Kshama Karna Vrunda - 19 - Last Part in Hindi Fiction Stories by Pradeep Shrivastava books and stories PDF | क्षमा करना वृंदा - 19 - अंतिम भाग

Featured Books
Share

क्षमा करना वृंदा - 19 - अंतिम भाग

भाग -19

नाश्ता अब भी जस का तस रखा था। हम-दोनों ने एक-दो घूँट कॉफ़ी ही पी थी बस। वृंदा की बातें सुनकर मैं बहुत भावुक हो गई। मैंने कहा, “सच वृंदा तुम जैसे लोग ही इस पृथ्वी पर साक्षात्‌ देव-दूत हैं। लेकिन मेरी प्यारी वृंदा, यह क्यों भूल रही हो कि इसके ट्रीटमेंट में कोई दस-बीस हज़ार नहीं, दस-बीस लाख रुपए लगना एक मामूली बात है . . .”

वृंदा ने मुझे यहीं रोकते हुए कहा, “जानती हूँ। ईश्वर की कृपा से हस्बैंड बिज़नेसमैन हैं। और बिज़नेस इतना बड़ा है कि यह रक़म उनके लिए कुछ भी नहीं है। जितना बड़ा उनका बिज़नेस है, पैसा है, उससे भी कहीं बहुत ज़्यादा बड़ा उनका दिल है।

“जानती हो, लॉक-डाउन में पूरा बिज़नेस, पूरी तरह से ठप था। लेकिन उन्होंने अपने स्टॉफ़ से कहा कि ‘परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। सब लोग मिलकर इस समस्या से निपट लेंगे।’ सुप्रीम-कोर्ट ने लॉक-डाउन पीरियड में प्राइवेट कंपनियों को यह छूट देकर सारे कर्मचारियों को एक तरह से मौत के रास्ते पर धकेल दिया था कि कंपनियों को सैलरी देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

“उसके इस निर्णय के बावजूद उन्होंने कर्मचारियों को पूरी सैलरी दी। आज तुमसे पहली बार यह बता रही हूँ कि यह नौकरी मैं केवल अपने शौक़ के लिए कर रही हूँ। मेरी सैलरी का एक भी पैसा आज-तक अकाउंट से निकला ही नहीं।

“वह हर महीने शुरू से ही मुझे लगातार इतनी पॉकेट मनी देते हैं आ रहे हैं, जो मेरी सैलरी से ज़्यादा है। पिछले पंद्रह साल में यह सारा पैसा मिल कर इतना इकट्ठा हो गया है कि बीस क्या चालीस लाख भी मैं ख़र्च कर सकती हूँ।

“अब तुम्हें कुछ भी इफ़-बट करने की आवश्यकता नहीं है। कल से ही तुम्हारा ट्रीटमेंट शुरू करवाते हैं। मेरी बातों पर तुम्हें यक़ीन हो जाए, इसलिए घर पहुँच कर मैं अपने हस्बैंड से तुम्हारी बात करवाऊँगी।

“तुम देखना, मेरा हस्बैंड मदद के लिए मुझसे भी दस क़दम आगे न निकले तो कहना। देखो तुम मेरी मित्र ही नहीं, बहन भी हो। मैं तुमसे बड़ी भी हूँ। इसलिए इतने अधिकार के साथ कहती हूँ कि अब मैं जो कहूँगी, वह तुम्हें मानना ही होगा। पहले ही तुम थोड़ी बहुत नहीं, बड़ी आत्मघाती लापरवाही कर चुकी हो।”

वृंदा की बातें सुनकर मेरी आँखों से आँसू, मोतियों की लड़ी बन कर मेरे गालों को स्पर्श करते हुए नीचे को गिरने लगे, तो वृंदा ने उन्हें पोंछते हुए कहा, “फ़्रेशिया यह क्या? ऐसे हिम्मत नहीं हारते। आँसू नहीं बहाते।”

मैंने उसके हाथों को पकड़ते हुए कहा, “मेरी प्यारी बड़ी बहन यह आँसू इसलिए नहीं आए कि मैं परेशान हूँ। यह ख़ुशी के आँसू हैं कि तुम जैसी बड़ी बहन मेरे साथ है। लेकिन बहन मेरी बात भी तुम समझने की कोशिश करो। जब यह पूरी दुनिया ही नहीं चाहती कि हम जैसे लोग ठीक हों, तो मैं कैसे ठीक हो जाऊँगी।

