रोज नहीं पीता हूँ मित्र।” गणेश ने उत्तर दिया।

“मतलब तुम रोज भी पीने की सोच सकते हो क्या?” कर्मवीर थोड़ा गुस्सा होते हुए पूछ रहा था।

“नहीं मित्र मैं उतना भी नहीं गिरा हूँ। हाँ लेकिन मेरी संगति थोड़ी खराब हुई है जिसके ककारण मैं उन लोगों को मना नहीं कर पाता।”

“हां, तो आज कभी कभार के लिए मना नहीं कर पाते हो कल जब दोस्ती और गहरी हो जायेगी तब रोज के लिए भी मना नहीं कर पाओगे।” कर्मवीर अभी भी गुस्से में था।

“नहीं कर्मवीर बस तुम्हें मुझे आज एक वादा करो कि तुम ये बात और किसी को नहीं बताओगे मैं भी तुम्हे आज वादा करता हूँ कि आज के बाद मैं शराब को कभी हाथ भी नहीं लगाऊँगा।”“चलो ठीक है मैं तुम्हें वादा देता हूँ कि मैं ये बात किसी को नहीं बताऊँगा लेकिन तुम अपने पिताजी की कसम खाओ, उस पिता की जो अपना खून पसीना एक कर रहा है तुम्हें यहाँ पढ़ाने के लिए। तुम उस पिता की कसम खाओ मेरे सामने कि तुम आज के बाद शराब छुओगे तक नहीं चाहे कितना भी पक्का कोई साथी क्यों ना हो”

“हाँ मैं अपने पिता की कसम खा के कहता हूँ कि मैं अब कभी भी शराब को हाथ तक नहीं लगाऊंगा बस तुम भी अपना किया वादा जरूर निभाना।” गणेश ने कर्मवीर के आगे हाथ जोड़ते हुए विनती की।

थोड़ी देर फिर से शान्ति रही फिर कर्मवीर ने गणेश से कहा,

“सोचा था पूछूँगा अब तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है लेकिन वो तो तुमने दिखा ही दिया अब क्या पूछूं समझ ही नहीं आ रहा।”

“नहीं आजकल मैंने अपनी पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। देखना अगले महीने जो टेस्ट होगा उसमें मैं तुम्हें अच्छे नम्बर लाकर दिखाऊंगा।” गणेश ने आत्मविश्वास दिखाने की कोशिश की।

“चलो अच्छी बात है ये बताओ माँ ने जो इतना प्यार से बनाकर भेजा था वो चखे ही कि नशे में उसे भी खाना याद नहीं रहा?”

“क्या बात कर रहे हो कर्मवीर माँ ने इतने प्यार से बना के भेजा था और मैं उसे नहीं खाऊंगा ऐसा हो सकता है। यार घर से कोई खाने की चीज आ जाए तो उसका तिरस्कार कोई कैसे कर सकता हिया। ये माना कि मैंने शराब पी है लेकिन मैं पूरी तरह से गिरा नहीं हूँ अभी।” गणेश का चेहरा उतर गया था।

“देखो गणेश तुम अच्छे से रहोगे तो मुझे क्या मिल जाएगा लेकिन मुझे और गाँव वालों को कितनी ख़ुशी होगी। तुम्हारे पिताजी को कितनी ख़ुशी होगी अगर तुम पढ़ लिखकर एक अच्छे इंसान बन जाओगे तब। मैं तो जो भी कहता हूँ बस तुम्हारे लिए और अपने गाँव के लिए ही कहता हूँ। मैं नहीं चाहता हूँ कि तुम कोई ऐसा उदाहरण गाँव वालों के सामने रख दो कि गाँव वाले अपने बच्चों को शहर पढने के लिए भेजने से डरने लगें। इसलिए भाई यहाँ पढने आये हो तो मन लगाकर बस पढ़ाई करो बाकी के कामों के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है।”

“ठीक है जैसा तुम कहोगे मित्र मैं वैसा ही करूँगा।” गणेश ने उत्तर दिया। थोड़ी देर और उनदोनों की बातें होती रहीं उसके बाद गणेश अपने छात्रावास के लिए निकल गया।

गर्मियों की छुट्टी में दोनों लड़के गाँव गए। वहाँ दोनों का लोगों ने खूब स्वागत किया। सभी उन दोनों से पूछते थे कि शहर में मन लगता है कि नहीं? गणेश तो शहर को ही अच्छा बताता था लेकिन कर्मवीर ने एक बार भी शहर को गाँव से बेहतर नहीं बताया। वो सबको यही कहता था कि बस पढ़ाई करनी है इसलिए वो वहाँ पर रुका हुआ है नहीं तो उसे तो वहाँ बिल्कुल भी मन नहीं लगता है। दोनों ने गर्मी की छुट्टी को बहुत ही मजे से बिताया। खूब आम और जामुन खाए और फिर छुट्टी कब ख़त्म हो गयी पता ही नहीं चला। जब दोनों वापस जाने लगे तो गणेश के चेहरे पर कोई भाव नहीं था लेकिन कर्मवीर तो रहा था उसकी आँखों में आँसू थे जिसे छिपाने का वो विफल प्रयास कर रहा था। उसे छोड़ने फिर से महावीर सिंह और मंगरू आये थे दोनों ने उसे और गणेश को रेलवे स्टेशन तक जाने वाली बस में बिठा दिया।

