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हम उन्हें जाते हुए देखते रह गए

सुबोध इनकम टैक्स में कमिश्नर के पद पर कार्यरत थे। उनकी पत्नी सुप्रिया हाउस वाइफ थी। उनका एक ही बेटा था वरुण, जिसे पति पत्नी ने पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया था। सुबोध और सुप्रिया को वरुण की शादी की चिंता थी।

"सुबोध, अब हमें जल्दी से जल्दी वरुण की शादी कर देनी चाहिए। दो साल हो गए उसे पढ़ाई ख़त्म किए, वक़्त पर सब होना ही उचित रहता है," सुप्रिया ने कहा।

सुप्रिया की बात सुन सुबोध बोले, "हाँ सुप्रिया, मुझे भी बहुत जल्दी है। लेकिन शादी कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल तो है नहीं। लड़की ढूँढना ही आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती है।"

"तुम ठीक कहते हो सुबोध, एक अच्छी लड़की जो परिवार को साथ लेकर चले, कैसे किसी का स्वभाव पता चल सकता है? शादी तो ऐसे ही करनी पड़ती है, असलियत बाद में ही पता चलती है।"

"अरे सुप्रिया आज खाने की टेबल पर रात में हम वरुण से बात करेंगे," सुप्रिया ने भी हामी भर दी।

रात को खाना खाते वक़्त सुप्रिया ने वरुण से कहा "वरुण अब तुम्हारी शादी करनी है, तुम्हें कोई लड़की पसंद हो तो बता दो, वरना हम ढूँढना शुरू करें।"

"क्या माँ इतनी जल्दी क्या है? अभी वक़्त है" कह कर वरुण ने बात को टाल दिया।

लेकिन वरुण अब अपनी माँ से अकेले में मिलने का मौका तलाश कर रहा था। पिता के इधर उधर जाते ही वरुण ने अपनी माँ को पीछे से आकर चिपका लिया और बड़े ही प्यार से बोला "मां"

वरुण कुछ बोले उससे पहले ही सुप्रिया समझ गई "क्या वरुण, तुमने कोई लड़की पसंद कर ली है क्या?"

"तुम्हें कैसे मालूम कि मैं यही कहने वाला हूं," वरुण ने कहा

"तुम्हारी माँ हूँ बेटा, तुम्हारा चेहरा देखकर मैं टेबल पर ही समझ गई थी और तुम सुबोध की वज़ह से कह नहीं पा रहे थे। लेकिन बेटा तुम चिंता ना करो तुम्हारे पिता कभी भी ना नहीं कहेंगे।"

सुप्रिया ने रात को ही सुबोध को कहा "तुमसे कुछ बात करनी है"

तभी सुबोध ने कहा "लड़की का नाम क्या है?" और मुस्कुरा दिए

"अरे सुबोध, अभी लड़की का नाम तो मैंने भी नहीं पूछा, पर तुम्हारी तरफ से हाँ है ना सुबोध?"

"अरे पगली, यदि लड़की और परिवार अच्छा हो तो परेशानी की कोई बात ही नहीं और मुझे उम्मीद है वरुण ने इस बात का पूरा ध्यान रखा होगा"

सुबह चाय के वक़्त सुबोध ने ही बात शुरू करी, "वरुण, लड़की का क्या नाम है? क्या करती है? परिवार कैसा है, सब बताओ?"

"जी पापा, उसका नाम रश्मि है। वह दो भाई बहन हैं, पिता सेल्स टैक्स में थे, अब सेवानिवृत्त हैं और माँ हाउस वाइफ है। आपसे मिलवाने के लिए मैं आज ही, रश्मि को लेकर आऊँगा। वह मेरे ऑफिस में, मेरे समकक्ष ही काम करती है।"

शाम होते ही वरुण रश्मि को मिलवाने ले आया। रश्मि ने आते ही सुबोध और सुप्रिया के झुक कर पाँव छुए और उनके पास बैठकर, उनसे बहुत देर तक बातें करती रही। रश्मि के जाने के बाद सुप्रिया बोली "सुबोध मुझे तो लड़की बहुत पसंद आई, आपको कैसी लगी?"

