Stree - 33 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-33)

स्त्री.... - (भाग-33)

स्त्री.......(भाग-33)

सब के जाने के बाद घर समेटने में छाया भी तारा का हाथ बटाँने लगी तो तारा ने कहा नहीं, छोटी दीदी मैं कर लूँगी....आप बस आराम करो। ससुराल में काम करते ही हो अब मायके में कुछ दिन आराम करो......एक कमरे में छाया और उसके बच्चे सो गए। दूसरे कमरे में राजन और पिताजी सोए......लिविंग रूम में गद्दे बिछा कर बाकी हम तीनों सो जाँएगे सोच तारा के साथ मैं जगह बना रही थी तो तारा बोली, दीदी आप और माताजी आराम से सो जाओ, मैं नीचे वर्कशॉप में सो जाऊँगी......नहीं तारा नीचे नहीं सोना है.....तुम्हे लग रहा है दिक्कत होगी तो ऐसा करो तुम छाया वाले कमरे मैं नीचे गद्दा बिछा कर सो जाओ......रात को बच्चे परेशान करें तो छाया को हेल्प भी मिल जाएगी। मैं और माँ लिविंग रूम में गद्दे पर सो गए....गद्दे पर सोना हमारे लिए कोई नई बात तो थी नहीं......माँ और मैं बहुत देर तक बाते करते रहे। गाऎव की आस पड़ोस की। सबके बारे में जान कर ऐसा लगा कि मैं ही गाँव घूम आयी हूँ। माँ अब राजन की शादी करवाने की फिक्र ले कर आयी थी, पर अब उन्हें मेरी भी शादी की फिक्र हो रही थी। माँ को लग रहा था कि विधवा की शादी तो एक बार फिर भी जल्दी हो जाती है, पर तलाकशुदा लड़की की शादी कराना बहुत मुश्किल भरा काम है। लोग पिछली शादी क्यों टूटी इसकी जाँच पड़ताल करते हैं,फिर कहीं जा कर बात बनती है......माँ लड़का तलाकशुदा हो तो उसकी भी शादी कराने पर यही सब तकलीफें आती होंगी.....तो माँ बोली ना बेटी तलाक का ठीकरा भी लड़की के सिर पर फूटता है, अब देख सुधीर बाबू ने दूसरी शादी तुरंत कर ली, तूने ही बताया है न!! मैं उनसे बहस नहीं करना चाहती थी और न ही सोमेश जी के बारे में बताना चाहती थी क्योंकि मुझे भी कहाँ पता था कि उनको मैं पसंद आयी या नहीं ? अगली सुबह के इंतजार मैं कब हम माँ बेटी की आँख लग गयी पता नहीं चला...। तारा जब नहा धो कर आयी तब मेरी आँख खुली। बिस्तर पर माँ नहीं दिखी तो पता चला वो तो नहा धो कर पूजा पाठ भी कर चुकी हैं.....मैं भी जल्दी से उठ गयी और नहा धो कर तैयार हो गयी। राजन और पिताजी भी तब तक बाहर आ गए थे और तारा सबके लिए चाय बना रही थी.....बच्चे तो सोए हुए थे और हम लोग प्रोग्राम बना रहे थे कहीं घूमने का। राजन को कार चलानी आती है, जब ये पूछा तो उसने कहा हाँ आती है पर क्यों? फिर मैंने उसके हाथ में कार की चाबी रख दी.....नीचे अपनी कार है, सबको उसी में घूमा कर लाना है। "वाह दीदी आपके पास कार भी है! ये तो पता नहीं था, राजन ने खुश होते हुए कहा"।