जब कर्मवीर वापस अपने कॉलेज पहुँच चुका था तब एक दिन छात्रावास के टेलिफोन पर उसके लिए फोन आया था। टेलिफोन पर जो अर्दली रहता था वो उसे बुलाने के लिए गया। चूँकि ये पहली बार था जब कर्मवीर के लिए कोई फोन आया था इसलिए अर्दली को उसका कमरा खोजने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी। कर्मवीर को भी आश्चर्य जो रहा था कि उसे किसने फोन पर याद कर लिया। जब उसने अर्दली से इस बाबत जानकारी लेनी चाही तो उसने कहा कि उसने तो ये पूछा ही नहीं कि उधर से कौन बोल रहा है आपका नाम ले के बुलाने के लिए कहा था सो मैं आपको बुलाने आ गया।

“ठीक है चलिए।” कहकर कर्मवीर उसके पीछे चल पडा।

फोन के पास पहुँच कर जब उसने फोन उठाया तो उधर से आवाज आई।

“हेल्लो।” कर्मवीर एक बार में ही आवाज पहचान गया।

“प्रणाम बाबूजी। कैसे हैं आप सब?”

“अरे वाह तुमने आवाज पहचान ली। हम सब तो यहाँ बहुत अच्छे से हैं ये बताओ तुम कैसे हो?”

“मैं भी ठीक से हूँ। आप फोन कहाँ से कर रहे हैं?”

“अपने घर से ही कर रहा हूँ फोन। मैंने तुम्हें पहले ही कहा था न कि अपने घर में भी फोन लगवा लेंगे। जब तुम्हारे पास से आया था तब ही फोन के लिए आवेदन दे दिया था देख लो सरकारी काम में कितना समय लग गया। आज जाकर फोन लगा है तो मैंने सोचा सबसे पहले उसी को फोन किया जाए जिसके लिए फोन लगा है। एक काम करो कागज़ कलम लेकर नम्बर भी लिख लो जब भी तुम्हें मन करेगा तो तुम हमलोगों को फोन कर लोगे।”

“ठीक है बाबूजी” कहकर कर्मवीर ने नम्बर लिखा और फिर थोड़ी देर और माँ और मंगरू से भी बातें करने के बाद वो अपने कमरे में चला गया।

कुछ दिनों बाद कर्मवीर और गणेश दोनों की बारहवीं तक की पढ़ाई खत्म हो गयी। कर्मवीर अपने पूरे कॉलेज में बारहवीं के सारे विषयों के विद्यार्थियों के बीच प्रथम आया था, वहीं गणेश बस प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो पाया था। अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई समाप्त करके दोनों एक बार फिर से अपने गाँव गए थे। दोनों अपनी आगे की पढ़ाई उसी शहर में करने वाले थे। आगे की पढ़ाई शुरू होने से पहले कुछ दिनों का जो अवकाश था उसमें दोनों एक बार फिर गाँव में ही थे। कर्मवीर से सभी बहुत ज्यादा खुश थे क्योंकि उसने पूरे कॉलेज में प्रथम स्थान हासिल किया था वहीं सभी गणेश को थोड़ी और मेहनत करने की सलाह देते थे। वो कहते थे कि वो भी कर्मवीर की तरह ही मेहनती बने। गाँव वालों की इन बातों को सुन सुनकर गणेश को चिढ़ भी हो जा रही थी। वो सबको ये समझाने में लगा जाता था कि सभी का दिमाग एक जैसा नहीं होता आखिर वो प्रथम श्रेणी से तो उत्तीर्ण हुआ। फेल तो नहीं हो गया न। गणेश को ये लग रहा था कि कितना जल्द ये समय बीत जाये और वो अपनी आगे की पढाई के लिए शहर चला जाए। गाँव के लोग उसे अच्छे नहीं लग रहे थे।

कर्मवीर ने विज्ञान का विषय ना चुनकर स्नातक में कला का साथ लेना उचित समझा। उसने पब्लिक एडमिन विषय से स्नातक करने का निर्णय लिया। जबकि गणेश ने विज्ञान से स्नातक करने के लिए नामांकन हेतु विभिन्न विश्व विद्यालयों में आवेदन दिया था। कर्मवीर ने बस शहर के दो सबसे अच्छे विश्व विद्यालयों में आवेदन दिया था क्योंकि वो जानता था कि उसके अंक पूरे शहर में सबसे ज्यादा हैं इसलिए उसका नामांकन होना तय था।

कर्मवीर का नामांकन उस शहर की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी में हुआ। उसे उस यूनिवर्सिटी के सबसे अच्छे कॉलेज में नामांकन मिल गया वहीं गणेश का नामांकन एक साधारण से महाविद्यालय में हुआ। दोनों ने फिर से अपने आगे की शिक्षा लेनी शुरू कर दी।

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