सुबोध ने कहा "चलो, कल उसके माता-पिता से मिल आते हैं।"

सुप्रिया की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा और फिर रश्मि के माता पिता से मिलकर विवाह तय हो गया और कुछ ही दिन में वरुण और रश्मि जीवन भर के गठबंधन में बंध गए।

कुछ दिन बहुत ख़ुशी से बीते, फिर एक दिन अचानक वरुण को उसकी कंपनी ने विदेश भेजने का निर्णय ले लिया।

रश्मि बहुत अच्छी लड़की थी, वह बड़े ही प्यार से सुप्रिया और सुबोध के साथ रहती थी। वरुण के विदेश जाने का सुनकर, वह चिंता ग्रस्त हो गई। तभी सुप्रिया ने उसे समझाया "रश्मि चिंता क्यों करती हो, अभी तो हम दोनों एकदम स्वस्थ हैं। वरुण की तरक्की हो रही है, यह तो हम सभी के लिए ख़ुशियों भरे पल हैं।"

रश्मि ने कहा "मां मुझे आपकी और पापा की चिंता है, आप दोनों अकेले हो जाओगे उम्र भी तो बढ़ रही है।"

"कोई बात नहीं रश्मि, तुम जाने की तैयारी करो," सुप्रिया बोली।

अब वरुण और रश्मि दोनों ही अमेरिका चले गए। वहाँ से हर रोज़ उनका फ़ोन आता रहता था। सुप्रिया और सुबोध ने उन्हें भेज तो दिया, लेकिन दोनों उदास हो गए। किंतु बेटे के उज्ज्वल भविष्य की चाहत तो हर माता-पिता को होती है। वरुण हमेशा उन्हें अपने पास बुलाने की ज़िद करता रहता था।

अब तक सुबोध भी सेवानिवृत्त हो चुके थे। कुछ दिनों के लिए सुबोध और सुप्रिया वरुण के पास अमेरिका चले गए। 6 महीने वहाँ रहे, रश्मि और वरुण ने उनका बेहद ख़्याल रखा, किंतु उन्हें वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। यहाँ अपना घर, अपने मित्र उन्हें बहुत याद आते थे। वरुण और रश्मि दिन भर ऑफिस में रहते अतः सुप्रिया और सुबोध को अकेले ही वक़्त गुजारना होता था।

छः महीने बीत गए और सुप्रिया तथा सुबोध वापस अपने देश आ गए। वक़्त गुजरता रहा, वरुण दो साल में एक बार ही आ पाता था। वह हमेशा अपने माता पिता को साथ ले जाने के लिए पीछे पड़ा रहता था

"पापा चलो ना, अब आप लोग हमारे साथ ही रहा करो। उम्र भी हो रही है, आप दोनों की।"

सुबोध कुछ ना कुछ कह कर टाल जाते थे।

अब सुप्रिया और सुबोध कमज़ोर हो चले थे, उम्र का ढलना तो जारी ही था। एक दिन सुबोध ने सुप्रिया को वृद्धाश्रम के बारे बताया और कहा वहाँ बहुत अच्छी देखरेख होती है, ऐसा मैंने सुन रखा है।

फिर कुछ दिन बाद सुबोध ने डरते-डरते सुप्रिया से कहा "सुप्रिया चलो हम वृद्धाश्रम में रहने चलते हैं।"

पहले तो सुप्रिया गुस्सा हो गई लेकिन सुबोध के समझाने पर मान भी गई।

सुबोध ने कहा, "देखो सुप्रिया, वहाँ रहेंगे तो वरुण और रश्मि को भी हमारी चिंता कम हो जाएगी। वह कितना डरते हैं हमारे लिए और कितना सोचते हैं हमारे बारे में।"

सुप्रिया के हाँ कहने पर वह दोनों वृद्धाश्रम में रहने चले गए और उन्हें सब के बीच वहाँ अच्छा भी लगने लगा।

सुप्रिया के बाजू वाले कमरे में विष्णु और शोभना नाम के पति पत्नी रहते थे। आजु-बाजु में कमरा होने के कारण उनकी अच्छी जान पहचान हो गई। सुप्रिया और शोभना तो अच्छी दोस्त बन गई थी।

शोभना की उदासी देखकर, अक्सर सुप्रिया पूछती रहती थी, "शोभना तुम्हारे कितने बच्चे हैं? तुम यहाँ रहने क्यों आए हो?"