हाँ राजन ज्यादा समय नहीं हुआ है। आप सब आ रहे हो पता चला तभी खरीदी जिससे माँ पिताजी को दिक्कत न हो घूमने में....तारा को नाश्ता बता मैं नीचे चली गयी काम देखने। सुबह की शिफ्ट वाले कारीगर आ गए थे......उनको सब कुछ बता कर और जो रात को तैयार हो गए थे उनको चेक करके फिनीशिंग के लिए कह ऊपर चली गयी। रसोई में छाया और माँ काम कर रही थी और तारा ऊपर के काम...। राजन और पिताजी टी वी देख रहे थे। नाश्ता करके घूमने जाने का प्रोग्राम बन गया था....। मैं अपना सब सामान समेट रही थी कि मेरी मोबाइल बज उठा....फोन बंसल सर का था। फोन उठा कर हैलो बोला तो बंसल सर ने कहा जानकी तुम सोमेश से दो बार मिल ली बताओ तुम्हें कैसा लगा? सर आपने पहले सोमेश जी से पूछा कि उन्हें मैं कैसी लगी? कहते हुए मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, कान और गाल बहुत गरम हो गए थे जिसकी गरमी मैं महसूस कर पा रही थी। बेटा मैंने पूछ लिया उससे, उसे तुम पसंद हो, शादी बिल्कुल सिंपल करना चाहता है और वो कह रहा था कि तुम्हारी फैमिली आने वाली है। हाँजी सर कल आ गए हैं। ठीक है बेटा, मैं सोमेश को बोलता हूँ वो तुमसे बात कर ले। वो तुम्हारी फैमिली से पहले मिलने आएगा, बाकी सब उसके बाद हम बड़े डिसाइड कर लेंगे। जी सर ठीक है, मैं ही फोन करके बात कर लेती हूँ.....बसंल सर की बात सुन कर दिल खुशी से नाच उठा। सोमेश जी को कुछ देर बाद फोन करूँगी सोच कर मैं पिताजी के पास चली गयी। मैं माँ से पहले बात नहीं करना चाहती थी, माँ को मेरी बेबाकी कभी पसंद नहीं आयी और शरमाने की मेरी उम्र थी नहीं। पिताजी मेरे जो सबसे पहले क्लाइंट बंसल सर हैं, उन्होंने ही ये जगह मुझे किराए पर दी है.....ये तो बहुत अच्छी बात है, देखो आज भी अच्छे लोग मौजूद हैं इस दुनिया में....पिताजी अभी और कुछ कहते कि मेरा फोन फिर बज गया। इस बार सोमेश जी का था, पिताजी के सामने से हटते हुए ठीक नहीं लगा, इसलिए थोड़ा झिझक भी रही थी फोन उठाने से पर जैसे तैसे उठाया, अब जब पता चल गया था कि वो मुझे पसंद करते हैं तो शरमा भी रही थी, मैंने अपने आप को संभाला और हैलो बोला, " जानकी सब आ गए हैं ? हाँ, कल सुबह आए। मैं उनसे शाम को 8 बजे मिलने आऊँगा डिनर करूँगा। बस मीठा मत बनाना मैं ले आऊँगा..."! जी, ठीक है मिलते हैं डिनर पर, कह फोन रख दिया गया। कौन आ रहा है दीदी डिनर पर? राजन ने पूछा तो पिताजी भी मेरी तरफ देखने लगे। पिताजी बंसल सर के छोटे बेटे हैं सोमेश जो डॉ. हैं एक सरकारी हॉस्पिटल में, सर चाहते हैं कि मैं उनके बेटे से शादी कर लूँ। सोमेश जी की पत्नी का देहांत 3 साल पहले एक एक्सीडेंट में हो गया था, जब वो अपने मायके गयी हुई थी। बंसल सर ने मुझे रिक्वेस्ट की थी कि हम दोनो 2-3 बार मिल लें तो हम कुछ दिन पहले मिले थे, वो आज आप सबसे मिलने आ रहे हैं। उनको मैं पसंद हूँ। मैंने फर्श की तरफ देखते हुए एक सांस में सब कह दिया। वाह दीदी, ये तो बहुत अच्छी बात है, पर एक बार छानबीन कर लेनी चाहिए कि जो वो बता रहे हैं, वो सही है या नहीं। राजन नें अपना पुलसिया दिमाग लगाते हुए कहा और पिताजी किसी सोच में पड़ गए और फिर बोले ये बसंल जी को तुम कब से जानती हो?6-7 साल से पिताजी।
