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चेत:पँचाशिका

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माँ वीणापाणि को नमन करते हुए सर्वप्रथम आ.गुरुदेव डॉ. उमाकांत जी शुक्ल को ह्रदय से प्रणाम करती हूँ | यह आदरणीय डॉ.शुक्ल का मेरे प्रति अतिरिक्त स्नेह व आशीष ही है कि इतनी दूर गुजरात में बैठी हुई मुझे अपने ज्ञान से सिंचित कराने हेतु मुझ तक अपनी चार पुस्तिकाओं को पहुंचाने का कष्ट किया | जैसा मैं बहुधा कहती हूँ, अपने हर साक्षात्कार में भी मन से स्वीकार करती भी हूँ कि मेरी गिनती तो कभी उच्च स्तरीय छात्रों में रही ही नहीं | हाँ, शैतान छात्रों में अवश्य मुझे उच्च आसन पर आसीन किया जा सकता है| 

मित्र सोच रहे होंगे कि मैं क्यों व्यर्थ ही इन बातों का जिक्र कर रही हूँ किन्तु ऐसा नहीं है जब कोई भी ऐसी बात अथवा घटना अथवा लोग हमारे सामने वर्षों बाद आते हैं, हम अपने जीवन के पीले पड़ गए पृष्ठ पलटते हुए वहीं जा पहुंचते हैं जहाँ से हमारी जीवन-यात्रा आरंभ हुई थी | तब अपने बारे में सच सोचने का मन होता है | कारण कि हम भी तो शनै:शनै: उस कगार पर जा खड़े होते हैं जहाँ से चेतना हमें पुकारती है | मेरे साथ तो यह बहुधा होता है और मुझे विश्वास है कि आयु के किसी मोड़ पर यह सबके साथ ही घटित होता होगा| 

आ.गुरुदेव के द्वारा प्रेषित चार पुस्तिकाओं को मैंने शिरोधार्य किया | पुस्तकें प्राप्त किए हुए खासा समय व्यतीत हो गया लेकिन मैं एक सरसरी निगाह ही डाल सकी, कुछ लिखने का साहस ही नहीं कर पाई | इससे आगे बढ़ने के लिए सरसरी दृष्टि पर्याप्त नहीं होती और वह भी संस्कृत में ! जिसको पढे हुए बरसों व्यतीत हो चुके थे | उसको समझना ही मेरे कुंद मस्तिष्क के लिए टेढ़ी खीर था | 

चार पुस्तिकाएँ मेरे समक्ष थीं और मैं मूढ़मति समझ नहीं पा रही थी कि यदि उन्हें पढ़ भी लिया तो आखिर लिखूँगी क्या? खैर, भयभीत होते हुए किसी प्रकार पुस्तकें खोली गईं थीं, भौतिक से आध्यात्मिक की ओर बढ़ते मन के भावों से प्रभावित होना स्वाभाविक था | ईमानदारी से कहूँ इच्छा थी कि केवल संस्कृत पद्य पढ़कर उन्हें समझूँ और फिर कुछ लिखने का प्रयास करूँ लेकिन यह संभव न हो सका | मेरी यह सोच और इच्छा अधिक समय की मांग कर रही थी अत:मुझे अँग्रेजी और हिन्दी की सहायता लेनी ही पड़ी | उसमें मेरा एक और लाभ यह हुआ कि मेरे दूसरे पूज्य अँग्रेजी के गुरुदेव डॉ. जगदीश प्रसाद जी शुक्ल का भावानुवाद पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | साथ ही आ.पूज्य सत्यव्रत जी शास्त्री की भूमिका पढ़ने का भी सुअवसर प्राप्त हुआ जिनके कभी मैंने दर्शन तो नहीं किए थे किन्तु माता-पिता के संस्कृत के प्रति प्रेम व ज्ञान के कारण न जाने किन संदर्भों में मैंने उनकी विद्वता का बखान कितनी बार घर में सुना था| 

मेरे समक्ष अब चार पुस्तकें थीं और उनको एकसाथ समझना मेरे लिए अति दुरूह कार्य था अत:सबसे पहले चेत: शब्द ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, प्रभावित किया यानि चेतना, मन का वह भीतरी आयाम जो जागृति देता है | यह मनुष्य को अन्तर्जगत से जोड़ती है और विवेकबुद्धि के सामंजस्य से प्राणी को कल्याणमय मार्ग की ओर ले जाती है| 