“पूरी दुनिया से तुम और मैं अकेले कहाँ लड़ पाएँगे। हमें जिन हथियारों से लड़ना है, वो सब इन्हीं के बनाए हुए हैं। यह हथियार इन्होंने कैंसर जैसे दुश्मन से जीतने के लिए बनाए ही नहीं हैं। इसीलिए हर रोज़ कैंसर से क़रीब सत्ताईस हज़ार लोग मरते हैं, लेकिन कहीं तुम्हें कोई हाहाकार, दुनिया, सरकार के माथे पर शिकन नज़र आती है।

“कोरोना! यह तो पूरी दुनिया में फैल चुका है। अपने पीक पर है, तब भी एक दिन में औसतन क़रीब आठ से नौ हज़ार लोग ही मर रहे हैं। इससे ज़्यादा भयानक स्थिति तो कार्डियोवैस्कुलर डिज़ीज़ से मरने वालों की है। इससे रोज़ क़रीब उनचास हज़ार मौतें हो रही हैं।

अस्थमा से हर रोज़ ग्यारह हज़ार लोग मर रहे हैं। लोअर रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन हर दिन सात हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान ले रहा है। लेकिन कभी भी रोज़ मरने वाले इन लाखों लोगों के प्रति तुमने कहीं कोई चिंता, कोई हैरानी-परेशानी देखी है?

“निश्चित ही नहीं देखी होगी, क्योंकि दवा कंपनियाँ, सरकारें यही तो चाहती हैं, समझती हैं कि इन बिमारियों से लोग तुरंत नहीं, कई सालों में तिल-तिल करके मरेंगे। और मरने से पहले अपनी, अपने शुभ-चिंतकों की सारी कमाई, दवा खरीद-खरीद कर इन्हीं दवा कंपनियों को सौंप जाएँगे।

“इनका प्रॉफ़िट आसमान को छुएगा, और इन दवाओं पर भारी-भरक़म टैक्स वसूल कर सरकारें अपना ख़ज़ाना भरेंगी। इसिलए दवाएँ ऐसी बनाई जाती हैं कि मरीज़ लंबा खिंचे, दवा बिके, दवा उद्योग फूले-फले।

“कोरोना वैक्सीन बनाने को लेकर दुनिया-भर में कंपनियों, सरकारों के बीच जिस तरह की अंधी होड़ मची हुई है, परस्पर बयानबाज़ी हो रही है, उससे मुझे लग रहा है कि आनन-फ़ानन में कोई वैक्सीन लांच कर दी जाएगी।

“स्थितियाँ जितनी डरावनी हैं, उससे यह भी साफ़ है, जो भी कम्पनी पहले बना लेगी, वह वैक्सीन मार्केट में लाते ही इतना मुनाफ़ा कमा लेगी, जितना उसने बीते दस वर्षों में भी नहीं कमाया होगा। और उस देश की सरकार उस पर टैक्स लगा कर कमाएगी।

“पैसा कमाने की यह होड़ उन्हें यह भी सोचने से रोक देगी कि वैक्सीन वाक़ई कितनी कारगर है, उसके साइड एफ़ेक्ट कितने और कैसे होंगे? यह वैक्सीन इन कंपनियों का ऐसा प्रॉडक्ट होगा, जो मार्केट में आने से पहले ही एडवांस बिक चुका होगा।

“अरब दो अरब नहीं, खरबों डोज़ बिकेंगी। कहीं वैक्सीन चार-पाँच डोज़ देने वाली हुई, तब तो सब कल्पना से परे होगा। सोचो इन कंपनियों पर पैसा आसमान से होती बारिश की तरह बरस रहा होगा। और वैक्सीन लोगों को कोरोना से बचा पा रही है या नहीं, यह सब बाद की बात होगी।

“इसलिए मेरा विश्वास अटल है कि सदैव की तरह मार्केट में वही दवाइयाँ आएँगी, जो मरीज़ के मर्ज़ को लंबा खींचने वाली होगी। आख़िर कई ट्रिलियन डॉलर का दवा उद्योग बीमारियों से ही तो आगे बढ़ेगा न। जितनी ज़्यादा बीमारियाँ, बीमार होंगे, उतने ही ज़्यादा दवा कंपनियों, देशों के ख़जाने मोटे होंगे।

“कितने दशक बीत गए, आज-तक एड्स की वैक्सीन या कोई कारगर दवा आई क्या? देखना कभी नहीं आएगी। जो भी वैज्ञानिक लाने की कोशिश करेगा, देख लेना वही मार दिया जाएगा।