सब क्लाइंटस माल की डिलीवरी होने के 15 दिन या 1 महीने बाद पैसे देते हैं वो भी चेक पर बसंल सर डिलिवरी के साथ ही सब पैसा दे देते हैं ज्यादातर कैश। इनका काम बहुत अच्छा है और उनकी इमेज काफी अच्छी है मार्किट में...। ठीक है जानकी, सोमेश जी से मिल लेते हैं और अगर सब सही रहा तो परिवार से भी मिल लेंगे। पिताजी उन्होंने न मेरे तलाक की वजह पूछी और न मैंने उनकी पत्नी के बारे में.....तो आप खुद से पहले मत पूछिएगा। ठीक है, नहीं पूछूंगा और राजन तू भी अभी माँ को बताना मत। पहले ही सौ तरीके की बातें कहने लगेगी और फिक्र करेगी वो अलग.....। नहीं बोलूँगा पिताजी.....क्या बातें हो रही हैं तुम तीनों में....माँ रसोई से बाहर आते हुए बोली। माँ बस सोच रहे हैं कि कहाँ जाए घूमने? नाश्ता करने के बाद राजन बच्चों और छाया को लेकर एस्सल वर्ल्ड ले गया। बहुत भीड रहती थी छुट्टियों के दिन और वीकेंड पर....थोड़ा सामान बच्चों के खाने के लिए दे दिया था और मैंने चुपके से राजन को पैसे दे दिए क्योंकि राजन कमाता नहीं है और छाया पैसे दे ये ठीक नहीं लगता। मुझे अच्छा लगा जब राजन ने चुप करके रख लिए पैसे.....वो मुझे समझता है, मेरे लिए इतना ही काफी था। माँ और पिताजी के होते हुए छाया भी मजे न कर पाती खुल कर इसलिए हम तीनों बाजार घूम आए और रात के डिनर के लिए सामान भी ले आए और लंच भी बाहर ही किया और तारा के लिए पैक कर लिया। उसको भी आने को कहा था, पर वो बोली कि नीचे भी कोई होना चाहिए तो मैंने भी ये ठीक समझा। पिताजी को हमारे साथ घूमना पसंद आ रहा था.....वो चाह रहे थे कि हर खरीदारी के पैसे वो दें, पर मैंने भी जिद की और याद दिलाया आप ही कहते थे न कि जानकी भी लड़के से कम नहीं तो आप बड़े बेटे के पास आए हो। आप ये समझिए। उसके बाद उन्होंने जिद नहीं की।घर आए तो तारा नीचे ही बैठी थी। मैंने उसको लंच करने को ऊपर आने को कहा....तारा को खाना दे कर मैं चेंज करने चली गयी। माँ और पिताजी को थोड़ी देर आराम करने को कह मैं तारा के साथ डिनर में क्या क्या बनेगा बताने लगी। कढी पकौडा, चावल, मिक्स वेज, और मसाला भिंडी बनाने का विचार था मेरा....मीठा बनाने से मना किया था सोमेश जी ने। सामान सब आ ही चुका था। सब्जियाँ खाना खाने के बाद तारा ने काटनी थी और मैं शाम की चाय से पहले भेलपूरी बनाने में लग गयी। माँ ने बाहर खाना ठीक से नहीं खाया था।राजन भी सब को ले कर 6:30 तक वापिस आ गया था...बच्चे तो बेहाल हो रहे थे थकान से....उनके हाथ मुँह धुला कर छाया ने उन्हें दूध ब्रैड खिलाया और सुला दिया। उसके बाद ही उसने चाय पी। "सुनो आज कोई खाने पर आ रहे हैं, हमसे मिलने तो ज्यादा पूछताछ करने मत बैठ जाना उसके घर परिवार की"...... पिताजी के ऐसे कहते ही माँ नाराज हो गयी, "हाँ मैं ही तो फालतू बोलती हूँ न, आप कहो तो कमरे से बाहर ही न निकलूँगी"! अरे माँ तुम भी तुरंत उखड़ जाती हो, पिताजी कहना चाह रहे हैं कि ये शहर है, तो यहाँ लोग एक दूसरे से ज्यादा सवाल नहीं पूछते बस इतना ही कहा है, अब नाराज मत हो और सब देखो कि ठीक बना है या नहीं? राजन ने माँ को संभाल लिया। छाया ने जब सुना मेहमान आ रहे हैं तो वो तुरंत सब कुछ ठीक करने लगी। हम भी तैयार थे और डिनर भी तैयार।सोमेश जी को भी पता था कि सब इंतजार कर रहे होंगे इसलिए 8 बजने से कुछ पहले ही आ गए......