लेकिन शोभना अक्सर यह कह कर टाल देती "सुप्रिया, हमारी संतान नहीं है"

कुछ दिन बीत गए फिर एक दिन सुप्रिया ने शोभना को रोते हुए देख लिया। वह शोभना के कमरे में आई तो शोभना उसे देख कर चुप हो गई।

सुप्रिया को देखकर शोभना के पति ने कहा "तुम दोनों यहाँ बैठकर बातें करो और मैं सुबोध जी के पास जाता हूं"

जाते-जाते विष्णु ने सुप्रिया से कहा "सुप्रिया जी, जरा शोभना को समझाइए, हर वक़्त बच्चों की याद करके रोती रहती है।"

इतना सुनकर सुप्रिया ने हैरान होकर शोभना की तरफ देखा, "शोभना तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला?"

"क्या करती, सुप्रिया तुमसे यह कहती कि चार बच्चों की माँ हो कर भी आज हम वृद्धाश्रम में पड़े हैं" इतना कहकर शोभना सुप्रिया से लिपट कर रोने लगी। सुप्रिया ने उसे सांत्वना देते हुए समझाया और फिर उसके बारे में सब जानना चाहा।

तब शोभना ने अपनी कहानी बताना शुरू की, "हमारे चार बच्चे हैं, तीन बेटे और एक बेटी, सब की शादी हो चुकी है। बड़ा बेटा अर्थ है, उसकी पत्नी मौसमी है। दोनों की शादी के बाद, वह दोनों अपनी नौकरी के चलते सिडनी ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहीं सेटल हो गए। मौसमी एक अच्छी लड़की है, वह जब तक हमारे साथ थी बहुत ही अच्छे से रही। दूसरा बेटा पार्थ है, उसकी शादी दिव्यानी से हुई। वह दोनों इसी शहर में रहते हैं किंतु दिव्यानी ने कभी भी हमें अपना समझा ही नहीं। आते ही घर में लड़ना, झगड़ना, गुस्सा दिखाना शुरू कर दिया। शुरू-शुरू में पार्थ उसे समझाता था लेकिन वक़्त के साथ पार्थ धीरे-धीरे पूरा दिव्यानी की ही तरह बोलने लगा और फिर उन दोनों ने अलग रहने का फ़ैसला कर लिया।"

बीच में ही सुप्रिया ने पूछ लिया, "तो क्या अलग रहकर तुम्हारे पास आना जाना भी बंद कर दिया?"

शोभना ने कहा "वह दोनों घर से ऐसे गए कि पलट कर भी नहीं देखा। तीसरी हमारी बेटी नित्या है उसकी शादी गौतम नाम के लड़के से करी है। वह पूरा परिवार लंदन में ही रहता है। नित्या अपने परिवार में काफी खुश है, हमें फ़ोन करती रहती है। हमारा सबसे छोटा बेटा कृतार्थ है, उसने लव मैरिज की है। उसकी पत्नी मालविका बहुत बड़े बिजनेसमैन की इकलौती बेटी है, करोड़ों की प्रॉपर्टी की मालकिन है।"

कुछ देर रुकने के बाद शोभना ने आगे बोलना शुरू किया "जब कृतार्थ ने हमें इस शादी के लिए पूछा तो हमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि बेटा इतने बड़े घर की लड़की हमारे मध्यम वर्गीय परिवार में कैसे रह पाएगी। लेकिन बेटे के प्यार के आगे हमें झुकना पड़ा और हमने कृतार्थ की शादी सहर्ष ही फिर मालविका से कर दी। शादी बहुत ही धूम-धाम से हुई। बहुत ही रईस लोग मालविका की तरफ से शादी में शामिल हुए थे।"