“जैसे चीन में उस डॉक्टर को मार दिया गया, जिसने कोरोना वायरस के बारे में बताया था। उसने जब बताया था, तभी सही क़दम उठाए जाते तो यह इतना फैलता ही नहीं। इसीलिए कहती हूँ कि सॉर्स, स्वाइन फ़्लू के बाद बहुत सालों से जो दवा इंडस्ट्री ठहरी-ठहरी हुई सी लग रही थी, उसे कोरोना वायरस अकल्पनीय ऊँची उड़ान भरने के लिए बड़े विशाल, मज़बूत पंख देने जा रहा है। इसका पूरा श्रेय सबसे लालची देश चीन को ही मिलेगा। उसी ने साज़िशन यह वायरस फैलाया।

“साज़िश इसलिए कहती हूँ कि दुनिया भर में इसने अपनी एयरलाइन की आवाजाही बंद नहीं की। जबकि अपने यहाँ इसके केंद्र वुहान से, अपने देश में सारी आवाजाही बंद किए रहा।

“ऐसी बहुत सी बातें हैं वृंदा, इसीलिए मैं कह रही हूँ कि हमारी लड़ाई का निर्णय पहले से ही लिखा हुआ रखा है। ऐसी लड़ाई लड़ कर अपना और तुम्हारा पैसा, तुम्हारी ऊर्जा, समय बर्बाद करने की मूर्खता नहीं करना चाहती। न ही ट्रीटमेंट की पत्थर को भी पिघला देने वाली पीड़ा से गुज़रना से चाहती हूँ। प्लीज़ मेरी प्यारी बड़ी बहन वृंदा, मुझसे ट्रीटमेंट के लिए नहीं कहो।”

अब-तक मेरी बातों को ग़ौर से सुन रही प्यारी वृंदा ने कहा, “फ़्रेशिया, फ़्रेशिया तुम यह सब क्या कहे जा रही हो। मैं नहीं जानती थी कि तुम्हारे दिमाग़ में ऐसी-ऐसी जटिल बातों का अम्बार लगा हुआ है।

“बड़ी होने के नाते तुमसे कह रही हूँ कि तुम्हारे दिमाग़ को शांत रखने के लिए सबसे पहले यह ज़रूरी है कि तुम टीवी पर न्यूज़ देखना, पेपर्स पढ़ना एकदम बंद करो।

“तुमसे तुम्हारे और तुम्हारे लियो के लिए कह रही हूँ कि इन पॉलिटिकल बातों के पीछे स्वयं को छुपाओ नहीं। माना तुम्हारी सारी बातें सही हैं। लेकिन यह भी तो सही है कि इन्हीं दवाओं से बहुत से लोग ठीक भी तो हो रहे हैं।

“हमें इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना है कि इन ठीक होने वाले बहुत से लोगों में से तुम भी होगी। इसलिए मेरी बात को बिल्कुल मना नहीं करो। कल से ही तुम्हारा ट्रीटमेंट शुरू होगा। मैंने तुमसे पहले जितनी बातें कही हैं, उन पर तुमको पूरा विश्वास हो जाए, इसलिए मैं घर पहुँच कर हस्बैंड से तुम्हारी दस बजे तक बात ज़रूर करवाऊँगी।

“तब-तक तुम आराम से लियो के साथ खाना-पीना कर लेना। कल से तुम जहाँ भी जाओगी, मेरे साथ ही जाओगी। कल मैं टाइम से लेने आ जाऊँगी। अब चलती हूँ। अपना ध्यान रखना मेरी प्यारी बहादुर बहन।”

मेरी प्यारी बहन वृंदा जाने लगी तो मेरा मन हुआ कि उसे गले से लगाकर धन्यवाद दूँ। लेकिन कोरोना वायरस के चलते फिज़िकल डिस्टेंसिंग को मेंटेन किया, दूर से ही हाथ हिलाती रही। हम-दोनों की आँखें भरी हुई थीं।

मुझे अटूट विश्वास था कि मेरा ट्रीटमेंट कैसे सही ढंग से शुरू हो जाए, यही सोचती हुई वृंदा कैब से घर जा रही थी। लेकिन मेरे दिमाग़ में बड़ी कठोर बातें चलनी शुरू हो गई थीं। जिससे मेरा चेहरा भी कठोर होता चला जा रहा था।

प्यारी वृंदा के जाने के आधे घंटे के बाद ही मैंने खाना बनाना शुरू किया। उसके पहले लियो के साथ खेलती रही। उसे नाश्ता भी कराया। खाने में मैंने लियो और अपनी फेवरेट चीज़ें ही बनाईं। ख़ूब प्यार से उसे खिलाया और खाया भी।