याद आते हैं अम्मा-पापा जिन्होंने बी.ए में मुझ जैसी नादान, शैतान को ज़बरदस्ती तीन साहित्य दिलवाए थे जो हमारे समय में संभव था | संस्कृत, हिन्दी, अँग्रेज़ी ! माता-पिता संस्कृत की परीक्षा के दिन दाएं, बाएं बैठ जाते और फिर शुरू होती मेरी परीक्षा जिसमें मैं सदा ही असफ़ल रहती | संस्कृत तो मुझे सदा से ही बहुत कठिन लगी है | 

बचपन से ही जब रूप रटने पड़ते और सुनाने पड़ते मैं रो जाती| अम्मा तो तरस खा भी लेतीं लेकिन पापा ---बिलकुल भी नहीं| कितनी भी मशक्कत होती लेकिन मुझे रटने ही पड़ते | अम्मा बेचारी बार-बार समझातीं कि एक बार व्याकरण समझ ले तो कोई दिक्कत नहीं होगी लेकिन वो तो मैं थी, आसानी से कुछ समझ में आ जाए तो नाम न बदल जाए क्या?पापा दिल्ली में थे अत:मुझे कुछ वर्ष दिल्ली में रहकर DPS में पढ़ने का अवसर मिला था और मेरा अधिक झुकाव अँग्रेजी की ओर था| वैसे कोई विशेष विद्वता किसी में भी नहीं प्राप्त कर सकी | फिर कभी पापा के तो कभी अम्मा के पास दोनों जगह खिंचती रही इसीलिए शायद अपने आपको वहाँ के बच्चों से कुछ अधिक समझने की फूँक भी मुझमें भरी रही होगी, मैं ऐसा सोचती हूँ| यद्धपि बड़े होने के साथ संस्कृत श्लोकों का गायन मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था जिसका कारण माँ थीं | उन्होंने मुझे सिखाया कि सही उच्चारण के बिना श्लोक-वाचन नहीं करना चाहिए| 

आ.गुरुवर्य के लेखन के बहाने मुझे अपनी अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त हुआ है| नमन करते हुए कहना चाहती हूँ कि अन्तरचेतना से प्रस्फुटित इन इक्यावन पद्यों में मुझे एक ऐसी चेतना का आभास हुआ जो मनुष्य को एक सचेतन मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर जागृति का संदेश देती है| सच कहूँ तो मुझे इतने वर्षों के बाद संस्कृत पढ़ने में आनंदानुभूति हुई, इसके लिए मैं आ.डॉ.शुक्ल के प्रति नतमस्तक हूँ | 

मालूम नहीं, मैं क्या लिख पा रही हूँ, न्याय तो नहीं ही कर पा रही हूँ कितने प्रयास के पश्चात भी मैं संस्कृत शब्दों को अपने लैपटॉप पर सही रूप में लिखने में असमर्थ हूँ| आदरणीय गुरुदेव !मैं करबद्ध क्षमा याचना करते हुए आपके मन में उठे सदभावों को केवल हिन्दी व अँग्रेज़ी के भावानुवाद के सहारे ही कुछेक पंक्तियाँ कहने का साहस कर रही हूँ| मुझे ज्ञात है, इसमें हलंत तक की त्रुटियाँ हैं | 

चेतना का यह आलंबन इस प्रथम पद्य से ही प्रदर्शित होता है और जागृति का संदेश देता है| 

1

देशश्च शक्तिश्च कुलं प्रतिष्ठा

मित्राणि भार्या तनुजास्तथा च | 

अत्रैव वित्तम पुनरत्र वेश्म

चेत:!समं यास्यति नैवं किञ्चित | | 

(एक प्रयास किया है किन्तु पूर्णत: शुद्ध नहीं लिख पाने के कारण आगे संस्कृत पद्य नहीं लिख  रही हूँ | )

1-हे चित्त, देश, शक्ति, कुल, प्रतिष्ठा, मित्र, पत्नी , पुत्र-पुत्रियाँ, महल -दुमहले सब यहीं धरे रह जाएंगे, तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा | 

Move on Pilgrim (Soul), stay not

For any road-side Lure-----

Wealth, relations, progeny et al

---Lest vision be abscure.

कवि उस सर्वशक्तिमान की खोज में हैं, वे अपने चित्त को झकझोरते हैं---शाश्वत सत्य की ओर अग्रसर होना ही उनका ध्येय है | 

16-ही चित्त, तू यथाशीघ्र उसी ईश को ढूंढ;जिसका न जन्म होता है, जिसमें न कोई परिवर्तन होता है , जिसमें न कोई बढ़ोत्तरी होती है, जिसमें न कोई घटत होती है और न जिसका नाश ही होता है | 

Make the ABSOLUTE thy goal, the ONE

Who is neither born nor die

Immune to the vagaries of time and place

To whom no Nature’s law applies.