पिताजी तो उनकी समय की पाबंदी देख कर ही संतुष्ट से दिख रहे थे। सोमेश जी ने माँ पिताजी के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और राजन के साथ हाथ मिलाया, तारा और छाया से हाथ छोड़ कर नमस्ते और मेरी तरफ एक हैलो उछाल दिया और एक पैकेट फ्रिज में रखने को पकड़ा दिया। राजन से बातें ऐसे करने लगे जैसे बहुत पुराने दोस्त हो। माँ तो लड़का मेरा दोस्त है इस बात से खुश नजर नहीं आ रही थी। राजन और पिताजी से बाते करते हुए बिल्कुल सहज दिख रहे थे, जैसे पहली बार मुझसे मिले थे। पानी पीने के बाद घर की बनी मिठाइयाँ तारा ने उनके आगे रख दी तो उन्होंने बहुत चाव से खाई और माँ को थैंक्यू भी बोला। माँ को आदत नहीं थी ऐसे बाहर के आदमियों से बात करने की। उनकी दुनिया में दो ही आदमी थे राजन और पिताजी। दामाद जी के सामने भी कम ही बाहर आती थीं। सोमेश जी तो इनसे पूछने बैठ गए कि आपने कैसे बनाई ये मिठाई। माँ के लिए ये आठवां अजूबा था कि आदमी पूछ रहा है। पिताजी ने इशारे से बताने को कहा तो माँ को बतानी पड़ी। माँ को अपने गँव की भाषा की आदत थी, फिर भी माँ ने धीरे धीरे बता दी। सबने मिल कर खाना खाया। बच्चों से मिलने का दिल थाउनका ,पर बच्चे तो सो गए थे। खाने के बाद पैकेट निकाला तो रसगुल्ले थे और बच्चों के लिए चॉकलेट!! उनके लाए रसगुल्ले सर्व किए। उन्होंने रसगुल्ले वाली कटोरी टेबल पर रखते हुए बोले....मैं यहाँ आप सबको बताने आया था कि मैं जानकी से शादी करना चाहता हूँ। मेरे पिताजी सालों से जानकी को जानते हैं। मेरे बारे में आप जानकी से सब कुछ पूछ सकते हैं, मैं नहीं जानना चाहता कि जानकी का तलाक क्यों हुआ, पर मैं आपको ये जरूर बताना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी की एक्सीडेंट में डेथ हो गयी थी। आप लड़की वाले हैं, आप छानबीन कर सकते हैं। उनका खुलापन और स्पष्टवादिता के पिताजी कायल हो गए। बेटा आगे की बात करने हम आपके घर आना चाहेंगे, पिताजी ने तुरंत फैसला ही ले लिया जो माँ को पसंद नहीं आया क्योंकि माँ को पूछा भी नहीं था....। राजन ने कहा चलिए अब तो आप मुँह मीठा कीजिए। सोमेश जी से मिल कर सब बहुत खुश थे। सबसे विदा ले कर वो चलने लगे तो राजन बोला दीदी नीचे तक छोड़ आओ। नीचे कार तक छोड़ने गयी तो वो बोले, जानकी तुमने तो बताया नहीं कि तुम्हें मैं पसंद हूँ या नहीं? वो तो मैंने "सर " को सुबह बता ही दिया था। अब तुम उन्हें पापा कहने की आदत डालो। मम्मी पापा से बात करके बताता हूँ कि कब की मीटिंग रखें दोनो परिवारों की.....ठीक है आप बता देना। गुडनाइट बोल कर ऊपर आयी तो राजन ने खूब हंगामा कर रखा था और माँ मुँह फुलाए बैठी थी कि मेरी राय पूछे बिना ही हाँ कर दी और पिताजी उन्हें सब समझा रहे थे। तारा अलग से छाया को डिटेल में बता रही थी। मेरे लिए सब एक सपने जैसा था। मन कर रहा था कि बस वक्त यहीं ठहर जाए.....मैं अपने हिस्से की खुशियां समेट कर स्टोर कर लूँ।
क्रमश;
मौलिक और स्वरचित
सीमा बी.

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