"फिर क्या हुआ शोभना?" सुप्रिया ने बीच में ही उसे टोक दिया। सुप्रिया की उत्सुकता काफी बढ़ गई थी।

शोभना का गला भर आया था, उसने स्वयं को संभाला फिर बताया "सुप्रिया, शादी के बाद चार-पाँच दिन हम सब साथ रहे। बड़े घर की लड़की थी इसलिए हमने ज़रूरत से ज्यादा ही उसका ख़्याल रखा। उसे कोई भी तकलीफ़ ना हो, असुविधा ना हो। वह भी हमारे साथ काफी अच्छे से ही रही। उसके बाद वह अपने मायके वापस चली गई।"

एक हफ्ते बाद हमने कृतार्थ से कहा "जाओ बेटा मालविका को अब ले आओ"

"जी मां," कृतार्थ ने जवाब दिया।

उसी शाम कृतार्थ, मालविका को लेने उसके घर पहुँच गया। तीन-चार दिन हो गए तब विष्णु ने फ़ोन लगाया "तुम लोग वापस कब आ रहे हो?"

"बस पापा, दो-तीन दिन और लगेंगे। यहाँ सब बड़ी ज़िद कर रहे हैं, इसलिए मैं रुक गया, आप फ़िक्र मत करो," कृतार्थ ने कहा।

"ठीक है बेटा, कोई बात नहीं, रह लो, रह लो।"

"किंतु फिर आठ दिन निकल गए, लेकिन वह लोग वापस नहीं आए।"

फिर सुप्रिया जी मुझे डर लगने लगा तब मैंने कृतार्थ को फ़ोन लगाया, "कृतार्थ कितने दिन हो गए, कब आओगे? इतने दिन किसी के घर रहना अच्छा लगता है क्या? चलो अब वापस आ जाओ, इतना कह कर सुप्रिया जी मैंने गुस्से में फ़ोन रख दिया।"

दूसरे दिन ही सुबह दस बजे एक बहुत बड़ी गाड़ी घर के सामने आकर खड़ी हुई। "हम दोनों ने खिड़की में से देखा, ड्राइवर ने उतर कर जब दरवाज़ा खोला तब कार में से मालविका और कृतार्थ बाहर निकले। ड्राइवर ने फिर कार में से दो बड़े डब्बे, उपहार के अपने हाथ में लिए और उनके साथ अंदर की तरफ आने के लिए आगे बढ़ा। कृतार्थ और मालविका को देखकर हम दोनों बहुत ही ज्यादा खुश हो गए। तभी विष्णु ने कहा शोभना देखो, तुमने कल नाहक ही गुस्सा किया था, देखो हमारे बच्चे आ गए।"

आते ही कृतार्थ ने हमें गले लगाया और मालविका को भी मैंने अपने गले से लगाया। हम सब बैठ कर बातें कर रहे थे तभी कृतार्थ ने बोला, "मां आज मेरी पसंद का खाना बनाना"

मैंने कृतार्थ से बोला "आज मैं तुम दोनों की पसंद का ही खाना बनाऊँगी। मालविका बेटा तुम्हें क्या पसंद है, मुझे बताओ?"

फिर मैं रसोई में खाना बनाने चली गई, मालविका ने भी आकर मेरा हाथ बटाया। तब तक लगभग एक बज गया था फिर हम सब साथ ही खाना खाने बैठ गए और हँसी मज़ाक करते-करते, कैसे शाम के पाँच बज गए पता ही नहीं चला।

शाम को पाँच बजे मालविका और कृतार्थ उठकर खड़े हो गए और जाने के लिए कहने लगे।

"सुप्रिया, मैं और विष्णु तो अवाक ही रह गए।"

फिर अपने आपको संभालते हुए विष्णु ने कहा, "कृतार्थ यह क्या बोल रहे हो? कहाँ जा रहे हो?"