अपने अंतर की यात्रा करते हुए कवि संताप करते हैं, बीते हुए समय के लिए उनके मन में पीड़ा है, क्षमा-याचना भी --

38—हे मूढ़ चित्त, तूने यहाँ के लोगों का सारा सुख-चैन चुराया और स्नेही जनों को बहुत कष्ट दिए, उम्र धीरे-धीरे सुरमेदानी की तरह समाप्त हो गई है, बस अब तू संताप करता रह | 

Sleepless nights you gave to many, 

Wont spare e’en yer own

Ebbing now as kohl in a phial

Left with naught but bootless groan .

कवि कृतज्ञ हैं उस परमपिता परमात्मा के प्रति जिनकी अनुकंपा से जीवन सहजता से व्यतीत हो गया है|  जीवन के इस कगार पर ईश्वरोपासना के लिए कवि अपने मन को संभलने के लिए प्रेरित करते हैं---

49—जिनकी कृपा से समय भली भाँति बीत गया है, हे चित्त, तू उन भावगम्य श्री वासुदेव का भजन कर;यह पृथ्वी, धन और घर कुछ भी तेरे साथ वहाँ नहीं जाएगा | 

Hail Krishna, my guide, my saviour

In my heart enshrined

All else including the Earth itself

Has to be left behind.

अंतिम पद में कवि समस्त तत्वों के प्रति नमन करते हुए इस क्षणभंगुर जीवन की वास्तविकता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं, उन्हें नमन करते हुए उस वे इस भौतिक जीवन से वास्तविक परमधाम को पुकारते हैं | 

51--हे भूमि, हे वायु, हे अग्नि, हे जल, हे आकाश आप सबको मेरा अंतिम प्रणाम है, हे चित्त , अब मैं दूसरे दूसरे देश जाना चाहता हूँ | 

O my skeyey dome

Time to bid  a grateful adieu

I’m bound a distant home .

इन पद्यों में वैराग्य भाव से उत्पन्न मानसिक स्थितियों के अनेक चित्र दृष्टव्य हैं| कवि ईश्वर के प्रति धन्यवाद अर्पित करते हैं कि उन्होंने उदर पूर्ति के साधन दिए हैं | कहीं श्रम की बात भी करते हैं, प्रेम की बात करते हैं| प्रत्येक मनुष्य की एक अवस्था ऐसी आती है जब उसका मन इस प्रकार चिंतनशील होता है, जीवन नि:सार लगने लगता है और यह अनुभूति होती है कि हँस ! अब तुझे उड़ जाना है | अपने से छोटों को अपने सामने जाते देखकर वे और भी द्रवित हो उठते हैं और अपने जीवन में पूरी आस्था के साथ भगवत शरण में लीन हो जाना चाहते हैं | विरक्ति की आद्रता से भीगा हुआ मन ईशोपासना में निमग्न हो जाना चाहता है| 

कुल मिलाकर कवि सम्पूर्ण हृदय की गहराइयों से समर्पण चाहते हैं और अपने चित्त से वार्तालाप करते हुए उसे भौतिक से आध्यात्मिक मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं| यह एक प्रेरणा है हम सबके लिए कि चिंतन करें और इस जीवन की वास्तविकता को पहचानकर आगे बढ़ें, बीता हुआ समय कभी वापिस नहीं आता जिस प्रकार हाथ से बुरती हुई रेती पुन:मुठ्ठी में कैद नहीं हो सकती इसी प्रकार जीवन का व्यतीत हो गया समय कभी वापिस नहीं आ सकता | इस वास्तविकता को समझें और उस पिता के प्रति स्वयं को समर्पित कर दें जिसके पास हमें अंत में जाना है , उस ईश की स्मृति में खोए रहें| 

एक साथ लिखने में स्वयं को असमर्थ पाती हूँ | प्रयास किया है कि अपनी सूक्ष्म बुद्धि से कुछ समझ  सकूँ| अन्य पुस्तकों की संवेदनाओं को समझकर  शीघ्र ही कुछ कहने की और गुरु जी के चरणों में समर्पित करने की इच्छा है| 

सादर प्रणाम सहित

अकिंचन

प्रणव