रात दस बजे प्यारी वृंदा और उसके प्यारे पति से बात की। उसके पति की बातों से भी मेरे आँसू निकलने लगे थे। क्योंकि वह भी बहुत ज़ोर देकर कह रहे थे कि “आप पैसों सहित किसी भी बात की चिंता न करिए। वृंदा और मैं आपके साथ हमेशा खड़े रहेंगे। आप अकेले नहीं हैं।”

बात ख़त्म होने के बाद मैंने मन ही मन कहा, ‘वृंदा तुम्हारा पति और तुम, तुम-दोनों के रूप में मैं देव-दूतों से मिली और बात की। इतनी भाग्यशाली हूँ कि मैं देव-दूतों से मिली। यह सौभाग्य तो बड़े-बड़े संतों को भी नहीं मिलता।’

मैं बड़ी देर तक कभी लियो के पास बैठती, कभी टहलती, कभी डॉक्टर की दी दवा को देखती, कभी वृंदा से छिपाकर जो तमाम दवाएँ स्टोर से निकाल लाई थी, उन्हें भी देखती। क़रीब बारह बजे मुझे लगा कि लियो को नींद आ रही है, तो मैं दो गिलास पानी ले आई।

न जाने क्यों मैं अचानक ही हर काम को बहुत जल्दी-जल्दी करती जा रही थी। मेरे कानों में अभी भी वृंदा और उसके हस्बैंड की बातें गूँज रही थीं। सारे काम पूरे करके मैं बड़े प्यार से लियो को समेटे-समेटे सो गई।”

यह दोनों विशिष्ट जन कुछ ही देर में इतनी गहरी चैन की नींद सोने लगे कि उन्हें देख कर अनिंद्रा से परेशान लोगों में घोर ईर्ष्या उत्पन्न हो सकती थी। अगले दिन सुबह वृंदा जल्दी से तैयार हुई उसके पास पहुँचने के लिए। उसको फ़ोन किया, लेकिन उसने कॉल रिसीव नहीं की। वह उसके घर पहुँची तो बार-बार कॉल-बेल बजाने, गेट को पीटने के बाद भी वह नहीं खुला।

उसने मोबाइल पर कॉल की, उसे रिंग बाहर भी बराबर सुनाई दे रही थी। उसने सोचा कहीं टॉयलेट में तो नहीं है। लेकिन ज़्यादा टाइम होने पर उसने फिर से दरवाज़ा पीटना शुरू किया तो पड़ोसी भी आ गए। और फिर पुलिस भी। दरवाज़ा तोड़ने के बाद पुलिस के साथ जब वह अंदर पहुँची तो देखा, फ़्रेशिया और लियो एक दूसरे को बाँहों में भरे स्थिर पड़े हुए हैं।

उनकी हालत देखते ही वृंदा को यह समझते देर नहीं लगी कि फ़्रेशिया ने वो काम कर दिया है, जिसके बारे में उसे सोचना भी नहीं चाहिए था। वह पत्थर बनी फटी-फटी आँखों से उन्हें देखती रही। आँखों से आँसुओं की धारा ऐसे बहने लगी जैसे कि पत्थर की आँखों से पानी का सोता फूट पड़ा हो।

पुलिस ने फ़्रेशिया के सिर के पास पड़े एक काग़ज़ को पढ़ने के बाद वृंदा से पूछा कि “आप ही वृंदा हैं?” उसके हाँ कहने पर उसने लेटर पढ़कर सुना दिया। फ़्रेशिया ने आख़िर में लिखा था, “मेरी बहुत-बहुत प्यारी बहन वृंदा, मैं निर्णय पहले से ही लिख दिए जाने वाली लड़ाई लड़कर, हारना बिल्कुल नहीं चाहती थी। अपने प्यारे लियो को भी नहीं छोड़ सकती। इसलिए उसे भी साथ ले जा रही हूँ। मुझे माफ़ करना मेरी प्यारी वृंदा।

“अपने पति से भी मेरी तरफ़ से क्षमा माँग लेना, मेरा आख़िरी नमस्कार कहना। हे मेरी प्यारी देव-दूत मेरा यह आख़िरी नमस्कार स्वीकार कर, मुझे भुला दो हमेशा के लिए। नहीं तो याद कर करके तुम रोओगी। मेरी आत्मा भी तुम्हारे आँसुओं पर आँसू बहाने लगेगी। अब आँसू पोंछ लो मेरी प्यारी-प्यारी बड़ी बहन वृंदा...।”

लेकिन वृंदा के आँसू बरसते रहे...

========

प्रदीप श्रीवास्तव