कृतार्थ कुछ बोले, उसके पहले मालविका ने कहा, "मां पापा मैं अपने घर की इकलौती बेटी हूँ और लाखों करोड़ों का कारोबार है। पिताजी की तबीयत अब ठीक नहीं रहती, इसलिए कृतार्थ को ही पूरा बिज़नेस संभालना होगा। माँ पापा आप पार्थ भैया के साथ क्यों नहीं रहते? थोड़ा-थोड़ा सभी को एडजस्ट करना पड़ता है। आपके पास तो पार्थ भैया भी हैं, लेकिन मेरे पापा तो अकेले हैं।"

सुप्रिया बीच में बोल उठी, "लेकिन शोभना, कृतार्थ ने कुछ नहीं बोला? वह चुप कैसे रह सकता था? यह तो घर जमाई बनने की बात ही हो गई ना, फिर क्या हुआ शोभना?"

"फिर हम दोनों उम्मीद भरी नज़र से कृतार्थ की तरफ देखते रहे, लेकिन वह हमसे नज़र ही नहीं मिला पाया। देखते ही देखते वह दोनों बाहर निकल गए और बड़ी-सी कार में हम उन्हें जाते हुए देखते रह गए।"

"शोभना, तुम्हें कृतार्थ को रोकना चाहिए था," सुप्रिया ने कहा।

"नहीं सुप्रिया, किसी के भी साथ ज़बरदस्ती करना ठीक नहीं लगता। कुछ दिनों तक, हम दोनों अपने उसी घर में रहे। कृतार्थ कभी-कभी मिलने आता था, लेकिन उसके ऊपर कार्य का भार कुछ ज्यादा ही हो गया था।"

"फिर एक दिन विष्णु ने अचानक ही निर्णय ले लिया कि हम दोनों वृद्धाश्रम में रहेंगे और वहाँ बहुत लोग होंगे तो आराम से वक़्त गुज़र जाएगा, देखरेख भी वहाँ अच्छी होती है। मैं इंकार ना कर सकी और चार बच्चों के होते हुए भी, परिस्थितियों वश हमें वृद्धाश्रम में रहना पड़ रहा है।"

"सुप्रिया, गलती तो बच्चों की भी नहीं थी सबकी अपनी-अपनी मजबूरियाँ थीं। अर्थ तो हमें अपने साथ ही रखना चाहता था, किंतु हम ही अपना देश छोड़कर नहीं गए।"

सुप्रिया ने शोभना को गले से लगाते हुए कहा, "वाह शोभना, फिर भी अपनी ही गलती निकाल रही हो। कोई बात नहीं, यहाँ हम हैं ना, हम सब वृद्ध मिलकर ख़ूब प्यार से रहेंगे।"

उसी दिन शाम को वह चारों पास के बगीचे में घूमने गए। उन्हें वहाँ एक बुजुर्ग दंपति मिले, आपस में बातचीत शुरू हुई। श्री राम करीब 75 वर्ष के थे और उनकी पत्नी श्रद्धा 73 वर्ष की थी। श्री राम ने विष्णु और सुबोध से किसी अच्छे वृद्धाश्रम के बारे में पूछा, तो उन्होंने उन्हें अपने ही वृद्धाश्रम का पता बता दिया।

सुप्रिया ने जिज्ञासा वश पूछ लिया, "आप के कितने बच्चे हैं?"

तब श्री राम और श्रद्धा एक साथ बोल उठे, "अरे अगर बच्चे होते तो हम वृद्धाश्रम में क्यों जाते, उनके साथ ही ना रहते। लेकिन भगवान ने हमें निःसंतान ही रखा है, इसलिए वृद्धाश्रम जाना पड़ रहा है"

तब सुप्रिया, सुबोध विष्णु और शोभना एक दूसरे का मुँह देखते रहे और एक सन्नाटा-सा छा गया।

अँधेरा होते-होते वह अपने वृद्धाश्रम वापस आ गए और श्री राम तथा श्रद्धा के भोलेपन के बारे में सोचते रहे।

-रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक